moral story

moral story moral story in Hindi language

“तुम इतना मत रो, ज़रूरत पड़ी तो बाबूजी को यहीं ले आएँगे,” अरविंद ने तकिए से टिक कर बैठी रीमा के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा...
10/07/2026

“तुम इतना मत रो, ज़रूरत पड़ी तो बाबूजी को यहीं ले आएँगे,”
अरविंद ने तकिए से टिक कर बैठी रीमा के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
रीमा की आँखें रात भर जागने से सूजी हुई थीं।
“मम्मी के जाने के बाद भइया लोग ऐसे बदल जाएँगे, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था,” उसकी आवाज़ भर्रा गई,
“पापा को तो जैसे किसी ने चीज़ समझकर इधर-उधर पटक दिया है…”
“कल फोन पर बाबूजी क्या कह रहे थे?” अरविंद ने धीरे से पूछा।
“कह रहे थे, ‘मुझे तो सब ठीक लग रहा है बिटिया, तेरी भाभी बहुत सेवा करती है।’
और पीछे से बर्तन पटकने की आवाज़ आ रही थी… सांस चढ़ी हुई थी उनकी,” रीमा ने आँख पोंछते हुए कहा,
“मम्मी की बीमारी में जो PF, ग्रेच्युटी, जमा पैसे थे, सब भइयों ने निकाल लिए। ‘इलाज और कर्ज़’ के नाम पर खेत बिक गए, पुराना घर भी बेचकर दो छोटे-छोटे फ्लैट ले लिए। और अब पापा खुद ही कह रहे हैं कि ‘मेरे पास कौन सा हक़ था, सब बच्चों के लिए ही तो किया।’”
अरविंद ने पानी का गिलास आगे बढ़ाते हुए कहा,
“देखो रीमा, अभी के लिए इतना तय कर लो – अगर उन्हें कभी ज़रा-सा भी लगे कि वो बोझ हैं, तो हम उन्हें अपने घर ले आएँगे। तुम ये तो जानती ही हो, मेरे लिए वो भी उतने ही आदरणीय हैं जितने मेरे अपने माता–पिता होते।”
रीमा एक टक छत की ओर देखने लगी।
“हम भी तो बूढ़े होंगे न, अरविंद? आज जो हम अपने बुज़ुर्गों के साथ करते देख रहे हैं… कल कहीं हमारे बच्चे भी…?”
उसने बात आधी ही छोड़ दी।

तीन महीने बाद रीमा मायके गई।
छोटे वाले भाई योगेश के फ्लैट पर।
दरवाज़ा खुला तो भाभी ने बनावटी मुस्कान के साथ कहा,
“अरे दीदी, अचानक? पहले बता देतीं तो कुछ अच्छा बना लेते खाने में।”
“बस ऐसे ही… पापा से मिलने मन किया,” रीमा ने मुस्कुरा कर कहा।
अंदर गई तो उसके कदम वहीं ठिठक गए।
रसोई की सिंक के पास स्टूल पर झुके धरमपाल जी, हाथ में रबर के दस्ताने, सामने बर्तनों का ढेर।
“पापा!” रीमा बेतहाशा उनकी तरफ बढ़ी,
“ये आप क्या कर रहे हैं?”
धरमपाल जी ने सकुचाते हुए मुस्कुराने की कोशिश की,
“अरे आ गई बिटिया? बस ऐसे ही… थाली–वगैरह धो रहा था। बहू ऑफिस गई है, योगेश दुकान पर, तो सोचा अपने घर का काम कर लूँ, इसमें शर्म कैसी?”
रीमा ने उनकी तरफ गौर से देखा।
कमर और झुकी हुई, आँखों के नीचे गड्ढे, हाथों की नसें उभरी हुईं।
“पापा, आपकी तो घुटनों में सूजन रहती है। डॉक्टर ने ज्यादा देर खड़े न रहने को कहा था न? बैठने वाले काम कर लिया कीजिए। कोई दिक्कत हो तो मुझे बता दीजिए,” रीमा की आवाज़ भीगने लगी,
“आपको तकलीफ़ हो और आप मुझसे छुपाएँ, ये मुझे नहीं सहा जाएगा।”
बगल के कमरे से योगेश की आवाज़ आई,
“बस दीदी, आप लोग शुरू हो गईं। पापा ने खुद कहा कि उन्हें फालतू बैठना अच्छा नहीं लगता, काम करते हैं तो शरीर चलता है। आखिर घर उनका ही तो है, थोड़ा–बहुत हाथ बँटा देंगे तो क्या बुरा है?”
रीमा ने तीखे स्वर में कहा,
“हाथ बँटाने और पूरा बोझ थमा देने में फर्क होता है, योगेश। पापा उम्रदराज़ हैं, नौकर नहीं। जब तक ज़मीन, घर और पैसे थे, तुम दोनों भाई–भाभियाँ उनकी एक–एक सलाह सुनते थे। सब बिक गया तो अब बर्तन और बच्चों की देखभाल उनकी नियति हो गई?”
उसने फिर पापा की तरफ देखा,
“पापा, आप चलिए मेरे साथ। मेरे घर। मैं आपसे कहानियाँ लिखवाऊँगी, अपना ऑनलाइन बिज़नेस बढ़ाऊँगी, आप अकाउंट्स देख लीजिए। आप खुद को ऐसे मत घुलाइए।”
धरमपाल जी का चेहरा एक पल को चमका, फिर वही पुराना संकोच लौट आया।
“नहीं बिटिया, बेटी के घर बूढ़े बाप अच्छे नहीं लगते। लोग क्या कहेंगे? बेटा–बहू रहते हुए बाप जमाई के घर पड़ा है…”
“लोग तो कल ये भी कहेंगे कि दो–दो बेटे होते हुए बाप बर्तन घिस रहा था,” रीमा तड़प कर बोली,
“पापा, रिश्तों का सम्मान खून नहीं, व्यवहार तय करता है। मेरे घर चलिए। वहाँ भी आपका सम्मान होगा, काम भी — पर शर्तों पर नहीं, अपने मन से।”
धरमपाल जी ने प्यार से उसकी पीठ थपथपाई,
“मुझे पता है तू बहुत प्यार करती है, पर मेरे दिमाग में बचपन से बैठा है – बाप की लाठी बेटे के दरवाज़े पर ही टिकती है।
तू है तो मेरी जान, पर ठौर मेरा यहीं है।
और फिर, पोते–पोती हैं, उनके साथ मन लगा रहता है। कुछ काम कर लेने से मुझे भी लगता है कि अब भी किसी काम का हूँ।”
रीमा की आँखें छलक पड़ीं।
उसे साफ दिख रहा था – बाप का ‘धर्म’ अब दूसरों की सुविधाओं का कवच बन गया था।
वह भारी मन से लौट आई।

समय बीतता गया।
कभी फोन पर भाभी कहतीं –
“दीदी, पापा तो बड़े जिद्दी हैं, खुद ही सब कर लेते हैं।”
कभी बीच में से आवाज़ आती – “पापा, बच्चे को टिफिन दे दिया? बस पकड़ा लो, बस टाइम हो रहा है…”
रीमा बेचैन रहती, पर हर बार बाबूजी का वही वाक्य बीच में दीवार बनकर खड़ा हो जाता –
“बेटी के घर बाप कैसा लगेगा…”
एक दिन दोपहर में दरवाज़े की घंटी बजी।
डाकिया था, एक रंगीन लिफाफा थमाकर चला गया।
रीमा ने खोला तो भीतर से नीले–हरे रंग का निमंत्रण पत्र निकला—
“‘उम्मीद मार्गदर्शन केंद्र’ के उद्घाटन समारोह में आपकी सादर उपस्थिति अपेक्षित है।
संस्थापक – श्री धरमपाल प्रसाद।
विशेष: वरिष्ठ नागरिकों के लिए पेंशन, बैंकिंग, सरकारी फॉर्म भरने की निःशुल्क सहायता।”
रीमा के हाथ काँप गए।
आँखों से आँसू खुद–ब–खुद बह निकले।
इतने में उसकी सास, उषा देवी, कमरे में आईं,
“क्या हुआ बहू, रो क्यों रही हो? निमंत्रण किसका है?”
रीमा ने हँसते–रोते हुए कार्ड उनकी तरफ बढ़ाया,
“माँजी, ये बाबूजी का है… मेरे पापा का।
वो अब किसी के मोहताज नहीं रहे… आपने देखा? ‘संस्थापक – धरमपाल प्रसाद’…”
उषा देवी के चेहरे पर भी चमक आई,
“अरे वाह! चल, फिर तो हमें भी जाना होगा न, अपनी नज़र से देखेंगे उनका नया काम।”
उस शाम धरमपाल जी खुद ही उनके घर आ पहुँचे।
कंधे पर पुराना बैग, आँखों में चमक, और चेहरे पर वैसा आत्मविश्वास जो रीमा ने बरसों बाद देखा।
“बिटिया!” उन्होंने दरवाज़ा खुलते ही कहा,
“तुझे सबसे पहले कार्ड भेजा, पर खुद आकर देता तो मज़ा ही और था।”
रीमा ने उन्हें सीने से लगा लिया,
“पापा, ये सब… कब? कैसे?”
धरमपाल जी सोफे पर बैठ गए,
“बात कुछ खास नहीं, बस दिल की आग ने रास्ता ढूँढ लिया।
हो क्या रहा था – सुबह से शाम तक बच्चों को बस स्टॉप तक छोड़ो, खाना बनाओ, बर्तन साफ करो, बैंक जाओ तो बहू–बेटे का काम भी निपटाओ… और फिर रात को लगे कि दिन भर ‘काम तो बहुत किया’, पर किसी ने ‘धन्यवाद’ तक न कहा।
एक दिन सोसाइटी के पार्क में बैठे पेन्शन की लाइन और फॉर्म की टेंशन सुन रहा था। बगल में बैठे एक बुज़ुर्ग ने कहा – ‘धरमपाल जी, आप तो बैंक में तीस साल काम कर चुके हैं, हमें फॉर्म भरना सिखा दीजिए न।’
बस वहीं से ख्याल आया – क्यों न मैं यही काम सबके लिए करूँ?”
रीमा तन्मय होकर सुन रही थी।
अरविंद और उषा देवी भी पास आकर बैठ गए थे।
“फिर?” अरविंद ने पूछा।
“फिर क्या,” धरमपाल जी मुस्कुराए,
“सोसाइटी के गार्ड रूम के पास खाली पड़ा स्टोर था। चेयरमैन से बात की – ‘अगर मैं यहाँ एक छोटी-सी टेबल-कुर्सी लगाकर लोगों के पेपरवर्क में मदद करूँ, तो आपको कोई आपत्ति?’
वो बोले – ‘अरे, आप जैसा ईमानदार आदमी मिलना मुश्किल है, कीजिए, लेकिन कोई गलत काम न हो।’
मैंने कहा – ‘मेरे बस का गलत काम नहीं।’”
सब हँस पड़े।
“शुरू–शुरू में बस नोटरी के फॉर्म, गैस सब्सिडी, वृद्धावस्था पेंशन के कागज़… ये सब भरने में मदद करता रहा। लोग पहले झिझकते थे, फिर धीरे–धीरे विश्वास बनने लगा।
किसी की पेंशन शुरू हो गई, किसी के कटा हुआ बिजली बिल जुड़ गया, किसी की विधवा पेंशन लग गई – सब मेरे कमरे में मिठाई लेकर आने लगे,”
धरमपाल जी की आँखें चमक उठीं,
“फिर किसी ने कहा – ‘काका, इस काम को थोड़ा और व्यवस्थित करिए, बाकायदा बोर्ड लगाइए, ताकि हम अपने जानने वालों को भेज सकें।’
बस, वहीं से ‘उम्मीद मार्गदर्शन केंद्र’ का जन्म हो गया।”
“और खर्चा?” रीमा ने पूछा,
“पहले तो भाई लोग पाँच–दस रुपये का भी हिसाब पूछते थे न…”
धरमपाल जी ने हल्की हँसी के साथ अरविंद की तरफ देखा,
“यहाँ तुम्हारे पति महोदय देवदूत बनकर उतरे। एक दिन फोन करके बोले –
‘बाबूजी, अगर आप सचमुच इस तरह का सेंटर खोलना चाहते हैं, तो किराया और पर्चे–पोस्टर हमारा समझिए।’
तुम्हारी सासू माँ ने कहा – ‘बुज़ुर्ग के हाथ से दिया हुआ परामर्श दान नहीं होता, आशीर्वाद होता है।’
मुझे पहली बार लगा कि जैसे मेरी उम्र रुक गई हो, पर मेरे काम की उम्र बढ़ गई हो।”
उषा देवी मुस्कुराईं,
“और फिर जो हमने किया, उसे एहसान मत समझिए।
रीमा कई रातें रो–रोकर बिताती थी, हमसे कहती – ‘पापा को एक ठौर चाहिए, जहाँ वो ‘दूसरों के आदेश से नहीं’, अपने निर्णय से काम करें।’
तुम्हारा आत्मसम्मान लौटाना हमारी भी जिम्मेदारी थी।”
धरमपाल जी की आँखें नम हो गईं।
“बिटिया,” उन्होंने रीमा की तरफ मुड़कर कहा,
“तूने उस दिन मुझे झकझोर दिया था, जब कहा था – ‘पापा, जब शरीर से काम निकलना बंद हो जाएगा, तब इन्हीं लोगों के लिए आप बोझ बन जाओगे।’
मैं तुझसे रूठ गया था भीतर–भीतर, पर आज समझ आया – तूने मुझे चोट नहीं, चेतावनी दी थी।”
रीमा ने उनका हाथ थाम लिया,
“अब तो आप खुश हो न, पापा?”
धरमपाल जी की आवाज़ में नई मजबूती थी,
“अब मुझे डर नहीं लगता कि कल को कोई कहेगा – ‘क्या काम आता है ये बूढ़ा?’
अब अगर कोई पूछेगा, तो कहूँगा – ‘मैं उन लोगों के काम आता हूँ, जिन्हें अपने हक़ के लिए किसी की कलम, किसी की समझ की ज़रूरत है।’
मेरे लिए अब बेटे–बेटी से ज़्यादा जरूरी मेरा आत्मसम्मान है।
जो साथ देते हैं, उन्हें दिल में रखता हूँ, जो इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनके लिए अब बस एक मुस्कान है – दूरी वाली।”
रीमा की आँखों से इस बार जो आँसू निकले, उनमें दुख नहीं, गर्व था।
उसे लगा जैसे उसके पापा ने सिर्फ अपना नहीं,
कई और बुज़ुर्गों का रास्ता भी रोशन कर दिया है –
जो अब समझ रहे थे कि बुढ़ापा सिर्फ दूसरों पर निर्भर होने का नाम नहीं,
खुद को पहचानने और अपने अनुभव को ताकत में बदलने का भी नाम है।
अरविंद ने हल्के मजाक में कहा,
“तो तय रहा बाबूजी, उद्घाटन में पहला नारियल मैं फोड़ूँगा, और पहला पोस्टर हमारी घर की दीवार पर लगेगा।”
उषा देवी बोलीं,
“और हम सब मिलकर तुम्हारी ‘उम्मीद’ में अपनी–अपनी ‘दुआ’ जोड़ेंगे।”
धरमपाल जी ने हँसते हुए कहा,
“बस एक वादा करो –
कल जब तुम बूढ़े हो जाओगे, तो अपने बच्चों को यही सिखाओगे कि
बुज़ुर्गों के लिए सबसे बड़ा सहारा उनकी हड्डियाँ नहीं,
उनका आत्मसम्मान होता है।”
रीमा ने मन–ही–मन जवाब दिया –
हाँ पापा, अब शायद मैं अपने बच्चों को यही कहानी सुनाऊँगी…
‘दादाजी की दुकान’ की नहीं,
‘दादाजी के आत्मसम्मान’ की कहानी।
-आपकी प्रियंका पटेल

बहू, तुम्हारे पिता तो इतने बड़े व्यापारी हैं। उनसे कहो न कि दामाद की मदद करें। आखिर इकलौती बेटी हो तुम," सासू माँ ने एक द...
09/07/2026

बहू, तुम्हारे पिता तो इतने बड़े व्यापारी हैं। उनसे कहो न कि दामाद की मदद करें। आखिर इकलौती बेटी हो तुम," सासू माँ ने एक दिन ताना मारा।

विदाई की शहनाइयां बज रही थीं, लेकिन सृष्टि का मन किसी मातम सा भारी था। सजी-धजी लाल जोड़े में लिपटी वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी, मगर उसकी आँखों में आंसुओं की जगह अंगारे थे। वह रो नहीं रही थी, बल्कि उसके अंदर एक गुस्सा खौल रहा था—अपने ही पिता, दीनानाथ जी के खिलाफ।

"देख रही है सृष्टि? तेरे पापा ने खाने में पनीर की जगह आलू-दम बनवाया है। और यह मंडप? ऐसा लग रहा है जैसे किसी गरीब की बेटी की शादी हो रही हो। जबकि तेरे पापा शहर के इतने बड़े व्यापारी हैं," सृष्टि की मौसी ने कान में फुसफुसाते हुए कहा।

सृष्टि ने मुट्ठी भींच ली। उसे याद आया कि कैसे उसने एक डिज़ाइनर लहंगे की ज़िद की थी, जिसकी कीमत दो लाख थी। लेकिन दीनानाथ जी ने साफ़ मना कर दिया था और पच्चीस हज़ार की एक बनारसी साड़ी लाकर थमा दी थी।

"बेटा, कपड़े पुराने हो जाते हैं, पर पैसे की कद्र कभी पुरानी नहीं होती," उन्होंने अपनी दलील दी थी।

सृष्टि को उस वक्त लगा था कि उसके पिता दुनिया के सबसे बड़े कंजूस हैं। उसे लगा कि वह उनके लिए सिर्फ़ एक बोझ है जिसे वह जल्द से जल्द और सस्ते में निपटाना चाहते हैं।

गाड़ी में बैठते वक्त जब दीनानाथ जी ने उसके सिर पर हाथ रखा, तो सृष्टि ने झटके से मुंह फेर लिया। उसने अपने पिता की नम आँखों को अनदेखा कर दिया। उसे सिर्फ़ अपनी अधूरी ख्वाहिशें और सहेलियों के ताने याद थे। विदाई के वक्त सब रोए, लेकिन सृष्टि की आँखों से एक आंसू नहीं गिरा। उसने कसम खाई थी कि इस 'कंजूस' पिता के घर वह दोबारा कभी मदद मांगने नहीं आएगी।

ससुराल पहुँचकर सृष्टि की दुनिया बदल गई। उसके पति, 'रजत', एक बड़े कॉरपोरेट ऑफिस में काम करते थे और ससुराल वाले भी रईस थे। शुरुआत के दो साल सपनों की तरह बीते। रजत उसे महंगें तोहफे देता, देश-विदेश घुमाता। सृष्टि को लगा कि उसने अपने पिता के घर में जो अभाव देखा था, वह अब खत्म हो चुका है। वह अक्सर अपनी माँ से फोन पर बात करती, लेकिन पिता से बात करने से कतराती। अगर कभी दीनानाथ जी फोन मांगते, तो वह बहाना बनाकर काट देती।

लेकिन वक्त का पहिया हमेशा एक जैसा नहीं रहता।

शादी के तीसरे साल, रजत की कंपनी में बड़ा घोटाला हुआ और उसे नौकरी से निकाल दिया गया। इतना ही नहीं, रजत ने शेयर बाज़ार में भी भारी निवेश किया था, जो डूब गया। रातों-रात, उनकी रईसी कर्ज़ में बदल गई।

बैंक वाले घर पर दस्तक देने लगे। रजत, जो कल तक प्यार लुटाता था, अब चिड़चिड़ा हो गया था। शराब पीकर घर आना और सृष्टि पर चिल्लाना उसकी आदत बन गई। ससुराल वालों ने भी हाथ खड़े कर दिए।

"बहू, तुम्हारे पिता तो इतने बड़े व्यापारी हैं। उनसे कहो न कि दामाद की मदद करें। आखिर इकलौती बेटी हो तुम," सासू माँ ने एक दिन ताना मारा।

सृष्टि का स्वाभिमान आड़े आ गया। जिस पिता को उसने अपनी शादी के दिन ठुकरा दिया था, अब उनसे पैसे कैसे मांगे? उसे यकीन था कि अगर वह गई भी, तो दीनानाथ जी उसे खाली हाथ लौटा देंगे और ऊपर से भाषण देंगे—"मैंने कहा था न पैसे बचाओ।"

हालात बदतर होते गए। एक रात रजत ने शराब के नशे में सृष्टि पर हाथ उठा दिया।

"निकल जा मेरे घर से! अगर अपने बाप से पैसे नहीं ला सकती, तो तेरी यहाँ कोई जगह नहीं है," रजत ने उसे धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया।

सृष्टि उस रात सड़क पर अकेली खड़ी थी। बारिश हो रही थी। उसकी जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी। न मायके जाने का मुँह था, न ससुराल में रहने की इज़्ज़त। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ जाए। वह पार्क की एक बेंच पर बैठकर पूरी रात रोती रही। उसे अपने पिता की याद आई, लेकिन साथ ही उनका वो 'कठोर' चेहरा भी याद आया।

"पापा तो कभी मुझे प्यार करते ही नहीं थे। अब उनके पास जाऊँगी तो वो कहेंगे कि मैंने अपनी मर्जी से शादी की थी, अब भुगतो," सृष्टि ने सोचा।

लेकिन सुबह होते-होते भूख और लाचारी ने उसके स्वाभिमान को तोड़ दिया। उसके पास कोई चारा नहीं था। वह लड़खड़ाते कदमों से बस स्टैंड गई और अपनी एक सोने की अंगूठी बेचकर मायके का टिकट लिया।

जब वह अपने शहर पहुँची और घर के गेट पर खड़ी हुई, तो उसके पैर कांप रहे थे। घर वैसा ही था—पुराना, सादा, बिना किसी नई पुताई के। "पापा ने आज तक घर पर भी पैसा नहीं लगाया," उसने मन ही मन सोचा।

दरवाज़ा माँ ने खोला। सृष्टि की हालत देख वह चीख पड़ीं। "सृष्टि! यह क्या हालत बना रखी है तूने?"

सृष्टि माँ के गले लगकर फूट-फूट कर रोई। दीनानाथ जी अंदर वाले कमरे से लाठी टेकते हुए बाहर आए। पिछले तीन सालों में वह बहुत बूढ़े हो गए थे।

सृष्टि को देखते ही उनकी आँखों में एक चमक आई, लेकिन उन्होंने खुद को संयत रखा।

"आ गई?" दीनानाथ जी की आवाज़ में वही पुराना कड़कपन था। "सुना है पति का कारोबार डूब गया है?"

सृष्टि को लगा कि अब ताने शुरू होंगे। वह चुप रही।

"जाओ, हाथ-मुंह धो लो। खाना मेज़ पर लगा है," बस इतना कहकर दीनानाथ जी अपने कमरे में चले गए।

सृष्टि को बहुत गुस्सा आया। "देखा माँ? इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस हाल में हूँ। इन्हें बस अपनी रोटियों की पड़ी है।"

माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा, "बेटा, तू उन्हें गलत समझ रही है। तू जा, फ्रेश हो जा।"

अगले दो दिन घर में अजीब सी खामोशी रही। दीनानाथ जी सुबह दुकान चले जाते और रात को लौटते। वे सृष्टि से ज़्यादा बात नहीं करते। सृष्टि को लगा कि वह यहाँ भी बोझ है। उसने सोचा कि वह नौकरी ढूंढेगी और अलग रहेगी।

तीसरे दिन शाम को, रजत घर आ धमका। उसके साथ दो-तीन गुंडे जैसे दिखने वाले आदमी भी थे।

"सृष्टि! बाहर निकल। मुझे पता है तू यहीं है," रजत चिल्लाया।

दीनानाथ जी बाहर आए। "क्या तमाशा है यह?"

"तमाशा नहीं ससुर जी, अपना हक़ लेने आया हूँ। आपकी बेटी को वापस ले जाने आया हूँ। और हाँ, जो बिज़नेस डूबा है, उसे उबारने के लिए 50 लाख चाहिए। वरना अपनी बेटी को भूल जाइए," रजत ने बेशर्मी से कहा।

सृष्टि सहम गई। उसे लगा आज उसके पिता उसे धक्के मारकर निकाल देंगे या फिर अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए रजत के पैरों में गिर जाएंगे।

दीनानाथ जी ने अपनी चश्मे को ठीक किया और रजत की आँखों में आँखें डालकर बोले, "मेरी बेटी कोई सामान नहीं है जिसे मैं तुझे बेच दूँ। और रही बात 50 लाख की, तो फूटी कौड़ी नहीं दूंगा तुझे।"

"तो ठीक है, रख लीजिए अपनी बेटी को। आज से हमारा रिश्ता ख़त्म। और यह घर... सुना है यह आपके नाम पर है? कोर्ट कचहरी के चक्कर में आपको ऐसा फसाऊंगा कि यह पुराना मकान भी बिक जाएगा," रजत ने धमकी दी।

सृष्टि रोने लगी, "पापा, दे दीजिये न पैसे... वरना यह मुझे छोड़ देगा।"

दीनानाथ जी ने सृष्टि की तरफ देखा और कड़क आवाज़ में बोले, "चुप रह! आज अगर मैंने इसके आगे घुटने टेक दिए, तो यह तुझे ज़िन्दगी भर ब्लैकमेल करेगा। ऐसे आदमी के साथ रहने से बेहतर है कि तू अकेली रहे।"

रजत और उसके गुंडे गालियां देते हुए चले गए, धमकी देकर कि वे कल फिर आएंगे।

सृष्टि को लगा कि अब सब ख़त्म हो गया। वह अपने कमरे में जाकर रोने लगी। "पापा ने मेरी गृहस्थी उजाड़ दी। पैसे होते हुए भी नहीं दिए।"

रात के 12 बज रहे थे। सृष्टि को नींद नहीं आ रही थी। उसे पिता के कमरे से कुछ खटपट की आवाज़ सुनाई दी। उसने धीरे से दरवाज़ा खोला। दीनानाथ जी एक पुरानी संदूक खोलकर बैठे थे। माँ उनके पास बैठी रो रही थीं।

"सुनिए, दे दीजिये न पैसे। हमारी बच्ची की ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी," माँ गिड़गिड़ा रही थीं।

दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली। "लता, अगर आज मैंने उसे वो पैसे दे दिए जो मैंने अपनी बुढ़ापे की दवाइयां बेचकर जोड़े हैं, तो वो जुआरी उसे भी उड़ा देगा। और फिर मेरी बच्ची सड़क पर आ जाएगी। मुझे मेरी बेटी की 'शादी' नहीं बचानी, मुझे अपनी 'बेटी' बचानी है।"

सृष्टि दरवाज़े के पीछे खड़ी सुन रही थी।

दीनानाथ जी ने संदूक से एक मोटी फाइल निकाली और माँ के हाथ में दी।

"यह देखो लता। यह उस दिन के लिए था जब सृष्टि पर मुसीबत आएगी।"

माँ ने फाइल खोली। उसमें एक आलीशान फ्लैट के कागज़ात थे—शहर के सबसे पॉश इलाके में। और वह फ्लैट 'सृष्टि' के नाम पर था। कागज़ात की तारीख उसी साल की थी जिस साल सृष्टि की शादी हुई थी।

दीनानाथ जी बोले, "याद है लता? सृष्टि अपनी शादी में 2 लाख का लहंगा मांग रही थी। मैंने मना कर दिया था। सबने मुझे कंजूस कहा। मेरी अपनी बेटी ने मुझे नफरत की नज़र से देखा। लेकिन मैंने वो 2 लाख, और शादी के टेंट-डेकोरेशन के 10 लाख बचाकर, इस फ्लैट की डाउन-पेमेंट की थी। पिछले तीन साल से मैं अपनी दुकान का सारा मुनाफा इस फ्लैट की किश्तें भरने में लगा रहा हूँ। मैंने खुद फटी बनियान पहनी, ताकि मेरी बेटी के सिर पर एक अपनी छत हो—जो उसके पति या पिता के रहमो-करम पर न हो।"

सृष्टि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

दीनानाथ जी की आवाज़ भर्रा गई, "मुझे पता था कि रजत बड़े घर का है, खर्चे बड़े हैं। अगर कभी ऊंच-नीच हुई, तो वो मेरी बेटी को ही दबाएगा। इसलिए मैंने उसे दहेज में सोना-चांदी नहीं दिया, वो तो रजत बेच देता। मैंने उसे 'आत्मनिर्भरता' दी है। यह घर सिर्फ़ सृष्टि का है। कल मैं रजत को यह कागज़ नहीं दूंगा, बल्कि सृष्टि को दूंगा। वो चाहे तो उस घर में रहे, या उसे बेचकर अपना बिज़नेस शुरू करे। उसे किसी मर्द के सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

फिर दीनानाथ जी ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाली।

"सोचा था मरने के बाद यह चिट्ठी उसे मिलेगी, पर शायद कल ही देनी पड़े।"

सृष्टि अब और नहीं रुक सकी। वह दौड़ती हुई कमरे में आई और पिता के पैरों में गिर पड़ी।

"पापा...!" उसका गला रुंध गया था।

दीनानाथ जी चौंक गए। उन्होंने जल्दी से अपने आंसू पोंछे और फाइल छिपाने की कोशिश की।

"अरे... तू सोई नहीं अभी तक?"

सृष्टि ने उनके घुटनों को पकड़ लिया। "मुझे माफ़ कर दीजिये पापा। मैं कितनी अंधी थी। मैं आपको कंजूस समझती रही, दुनिया का सबसे बुरा पिता समझती रही। और आप... आप अपनी खुशियाँ मारकर मेरा भविष्य बना रहे थे।"

दीनानाथ जी ने उसे उठाने की कोशिश की, पर सृष्टि नहीं उठी। वह बच्चों की तरह रो रही थी।

"पापा, मैंने आपकी उस 25 हज़ार की साड़ी की कीमत नहीं समझी, लेकिन आपने मेरे लिए करोड़ों का आशियाना बना दिया। मुझे वो फ्लैट नहीं चाहिए पापा, मुझे बस आप चाहिए। मुझे माफ़ कर दीजिये।"

दीनानाथ जी का संयम टूट गया। उन्होंने सृष्टि को उठाकर गले लगा लिया। वह पिता, जो विदाई पर भी नहीं रोया था, आज अपनी बेटी को छाती से लगाकर फूट-फूट कर रो रहा था।

"पगली," दीनानाथ जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा, "बाप कभी बुरा नहीं होता। बस उसके प्यार करने का तरीका थोड़ा सख्त होता है। मैं डरता था कि अगर तुझे लाड़-प्यार में कमज़ोर बना दिया, तो तू इस ज़ालिम दुनिया से कैसे लड़ेगी? मैं तुझे रानी नहीं, एक योद्धा बनाना चाहता था।"

उन्होंने सृष्टि के आंसू पोंछे और वो चिट्ठी उसके हाथ में दी।

"पढ़ इसे।"

सृष्टि ने कांपते हाथों से चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था:

*"मेरी प्यारी गुड़िया सृष्टि,*

*शायद जब तुम यह पढ़ रही होगी, मैं इस दुनिया में नहीं हूँगा। मुझे पता है तुम मुझसे नाराज़ हो। तुम्हें लगता है कि मैंने तुम्हारी खुशियों का गला घोंटा। पर बेटा, दुनिया तमाशा देखती है, और बाप भविष्य देखता है। शादी के चार घंटे की चकाचौंध के लिए मैं तुम्हारी आने वाली चालीस साल की सुरक्षा दांव पर नहीं लगा सकता था। लोग कहते, 'वाह! क्या शादी थी', पर बाद में अगर तुम रोती, तो वही लोग हँसते।

यह मकान तुम्हारे नाम है। यह तुम्हारा किला है। इसमें तुम सिर उठाकर जीना। और हाँ, अगर कभी लगे कि मैं बहुत सख्त था, तो बस एक ख़राब पिता समझकर, मुझे माफ़ कर देना मेरी गुड़िया..!!

* तुम्हारा 'कंजूस' पापा"*

चिट्ठी पढ़कर सृष्टि ने उसे अपने सीने से लगा लिया। उस रात उसने महसूस किया कि असली दौलत बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि पिता की उस दूरदर्शी सोच और त्याग में होती है।

अगले दिन जब रजत आया, तो सृष्टि ने दरवाज़ा खोला।

"पैसे लाई?" रजत ने पूछा।

सृष्टि ने उसके सामने तलाक के कागज़ात फेंक दिए।

"पैसे नहीं, अपनी आज़ादी लाई हूँ। और हाँ, मेरे पिता ने मुझे जो दिया है, उसकी कीमत तुम जैसे लोग सात जन्मों में नहीं समझ सकते। निकल जाओ यहाँ से, अब मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं है।"

दीनानाथ जी पीछे खड़े अपनी बेटी को देख रहे थे। उनकी आँखों में गर्व था। उनकी 'गुड़िया' अब गुड़िया नहीं रही थी, वह एक शेरनी बन चुकी थी—बिल्कुल वैसी, जैसी वह उसे बनाना चाहते थे।

सृष्टि ने उस दिन कसम खाई कि वह उस नए फ्लैट में एक बुटीक शुरू करेगी और अपने पिता का सिर कभी झुकने नहीं देगी। उसे समझ आ गया था कि पिता का प्यार नारियल जैसा होता है—बाहर से सख्त, लेकिन अंदर से मीठा और जीवन देने वाला।

अक्सर हम अपने माता-पिता के कड़े फैसलों को उनकी बेरुखी समझ लेते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि जब दुनिया हमारी हंसी और लिबास देख रही होती है, तब एक पिता हमारी सुरक्षा और भविष्य की चिंता में अपनी नींदें हराम कर रहा होता है। पिता के प्यार को 'खर्च' से नहीं, 'फ़िक्र' से तौलिये।

क्या दीनानाथ जी ने शादी में पैसे बचाकर फ्लैट लेकर सही किया? या उन्हें सृष्टि की खुशी के लिए धूमधाम से शादी करनी चाहिए थी? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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“आरव ने कहा है—कंपनी घर दे रही है, फर्नीचर भी… अब तुम बताओ, मैं क्या माँगूँ?”अदिति ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसके चे...
08/07/2026

“आरव ने कहा है—कंपनी घर दे रही है, फर्नीचर भी… अब तुम बताओ, मैं क्या माँगूँ?”
अदिति ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसके चेहरे की रेखाएँ मुस्कान से पहले ही थकान लिख देती थीं। यह वही थकान थी जो पिछले तीन साल से उसके हिस्से आई थी—बिना शोर किए, बिना शिकायत किए, बस भीतर-भीतर घिसते हुए।
आरव और अदिति एक-दूसरे को समझते थे। एक-दूसरे के लिए बुरे नहीं थे। पर उनके बीच एक तीसरा व्यक्ति था—आरव की माँ, शकुंतला देवी, जिनकी बात घर में अंतिम मानी जाती थी। उम्र के साथ उनकी ज़िद और तीखी हो गई थी, और उनकी “परंपरा” वाली भाषा में अक्सर अदिति के लिए काँटे छिपे रहते थे।
“घर माँगना है तो माँग लो… पर वहाँ भी माँ…?” अदिति ने वाक्य पूरा नहीं किया। उसे पता था, कुछ सवाल इस घर में पूछे नहीं जाते।
आरव ने नज़रें चुराकर कहा, “माँ अकेली कैसे रहेंगी? मैं उन्हें छोड़ नहीं सकता।”
अदिति ने सिर हिलाया, जैसे वह ‘हाँ’ कह रही हो, पर सच में वह अपने भीतर गिरते भरोसे को संभाल रही थी।
शकुंतला देवी को लगता था कि बहू का काम है—सुबह उठकर चूल्हा, पूजा, नाश्ता, और दिन भर “घर को संभालना”, यानी अपना होना भूल जाना। अदिति नौकरी करती थी, फिर भी उसे ‘कामवाली’ की तरह आदेश मिलते—“चाय में शक्कर कम”, “रोटी फूली नहीं”, “माँ के कमरे में धूप क्यों नहीं आई”, “मेरे लिए अलग सब्ज़ी क्यों नहीं बनी।”
आरव देखता था, पर बोलता नहीं था। वह हर बार बीच में आकर दो ही शब्द कहता—“अदिति, समझो… माँ की उम्र…”
और अदिति हर बार समझने की कोशिश करती, क्योंकि उसे आरव पर भरोसा था। मगर भरोसा भी कब तक अकेले घर चलाए?
धीरे-धीरे अदिति की हँसी कम होने लगी। ऑफिस में उसकी सहेलियाँ कहतीं, “तू पहले कितनी चहकती थी।”
वह बस मुस्कुरा देती, क्योंकि सच बताने से पहले उसे अपने आँसुओं का हिसाब रखना पड़ता।
एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त आरव ने अचानक कहा, “अगले हफ्ते शिफ्ट करना है।”
“कहाँ?” अदिति का मन जैसे जाग उठा।
“नया फ्लैट… कंपनी का।” आरव की आवाज़ में अजीब-सी जल्दी थी, जैसे वह खुद को मनाने की कोशिश कर रहा हो।
उस रात अदिति देर तक जागती रही। उसने सोचा—शायद अब सब ठीक होगा। शायद नया घर, नया शहर, नई शुरुआत। शायद शकुंतला देवी भी बदलें। शायद…
‘शायद’ शब्द बहुत बड़ा सहारा होता है, जब इंसान के पास कोई ठोस आश्वासन न हो।
आखिर वह दिन आ गया। सामान बँधा, कार में रखा गया, और वे नए घर पहुँचे। फ्लैट सच में सुंदर था। हल्की धूप, खुली खिड़कियाँ, पास में पार्क, और सोसाइटी के नीचे छोटी-सी दुकान। अदिति की आँखों में पहली बार घर का सपना जागा—अपना घर, जहाँ वह साँस ले सके।
रात को जब आरव सो गया, अदिति बालकनी में खड़ी देर तक शहर की रोशनी देखती रही। उसे लगा, जैसे उसकी छाती पर रखा पत्थर थोड़ा हल्का हो गया है।
अगली सुबह वह बहुत जल्दी उठी। उसने मन में तय किया—आज आरव को अपनी पसंद का टिफिन बनाकर देगी। उसने सोचा, ऑफिस पास है, तो आरव भी आराम से उठेगा। मगर बेडरूम से नल की आवाज़ आई। आरव नहाने की तैयारी कर रहा था।
“इतनी जल्दी?” अदिति ने आश्चर्य से पूछा, “ऑफिस तो पास है ना?”
आरव ने शीशे में खुद को देखते हुए हल्की मुस्कान दी, पर वह मुस्कान भी किसी बोझ का पर्दा लग रही थी।
“ऑफिस… वही है,” उसने धीरे से कहा, “जहाँ पहले था।”
अदिति चौंकी। “तो हम यहाँ क्यों आए?”
आरव ने तौलिया कंधे पर रखा और एक गहरी सांस ली। वह कुछ पल चुप रहा, जैसे शब्द चुन रहा हो—शब्द जो किसी को चोट न करें, पर सच भी कह दें।
“अदिति… मैंने झूठ कहा था।”
अदिति का चेहरा सफेद पड़ गया। “क… क्या?”
आरव ने उसके सामने बैठते हुए कहा, “मुझे कोई नई साइट नहीं मिली। न ही ऑफिस बदला। बदली है बस… हमारी जगह।”
अदिति की आँखों में प्रश्नों का सैलाब उमड़ आया। “तुमने… ये सब…?”
आरव ने सिर झुका लिया। “मैं तुम्हें यहाँ लाया हूँ… तुम्हारे लिए।”
अदिति को लगा जैसे कोई सपना अचानक सच्चाई बन गया हो, और सच्चाई इतनी हल्की कि वह पकड़ में ही न आए।
“पर… तुम्हारी माँ?” उसने धीरे से पूछा, जैसे कोई डरता हुआ बच्चा पूछता है—दरवाजे के पीछे राक्षस तो नहीं?
आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “माँ को मैंने नहीं छोड़ा। मैंने बस… तुम्हें बचा लिया।”
उसकी आवाज़ काँप गई। “अगर मैं माँ से सीधे कहता कि मैं उनके साथ नहीं रहना चाहता… तो वो टूट जातीं। वो उम्र ऐसी है, जहाँ आदमी बदलता नहीं, बस अपनी आदतों को धर्म बना लेता है। और मैं… मैं लाचार हो जाता।”
अदिति ने होंठ भींच लिए। “तो तीन साल…?”
आरव ने दर्द से कहा, “मैंने सब देखा है। तुम्हारा चुप-चुप रहना, तुम्हारा अकेले रसोई में रो लेना, तुम्हारी छुट्टी में भी घर का काम… सब। पर मैं फँसा रहा। माँ और पत्नी के बीच… और मैं हर बार गलत फैसला करता रहा—क्योंकि मुझे लगा, समय ठीक कर देगा।”
“बच्चा…” अदिति के मुँह से शब्द टूटकर निकला।
आरव की आँखों में अफसोस उतर आया। “मैंने भी यही सोचा था कि बच्चा होगा तो माँ बदल जाएँगी। पर माँ ने तो तुम्हें और कसकर बाँधना शुरू कर दिया। जैसे तुम उनकी संपत्ति हो।”
अदिति का गला भर आया। “और तुम… तब भी…”
“तब भी मैं डर गया,” आरव ने सच कबूल किया। “माँ की आँसू वाली भाषा से… समाज की बातों से… रिश्तेदारों के ताने से… और अपने ही अपराधबोध से कि मैं ‘अच्छा बेटा’ नहीं बन पाऊँगा।”
कुछ देर सन्नाटा रहा। किचन में दूध उबलकर गिर गया, पर अदिति को जैसे आवाज़ भी सुनाई नहीं दी। उसके भीतर पिछले सालों की सारी रातें एक साथ जाग गईं।
आरव ने अचानक उसके हाथ पकड़ लिए। “आज पहली बार मैंने तुम्हारे लिए फैसला किया है। देर से किया… पर किया है।”
अदिति की आँखों से आँसू बह निकले। “पर माँ…?”
आरव ने धीरे से कहा, “माँ अपने बड़े भाई के पास चली गई हैं। मैंने उनसे कहा कि कंपनी ने मुझे दूर भेज दिया है। उन्होंने मुझे खुद कहा—‘जा, यहाँ रहकर बर्बाद मत हो…’”
अदिति ने अविश्वास से पूछा, “उन्होंने… आसानी से भेज दिया?”
आरव ने कड़वी मुस्कान दी। “हाँ। क्योंकि उनके लिए मैं बेटा हूँ। और तुम… बस बहू।”
यह बात अदिति के दिल में चुभी, पर उसी चुभन में एक राहत भी थी—कम से कम सच साफ था।
“तो अब?” अदिति ने पूछा, अपनी आवाज़ को संभालते हुए।
आरव ने कहा, “हर दो हफ्ते में माँ से मिलने जाएंगे। दिन में रहेंगे, रात को वापस आ जाएंगे। माँ को अकेला भी नहीं छोड़ेंगे, और तुम्हें भी… फिर उस पिंजरे में नहीं डालेंगे।”
अदिति ने धीरे से कहा, “और अगर माँ नाराज़ हुईं?”
आरव ने पहली बार पूरे आत्मविश्वास से कहा, “तो हो जाएँ। मैं उनकी नाराज़गी सह लूँगा, पर तुम्हारा टूटना नहीं। तुम मेरी पत्नी हो, सिर्फ घर की मशीन नहीं।”

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पापाजी के देहावसान का अप्रत्याशित समाचार मिलते ही राशि और राहुल पहली ही फ्लाइट पकड़कर इंडिया आ गए थे.पापा जी के साइलेंट ह...
08/07/2026

पापाजी के देहावसान का अप्रत्याशित समाचार मिलते ही राशि और राहुल पहली ही फ्लाइट पकड़कर इंडिया आ गए थे.

पापा जी के साइलेंट हार्ट अटैक ने नींद में ही उनकी जान ले ली थी. अंतर्मुखी और शांत स्वभाव के पापाजी ने आख़िरकार दुनिया भी उसी अंदाज़ में छोड़ दी थी,

पर वाचाल, भोली और मिलनसार सविताजी पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा था. रिश्तेदार और पड़ोसी महिलाओं के भरपूर सहयोग के बावजूद राशि के लिए उन्हें संभालना मुश्किल हो गया था. ख़ैर, गुज़रते व़क्त के साथ-साथ सब संभलने लगा, पर राशि और राहुल जानते थे कि मां की ज़िंदगी में अचानक आया खालीपन इतनी आसानी से भरनेवाला नहीं है.

पिता की ही तरह अल्पभाषी और धीर-गंभीर राहुल और भी चुप-चुप रहने लगा, तो राशि ने आगे बढ़कर सारी ज़िम्मेदारियां ओढ़ ली थीं. यहां तक कि उनके अमेरिका लौटने का दिन आने से पहले-पहले उसने मम्मीजी को भी किसी तरह साथ चलने के लिए मना ही लिया था.

“यह घर ऐसे का ऐसा ही रहेगा मम्मीजी. आपका वहां मन न लगे, तो आप कभी भी वापस आ सकती हैं.”

राशि के इस आश्‍वासन पर ही सविताजी बच्चों के साथ जाने के लिए तैयार हो पाई थीं. वैसे भी बेटे-बहू के सिवाय अब उनका दुनिया में और था भी कौन?

राशि ने बहुत ही उत्साह से अमेरिका में रहनेवाले अपने संबंधियों और दोस्तों से सविताजी को मिलवाया था. उसका तो पूरा परिवार ही अमेरिका में बसा हुआ था. राहुल से भी उसकी मुलाकात उच्च अध्ययन के तहत कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में हुई थी और बस वहीं दोनों एक-दूसरे को दिल दे बैठे थे. राशि के घरवाले तो एक बार में ही इस रिश्ते के लिए तैयार हो गए थे. हां, राहुल के माता-पिता को ख़ुद को समझाने में थोड़ा व़क्त लगा था...

यदि बेटा पढ़-लिखकर वहीं नौकरी करेगा, तो ठीक ही है, अपना कहने को वहां इतने लोग होंगे. कम से कम बहू इंडियन तो है. बातूनी, मिलनसार सविताजी को तो मानो बेटी, सहेली सब कुछ मिल गई थी. विदेश में पली-बढ़ी होने पर भी राशि को सविताजी के साथ सामंजस्य बिठाने में कोई परेशानी नहीं हुई.

कारण, सविताजी का दिल बिल्कुल साफ़ था. वे राशि को सच्चे दिल से अपना मानने लगी थीं ये उनकी यही साफ़गोई और सच्चाई राशि को अंदर तक छू जाती थी.

राशि ने अपनी उच्च शिक्षित, कामकाजी मां से निर्भीकता, स्मार्टनेस सीखी थी, पर अब सविताजी की उदारता, विनम्रता, माधुर्य और सादगी भी अपना लेने से उसके व्यक्तित्व में चार चांद लग गए थे

मम्मीजी को अपने साथ अमेरिका लाकर राशि संतुष्ट थी, पर मम्मीजी संतुष्ट हैं या नहीं, इसे लेकर वह आश्‍वस्त नहीं हो पा रही थी. और उधर लोगों के उनके लिए सादी सुझावों और प्रस्तावों ने राशि को अजीब धर्मसंकट में डाल दिया था. वह कैसे मम्मीजी के सम्मुख ये सब बातें और प्रस्ताव रखे?

जिस तरह के समाज और मानसिकता के बीच वह बचपन से रहती आई है, उसमें यह सब बहुत सामान्य बात है. लेकिन मम्मीजी जिस तरह के परिवेश से आई हैं, वहां इस तरह की बातें, प्रस्ताव... राशि को तो यह भी डर था कि उसके प्रस्ताव रखते ही कहीं मम्मीजी उसी व़क्त पैदल ही इंडिया रवाना न हो जाएं.

राहुल भी तो सब सुनकर एकबारगी कितने असहज हो गए थे. राशि ने समझाना चाहा, तो उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि मुझे नहीं लगता कि मां इसके लिए कभी तैयार होंगी. राशि समझ गई थी कि यह मोर्चा उसे अकेले ही संभालना है.

यदि मम्मीजी सहमत हो जाती हैं, तो यह न केवल उनके लिए वरन पूरे परिवार के लिए बहुत राहत और ख़ुशी की बात होगी,

पर इसकी संभावना उसे शून्य ही नज़र आ रही थी. इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने साधारण रूढ़िवादी परिवेश के बावजूद मम्मीजी बहुत प्रगतिशील विचारों की हैं.
राशि ओर राहुल की
शादी से पहले भी राहुल ने उसे बता दिया था कि चाहे पूरा घर-बिरादरी उनकी शादी के ख़िलाफ़ हो जाए, लेकिन मां शत-प्रतिशत उन्हीं का साथ देंगी. “अच्छा, इतने विश्‍वास की वजह?” राशि ने शोख़ी से पूछा था.

“मां का दिल बहुत साफ़, कोमल और सच्चा है. मैं उन्हें जैसे ही हमारे प्यार की गहराई का वास्ता दूंगा, वे तुरंत पिघल जाएंगी और आगे होकर तुम्हारा हाथ मांग लेंगी.”

राशि ने सविताजी के बारे में जो सुना था, शादी के बाद उन्हें उससे कहीं बढ़कर पाया. कई बार तो राशि का पक्ष लेते हुए वे राहुल को ही झिड़क देती थीं. राहुल तो शादी के बाद हमेशा के लिए इंडिया सेटल हो जाना चाहता था. राशि उसकी भावनाओं को समझती थी. सहमत भी थी, लेकिन जल्दबाज़ी में कोई भी निर्णय लेना उसे समझदारी नहीं लग रहा था.

“देखिए न मम्मीजी, राहुल तो ज़िद पकड़कर बैठ जाते हैं. कहते हैं नौकरी तो मिल ही जाएगी, आज नहीं तो कल! यदि इंडिया लौटना है, तो बस तुरंत लौट चलो.”

“अच्छा, राहुल ने ऐसा कहा? हम तो सोच रहे थे वो हमेशा के लिए वहीं विदेश में ही बस जाएगा.” सविताजी गर्व से फूल उठी थीं. “मम्मीजी, उन्हें आप सबसे बहुत लगाव है. मैं भी यही चाहती हूं कि सभी साथ रहें, लेकिन जब तक यहां दूसरी नौकरी का इंतज़ाम नहीं हो जाता, तो हम दोनों की लगी लगाई बढ़िया नौकरियां छोड़कर आना क्या समझदारी होगी? वहां रहते हुए भी तो यहां नौकरी ढूंढ़ सकते हैं?”

“हां और क्या? मैं राहुल को समझाती हूं.” मां के कहने पर ही राहुल को दो साल और अमेरिका में रुकना पड़ा था. दो साल बाद जब वो इंडिया आने के लिए पूरी तरह तैयार था, तो मां ने उसे यह कहकर फिर रोक दिया था, “बहू क्या वहां अकेली रहेगी? उसकी भी तो यहां नौकरी लग जाने दे.” “अकेली क्यूं? उसका तो पूरा घर-परिवार है यहां.” राहुल ने तर्क दिया था.

“वह वहां अपने घर परिवार के साथ रहती है या तेरे साथ? वो तेरी ज़िम्मेदारी है न! और अपनी ज़िम्मेदारी से इस तरह मुंह मोड़कर आना भले घर के लड़कों की निशानी नहीं है.”

“लेकिन इसमें न जाने कितना टाइम और लग जाएगा मां?”

“जहां इतने साल लगे हैं, वहां एकाध और सही, लेकिन मैं चाहती हूं तुम दोनों साथ इंडिया लौटो.”

राशि के घर-परिवारवाले, दोस्त, ऑफिसकर्मी सभी उसकी सास का निर्णय जानकर आश्‍चर्यचकित रह गए थे.

“इंडियन सास तो अपनी बहू को सांस भी नहीं लेने देतीं. बड़ी स्ट्रिक्ट और रूढ़िवादी होती हैं.”

“मेरी सास अपवाद हैं.” राशि गर्व से मुस्कुराते हुए बताती. टिपिकल सास जैसी नहीं हैं और देखने में भी वे बेहद ख़ूबसूरत हैं. अभी 50 की हुई हैं, पर देखने में 50 से भी कम की लगती हैं.”

“राशि, बेटी तूने ये कैसे कपड़े रखे हैं मेरे पहनने के लिए?” मम्मीजी की पुकार सुनाई पड़ी, तो विगत में खोई राशि वर्तमान में लौटी. वह भागती हुई मम्मीजी के कमरे में पहुंची. “मैंने बताया तो था कि आपके लिए कुछ नए सूट तैयार करवाए हैं, जो यहां के मौसम और रहन-सहन के हिसाब से आपके लिए सही रहेंगे.”

“हां, पर इनके रंग तो देख. ये लाल-पीले कपड़े मैं पहनूंगी?”

“मम्मीजी, आप भूल जाती हैं यह इंडिया नहीं है. यहां यह सब कोई नहीं देखता.” “इंडिया नहीं, इंडियन्स तो हैं. मैं तो राहुल के सामने भी ये सब पहनकर नहीं जा सकती. क्या सोचेगा वो?” “कोई कुछ नहीं सोचेगा. जो सोचता है, वो आपके भले के लिए ही सोचता है और राहुल तो वैसे भी आज से 3-4 दिनों के लिए बाहर गए हैं. भूल गईं आप?”

“ओह हां! पर फिर भी मुझसे यह सब पहनकर किसी के सामने नहीं जाया जाएगा. वैसे ही लोग मुझे देखकर जाने क्या-क्या बातें बनाते रहते हैं?”

“कैसी बातें?” राशि ने चौंककर पूछा. “किसी ने आपसे कुछ कहा क्या?” “म...मुझे नहीं कहा तो क्या, तेरे तो कान भरते ही हैं. देख बेटी, मैं नहीं चाहती मेरी वजह से यहां तुम लोगों को कोई नीचा दिखाए. वैसे तो मैं अपनी ओर से बहुत संभलकर रहती हूं, फिर भी शायद कभी कोई भूल हो गई हो. यहां के तौर-तरी़के नहीं जानती न!

तू राहुल से कहकर अब मेरे इंडिया लौटने की व्यवस्था करा दे. वैसे भी मुझे यहां आए अब बहुत समय हो गया है.

” राशि को लगा यही उपयुक्त समय है खुलकर बात करने का. “आप कहीं नहीं जा रहीं मम्मीजी, बल्कि हमेशा के लिए यहीं बसने जा रही हैं. आप अपने आपको एक नई ज़िंदगी की शुरुआत के लिए तैयार करना आरंभ कर दें.”

“ये तू क्या पहेलियां बुझा रही है?” “आप लोगों की कानाफूसी की बात कर रही थीं न? वे आपसे, आपकी ख़ूबसूरती से, आपकी व्यवहारकुशलता, आपकी पाककला आदि सभी से बहुत ज़्यादा प्रभावित हैं.

कोई अपने विधुर भाई के लिए, तो कोई अपने तलाक़शुदा बेटे के लिए आपका रिश्ता मांग रहा है.”

सविताजी भौचक्की-सी राशि को देख रही थीं. “तू पागल तो नहीं हो गई है? क्या बके जा रही है?”

“मम्मीजी, शांत हो जाइए. यहां यह सब बहुत सामान्य बात है. फिर वे आपके भले के लिए ही यह सब कह रहे हैं. अभी आपकी उम्र ही क्या है!” “राहुल जानता है यह सब?” सविताजी अब भी सदमे की सी स्थिति में थीं. “हां, मैंने बताया था उन्हें.” कहते-कहते राशि को ख़्याल आ गया कि यदि वह राहुल की प्रतिक्रिया शब्दश: बता देगी, तो मम्मीजी कभी भी इस प्रस्ताव के लिए तैयार नहीं होंगी. “वो भी यही कह रहे थे कि मां जैसा ठीक समझें. मम्मीजी, आप इतनी समझदार, व्यावहारिक और प्रगतिशील विचारोंवाली हैं. अच्छी तरह जानती हैं कि ज़िंदगी का सफ़र अकेले तय करना कितना मुश्किल है?”

“लेकिन मैं अकेली नहीं हूं. तुम्हारे पापाजी शरीर से भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनका प्यार मेरे दिलोदिमाग़ में रच-बस गया है, जिसके सहारे मैं आराम से अपनी शेष ज़िंदगी व्यतीत कर सकती हूं. तुम्हारे लिए यह समझना थोड़ा मुश्किल होगा, क्योंकि तुम्हारी वैवाहिक ज़िंदगी
तो शुरुआत ही प्यार से हुई है,

लेकिन मेरा वैवाहिक जीवन जब आरंभ हुआ था, तब मैं प्यार का क ख ग... भी नहीं जानती थी. मात्र 19 वर्ष की थी तब मैं. शारीरिक संबंधों को ही प्यार समझती थी. 20 की हुई, तब राहुल गोद में आ गया था. तुम्हारे पापाजी दूसरे शहर में नौकरी करते थे. ससुरजी का प्रॉपर्टी का बिज़नेस था और मैं सास-ससुर के पास ही रहती थी. सप्ताहांत में या कभी-कभी तो दो सप्ताह में राहुल के पापा घर आते थे. कभी उनकी अपने ही शहर में ट्रांसफर करा लेने की बात चलती, तो कभी मुझे उनके पास भेजने की बात. इस ऊहापोह में कुछ वर्ष तो ऐसे ही निकल गए. राहुल स्कूल भी जाने लग गया. मुझे अब उनसे दूर रहना अखरने लगा था. मन हमेशा उनके सामीप्य की कामना करता रहता. शायद ऐसी ही मनोदशा उनकी भी थी.

शायद हमारे दिलों में सच्चे प्यार का अंकुरण हो चुका था, लेकिन राहुल के पापा को तो तुम जानती ही हो. वे इस सच्चाई को कहां अपने मुंह से स्वीकारने वाले थे? पर मैं ग़ौर कर रही थी कि उनके घर के चक्कर, फोन कॉल्स आदि बढ़ गए थे. उस समय मोबाइल तो थे नहीं. लैंडलाइन पर ही राहुल की पढ़ाई या अन्य किसी बहाने से ये मुझसे बात करने में आतुरता दिखाते, तो ऊपर से शर्माती मैं अंदर ही अंदर ख़ुशी से फूल उठती थी.

हमारा प्यार परवान चढ़ना शुरू ही हुआ था कि अचानक हृदयाघात से मेरे ससुरजी चल बसे. शोक संतप्त उस घड़ी में लंबे समय तक साथ रहने का मौक़ा मिला, तो हम परस्पर और भी पास आ गए.

उस बार जब वो हमें छोड़कर गए, तो मैंने निश्‍चय कर लिया कि अब मैं मांजी और राहुल को लेेकर हमेशा के लिए इनके पास चली जाऊंगी, लेकिन मैं आश्‍चर्यचकित रह गई, जब कुछ दिन बाद ये ही अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर हमेशा के लिए हमारे संग रहने आ गए. इन्होंने तर्क दिया कि अब सरकारी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर ये बाऊजी का बिज़नेस संभालेंगे.

लेकिन अपने अंतरंग क्षणों में इन्होंने स्वीकार किया कि मेरा मोह ही इन्हें हमेशा के लिए यहां खींच लाया था. मैंने भी अपना प्यार उजागर करते हुए इन्हें अपने इरादे से अवगत करा दिया था. हमारी ज़िंदगी के वे स्वर्णिम दिन थे.

मांजी सत्संग में, तो राहुल अपनी उच्च शिक्षा में व्यस्त था और हमारा सारा समय एक-दूसरे को समर्पित था. फिर मांजी भी चल बसीं, राहुल विदेश चला गया, पर परवान चढ़ते प्यार को अचानक विराम लग गया.

तुम्हारे पापाजी साथ छोड़ गए... परिपक्व उम्र का प्यार भी परिपक्व होता है बेटी. अब शारीरिक क्षुधा तो समाप्त हो गई है और मन उनके प्यार से परितृप्त है. वे मेरे मन में बसे हुए हैं, जहां मैं उनसे हर बात साझा करती हूं, सलाह-मशविरा करती हूं.

अब बताओ, ऐसे में मैं किसी और को कैसे अपने दिल में जगह दे सकती हूं.” राशि अवाक् थी. मम्मीजी-पापाजी की परिपक्व प्रेमगाथा ने उसे अभिभूत कर दिया था. पर साथ ही अपने प्रेम के प्रति उसका मन आशंका से भर उठा था. वह तो कॉलेज के प्रथम वर्ष में ही राहुल के प्यार में पड़ गई थी, तो क्या अपरिपक्व उम्र का प्रेम व़क्त के साथ समाप्त हो जाएगा? जैसा कि वह यहां देखती आई है. सम्बन्ध जोड़ना और तोड़ना यहां तो आम है.

“क्या हुआ बेटी? अचानक तुम्हारा चेहरा क्यूं उतर गया? मैंने कोई ठेस तो नहीं पहुंचा दी तुम्हें?” राशि उनसे अपना भय साझा किए बिना न रह सकी.

“ऐसा कुछ नहीं होगा. यहां के समाज के लिए तुम्हारा प्रेम अपवाद साबित होगा.

मैंने तुम्हारे आपसी प्यार में अल्हड़पन, नादानियां देखी हैं, तो गहन समर्पण और अपनत्व भी महसूस किया है. मेरा आशीर्वाद है तुम्हारा प्रेम सदैव अक्षुण्ण बना रहेगा.”

वातावरण में घुलती पवित्रता और विश्‍वास ने सास-बहू के रिश्ते को और भी प्रगाढ़ बना दिया था.❤️

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