21/09/2025
जहाँ तक मैं इमरान प्रतापगढ़ी को जानता हूँ तो ऐसा कोई मौजू ही नहीं है जिस पर इमरान प्रतापगढ़ी ने न लिखा है | इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने सफर की शुरूआत ही "माँ" से किया है | मुझे वो दिन याद है जब एक 15-16 साल का नौजवान शाइर मंचो पर पहुंचते ही कहता है कि,
"अपने शहर की ताज़ा हवा ले के चला हूं,
हर मर्ज़ की यारों मैं दवा ले के चला हूँ |
मुझको यकीन है कि रहूंगा मैं कामयाब...!
क्योंकि मैं घर से "माँ" की दोआ ले के चला हूँ |
फिर इमरान ने माँ को और गहराई से महसूस किया तो एक मुकम्मल नज़्म आई |
"खुदा मुझसे माँ की मोहब्बत न छीने"
इस नज़्म को जिसने भी सुना अपने आँसू नहीं रोक सका |
इमरान प्रतापगढ़ी फिर आगे बढ़ कर कौमी एकजहती की मिशाल देते हुए कहते हैं कि,
"हम नमाज़ पढ़ते हैं गंगा में वज़ू कर के "
फिर इमरान प्रतापगढ़ी 18-19 की उम्र पर पहुंचते हैं तो उनकी शायरी में उनकी उम्र बोल उठती है तो शेर कुछ यूं होते हैं कि,
पतझड़ों के मौसम में भी बसंत हो जाये,
हर तरफ खुशी चहके, दुख का अंत हो जाए!!
जिस्म आपका जैसे, वेद की ऋचाएं हैं ...!
जो भी गौर से पढ़ ले, वो ही संत हो जाए ||"
या फिर कुछ यूं होते हैं कि,
"सामने देखकर मुँह न मोड़ा करो,
दिल ये नाज़ुक है इसको न तोड़ा करो |
रेशमी डोरियां कैद कर लेती हैं......!
अपनी ज़ुल्फें खुली यूं न छोड़ा करो ||"
उम्र कुछ और हावी हुई तो एक गीत बनकर बोल उठी,
नहाना तेरा पानी में .........!....................!..........................
हसीं चाँद बादल के आगोश में था,
इसे देखकर दिल कहां होश में था |
अरे ! जागते-जागते सो गया था,
तुम्हें इस तरह देखकर खो गया था!
दिवाना तेरा पानी में ......!
नहाना तेरा पानी में...!!
कुछ यूं भी दीवानगी का असर रहा है इमरान प्रतापगढ़ी पर कि उनको लिखना पड़ा,
तेरा चेहरा लगे अप्सरा की तरह,
मैं गगन की तरह, तू धरा की तरह !!
दीवानगी बढ़ती गई और कुछ यूं कह उठे इमरान प्रतापगढ़ी, कि',
सुबह में शाम में और दोपहर में साथ रहती है,
कोई मासूम सी लड़की सफर में साथ रहती है |
इसी दीवानगी ने इमरान प्रतापगढ़ी से लिखवाया कि,
किसी की याद का जंगल है, भागे जा रहा हूँ मैं,
जो किस्मत में नहीं है उसको मांगे जा रहा हूँ मैं!
दुल्हन बनकर किसी की वो कहीं पर सो रही होगी,
मगर मुद्दत हुई है अब भी जागे जा रहा हूँ मैं ||
इसी सिलसिले में कुछ शे'र और आये, जैसे,
"मेरी खुश्बू संभाल कर रखना,
दिल पे काबू, संभाल कर रखना!
तेरे सीने से लग के रोया हूं...,
मेरे आँसू संभाल कर रखना...!!
यहाँ तक कि इमरान प्रतापगढ़ी पर एक समय ऐसा भी आया कि, इन्होने टी सर्च, लैपटॉप और मोबाइल फोन तक को अपनी शायरी में जगह दिया | यहाँ पर भी इनकी उम्र ही बोल रही थी | इसी बीच इमरान प्रतापगढ़ी ने मोबाइल फोन से जुड़ा हुआ एक गीत भी लिखा जो उस वक्त नौजवानों के लबों पर गुनगुनाया जाने लगा | गीत यूं था कि,
फिर उसने मारी है मिसकॉल......!........................................
नाजुक नादुक उंगली जब, कीपैड पे चलती होगी,
उस दम तो मोबाइल की भी जान निकलती होगी!
उसके भी मन में उठते होंगे, अच्छे-बुरे खयाल!!
फिर उसने मारी है मिसकॉल ...!
और शायद यही पराकाष्ठा भी थी उनके दीवानेपन की |
एक समय आया कि उनकी शायरी नौजवानों के सर चढ़कर बोलने लगी तो इमरान प्रतापगढ़ी को और ताकत मिली तो उन्होंने खुलकर बात कहना शुरू किया तो कुछ यूं भी शेर आये कि,
"इन रगों में बहती हो, सच में तुम लहू बनकर,
जिसकी जैसी ख़्वाहिश है, वैसी हूबहू बनकर |
अब नहीं सहा जाता, ये अकेलापन मुझसे,
मेरे घर में आ जाओ, माँ की तुम बहू बनकर!!
फिर उन्होंने खुद ही कहा कि,
बहुत ज्यादा उबलता लहू पसंद नहीं,
बिना दुपट्टे के मुझको बहू पसंद नहीं ||
फिर इमरान प्रतापगढ़ी की ज़िंदगी को उस वक्त के हादसों ने मुतआस्सिर करना शुरू किया तो उनकी शायरी का रूख ही बदल गया | ये दौर ऐसा था कि आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह नौजवानों को जेल में ठूंसा जाता और जब तक वो अदालत में खुद को बेगुनाह साबित करते तब तक उनका कैरियर तबाह बरबाद हो जाया करता | मदरसों को आतंक का अड्डा बताया जाता जो कि सरासर बेबुनियाद था | इन मामलात ने इमरान प्रतापगढ़ी को झकझोर के रख दिया और फिर यहाँ से जो शायरी का रूख बदला तो इमरान प्रतापगढ़ी को एक अलग पहचान मिली जो आज तक बरकरार है और इसी पहचान से कुछ मठाधीश जलने लग गये | हुआ यूं कि मदरसों पर हुये सुनियोजित हमलों के आगे किसी शायर ने बोलने की हिम्मत नहीं दिखाई तब इमरान प्रतापगढ़ी ने अपनी तारीखी नज़्म मदरसा लिखा और कुर्ला के मुसायरे में जब पढ़ा तो बड़े बड़े शाइर हैरत से इमरान प्रतापगढ़ी का मुंह ताकने लगे | .........मंच पर ज़लज़ला आ गया...... |
शायद ही कोई हो जिसने मदरसा नज़्म को न सुना हो |
इस एक नज़्म को इतनी मकबूलियत हासिल हुई कि किसी शायर के जिंदगी भर में इतनी मकबूलियत हासिल नहीं हो पाती | और यहीं से इमरान प्रतापगढ़ी को हिम्मत पैदा हुई और अब वो हुकूमत से आँख मिलाकर शायरी करने लग गये | और साफ लफ्जों में उन्होंने हुकूमत से सवाल किया कि,
"बापू का क़ातिल कौन है?
इंदिरा का क़ातिल कौन है?
राजीव को किसने कत्ल किया?
इसपर संसद क्यों मौन है??
नक्सली उधर हथियार उठा, लश्कर के लश्कर आते हैं,
अफसोस मगर आतंक के हर इल्जाम मेरे सर आते हैं!!
इसके साथ ही साथ उन्होंने दिल्ली से सवाल किया,
"दिल्ली बता! धोका तुझे कब हमने दिया है?
और .........
"मुझको कुछ बातें कहनी हैं, इस गूंगी बहरी दिल्ली से!!
और फिर एक के बाद एक सवाल पैदा करती हुई नज़्म आने का सिलसिला शुरू हो गया जो अब तक जारी है |
इमरान प्रतापगढ़ी ने भारत माँ (मादरे वतन) को मुखातिब एक नज़्म भी पढ़ा जो बेहद मकबूल हुई |
"सदियों से यहीं पर रहता है,
जाने कितने गम सहता है?
भीगी पलकों से एक बेचा,
भारत माँ से ये कहता है!!
पुरखे हम सब के गोद में तेरी, खाक ओढ़कर लेटे हैं,
माँ! हम भी तेरे बेटे हैं! माँ हम भी तेरे बेटे हैं!!
इस नज़्म ने भीे लोगों की आँखों में आँसू ला दिये | यही नहीं इस नज़्म के बाद भी माँ भारती को पुकारती हुई एक और तारीखी नज़्म इमरान प्रतापगढ़ी ने जब दुबई में पहली बार पढ़ा तो मंच पर मौजूद शोअरा हैरत से इमरान प्रतापगढ़ी को देखने लगे......... वो नज़्म थी "कश्मीर".........नज़्म नहीं मानो कश्मीर बोल रहा हो......,
हाँ मैं कश्मीर हूँ, हाँ मैं कश्मीर हूँ!! ...................................................
ना कहानी हूं ना कोई किस्सा हूं मैं,
मेरे भारत तेरा एक हिस्सा हूँ मैं... ||
जिसको गाया नहीं जा सका आज तक,
ऐसा एक दर्द हूं, ऐसी एक पीर हूं!!
हाँ मैं कश्मीर हूँ ............
और यहीं से इमरान प्रतापगढ़ी का डंका विदेशों में भी बजने लगा |
इमरान प्रतापगढ़ी ने देश, समाज, गाँव, परदेश, हर मौजू पर अपनी बेबाक शायरी से लोगों का दिल जीत लिया है!
इसके आगे का इमरान प्रतापगढ़ी तो आप सब भी जानते ही होंगे | सच तो ये है कि इमरान प्रतापगढ़ी को लफ्जों में बयान ही नहीं किया जा सकता है इमरान प्रतापगढ़ी को समझने के लिए कुछ वक्त इमरान प्रतापगढ़ी के साथ गुजारना पड़ेगा क्योंकि इमरान प्रतापगढ़ी को लिखा नहीं जा सकता है सिर्फ महसूस किया जा सकता है |
बाकी फिर कभी ............
अबू शहमा प्रतापगढ़ी के क़लम से