10/07/2026
“तुम इतना मत रो, ज़रूरत पड़ी तो बाबूजी को यहीं ले आएँगे,”
अरविंद ने तकिए से टिक कर बैठी रीमा के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
रीमा की आँखें रात भर जागने से सूजी हुई थीं।
“मम्मी के जाने के बाद भइया लोग ऐसे बदल जाएँगे, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था,” उसकी आवाज़ भर्रा गई,
“पापा को तो जैसे किसी ने चीज़ समझकर इधर-उधर पटक दिया है…”
“कल फोन पर बाबूजी क्या कह रहे थे?” अरविंद ने धीरे से पूछा।
“कह रहे थे, ‘मुझे तो सब ठीक लग रहा है बिटिया, तेरी भाभी बहुत सेवा करती है।’
और पीछे से बर्तन पटकने की आवाज़ आ रही थी… सांस चढ़ी हुई थी उनकी,” रीमा ने आँख पोंछते हुए कहा,
“मम्मी की बीमारी में जो PF, ग्रेच्युटी, जमा पैसे थे, सब भइयों ने निकाल लिए। ‘इलाज और कर्ज़’ के नाम पर खेत बिक गए, पुराना घर भी बेचकर दो छोटे-छोटे फ्लैट ले लिए। और अब पापा खुद ही कह रहे हैं कि ‘मेरे पास कौन सा हक़ था, सब बच्चों के लिए ही तो किया।’”
अरविंद ने पानी का गिलास आगे बढ़ाते हुए कहा,
“देखो रीमा, अभी के लिए इतना तय कर लो – अगर उन्हें कभी ज़रा-सा भी लगे कि वो बोझ हैं, तो हम उन्हें अपने घर ले आएँगे। तुम ये तो जानती ही हो, मेरे लिए वो भी उतने ही आदरणीय हैं जितने मेरे अपने माता–पिता होते।”
रीमा एक टक छत की ओर देखने लगी।
“हम भी तो बूढ़े होंगे न, अरविंद? आज जो हम अपने बुज़ुर्गों के साथ करते देख रहे हैं… कल कहीं हमारे बच्चे भी…?”
उसने बात आधी ही छोड़ दी।
तीन महीने बाद रीमा मायके गई।
छोटे वाले भाई योगेश के फ्लैट पर।
दरवाज़ा खुला तो भाभी ने बनावटी मुस्कान के साथ कहा,
“अरे दीदी, अचानक? पहले बता देतीं तो कुछ अच्छा बना लेते खाने में।”
“बस ऐसे ही… पापा से मिलने मन किया,” रीमा ने मुस्कुरा कर कहा।
अंदर गई तो उसके कदम वहीं ठिठक गए।
रसोई की सिंक के पास स्टूल पर झुके धरमपाल जी, हाथ में रबर के दस्ताने, सामने बर्तनों का ढेर।
“पापा!” रीमा बेतहाशा उनकी तरफ बढ़ी,
“ये आप क्या कर रहे हैं?”
धरमपाल जी ने सकुचाते हुए मुस्कुराने की कोशिश की,
“अरे आ गई बिटिया? बस ऐसे ही… थाली–वगैरह धो रहा था। बहू ऑफिस गई है, योगेश दुकान पर, तो सोचा अपने घर का काम कर लूँ, इसमें शर्म कैसी?”
रीमा ने उनकी तरफ गौर से देखा।
कमर और झुकी हुई, आँखों के नीचे गड्ढे, हाथों की नसें उभरी हुईं।
“पापा, आपकी तो घुटनों में सूजन रहती है। डॉक्टर ने ज्यादा देर खड़े न रहने को कहा था न? बैठने वाले काम कर लिया कीजिए। कोई दिक्कत हो तो मुझे बता दीजिए,” रीमा की आवाज़ भीगने लगी,
“आपको तकलीफ़ हो और आप मुझसे छुपाएँ, ये मुझे नहीं सहा जाएगा।”
बगल के कमरे से योगेश की आवाज़ आई,
“बस दीदी, आप लोग शुरू हो गईं। पापा ने खुद कहा कि उन्हें फालतू बैठना अच्छा नहीं लगता, काम करते हैं तो शरीर चलता है। आखिर घर उनका ही तो है, थोड़ा–बहुत हाथ बँटा देंगे तो क्या बुरा है?”
रीमा ने तीखे स्वर में कहा,
“हाथ बँटाने और पूरा बोझ थमा देने में फर्क होता है, योगेश। पापा उम्रदराज़ हैं, नौकर नहीं। जब तक ज़मीन, घर और पैसे थे, तुम दोनों भाई–भाभियाँ उनकी एक–एक सलाह सुनते थे। सब बिक गया तो अब बर्तन और बच्चों की देखभाल उनकी नियति हो गई?”
उसने फिर पापा की तरफ देखा,
“पापा, आप चलिए मेरे साथ। मेरे घर। मैं आपसे कहानियाँ लिखवाऊँगी, अपना ऑनलाइन बिज़नेस बढ़ाऊँगी, आप अकाउंट्स देख लीजिए। आप खुद को ऐसे मत घुलाइए।”
धरमपाल जी का चेहरा एक पल को चमका, फिर वही पुराना संकोच लौट आया।
“नहीं बिटिया, बेटी के घर बूढ़े बाप अच्छे नहीं लगते। लोग क्या कहेंगे? बेटा–बहू रहते हुए बाप जमाई के घर पड़ा है…”
“लोग तो कल ये भी कहेंगे कि दो–दो बेटे होते हुए बाप बर्तन घिस रहा था,” रीमा तड़प कर बोली,
“पापा, रिश्तों का सम्मान खून नहीं, व्यवहार तय करता है। मेरे घर चलिए। वहाँ भी आपका सम्मान होगा, काम भी — पर शर्तों पर नहीं, अपने मन से।”
धरमपाल जी ने प्यार से उसकी पीठ थपथपाई,
“मुझे पता है तू बहुत प्यार करती है, पर मेरे दिमाग में बचपन से बैठा है – बाप की लाठी बेटे के दरवाज़े पर ही टिकती है।
तू है तो मेरी जान, पर ठौर मेरा यहीं है।
और फिर, पोते–पोती हैं, उनके साथ मन लगा रहता है। कुछ काम कर लेने से मुझे भी लगता है कि अब भी किसी काम का हूँ।”
रीमा की आँखें छलक पड़ीं।
उसे साफ दिख रहा था – बाप का ‘धर्म’ अब दूसरों की सुविधाओं का कवच बन गया था।
वह भारी मन से लौट आई।
समय बीतता गया।
कभी फोन पर भाभी कहतीं –
“दीदी, पापा तो बड़े जिद्दी हैं, खुद ही सब कर लेते हैं।”
कभी बीच में से आवाज़ आती – “पापा, बच्चे को टिफिन दे दिया? बस पकड़ा लो, बस टाइम हो रहा है…”
रीमा बेचैन रहती, पर हर बार बाबूजी का वही वाक्य बीच में दीवार बनकर खड़ा हो जाता –
“बेटी के घर बाप कैसा लगेगा…”
एक दिन दोपहर में दरवाज़े की घंटी बजी।
डाकिया था, एक रंगीन लिफाफा थमाकर चला गया।
रीमा ने खोला तो भीतर से नीले–हरे रंग का निमंत्रण पत्र निकला—
“‘उम्मीद मार्गदर्शन केंद्र’ के उद्घाटन समारोह में आपकी सादर उपस्थिति अपेक्षित है।
संस्थापक – श्री धरमपाल प्रसाद।
विशेष: वरिष्ठ नागरिकों के लिए पेंशन, बैंकिंग, सरकारी फॉर्म भरने की निःशुल्क सहायता।”
रीमा के हाथ काँप गए।
आँखों से आँसू खुद–ब–खुद बह निकले।
इतने में उसकी सास, उषा देवी, कमरे में आईं,
“क्या हुआ बहू, रो क्यों रही हो? निमंत्रण किसका है?”
रीमा ने हँसते–रोते हुए कार्ड उनकी तरफ बढ़ाया,
“माँजी, ये बाबूजी का है… मेरे पापा का।
वो अब किसी के मोहताज नहीं रहे… आपने देखा? ‘संस्थापक – धरमपाल प्रसाद’…”
उषा देवी के चेहरे पर भी चमक आई,
“अरे वाह! चल, फिर तो हमें भी जाना होगा न, अपनी नज़र से देखेंगे उनका नया काम।”
उस शाम धरमपाल जी खुद ही उनके घर आ पहुँचे।
कंधे पर पुराना बैग, आँखों में चमक, और चेहरे पर वैसा आत्मविश्वास जो रीमा ने बरसों बाद देखा।
“बिटिया!” उन्होंने दरवाज़ा खुलते ही कहा,
“तुझे सबसे पहले कार्ड भेजा, पर खुद आकर देता तो मज़ा ही और था।”
रीमा ने उन्हें सीने से लगा लिया,
“पापा, ये सब… कब? कैसे?”
धरमपाल जी सोफे पर बैठ गए,
“बात कुछ खास नहीं, बस दिल की आग ने रास्ता ढूँढ लिया।
हो क्या रहा था – सुबह से शाम तक बच्चों को बस स्टॉप तक छोड़ो, खाना बनाओ, बर्तन साफ करो, बैंक जाओ तो बहू–बेटे का काम भी निपटाओ… और फिर रात को लगे कि दिन भर ‘काम तो बहुत किया’, पर किसी ने ‘धन्यवाद’ तक न कहा।
एक दिन सोसाइटी के पार्क में बैठे पेन्शन की लाइन और फॉर्म की टेंशन सुन रहा था। बगल में बैठे एक बुज़ुर्ग ने कहा – ‘धरमपाल जी, आप तो बैंक में तीस साल काम कर चुके हैं, हमें फॉर्म भरना सिखा दीजिए न।’
बस वहीं से ख्याल आया – क्यों न मैं यही काम सबके लिए करूँ?”
रीमा तन्मय होकर सुन रही थी।
अरविंद और उषा देवी भी पास आकर बैठ गए थे।
“फिर?” अरविंद ने पूछा।
“फिर क्या,” धरमपाल जी मुस्कुराए,
“सोसाइटी के गार्ड रूम के पास खाली पड़ा स्टोर था। चेयरमैन से बात की – ‘अगर मैं यहाँ एक छोटी-सी टेबल-कुर्सी लगाकर लोगों के पेपरवर्क में मदद करूँ, तो आपको कोई आपत्ति?’
वो बोले – ‘अरे, आप जैसा ईमानदार आदमी मिलना मुश्किल है, कीजिए, लेकिन कोई गलत काम न हो।’
मैंने कहा – ‘मेरे बस का गलत काम नहीं।’”
सब हँस पड़े।
“शुरू–शुरू में बस नोटरी के फॉर्म, गैस सब्सिडी, वृद्धावस्था पेंशन के कागज़… ये सब भरने में मदद करता रहा। लोग पहले झिझकते थे, फिर धीरे–धीरे विश्वास बनने लगा।
किसी की पेंशन शुरू हो गई, किसी के कटा हुआ बिजली बिल जुड़ गया, किसी की विधवा पेंशन लग गई – सब मेरे कमरे में मिठाई लेकर आने लगे,”
धरमपाल जी की आँखें चमक उठीं,
“फिर किसी ने कहा – ‘काका, इस काम को थोड़ा और व्यवस्थित करिए, बाकायदा बोर्ड लगाइए, ताकि हम अपने जानने वालों को भेज सकें।’
बस, वहीं से ‘उम्मीद मार्गदर्शन केंद्र’ का जन्म हो गया।”
“और खर्चा?” रीमा ने पूछा,
“पहले तो भाई लोग पाँच–दस रुपये का भी हिसाब पूछते थे न…”
धरमपाल जी ने हल्की हँसी के साथ अरविंद की तरफ देखा,
“यहाँ तुम्हारे पति महोदय देवदूत बनकर उतरे। एक दिन फोन करके बोले –
‘बाबूजी, अगर आप सचमुच इस तरह का सेंटर खोलना चाहते हैं, तो किराया और पर्चे–पोस्टर हमारा समझिए।’
तुम्हारी सासू माँ ने कहा – ‘बुज़ुर्ग के हाथ से दिया हुआ परामर्श दान नहीं होता, आशीर्वाद होता है।’
मुझे पहली बार लगा कि जैसे मेरी उम्र रुक गई हो, पर मेरे काम की उम्र बढ़ गई हो।”
उषा देवी मुस्कुराईं,
“और फिर जो हमने किया, उसे एहसान मत समझिए।
रीमा कई रातें रो–रोकर बिताती थी, हमसे कहती – ‘पापा को एक ठौर चाहिए, जहाँ वो ‘दूसरों के आदेश से नहीं’, अपने निर्णय से काम करें।’
तुम्हारा आत्मसम्मान लौटाना हमारी भी जिम्मेदारी थी।”
धरमपाल जी की आँखें नम हो गईं।
“बिटिया,” उन्होंने रीमा की तरफ मुड़कर कहा,
“तूने उस दिन मुझे झकझोर दिया था, जब कहा था – ‘पापा, जब शरीर से काम निकलना बंद हो जाएगा, तब इन्हीं लोगों के लिए आप बोझ बन जाओगे।’
मैं तुझसे रूठ गया था भीतर–भीतर, पर आज समझ आया – तूने मुझे चोट नहीं, चेतावनी दी थी।”
रीमा ने उनका हाथ थाम लिया,
“अब तो आप खुश हो न, पापा?”
धरमपाल जी की आवाज़ में नई मजबूती थी,
“अब मुझे डर नहीं लगता कि कल को कोई कहेगा – ‘क्या काम आता है ये बूढ़ा?’
अब अगर कोई पूछेगा, तो कहूँगा – ‘मैं उन लोगों के काम आता हूँ, जिन्हें अपने हक़ के लिए किसी की कलम, किसी की समझ की ज़रूरत है।’
मेरे लिए अब बेटे–बेटी से ज़्यादा जरूरी मेरा आत्मसम्मान है।
जो साथ देते हैं, उन्हें दिल में रखता हूँ, जो इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनके लिए अब बस एक मुस्कान है – दूरी वाली।”
रीमा की आँखों से इस बार जो आँसू निकले, उनमें दुख नहीं, गर्व था।
उसे लगा जैसे उसके पापा ने सिर्फ अपना नहीं,
कई और बुज़ुर्गों का रास्ता भी रोशन कर दिया है –
जो अब समझ रहे थे कि बुढ़ापा सिर्फ दूसरों पर निर्भर होने का नाम नहीं,
खुद को पहचानने और अपने अनुभव को ताकत में बदलने का भी नाम है।
अरविंद ने हल्के मजाक में कहा,
“तो तय रहा बाबूजी, उद्घाटन में पहला नारियल मैं फोड़ूँगा, और पहला पोस्टर हमारी घर की दीवार पर लगेगा।”
उषा देवी बोलीं,
“और हम सब मिलकर तुम्हारी ‘उम्मीद’ में अपनी–अपनी ‘दुआ’ जोड़ेंगे।”
धरमपाल जी ने हँसते हुए कहा,
“बस एक वादा करो –
कल जब तुम बूढ़े हो जाओगे, तो अपने बच्चों को यही सिखाओगे कि
बुज़ुर्गों के लिए सबसे बड़ा सहारा उनकी हड्डियाँ नहीं,
उनका आत्मसम्मान होता है।”
रीमा ने मन–ही–मन जवाब दिया –
हाँ पापा, अब शायद मैं अपने बच्चों को यही कहानी सुनाऊँगी…
‘दादाजी की दुकान’ की नहीं,
‘दादाजी के आत्मसम्मान’ की कहानी।
-आपकी प्रियंका पटेल