06/02/2026
आज का समाज एक गहरे नैतिक संकट से गुजरता प्रतीत होता है।
अनुभव वही व्यक्ति कर सकता है, जिस पर अन्याय स्वयं घटित होता है।
दुखद तथ्य यह है कि अधिकार अब संविधान से नहीं, बल्कि आदेश से संचालित होने लगे हैं।
व्यक्ति की नहीं, भीड़ की स्वीकार्यता मायने रखने लगी है।
राजनीति का केंद्र जनकल्याण न होकर वोट बैंक बनता जा रहा है, जहाँ सत्य, नैतिकता और मानवता पीछे छूटती जा रही हैं।
न सच बोलने वाला सुरक्षित है, न सच सुनने वाला इच्छुक।
कानून और नियम कागज़ों तक सीमित होते दिखते हैं, जबकि व्यवहार में “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की स्थिति दिखाई देती है।
ऐसे समय में न्याय दूर-दूर तक समझौता करता हुआ प्रतीत होता है।
आम नागरिक असहाय है और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ती जा रही है।
यह स्थिति केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि आत्ममंथन की माँग करती है—कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।