15/05/2026
नगरोटा बगवां में क्यों हुआ था गुलेर की उस रानी का सार्वजनिक अभिनंदन? सरकारी शिक्षा के इतिहास की अनूठी मिसाल कमला गुलेरिया
विनोद भावुक। धर्मशाला
साल 1971 की बात है। कांगड़ा जिले के नगरोटा बगवां स्थित गर्ल्स हाई स्कूल की मुख्य अध्यापिका का तबादला धर्मशाला हो गया। आमतौर पर किसी शिक्षक या अध्यापिका के तबादले पर एक औपचारिक विदाई समारोह होता है, शायद कोई अभिनंदन पत्र दिया जाता है, लेकिन यहां तो कुछ अलग ही हुआ। नगरोटा बाजार में एक शोभा यात्रा निकाली गई।
जगह-जगह उनका स्वागत किया गया, फूलों की बौछारें हुईं और शहर की हर बड़ी हस्ती, व्यापारी से लेकर अधिकारी तक उस जुलूस में शामिल थे। यह था उस दौर की एक अनोखी शिक्षिका कमला गुलेरिया का प्रभाव। वह सिर्फ एक अध्यापिका नहीं थीं, बल्कि उन हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा थीं, जिन्होंने उनके संपर्क में आकर पढ़ना-लिखना सीखा।
शिक्षिका का जबरदस्त सम्मान
कमला गुलेरिया ने नगरोटा बगवां के गर्ल्स हाई स्कूल में मुख्य अध्यापिका के तौर पर कार्य किया। उनके काम करने का तरीका बहुत अलग था। वह न सिर्फ पढ़ाती थीं, बल्कि छात्राओं को जीवन जीने का तरीका सिखाती थीं। अनुशासन, समय की पाबंदी, कर्तव्यपरायणता, ये ऐसे गुण थे जो वह अपनी छात्राओं में भरती थीं और जीने का हुनर सिखाती थीं।
जब 1971 में उनका तबादला धर्मशाला हुआ, तो नगरोटा बाजार के लोगों ने फैसला किया कि ऐसी अध्यापिका को सिर्फ हैंडशेक करके विदा नहीं किया जा सकता। उन्होंने एक भव्य शोभा यात्रा निकाली। लोगों ने जगह-जगह मालाएं पहनाकर उनका अभिनंदन किया। कस्बे की हर बड़ी हस्ती, व्यापारी, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता उस यात्रा में शामिल थे।
शादी के बाद की पढ़ाई
आज हम आपको इसी कमला गुलेरिया की कहानी बताने जा रहे हैं, जो गुलेर राज परिवार की बहू थी, लेकिन उसने उस दौर में अपनी मेहनत और लगन से शिक्षा के क्षेत्र में हिमाचल का नाम रोशन किया। 29 अगस्त, 1929 को जम्मू-कश्मीर के सांबा में कमला का जन्म हुआ। उनके पिता कर्नल बलदेव सिंह सम्याल जम्मू-कश्मीर के पहले इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस थे।
कमला ने श्रीनगर से दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की। बाद में शादी के बाद भी उन्होंने पढ़ना जारी रखा। यह वह समय था जब ज्यादातर महिलाएं घर की चारदीवारी तक सीमित रहती थीं। उन्होंने इस रीत को तोड़कर डबल एमए, बीएड और एमएड किया। 1947 में उनका विवाह नगेंद्र सिंह गुलेरिया से हुआ, जो गुलेर रियासत से संबंध रखते थे।
पढ़ने के साथ खेलने में माहिर
राजपरिवार में शादी के बाद कमला गुलेरिया आराम की जिंदगी जी सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपने आप को चुनौती दी। उन्होंने अध्यापन को अपना पेशा बनाया और अपने दम पर एक मुकाम हासिल किया। वह कहती थीं कि महिलाओं को आत्मनिर्भर होना चाहिए। शिक्षा ही वह माध्यम है जो उन्हें सशक्त बना सकता है। उन्होंने वही किया जो उन्होंने सिखाया।
उनके बेटे द ट्रिब्यून के पत्रकार राघव गुलेरिया बताते हैं कि उनकी माता एक अच्छी खिलाड़ी भी थीं। वह सिर्फ पढ़ाने भर तक सीमित नहीं थीं, बल्कि कई खेलों में उनकी गहरी रुचि थी। प्रदेश के कई खेल संघों में वह पदाधिकारी भी रहीं। उनका मानना था कि शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक फिटनेस भी जरूरी है। वह अपनी छात्राओं को खेलों के लिए भी प्रेरित करती थीं।
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित
वह हिमाचल प्रदेश साहित्यकार परिषद की संस्थापक सदस्य भी थीं। उन्होंने कई लेख और कविताएं भी लिखीं। अपने लंबे शिक्षण काल में कमला गुलेरिया ने कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया। वह जिला शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान धर्मशाला की प्राचार्य रहीं। वह बॉयज और गर्ल स्कूल धर्मशाला की प्रधानाचार्य भी रहीं। हर पद पर उन्होंने एक नया आयाम स्थापित किया।
कमला गुलेरिया का काम सिर्फ विद्यार्थियों और अभिभावकों तक ही सीमित नहीं था। उनकी मेहनत को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। 1971 में उन्हें एनसीईआरटी का राष्ट्रीय पुरस्कार (राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार) प्रदान किया गया। वह हिमाचल प्रदेश की पहली महिला थीं जिन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला। 1975 में हिमाचल राज्य पुरस्कार और प्रो. डी.सी. शर्मा मेमोरियल अवार्ड भी मिला।
आदर के साथ याद की जाती हैं कमला गुलेरिया
93 वर्ष की आयु में, 5 मार्च 2021 को धर्मशाला में अपने घर में कमला गुलेरिया का निधन हो गया। उनके जाने से शिक्षा जगत में एक ऐसी रिक्ति आ गई जिसे भरना मुश्किल है, लेकिन उनकी विरासत, उनके जीवन की शिक्षाएं हमेशा जीवित रहेगी। उनके अधीन काम करने वाले अध्यापक और अध्यापिकाएं आज भी उन्हें आदर के साथ याद करते हैं।
कमला गुलेरिया की कहानी केवल एक महिला की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस शिक्षा की ताकत की कहानी है, जो बदलाव ला सकती है। यह उस महिला सशक्तिकरण की कहानी है, जब महिलाएं खुद को अपनी मेहनत से ऊंचाइयों पर ले जाती हैं। यह उस समुदाय की सोच की कहानी है, जो अपने शिक्षक को सम्मान देना जानता है।