08/07/2026
“आरव ने कहा है—कंपनी घर दे रही है, फर्नीचर भी… अब तुम बताओ, मैं क्या माँगूँ?”
अदिति ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसके चेहरे की रेखाएँ मुस्कान से पहले ही थकान लिख देती थीं। यह वही थकान थी जो पिछले तीन साल से उसके हिस्से आई थी—बिना शोर किए, बिना शिकायत किए, बस भीतर-भीतर घिसते हुए।
आरव और अदिति एक-दूसरे को समझते थे। एक-दूसरे के लिए बुरे नहीं थे। पर उनके बीच एक तीसरा व्यक्ति था—आरव की माँ, शकुंतला देवी, जिनकी बात घर में अंतिम मानी जाती थी। उम्र के साथ उनकी ज़िद और तीखी हो गई थी, और उनकी “परंपरा” वाली भाषा में अक्सर अदिति के लिए काँटे छिपे रहते थे।
“घर माँगना है तो माँग लो… पर वहाँ भी माँ…?” अदिति ने वाक्य पूरा नहीं किया। उसे पता था, कुछ सवाल इस घर में पूछे नहीं जाते।
आरव ने नज़रें चुराकर कहा, “माँ अकेली कैसे रहेंगी? मैं उन्हें छोड़ नहीं सकता।”
अदिति ने सिर हिलाया, जैसे वह ‘हाँ’ कह रही हो, पर सच में वह अपने भीतर गिरते भरोसे को संभाल रही थी।
शकुंतला देवी को लगता था कि बहू का काम है—सुबह उठकर चूल्हा, पूजा, नाश्ता, और दिन भर “घर को संभालना”, यानी अपना होना भूल जाना। अदिति नौकरी करती थी, फिर भी उसे ‘कामवाली’ की तरह आदेश मिलते—“चाय में शक्कर कम”, “रोटी फूली नहीं”, “माँ के कमरे में धूप क्यों नहीं आई”, “मेरे लिए अलग सब्ज़ी क्यों नहीं बनी।”
आरव देखता था, पर बोलता नहीं था। वह हर बार बीच में आकर दो ही शब्द कहता—“अदिति, समझो… माँ की उम्र…”
और अदिति हर बार समझने की कोशिश करती, क्योंकि उसे आरव पर भरोसा था। मगर भरोसा भी कब तक अकेले घर चलाए?
धीरे-धीरे अदिति की हँसी कम होने लगी। ऑफिस में उसकी सहेलियाँ कहतीं, “तू पहले कितनी चहकती थी।”
वह बस मुस्कुरा देती, क्योंकि सच बताने से पहले उसे अपने आँसुओं का हिसाब रखना पड़ता।
एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त आरव ने अचानक कहा, “अगले हफ्ते शिफ्ट करना है।”
“कहाँ?” अदिति का मन जैसे जाग उठा।
“नया फ्लैट… कंपनी का।” आरव की आवाज़ में अजीब-सी जल्दी थी, जैसे वह खुद को मनाने की कोशिश कर रहा हो।
उस रात अदिति देर तक जागती रही। उसने सोचा—शायद अब सब ठीक होगा। शायद नया घर, नया शहर, नई शुरुआत। शायद शकुंतला देवी भी बदलें। शायद…
‘शायद’ शब्द बहुत बड़ा सहारा होता है, जब इंसान के पास कोई ठोस आश्वासन न हो।
आखिर वह दिन आ गया। सामान बँधा, कार में रखा गया, और वे नए घर पहुँचे। फ्लैट सच में सुंदर था। हल्की धूप, खुली खिड़कियाँ, पास में पार्क, और सोसाइटी के नीचे छोटी-सी दुकान। अदिति की आँखों में पहली बार घर का सपना जागा—अपना घर, जहाँ वह साँस ले सके।
रात को जब आरव सो गया, अदिति बालकनी में खड़ी देर तक शहर की रोशनी देखती रही। उसे लगा, जैसे उसकी छाती पर रखा पत्थर थोड़ा हल्का हो गया है।
अगली सुबह वह बहुत जल्दी उठी। उसने मन में तय किया—आज आरव को अपनी पसंद का टिफिन बनाकर देगी। उसने सोचा, ऑफिस पास है, तो आरव भी आराम से उठेगा। मगर बेडरूम से नल की आवाज़ आई। आरव नहाने की तैयारी कर रहा था।
“इतनी जल्दी?” अदिति ने आश्चर्य से पूछा, “ऑफिस तो पास है ना?”
आरव ने शीशे में खुद को देखते हुए हल्की मुस्कान दी, पर वह मुस्कान भी किसी बोझ का पर्दा लग रही थी।
“ऑफिस… वही है,” उसने धीरे से कहा, “जहाँ पहले था।”
अदिति चौंकी। “तो हम यहाँ क्यों आए?”
आरव ने तौलिया कंधे पर रखा और एक गहरी सांस ली। वह कुछ पल चुप रहा, जैसे शब्द चुन रहा हो—शब्द जो किसी को चोट न करें, पर सच भी कह दें।
“अदिति… मैंने झूठ कहा था।”
अदिति का चेहरा सफेद पड़ गया। “क… क्या?”
आरव ने उसके सामने बैठते हुए कहा, “मुझे कोई नई साइट नहीं मिली। न ही ऑफिस बदला। बदली है बस… हमारी जगह।”
अदिति की आँखों में प्रश्नों का सैलाब उमड़ आया। “तुमने… ये सब…?”
आरव ने सिर झुका लिया। “मैं तुम्हें यहाँ लाया हूँ… तुम्हारे लिए।”
अदिति को लगा जैसे कोई सपना अचानक सच्चाई बन गया हो, और सच्चाई इतनी हल्की कि वह पकड़ में ही न आए।
“पर… तुम्हारी माँ?” उसने धीरे से पूछा, जैसे कोई डरता हुआ बच्चा पूछता है—दरवाजे के पीछे राक्षस तो नहीं?
आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “माँ को मैंने नहीं छोड़ा। मैंने बस… तुम्हें बचा लिया।”
उसकी आवाज़ काँप गई। “अगर मैं माँ से सीधे कहता कि मैं उनके साथ नहीं रहना चाहता… तो वो टूट जातीं। वो उम्र ऐसी है, जहाँ आदमी बदलता नहीं, बस अपनी आदतों को धर्म बना लेता है। और मैं… मैं लाचार हो जाता।”
अदिति ने होंठ भींच लिए। “तो तीन साल…?”
आरव ने दर्द से कहा, “मैंने सब देखा है। तुम्हारा चुप-चुप रहना, तुम्हारा अकेले रसोई में रो लेना, तुम्हारी छुट्टी में भी घर का काम… सब। पर मैं फँसा रहा। माँ और पत्नी के बीच… और मैं हर बार गलत फैसला करता रहा—क्योंकि मुझे लगा, समय ठीक कर देगा।”
“बच्चा…” अदिति के मुँह से शब्द टूटकर निकला।
आरव की आँखों में अफसोस उतर आया। “मैंने भी यही सोचा था कि बच्चा होगा तो माँ बदल जाएँगी। पर माँ ने तो तुम्हें और कसकर बाँधना शुरू कर दिया। जैसे तुम उनकी संपत्ति हो।”
अदिति का गला भर आया। “और तुम… तब भी…”
“तब भी मैं डर गया,” आरव ने सच कबूल किया। “माँ की आँसू वाली भाषा से… समाज की बातों से… रिश्तेदारों के ताने से… और अपने ही अपराधबोध से कि मैं ‘अच्छा बेटा’ नहीं बन पाऊँगा।”
कुछ देर सन्नाटा रहा। किचन में दूध उबलकर गिर गया, पर अदिति को जैसे आवाज़ भी सुनाई नहीं दी। उसके भीतर पिछले सालों की सारी रातें एक साथ जाग गईं।
आरव ने अचानक उसके हाथ पकड़ लिए। “आज पहली बार मैंने तुम्हारे लिए फैसला किया है। देर से किया… पर किया है।”
अदिति की आँखों से आँसू बह निकले। “पर माँ…?”
आरव ने धीरे से कहा, “माँ अपने बड़े भाई के पास चली गई हैं। मैंने उनसे कहा कि कंपनी ने मुझे दूर भेज दिया है। उन्होंने मुझे खुद कहा—‘जा, यहाँ रहकर बर्बाद मत हो…’”
अदिति ने अविश्वास से पूछा, “उन्होंने… आसानी से भेज दिया?”
आरव ने कड़वी मुस्कान दी। “हाँ। क्योंकि उनके लिए मैं बेटा हूँ। और तुम… बस बहू।”
यह बात अदिति के दिल में चुभी, पर उसी चुभन में एक राहत भी थी—कम से कम सच साफ था।
“तो अब?” अदिति ने पूछा, अपनी आवाज़ को संभालते हुए।
आरव ने कहा, “हर दो हफ्ते में माँ से मिलने जाएंगे। दिन में रहेंगे, रात को वापस आ जाएंगे। माँ को अकेला भी नहीं छोड़ेंगे, और तुम्हें भी… फिर उस पिंजरे में नहीं डालेंगे।”
अदिति ने धीरे से कहा, “और अगर माँ नाराज़ हुईं?”
आरव ने पहली बार पूरे आत्मविश्वास से कहा, “तो हो जाएँ। मैं उनकी नाराज़गी सह लूँगा, पर तुम्हारा टूटना नहीं। तुम मेरी पत्नी हो, सिर्फ घर की मशीन नहीं।”
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