07/04/2026
Q:क्या ओबीसी को राजनीतिक पार्टियों का गुलाम कहना उचित है ? आइए इस पर विश्लेषण करते हैं।
Ans:ओबीसी के लोग कांग्रेस या बीजेपी के “गुलाम” नहीं हैं। वे भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े वोट बैंक में से एक हैं (लगभग 40-52% आबादी, मंडल आयोग के अनुसार), और वे अपनी सुविधा, हित और गणित के हिसाब से वोट देते हैं। “गुलाम” शब्द इस्तेमाल करना ही गलत है—यह एक समुदाय को अपमानित करता है और वास्तविकता को छुपाता है।
वास्तविक कारण क्या हैं?
जाति-आधारित वोट बैंक की राजनीति
भारत में वोटिंग ज्यादातर जाति, समुदाय और स्थानीय गणित पर होती है। ओबीसी (यादव, कुर्मी, पटेल, जाट, गुर्जर, माली, आदि) एक मोनोलिथिक ब्लॉक नहीं हैं।
बीजेपी ने 2014 के बाद “नॉन-यादव ओबीसी” और “अति-पिछड़ा” (EBC) को अलग-अलग किया। छोटी-छोटी ओबीसी जातियों को टिकट, मंत्री पद और योजनाओं का फायदा देकर अपना वोट बैंक बनाया।
कांग्रेस ने पहले मंडल कमीशन (1990) का विरोध किया था (राजीव गांधी के समय), बाद में समर्थन किया, लेकिन संगठनात्मक रूप से ऊपरी जातियों पर निर्भर रही। इसलिए उसका ओबीसी आधार कमजोर हुआ।
दोनों पार्टियाँ आरक्षण, प्रमोशन, शिक्षा और नौकरियों के वादे करती हैं—इसीलिए ओबीसी वोटर उन्हें “उपयोगी” मानते हैं।
कल्याणकारी योजनाओं का असर
गरीबी रेखा के नीचे या निचले मध्यम वर्ग के बहुत से ओबीसी परिवारों को बीजेपी की योजनाएँ (PM Awas, Ujjwala, Ayushman, free ration, किसान सम्मान निधि, मुद्रा लोन) सीधा फायदा पहुँचाती हैं। कांग्रेस भी जब सत्ता में थी तो इसी तरह की योजनाएँ चलाती थी। जब कोई पार्टी सत्ता में होती है तो उसके पास पैसा और स्कीम होती है—वोटर उसी को चुनते हैं। यह गुलामी नहीं, व्यावहारिक गणित है।
क्षेत्रीय और राज्य-विशेष अंतर
उत्तर प्रदेश-बिहार में यादव-जैसे बड़े ओबीसी समुदाय SP/RJD को वोट देते हैं, न कि सीधे कांग्रेस-बीजेपी को।
मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा में बीजेपी को ओबीसी का बड़ा समर्थन मिलता है।
कुछ राज्यों में कांग्रेस अभी भी ओबीसी वोट ले लेती है।
मतलब कोई “गुलामी” नहीं है—वोटर जहाँ फायदा दिखता है, वहाँ जाते हैं। 2019 और 2024 के चुनावों में बीजेपी ने ओबीसी को अपनी तरफ ज्यादा खींचा, लेकिन 2025-26 के उपचुनावों या भविष्य में यह बदल भी सकता है।
नेतृत्व और पहचान
नरेंद्र मोदी खुद ओबीसी (घांची) बैकग्राउंड से हैं—इससे बहुत से ओबीसी वोटरों में “अपना आदमी” वाला भाव आता है। कांग्रेस के पास अभी ऐसा कोई चेहरा नहीं है। लेकिन यह स्थायी नहीं है। 1990 के दशक में VP सिंह (ओबीसी) ने मंडल लागू किया तो ओबीसी ने जनता दल को सपोर्ट किया। वोटर बदलते रहते हैं।
अगर कोई समुदाय किसी पार्टी को बार-बार वोट दे रहा है, तो वह इसलिए क्योंकि वह पार्टी उस समय उसके हितों के सबसे करीब लगती है। “गुलाम” कहना उन लाखों ओबीसी मतदाताओं का अपमान है जो अपनी मर्जी से वोट डालते हैं। अगर वे असंतुष्ट होंगे तो अगले चुनाव में वोट बदल देंगे—जैसा उन्होंने कई बार किया है।
भारतीय राजनीति में जाति, विकास और सत्ता का गठजोड़ है। इसे “गुलामी” कहकर सरल बनाना वास्तविकता से बचना है। ओबीसी लोग किसी के गुलाम नहीं—वे वोटर हैं, और वोटर की ताकत यही है कि वह अपनी शर्त पर पार्टी चुन सकता है।