06/08/2026
जो घर में आए थे पंछी सबको अपना सुख संसार मिला
दाना पानी हृदय मिला सबने मिलकर आकाश रचा
जितना था वह सब था अपना , अपना पराया कब जाना था
सूर्योदय से क्षितिज शाम तक निज अम्बर में ही उड़ना था...
शिकारियों को जलन बहुत थी कैसा अद्भुद संसार मिला
पंछी को लालच सब देते धीरे धीरे अहंकार बढ़ा...
क्या क्रूर प्रहार किया निष्ठुर मन घर मैं ही उत्पात मचा
अब उड़ने को आतुर सब बैठे संघर्षों का दीप जला
जब जब पंछी उड़े छोड़ घर बहका बहका सा फिरता है
अपना आकाश संभालो पहले क्या निज स्वभाव से डरता है
द्वंद्वों में जो घिरे खड़े हैं क्या अपना मकसद भूल गए हैं
रोम रोम है जिनका भगवा बह हरि को देने श्राप खड़े हैं
सेवा और समर्पण से हम जितना भी आकाश गढ़े
अब कहते हैं कि हो नव अम्बर और नए परों की आश करें
सबने तेरा अम्बर देखा ना तुझ पर विश्वास किया
नई उड़ानों से बस भरमा दिया भ्रमित आकाश थमा
जब जब उड़ा छोड़ घर पंछी सबका बना शिकार उड़ा
अपना है जो ध्येय समर्पण क्यों उसका विश्वास डिगा
ध्येय लक़्छ सेवा ही अपनी स्वांस स्वांस में राम भरा
राक्षस दल जो चढ़े रथों पर राम भक्त का स्वांग रचा
राम राज्य के याचक कब राज तिलक क्या मांगा है
भरत जगत में बड़े तपस्वी हर क्षण सेवक पद ही चाहा है
एक चक्रव्यूह अंतर मन का जो जीते बही पार्थ कहलाए
धर्म कि खातिर अजर अमर भी हंसकर मृत्यु गले लगाए
आंख बड़ी छोटी जैसी भी ध्येय साध्य निज जानो
चंद्र कला दिखला दिखला कर यूं समुद्र मत छेड़ो
आकाश है सबके लिए सब यहां उड़ते रहो
कौन है जो घर बनाता आकाश में जगते रहो
अनुशासन निज भाव जगा अनुशासन फिर स्वा का हो
है जमीन अधिकार हमारी आसमान यह सबका हो....🚩🙏