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15/05/2026

नगरोटा बगवां में क्यों हुआ था गुलेर की उस रानी का सार्वजनिक अभिनंदन? सरकारी शिक्षा के इतिहास की अनूठी मिसाल कमला गुलेरिया

विनोद भावुक। धर्मशाला

साल 1971 की बात है। कांगड़ा जिले के नगरोटा बगवां स्थित गर्ल्स हाई स्कूल की मुख्य अध्यापिका का तबादला धर्मशाला हो गया। आमतौर पर किसी शिक्षक या अध्यापिका के तबादले पर एक औपचारिक विदाई समारोह होता है, शायद कोई अभिनंदन पत्र दिया जाता है, लेकिन यहां तो कुछ अलग ही हुआ। नगरोटा बाजार में एक शोभा यात्रा निकाली गई।

जगह-जगह उनका स्वागत किया गया, फूलों की बौछारें हुईं और शहर की हर बड़ी हस्ती, व्यापारी से लेकर अधिकारी तक उस जुलूस में शामिल थे। यह था उस दौर की एक अनोखी शिक्षिका कमला गुलेरिया का प्रभाव। वह सिर्फ एक अध्यापिका नहीं थीं, बल्कि उन हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा थीं, जिन्होंने उनके संपर्क में आकर पढ़ना-लिखना सीखा।

शिक्षिका का जबरदस्त सम्मान

कमला गुलेरिया ने नगरोटा बगवां के गर्ल्स हाई स्कूल में मुख्य अध्यापिका के तौर पर कार्य किया। उनके काम करने का तरीका बहुत अलग था। वह न सिर्फ पढ़ाती थीं, बल्कि छात्राओं को जीवन जीने का तरीका सिखाती थीं। अनुशासन, समय की पाबंदी, कर्तव्यपरायणता, ये ऐसे गुण थे जो वह अपनी छात्राओं में भरती थीं और जीने का हुनर सिखाती थीं।

जब 1971 में उनका तबादला धर्मशाला हुआ, तो नगरोटा बाजार के लोगों ने फैसला किया कि ऐसी अध्यापिका को सिर्फ हैंडशेक करके विदा नहीं किया जा सकता। उन्होंने एक भव्य शोभा यात्रा निकाली। लोगों ने जगह-जगह मालाएं पहनाकर उनका अभिनंदन किया। कस्बे की हर बड़ी हस्ती, व्यापारी, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता उस यात्रा में शामिल थे।

शादी के बाद की पढ़ाई

आज हम आपको इसी कमला गुलेरिया की कहानी बताने जा रहे हैं, जो गुलेर राज परिवार की बहू थी, लेकिन उसने उस दौर में अपनी मेहनत और लगन से शिक्षा के क्षेत्र में हिमाचल का नाम रोशन किया। 29 अगस्त, 1929 को जम्मू-कश्मीर के सांबा में कमला का जन्म हुआ। उनके पिता कर्नल बलदेव सिंह सम्याल जम्मू-कश्मीर के पहले इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस थे।

कमला ने श्रीनगर से दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की। बाद में शादी के बाद भी उन्होंने पढ़ना जारी रखा। यह वह समय था जब ज्यादातर महिलाएं घर की चारदीवारी तक सीमित रहती थीं। उन्होंने इस रीत को तोड़कर डबल एमए, बीएड और एमएड किया। 1947 में उनका विवाह नगेंद्र सिंह गुलेरिया से हुआ, जो गुलेर रियासत से संबंध रखते थे।

पढ़ने के साथ खेलने में माहिर

राजपरिवार में शादी के बाद कमला गुलेरिया आराम की जिंदगी जी सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपने आप को चुनौती दी। उन्होंने अध्यापन को अपना पेशा बनाया और अपने दम पर एक मुकाम हासिल किया। वह कहती थीं कि महिलाओं को आत्मनिर्भर होना चाहिए। शिक्षा ही वह माध्यम है जो उन्हें सशक्त बना सकता है। उन्होंने वही किया जो उन्होंने सिखाया।

उनके बेटे द ट्रिब्यून के पत्रकार राघव गुलेरिया बताते हैं कि उनकी माता एक अच्छी खिलाड़ी भी थीं। वह सिर्फ पढ़ाने भर तक सीमित नहीं थीं, बल्कि कई खेलों में उनकी गहरी रुचि थी। प्रदेश के कई खेल संघों में वह पदाधिकारी भी रहीं। उनका मानना था कि शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक फिटनेस भी जरूरी है। वह अपनी छात्राओं को खेलों के लिए भी प्रेरित करती थीं।

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित

वह हिमाचल प्रदेश साहित्यकार परिषद की संस्थापक सदस्य भी थीं। उन्होंने कई लेख और कविताएं भी लिखीं। अपने लंबे शिक्षण काल में कमला गुलेरिया ने कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया। वह जिला शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान धर्मशाला की प्राचार्य रहीं। वह बॉयज और गर्ल स्कूल धर्मशाला की प्रधानाचार्य भी रहीं। हर पद पर उन्होंने एक नया आयाम स्थापित किया।

कमला गुलेरिया का काम सिर्फ विद्यार्थियों और अभिभावकों तक ही सीमित नहीं था। उनकी मेहनत को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। 1971 में उन्हें एनसीईआरटी का राष्ट्रीय पुरस्कार (राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार) प्रदान किया गया। वह हिमाचल प्रदेश की पहली महिला थीं जिन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला। 1975 में हिमाचल राज्य पुरस्कार और प्रो. डी.सी. शर्मा मेमोरियल अवार्ड भी मिला।

आदर के साथ याद की जाती हैं कमला गुलेरिया

93 वर्ष की आयु में, 5 मार्च 2021 को धर्मशाला में अपने घर में कमला गुलेरिया का निधन हो गया। उनके जाने से शिक्षा जगत में एक ऐसी रिक्ति आ गई जिसे भरना मुश्किल है, लेकिन उनकी विरासत, उनके जीवन की शिक्षाएं हमेशा जीवित रहेगी। उनके अधीन काम करने वाले अध्यापक और अध्यापिकाएं आज भी उन्हें आदर के साथ याद करते हैं।

कमला गुलेरिया की कहानी केवल एक महिला की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस शिक्षा की ताकत की कहानी है, जो बदलाव ला सकती है। यह उस महिला सशक्तिकरण की कहानी है, जब महिलाएं खुद को अपनी मेहनत से ऊंचाइयों पर ले जाती हैं। यह उस समुदाय की सोच की कहानी है, जो अपने शिक्षक को सम्मान देना जानता है।

ग्रेट 🌹
14/05/2026

ग्रेट 🌹

कांगड़ा के 86 साल के डॉ. श्याम सिंह पठानिया, जिनके पास हैं 6 पीएचडी, 21 मास्टर और 15 प्रोफेशनल डिग्रियां! पढ़ाई के दीवाने ने 700 किताबें लिख रचा इतिहास

अशोक पठानिया। मलाहड़ी (कांगड़ा)

क्या आपने कभी सोचा है कि एक इंसान अपने जीवन में कितनी डिग्रियां हासिल कर सकता है? 2-4 तो आम बात है, लेकिन क्या 6 पीएचडी, 21 मास्टर डिग्री और 15 प्रोफेशनल डिग्रियां? यकीन नहीं होता न? लेकिन ये सच है। मिलिए चंडीगढ़ के रहने वाले कांगड़ा जिला के इंदौरा ब्लॉक के मलाहड़ी गांव के डॉ. श्याम सिंह पठानिया से, जिनकी उम्र 86 साल है। अब भी पढ़ने-लिखने का जुनून कम नहीं हुआ।

बात 3 नवंबर 1942 की है, जब डॉ. पठानिया का जन्म लाहौर में हुआ। उनके पिता शलक सिंह पठानिया वहां सरकारी अधिकारी थे। लेकिन भारत विभाजन का वो दौर आया तो परिवार दिल्ली आया और फिर चंडीगढ़ में बस गया। डॉ. पठानिया पंजाब लेखाकर विभाग में अफसर बने। शिमला और चंडीगढ़ में नौकरी की और साल 2002 में सीनियर ऑडिट ऑफिसर के पद से रिटायर हुए।

रिटायर होकर शुरू किया पढ़ना- लिखना

पंजाब यूनिवर्सिटी से एमबीए, एमसीए, फाइनेंस एंड कंट्रोल में मास्टर... फिर मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी से एमबीए, विनायक मिशन यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स, साइकोलॉजी, इंग्लिश में मास्टर... अलागप्पा यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस, एजुकेशन और सेक्सोलॉजी में भी एमए! जी हां, ‘सेक्स एंड सोशियो इकोनॉमिक स्टेटस’ जैसे विषय पर भी उन्होंने पढ़ाई की।

वैदिक ज्योतिष, वास्तु, टैरो, फेंगशुई, न्यूमरोलॉजी, पामिस्ट्री, ये तो उनके शौक के विषय हैं। उदयपुर के श्री महर्षि कॉलेज ऑफ वैदिक एस्ट्रोलॉजी से तो उन्होंने ढेरों डिप्लोमा और डिग्रियां ले रखी हैं। अब सोचिए, रिटायरमेंट के बाद आम आदमी आराम करता है, डॉ. पठानिया ने तो पढ़ाई को ही अपना मिशन बना लिया! अब आप पूछेंगे कि इतनी सारी डिग्रियां कैसे हासिल कर लीं? तो जवाब है जुनून!

पीएचडी में भी कमाल, प्रोफेशनल डिग्रियां बेमिसाल

डॉ. पठानिया ने ‘Reference Effect of Pressure of Pyramid’ विषय पर वास्तुकला में पीएचडी की है। ‘Planets Intravenal Relief’ पर ज्योतिष में पीएचडी, करने के बाद "इंजीनियर्स टेक्सचर एंड स्केप" विषय पर भी पीएचडी है। उन्होंने कैंसर, हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, शुगर पर ग्रहों के प्रभाव पर भी रिसर्च कर डाली। यानी विज्ञान और ज्योतिष का अनूठा संगम!

डॉ. पठानिया ने कंपनी सेक्रेटरी, कॉस्ट अकाउंटेंटी, इनकम टैक्स अथॉराइज्ड रिप्रेजेंटेटिव, कंप्यूटर एप्लीकेशन, नेचुरोपैथी, योग...न जाने कितने प्रोफेसनल कोर्स किए हैं। उन्होंने हर विषय में हाथ आजमाया, चाहे वो संस्कृत हो या क्रिमिनोलॉजी, पॉलिटिकल साइंस हो या सोशल वर्क। वह अपनी पेंशन की ज्यादातर रकम ये किताबें खरीदने और पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं।

लिख चुके हैं 700 किताबें

डॉ. पठानिया अब तक अलग-अलग विषयों पर 700 किताबें लिख चुके हैं! सात सौ... ये कोई टाइपो नहीं है। 86 साल की उम्र में भी इनकी कलम नहीं रुकती। कहते हैं न कि उम्र दिमाग से बड़ी होती है... लेकिन इन्होंने तो उम्र को भी मात दे दी। इस उम्र में भी उनका पढ़ना लिखना निरंतर जारी है। यही उनका जीवन रक्षक टॉनिक है।

डॉ. श्याम सिंह पठानिया सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक मिसाल हैं। कहते हैं कि पढ़ना कोई उम्र नहीं देखता, और इन्होंने ये साबित कर दिया। रिटायरमेंट के बाद भी वे खाली नहीं बैठे। आज के युवा जहां एक किताब खोलने में आलस करते हैं, वहीं 86 साल के इस बुजुर्ग ने 700 किताबें लिख डालीं।तो जब आप लगे किअब उम्र हो गई पढ़ने की नहीं, तो डॉ. पठानिया का चेहरा याद कर लीजिए।

12/05/2026
28/04/2026

कांगड़ा की मंगला, करधनी में लाहौर की शाही मुहर
बेटी को 25 रुपये में बेचने वाले माँ-बाप… क्या उनके पास कोई और चारा था?
#कांगड़ा #लकड़हारे_की_बेटी #हिमाचल_प्रदेश

   ‘पर्ल ऑफ़ इंडिया:  ब्रिटिश राज की समर कैपिटल में भारतीय नज़ाकत की चमक प्रिंसेस सीता देवी
25/12/2025

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  केक और चॉकलेट का स्वाद लेने लंदन से शिमला आती थीं ब्रिटेन की गोरियां, इटैलियन शेफ फेडरिको पेलिटी के हुनर का कमाल
23/12/2025

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नादौन में दोस्ती में बदला कहलूर में गुरु गोविंद सिंह से हुआ टकराव,, राजा भीम चंद ने मुग़लों को रोका और इतिहास में अमिट छ...
23/12/2025

नादौन में दोस्ती में बदला कहलूर में गुरु गोविंद सिंह से हुआ टकराव,, राजा भीम चंद ने मुग़लों को रोका और इतिहास में अमिट छाप छोड़ी

22/12/2025

धर्मशाला से तिब्बती चिकित्सा को अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचाने वाली डॉक्टर डोल्मा, दलाई लामा की डॉक्टर के तौर पर रहीं मशहूर

विनोद भावुक। धर्मशाला

साल 1959 में जब 14वें दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आए, तब लोबसंग डोल्मा भी अपनी दो छोटी बेटियों को पीठ पर बांधकर इस कठिन यात्रा में शामिल हुईं। निर्वासन के शुरुआती वर्षों में उन्होंने पालमपुर, मनाली, लाहौल और आसपास के इलाकों में सड़क निर्माण कार्य तक किया, ताकि परिवार का पालन-पोषण हो सके।

धर्मशाला पहुंचने पर उन्हें तिब्बती चिकित्सा संस्थान मेन टसी खाँग में इसलिए शामिल होने से पहले मना कर दिया गया क्योंकि वे महिला थीं, लेकिन समय बदला। 1972 में वे न केवल इस संस्थान से जुड़ीं, बल्कि इस चिकित्सा संस्थान की पहली महिला मुख्य चिकित्सक बनीं और सारी दुनिया में दलाई लामा की डॉक्टर के रूप में जानी गईं।

तिब्बत की धरती पर जन्म, चिकित्सा की विरासत

6 जुलाई 1934 को तिब्बत के क्यिरोंग क्षेत्र में जन्मी लोबसंग डोल्मा 13वीं पीढ़ी की पारंपरिक तिब्बती चिकित्सक थीं। चिकित्सा उनके लिए पेशा नहीं, बल्कि विरासत थी। अपने पिता से उन्होंने बचपन में ही तिब्बती चिकित्सा, प्रशासन और सेवा का गहन प्रशिक्षण लिया। उन्होंने तिब्बती चिकित्सा, ज्योतिष और बौद्ध दर्शन में उच्च शिक्षा प्राप्त की। कठिन साधना, कठोर अध्ययन और सेवा संतुलन उनकी पहचान बना।

धर्मशाला से उन्होंने तिब्बती चिकित्सा को अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचाया। विश्व स्वास्थ्य संस्थान, विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में उनके व्याख्यानों ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई। बाद में उन्होंने निजी क्लिनिक खोला और महिलाओं व बच्चों के इलाज में खुद को समर्पित किया। कई जगहों पर उन्होंने निःशुल्क चिकित्सा सेवा भी दी।

मां की विरासत को संरक्षित कर रही बेटी

15 दिसंबर 1989 को धर्मशाला में उनका निधन हुआ। आज भी धर्मशाला में उनका क्लिनिक मशहूर है, जिसे उनकी बेटी आगे बढ़ा रही हैं। इस क्लीनिक में तिब्बती चिकित्सा पद्दति से उपचार किया जाता है। आज भी यह क्लीनिक कैंसर जैसी असाध्य रोग के उपचार के देश भर में मशहूर है और देश के कई हिस्सों से लोग उपचार के लिए यहाँ आते हैं।

डॉ. लोबसंग डोल्मा खंगकर की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस, महिला सशक्तिकरण की कहानी है। यह प्रेरककथा तिब्बती निर्वासन इतिहास की भी जीवंत मिसाल है। मनाली और धर्मशाला उनकी यात्रा के ऐसे पड़ाव हैं, जहां दर्द भी था और उम्मीद भी। यह इस बात की भी गवाही है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है।

  सिक्किम की डॉक्टर लड़की को हमीरपुर के डॉक्टर लड़के से हुआ प्यार, दोनों ने मिलकर शाहपुर को ‘पल्स मेडिसिटी’ अस्पताल का दिय...
11/12/2025

सिक्किम की डॉक्टर लड़की को हमीरपुर के डॉक्टर लड़के से हुआ प्यार, दोनों ने मिलकर शाहपुर को ‘पल्स मेडिसिटी’ अस्पताल का दिया उपहार

सिक्किम की डॉक्टर लड़की को हमीरपुर के डॉक्टर लड़के से हुआ प्यार, दोनों ने मिलकर शाहपुर को ‘पल्स मेडिसिटी’ अस्पताल का दिया उपहार

विनोद भावुक। शाहपुर

प्यार रास्ते नहीं पूछता, बस मंज़िल चुन लेता है। कुछ ऐसा ही हुआ जब सिक्किम की एक डॉक्टर लड़की और हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर के डॉक्टर की राहें एक-दूजे से टकराईं। पहले साथ काम शुरू हुआ, फिर अपनापन बढ़ा और देखते ही देखते यह रिश्ता दिल से दिल तक पहुँच गया। चिकित्सा की ड्यूटी, अस्पतालों की व्यस्त जिंदगी और मरीजों की चिंता, इन्हीं सबके बीच जन्मी एक सुंदर प्रेम कहानी।

प्रेमी जीवन साथी बने और यह संयोग कांगड़ा जिला के शाहपुर कस्बे के लोगों के लिए वरदान बन गया। आज यह दोनों एनेस्थीसिया और क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉ. रिपिन हीरा और गाइनी, ऑब्सटेट्रिक्स और इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. हीशे पालमु शाहपुर में ‘पल्स मेडिसिटी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल चला रहे हैं, जो थोड़े से समय में लोगों का विश्वास जीतने में सफल रहा है।

शाहपुर में आकर सच हुआ सपना

सिक्किम की पहाड़ियां हो या हिमाचल प्रदेश की घाटियां, सपने हर जगह एक जैसे होते हैं। डॉ. हीशे ने सिक्किम से एमबीबीएस, मणिपाल से पीजी और इनफर्टिलिटी में फ़ेलोशिप की। हमीरपुर के डॉ. रिपिन ने एमबीबीएस, पीजी, डीएनबी और देश के कई राज्यों में क्रिटिकल केयर की ट्रेनिंग की।

वक्त गुजरा, अनुभव बढ़ा और दोनों ने महसूस किया कि अगर अपना अस्पताल हो, अपनी गाइडलाइन हो और मरीजों को किसी दबाव के बिना इलाज दिया जाए— तो बहुत कुछ बदल सकता है। यही सोच उन्हें शाहपुर ले आई और नींव पड़ी शाहपुर के आधुनिक और भरोसेमंद अस्पताल की।

ऐसे पड़ी मॉडर्न अस्पताल की नींव

एक खाली पड़ी बिल्डिंग लीज़ पर ली गई, दीवारें बदलीं, सोच बदली, सुविधाएं जोड़ी गईं और धीरे-धीरे खड़ा हुआ पल्स मेडिसिटी अस्पताल, जिसमें आज मेडिसिन और क्रिटिकल केयर, गाइनी व ऑब्सटेट्रिक्स तथा इनफर्टिलिटी, ऑर्थोपेडिक्स: ट्रॉमा, जॉइंट रिप्लेसमेंट, आर्थ्रोस्कोपी रेडियोलॉजी, यूरोलॉजी, न्यूरो व कार्डियक इमरजेंसी और 24×7 लैब व इमरजेंसी सेवाएँ उपलब्ध हैं।

पल्स मेडिसिटी शाहपुर के लिए सिर्फ अस्पताल नहीं, रोज़गार का नया केंद्र भी है। नर्सिंग, लैब टेक्नीशियन, फ्रंट डेस्क, सिक्योरिटी, ड्राइवर और अकाउंट्स जैसी पोस्टों पर 95% लोग शाहपुर और आसपास के गांवों के हैं। यह अस्पताल शाहपुर के 50 से अधिक परिवारों को घर के पास रोजगार प्रदान कर रहा है।

किफायती और बेहतर इलाज का भरोसा

डॉ. रिपिन कहते हैं कि हम चाहते हैं कि मरीजों को किफायती और बेहतर इलाज मिले। प्राइवेट अस्पताल महंगे और डराने वाले लगते हैं। हम उस छवि को बदलना चाहते हैं। जल्द ही इस अस्पताल को और बड़ा करने की प्लानिंग जारी है। डॉ. हीशे कहती हैं कि इंफर्टिलिटी, डिलीवरी और महिला स्वास्थ्य के लिए शाहपुर और आसपास की महिलाओं को अब दूर नहीं जाना पड़ेगा।

3 नवंबर से इस अस्पताल का संचालन शुरू किया जा चुका है। शाहपुर के लिए यह सिर्फ अस्पताल नहीं, एक प्रेम भरी साझेदारी की सौगात है। जहाँ दो डॉक्टरों का प्यार एक परिवार बना, वहीं उनकी सोच और मेहनत से शाहपुर को मिला एक ऐसा अस्पताल, जो सपनों से जन्मा है, सेवा से चलता है और लोगों के भरोसे को बढ़ाता है।




05/11/2025

विशेष कैदी मुद्रा : लंदन की नीलामी में 250 ब्रिटिश पाउंड में बिका योल कैम्प में छ्पा एक आन्ना का नोट

विनोद भावुक। धर्मशाला

दूसरे विश्व युद्ध के दिनों में शांत कांगड़ा घाटी में स्थित योल कैंप एक ऐसा नाम था जो ब्रिटिश भारत में प्रिजनर ऑफ वॉर (POW) की दुनिया से जुड़ा हुआ था। यहीं पर 1941 से 1945 के बीच, युद्धबंदियों के लिए विशेष कैदी मुद्रा (Prisoner-of-War Money) छापी जाती थी।

हाल ही में ऐसी ही एक दुर्लभ मुद्रा ‘1 आन्ना, योल कैंप 25’ लंदन की एक अंतरराष्ट्रीय नीलामी में 250 ब्रिटिश पाउंड में बिकी। यह नोट बैंगनी और पीले रंग की छपाई में है, जिसमें पीछे की तरफ कुछ नहीं लिखा गया। विशेषज्ञ इसे ‘Campbell 5323’ के नाम से पहचानते हैं।

बंदी शिविर के भीतर उपयोग होने वाली करन्सी

योल कैंप उस दौर में ब्रिटिश साम्राज्य का एक बड़ा बंदी शिविर था, जहां इटालियन, जर्मन और जापानी युद्धबंदी रखे गए थे। उन्हें बाहर की आर्थिक व्यवस्था से काटने के लिए अलग मुद्रा दी गई, जिसे सिर्फ कैंप के भीतर ही उपयोग किया जा सकता था।

यह मुद्रा असली रुपये की जगह, केवल सामान खरीदने या आदान-प्रदान में काम आती थी। यानी यह करन्सी कैदियों की एक ‘सीमित अर्थव्यवस्था’ थी। यह मुद्रा असली रुपये नहीं थी और सिर्फ कैदी ही प्रयोग करते थे।

आज यह एक आन्ना का नोट न केवल इतिहास की धरोहर है, बल्कि एक प्रतीक है उस दौर का जब युद्ध के बीच भी प्रशासन, अनुशासन और नियंत्रण की सीमाएँ कागज पर खींच दी जाती थीं। एक आन्ना का यह नोट ब्रिटिश भारत की जंग की कहानी कहता है।

यह दुर्लभ नोट अब संग्राहकों के बीच एक इतिहास का जीवंत टुकड़ा बन चुका है, जो बताता है कि योल का यह छोटा-सा कैम्प, कभी वैश्विक युद्ध के नक्शे पर एक अहम बिंदु था। यहाँ सालों विदेशी युद्धबंदी रखे गए थे।

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Dhagwar, Dharamshala, Kangra
Dharamsala
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