Girishh Bhagwati

Girishh Bhagwati Lyricist, Writer, Actor, Film Director Trying to run a Production house. Baki Ram jane

I am a Husband of a Superwoman and Father of Two SuperChildren, simultaneously i am doing good in Writing, Acting and Adfilm Direction.

An unpublished book in hand of unpublic politician.
05/02/2026

An unpublished book in hand of unpublic politician.

द्वितीय दिवस।
25/01/2026

द्वितीय दिवस।

अपनी ही पटरी पर चलने का अलग ही मजा है।
24/01/2026

अपनी ही पटरी पर चलने का अलग ही मजा है।

भाजपा  VS वामपंथ? विचारधारा से सत्ता तक साम्यवाद, एकात्म मानववाद और आज की पहचान की राजनीति-बीसवीं सदी के आरंभ में विश्व ...
20/01/2026

भाजपा VS वामपंथ? विचारधारा से सत्ता तक साम्यवाद, एकात्म मानववाद और आज की पहचान की राजनीति-
बीसवीं सदी के आरंभ में विश्व दो बड़े वैचारिक ध्रुवों में बँट रहा था, एक ओर पूँजीवाद, दूसरी ओर साम्यवाद। कार्ल मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत के आधार पर जिस समाज की कल्पना की, उसे लेनिन ने 1917 की रूसी क्रांति के माध्यम से सत्ता-व्यवस्था में रूपांतरित कर दिया। इसके बाद साम्यवाद केवल एक आर्थिक दर्शन नहीं रहा, बल्कि एक संगठित राजनीतिक शक्ति बन गया। उपनिवेशवाद से जूझ रहे एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में यह विचार तेजी से फैला। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।
1920 के दशक से भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन और छात्र संगठनों के माध्यम से मजबूत होने लगा। 1940–50 के दशक तक मार्क्सवादी चिंतन राष्ट्रीय बौद्धिक विमर्श का एक प्रमुख स्तंभ बन चुका था। समाज को ‘शोषक बनाम शोषित’ के द्वंद्व में देखना और क्रांति को समाधान मानना इसकी केन्द्रीय दृष्टि थी।
इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े विचारकों के सामने एक बुनियादी प्रश्न खड़ा हुआ, क्या भारतीय समाज को केवल आर्थिक वर्गों के चश्मे से समझा जा सकता है? क्या उसकी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संरचना को इस दृष्टि से समेटा जा सकता है? इसी वैचारिक चुनौती के उत्तर के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन सामने आता है।
दीनदयाल उपाध्याय ने उस मार्क्सवादी धारणा को अस्वीकार किया जिसमें मनुष्य को मात्र एक आर्थिक इकाई माना जाता है। उन्होंने भारतीय जीवन-दृष्टि के आधार पर “एकात्म मानववाद” का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसमें व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और संस्कृति को एक अविभाज्य समग्रता के रूप में देखा गया। साम्यवाद जहाँ वर्ग-संघर्ष और राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था पर टिका था, वहीं दीनदयाल उपाध्याय ने “अंत्योदय” की अवधारणा दी, समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति के उत्थान को विकास का केंद्र बिंदु बनाने की सोच।
1950–60 के दशकों में, जब वामपंथी बौद्धिक प्रभाव अपने चरम पर था, भारतीय जनसंघ (जो आगे चलकर भाजपा बना) ने एकात्म मानववाद को अपनी वैचारिक आधारशिला बनाया। 1965 के मुंबई व्याख्यानों के माध्यम से दीनदयाल उपाध्याय ने इसे एक सुव्यवस्थित दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार मार्क्स के “सर्वहारा” के समानांतर भारतीय परंपरा में “अंतिम जन” की संकल्पना उभरी, उद्देश्य दोनों का कल्याण था, किंतु मार्ग और दृष्टि भिन्न थे।
आज के परिदृश्य में यह वैचारिक द्वंद्व एक नए रूप में दिखाई देता है। वामपंथ और भाजपा दोनों ही अब केवल दार्शनिक विमर्श की दुनिया में नहीं, बल्कि सत्ता-राजनीति के कठोर यथार्थ में खड़े हैं। वर्ग-संघर्ष और सामाजिक समरसता जैसे मूल सिद्धांत व्यवहार में चुनावी गणित और जनाधार की राजनीति में ढल जाते हैं। यहाँ विचारधाराएँ अपने-अपने समर्थक समूहों को संगठित करने के लिए पहचान की राजनीति का सहारा लेती हैं।
वामपंथी दलों का सामाजिक आधार प्रायः अल्पसंख्यक, हाशिये के समुदाय और वंचित वर्ग रहे हैं, जबकि भाजपा का आधार बहुसंख्यक समाज और उसकी सांस्कृतिक अस्मिता। यहीं से हिंदू–मुस्लिम विमर्श और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति उभरती है। यह टकराव मूलतः धर्म का नहीं, बल्कि सत्ता-संरचना का है, धर्म और पहचान यहाँ साधन बन जाते हैं, लक्ष्य होता है राजनीतिक वर्चस्व।
इस दृष्टि से देखा जाए तो आज की राजनीति न तो केवल साम्यवाद बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का शुद्ध वैचारिक संघर्ष है और न ही केवल धार्मिक भावनाओं का स्वतःस्फूर्त उभार। यह उस लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम है जिसमें हर विचारधारा को सत्ता में बने रहने के लिए एक स्थायी, भावनात्मक और संगठित जनाधार चाहिए।
बीसवीं सदी में द्वंद्व था, मार्क्स बनाम दीनदयाल, वर्ग-संघर्ष बनाम समरसता।
इक्कीसवीं सदी में वही द्वंद्व रूप बदलकर सामने है, समुदाय बनाम समुदाय, पहचान बनाम पहचान।
अंततः संघर्ष विचारों का नहीं, उस सत्ता का है जो समाज की दिशा तय करने की क्षमता रखती है।
नोट - कॉंग्रेस की कोई विचारधारा नहीं है, इसलिए वो इस विषय से बाहर है।
- गिरीश भगवती।
#गिरीश

आजकल विराट कोहली की ये तस्वीर बेहद वायरल हो रही है। और कट्टर चुड्डु लोग इसके ज़रिये लोगो को व्यंग्यात्मक तरीके से अध्यात्...
19/01/2026

आजकल विराट कोहली की ये तस्वीर बेहद वायरल हो रही है। और कट्टर चुड्डु लोग इसके ज़रिये लोगो को व्यंग्यात्मक तरीके से अध्यात्म की आड़ में कोई एक सम्प्रदाय अपनाने को दबाव बना रहे है। की आज ये पढ़ लिखता तो किसी कंपनी में इंजीनियर होता (मतलब नास्तिको और धर्म विरोधियो पर तंज) तो मैंने दबाव लिखा प्रेरित इसलिए नहीं क्यूंकि अगर आप ताना कसते हुए शर्मा जी के लड़के का उदाहरण देती मम्मी को देखेंगे तो ये ही फील आएगा। फिर से विराट कोहली पर आते हैं। आज ये बंदा , सब काम करके संतुष्ट होकर आध्यात्मिक जगह पर जा रहा है। न कि अपने करियर बनाने की उम्र के पहले चरण में। भाई जीवन को हमारे समझदार पुरखो ने चार चरण में पहले से ही बांटा हुआ है। धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष। ईश्वर को मन में रखकर धर्म (कर्तव्य को धारण करो ), अर्थ(आवश्यक साधनो को इकठ्ठा करो), काम (जीवन के सुख, प्रेम, सौंदर्य, इच्छा, कला, रति और भावनात्मक संतोष। यानी जीवन का रस प्राप्त करो) और अंत में मोक्ष (जन्म–मरण के चक्र से मुक्ति, आत्मज्ञान, परम सत्य की अनुभूति। यानी मैं कौन हूँ) सरल शब्दों में – धर्म दिशा देता है, अर्थ साधन देता है, काम आनंद देता है, और मोक्ष मुक्त करता है। अगला तीन चीज़े प्राप्त कर चुका है, लोगो को भटकाए नहीं। डायरेक्ट चौथी सीढ़ी पिछले जन्म में तीन सीढिया प्राप्त व्यक्ति चढ़ते हैं या चू किस्म के लोग।(जो की चढ़ नहीं पाते।)
- गिरीश भगवती।
#गिरीश

 #जनमानस।एक मध्यमार्गी होने के नाते मेरी मित्रसूची में हर विचारधारा के लोग हैं। चाहे वो घोर वामपंथी विचारो वाले हो या घो...
18/01/2026

#जनमानस।
एक मध्यमार्गी होने के नाते मेरी मित्रसूची में हर विचारधारा के लोग हैं। चाहे वो घोर वामपंथी विचारो वाले हो या घोर हिंदुत्ववादी। जैसा की मेरा विषय सिनेमा और उसमे मौजूद तत्व हैं तो मेरी बातचीत भी इन सभी से इसी विषय पर होती है। अगर लिबरल(इसे उदार न समझे बस एक जाती की तरह लें।) और वामपंथी विचारधारा के लोगो की बात की बात की जाए तो उनके मन में बस एक ही तीस रहती है की अब सिनेमा भी साम्प्रदायिक हो गया है। हर जगह प्रोपोगेंडा फ़ैलाने की साजिश हो रही है। इसे वो हिटलर के प्रोपोगंडा सिनेमा से जोड़ते हैं।
दूसरी तरफ राष्ट्रवादी (इसे भी देशभक्त न समझ कर जाती की तरह लें।) और हिंदुत्ववादी कहते हैं की लोग धर्म से जुड़ी समस्याओ पर बनी फिल्मों को क्यों नहीं देखते और वामपंथी, लिबरल्स कैसे उनकी एजेंडा फिल्मों को सफल कर लेते हैं ?
मेरा सिर्फ एक ही कहना है यहाँ न तो कोई साम्प्रदायिक न ही वामपंथी सिनेमा है। जो हैं वो अच्छा या बुरा सिनेमा है। और उसे देखने वाले दर्शकों को आपने समझ लिया तो आप सिनेमा के माध्यम से खूब अपने विचार प्रसारित करें।और ये दर्शक कौन है वो जानना बेहद ज़रूरी है। ये वो दर्शक हैं जो कहीं बंधे नहीं होते। हो सकता है उनके मन में आपकी विचारधारा के लिए एक झुकाव हो पर वो उस पर मुखर नहीं होते। वो सिनेमा देखना चाहते हैं लेकिन अच्छा और मनोरंजक। ये वो दर्शक होते हैं जिन्हे राजनितिक भाषा में स्विंग वोटर कहा जाता है, जो अगर आप पर रीझ गए तो सरकार बना दे और रूठ गए तो सत्ता पलट दें। उनकी जीभ इस बात पर नहीं हिलती की आपने उनकी पसंदीदा विचारधारा पर सिनेमा बनाया है, बल्कि इस पर हिलती है की आपने उनके लिए गए टिकिट की कीमत उन्हें वापस की है की नहीं। "मज़ा आगया और मज़ा नहीं आया" का कोई सम्प्रदाय या विचारधारा नहीं होती। एक ख़राब फिल्म को भी आप प्रयास कर कुछ लाख तो कमवा सकते हैं लेकिन सफल नहीं बना सकते। क्यूंकि सिनेमा विचारधारा से कमिटेड नहीं विषयवस्तु से आकर्षित दर्शक देखता है। 5000 स्क्रीन पर रिलीज़ होकर एक फिल्म अगर डेढ़ से दो करोड़ दर्शकों को पा ले तो वो अत्यंत सफल मानी जाती है। उसका कारण उसकी विचारधारा नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता होती है। वो तकनिकी भी होती है और कलात्मक भी। तो आप खूब ज़ोर लगा लें तो भी कश्मीर फ़ाइल जैसी औसत फिल्म को एक मार्मिक विषय के सहारे 350 करोड़ तक पंहुचा सकते हैं लेकिन ये काठ की हांड़ी होती है फिर से नहीं चढ़ती। विवेक अग्निहोत्री की बाद की फिल्मों के हाल सब देख चुकें हैं। वही राष्ट्रीय विषयों पर आदित्य धर द्वारा निर्देशित और वामपंथी या उदारवादी विषयों पर दक्षिण की थलपति(जोसेफ )विजय अभिनीत फिल्मो को देखे तो आपको निर्माण में तकनिकी और कलात्मक गुणवत्ता दोनों का फर्क समझ आ जायेगा। हिंदुत्ववादी मुद्दों पर कोई ऐसा फिल्मकार नहीं है जिसका नाम लिया जाए। दलितवादी मुद्दों पर ज़रूर नागराज मंजुले और नीरज घायवन का नाम लिया जा सकता है। इनका सिनेमा अच्छा भी है और अपने विषय के रति ईमानदार भी। तो यही कहना चाहूंगा कि अच्छा सिनेमा बनाये उसमे विषय को बेहतर तरीके से समझाने पर मेहनत करें। तकनिकी और कलात्मक पहलुओं को मजबूत करें। दर्शक साम्प्रदायिक या वामपंथी नहीं होता वो सिर्फ दर्शक होता है। अच्छा लगा तो चार और लोगो को सिनेमा हाल भेज देगा वर्ना आपकी लुटिया भी डुबो देगा।
-गिरीश भगवती।
#गिरीश

जब मणि सेठना  ने 1904 में पहला सिनेमाहाल शुरू किया तो फिर जमशेद जी को सिनेमाहाल का जनक क्यों माना जाता  है? सवाल है कि “...
17/01/2026

जब मणि सेठना ने 1904 में पहला सिनेमाहाल शुरू किया तो फिर जमशेद जी को सिनेमाहाल का जनक क्यों माना जाता है? सवाल है कि “पहला सिनेमाहॉल” किसे माना जाए? मणि सेठना का रॉयल्टी थिएटर या जमशेदजी मदन का एल्फिंस्टोन पिक्चर पैलेस, और क्यों ?
1896 में लुमिएर ब्रदर्स ने बॉम्बे में पहली बार चलती तस्वीरें दिखाईं, लेकिन वे अस्थायी शो थे। होटल, थिएटर हॉल या टेंट में। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पारसी उद्यमी मणि सेठना ने 1900 के शुरुआती वर्षों में बॉम्बे में नियमित फिल्म प्रदर्शन शुरू किए और एक स्थायी स्थल बनाया, जिसे “रॉयल्टी थिएटर” कहा गया। ऐतिहासिक रिकॉर्ड में इसका सटीक उद्घाटन वर्ष पूरी तरह तय नहीं है, पर अधिकांश शोध इसे 1904 से 1910 के बीच सक्रिय मानते हैं। इसका महत्व यह है कि यहाँ फिल्में रोज़मर्रा के मनोरंजन की तरह दिखाई जाने लगीं, न कि सिर्फ तमाशे की तरह।
लेकिन इतिहास में “भारत का पहला सिनेमाहॉल” का खिताब आमतौर पर 1907 में कोलकाता में बने एल्फिंस्टोन पिक्चर पैलेस को दिया जाता है, जिसे जमशेदजी फ्रामजी मदन ने खास तौर पर फिल्मों के लिए डिज़ाइन कर बनवाया था। टिकट काउंटर, प्रोजेक्शन रूम, स्थायी सीटिंग यानी पूरी इमारत ही सिनेमा के लिए बनी थी। इसी तकनीकी और स्थापत्य कारण से उसे पहला purpose-built सिनेमाघर माना गया।
तुलना करें तो मणि सेठना सिनेमा के पहले शोमैन थे, जिन्होंने भारत में फिल्म देखने की आदत डाली, जबकि मदन पहले “सिनेमा हॉल निर्माता” थे, जिन्होंने फिल्मों के लिए अलग से घर बनाया। एक ने परंपरा शुरू की, दूसरे ने उसे संस्था का रूप दिया। क्यूंकि मणि सेठना ने 1904 पहले सिनेमा शो अस्थायी हॉल से शुरू किये थे, तो उन्हें पहला शोमेन माना जा सकता है पर मदन ने उसे एक परमानेंट सिनेमा हॉल की शक्ल दी बस यही फर्क है जैसे किसी मैदान में पहला नाटक खेलने वाला कलाकार और पहली बार नाट्यशाला बनाने वाला निर्माता। दोनों इतिहास में जरूरी हैं, पर “पहला थिएटर” वही कहलाता है जो खास तौर पर रंगमंच के लिए बना हो।
इस तरह भारतीय सिनेमा की शुरुआत एक व्यक्ति से नहीं, एक प्रक्रिया से हुई – मणि सेठना की स्क्रीन से लेकर मदन के सिनेमाघर तक और यहीं से भारत में फिल्में तमाशा नहीं, संस्कृति बन गईं। और आज हम जो सिनेमाहॉल का स्वरुप देख रहे हैं उसकी नीव में इन दोनों के ही प्रयास हैं, जो हमेशा अमर रहेंगे।
-गिरीश भगवती।
#गिरीश

एक कहावत है दोई दीन से गए पांडे, न रोटी मिली न मांडे।शिवसेना की स्थापना 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने “मराठी मानुष” के स्व...
16/01/2026

एक कहावत है दोई दीन से गए पांडे, न रोटी मिली न मांडे।
शिवसेना की स्थापना 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने “मराठी मानुष” के स्वाभिमान और मुंबई के स्थानीय अधिकारों की रक्षा के लिए की थी। 1970 के दशक से लेकर 2019 तक बृहन्मुंबई महानगरपालिका पर शिवसेना का वर्चस्व रहा। 1985 से 2022 तक लगातार 37 वर्षों तक बीएमसी पर उसका कब्ज़ा किसी भी भारतीय शहर में किसी एक पार्टी का सबसे लंबा नगर-शासन माना जाता था। 2017 के बीएमसी चुनावों में शिवसेना को 227 में से 84 सीटें मिलीं, बीजेपी को 82, और कांग्रेस को 31। तब भी शिवसेना किसी तरह मेयर की कुर्सी बचा ले गई थी, लेकिन दरार साफ दिखने लगी थी।
2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने पार्टी को उसी तरह तोड़ दिया जैसे किसी फिल्म में वारिस अपने ही राजा के खिलाफ बग़ावत कर दे। उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और पार्टी दो हिस्सों में बंट गई – एक “बालासाहेब की विरासत” का दावा करने वाली, दूसरी “सत्ता और संगठन” पर क़ब्ज़ा जमाने वाली। चुनाव आयोग ने बाद में शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को दे दिया, जो ऐतिहासिक रूप से उद्धव गुट के लिए सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका था।
2024 के लोकसभा चुनावों में मुंबई की छह में से पाँच सीटें एनडीए (बीजेपी-शिंदे शिवसेना) के खाते में गईं, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) केवल एक सीट पर सिमट गई। 2019 में यही पार्टी मुंबई में चार सीटें जीत चुकी थी। वोट शेयर के आंकड़े भी कहानी कहते हैं – जहाँ 2019 में संयुक्त शिवसेना का मुंबई में वोट प्रतिशत लगभग 28–30% के आसपास था, वहीं विभाजन के बाद यह हिस्सा दो धड़ों में बंटकर कमज़ोर पड़ा और एनडीए का सामूहिक वोट शेयर 45% से ऊपर चला गया।
शिवसेना बाहरी विरोधियों से नहीं, बल्कि अंदरूनी कलह से ज़्यादा घायल हुई। पार्टी की पारंपरिक ताक़त रही मराठी मध्यमवर्गीय मतदाता और मिल वर्कर्स की पुरानी पीढ़ी, जो अब या तो बिखर चुकी है या नई राजनीति की तरफ़ शिफ्ट हो गई है। स्मृतियों से सबक लेने वाली पार्टी नया भविष्य तैयार करती है, न कि स्मृतियों में जीने वाली पार्टी।
इतिहास गवाह है कि मुंबई की राजनीति में जिसने भी “स्थिर नेतृत्व और स्पष्ट पहचान” खोई, वह टिक नहीं पाया। 1970–80 के दशक में कांग्रेस का प्रभुत्व टूटा, 1990 के बाद शिवसेना-बीजेपी उभरे, और अब 2020 के बाद वही शिवसेना अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। यह हार केवल चुनावी नहीं, बल्कि एक युग के समाप्त होने का संकेत है, उस युग का, जहाँ एक ही पार्टी मुंबई की नब्ज़, भाषा और गुस्से की प्रतिनिधि मानी जाती थी। पर अब बाला साहेब चले गए और गंगा में बहुत पानी बह गया। होश में आना बहुत ज़रूरी है।
फिल्मों की तरह यहाँ भी ट्रैजेडी यह नहीं कि राजा हारा, बल्कि यह है कि लड़ाई अपनों के बीच हुई। और जब युद्ध घर के अंदर हो, तो क़िले की दीवारें अपने आप ढहने लगती हैं। पर बुरा तो तब है जब किला ही हाथ से निकल जाये। अब रसमलाई खाओ और घर जाओ।
BMC-
बीजेपी+ -118
शिवसेना उबाठा+- 66
महाराष्ट्र-
बीजेपी+ - 26
शिवसेना उबाठा+ - 1
इतना स्कोर काफी है, हालत बताने के लिए।
फोटो- Getty Images
#गिरीश

जंगल का कानून कहता है कि ताकतवर ही राजा होता है  जैसे कि शेर,लेकिन सर्कस में वही शेर इंसान के इशारे पर नाचता है, क्योंकि...
15/01/2026

जंगल का कानून कहता है कि ताकतवर ही राजा होता है जैसे कि शेर,लेकिन सर्कस में वही शेर इंसान के इशारे पर नाचता है, क्योंकि असली ताकत कई बार मांसपेशियों में नहीं, बल्कि सिस्टम और दिमाग में होती है। “द वाइट टाइगर” इसी सच्चाई से अपनी बात शुरू करती है और हमें बलराम हलवाई की कहानी में ले जाती है, जो एक गरीब, तेज और ईमानदार लड़का है, लेकिन ऐसे समाज में पैदा हुआ है जहाँ जन्म ही तय कर देता है कि तुम मालिक बनोगे या नौकर। वह अमीर जमींदार के बेटे अशोक का ड्राइवर बनता है, बाहर से सीधा-सादा दिखने वाला यह मालिक असल में उसी व्यवस्था का हिस्सा है जो गरीब को कुचलकर अपनी सुविधा की सीढ़ी बनाती है। बलराम खुद को “व्हाइट टाइगर” मानता है, एक दुर्लभ प्राणी जो पिंजरा तोड़ने की हिम्मत रखता है, और यहीं से मास्टर और सर्वेंट के रिश्ते का खेल धीरे-धीरे सत्ता, लालच और आज़ादी की जंग में बदल जाता है। फिल्म बड़ी बेबाकी से अमीर-गरीब की खाई, सत्ता की चालबाज़ी, भ्रष्टाचार और उस सामाजिक ढांचे को दिखाती है जहाँ इंसान इंसान नहीं, बल्कि इस्तेमाल की चीज़ बन जाता है, पर साथ ही यह भी सच है कि जाति और वर्ग-भेद को जिस एकरेखीय और अतिरेकी रूप में पेश किया गया है, वह पूरे भारत की जटिल सच्चाई नहीं, बल्कि एक गहरे अंधेरे का चयनित हिस्सा है, जो अंतरराष्ट्रीय दर्शक के सामने देश की छवि को जरूरत से ज्यादा नकारात्मक बना देता है। तकनीकी तौर पर फिल्म बेहद मजबूत है, कैमरा, लोकेशन, बैकग्राउंड और अभिनय, खासकर आदर्श गौरव का, सब मिलकर एक दमदार अनुभव रचते हैं, लेकिन भावनात्मक स्तर पर कहानी कहीं न कहीं फिसल जाती है, बलराम के भीतर का डर, अपराधबोध, विद्रोह और नैतिक संघर्ष पूरी गहराई से दिल में उतर नहीं पाता, हम उसके सफर को समझते तो हैं, पर महसूस उतना नहीं कर पाते। अंत में यह फिल्म एक आईने की तरह हमारे सामने सवाल रखती है कि क्या आज भी समाज जंगल के उसी नियम पर चलता है जहाँ ताकत ही न्याय है, फर्क बस इतना है कि कभी शेर पिंजरे में होता है और कभी इंसान, और असली व्हाइट टाइगर वही है जो इस पिंजरे को तोड़ने की हिम्मत कर ले, चाहे उसकी कीमत कितनी ही भारी क्यों न हो।
-गिरीश भगवती।

माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रोंदे मोहे।एक दिन ऐसा आएगा में रौंदूंगी तोहे।।सोचिए स्क्रीन पर अचानक एक वीडियो उभरता है। को...
14/01/2026

माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रोंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा में रौंदूंगी तोहे।।
सोचिए स्क्रीन पर अचानक एक वीडियो उभरता है। कोई चेहरा नहीं, कोई सितारा नहीं। सिर्फ एक वाक्य:
“तुम्बाड़ के डायरेक्टर की दूसरी फिल्म.”
बस यही से ये विडिओ आपको अपनी और खींचने लगता है।
2018 में एक ही फिल्म बनाई गई और वह फिल्म इंडियन सिनेमा की ऑल-टाइम बेस्ट सूचियों में दर्ज हो गई। आठ साल की खामोशी के बाद वही निर्देशक लौट रहा है, और वापसी भी किसी फ्रेंचाइज़ी या सुरक्षित रास्ते से नहीं, बल्कि एक और अनकंफर्टेबल, डार्क और दिमाग से खेलने वाली फिल्म के साथ माया सभा।
पोस्टर ही हवा बना देता है, लेकिन असली झटका तब लगता है जब हीरो का चेहरा सामने आता है जावेद जाफरी। वही जावेद जाफरी, जिन्हें हमारी सामूहिक स्मृति ने कॉमेडी के खांचे में कैद कर दिया है।
तो सवाल उठता है, तुम जैसी ट्रेजडी और डार्क फैंटेसी बनाने वाला निर्देशक अपनी कमबैक फिल्म में जावेद जाफरी को लीड क्यों चुनता है?
यहीं से माया सभा का खेल शुरू होता है।
30 सेकंड का अनाउंसमेंट वीडियो ऊपर-ऊपर से देखने पर कुछ खास नहीं लगता। लेकिन जो दर्शक तुम्बाड़ को थिएटर में न देखने की गलती कर चुके हैं, उनके लिए ये गलती सुधरने का मौका हो सकता है।
यह फिल्म बॉक्स ऑफिस के लिए नहीं बनती दिखती। यह फिल्म उस दर्शक को असहज करने के लिए बन रही है, जो सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन समझता है।
90 मिनट की लंबाई—हॉलीवुड की तरह सटीक, बिना एक्स्ट्रा तामझाम।
सब्जेक्ट वही पुराना लेकिन खतरनाक
जो दिखता है, वह सच नहीं। और जो सच है, वह आंखों से नहीं दिखता।
कहानी एक ऐसे थिएटर मालिक की है, जो लोगों से कट चुका है, और सिनेमा की दुनिया में इस कदर डूब गया है की असल ज़िन्दगी में भी भ्रम घर कर गया है। टीज़र की शुरुआत उसी बंद पड़े थिएटर से होती है—ऊपर बड़ा-बड़ा लिखा है माया सभा। खंडहर बन चुका हॉल। खाली कुर्सियाँ। और अंधेरे में उभरी एक चेतावनी।
फिर आता है टीज़र का सबसे रहस्यमय शॉट—
एक पुरानी, कबाड़ी जैसी हालत में खड़ी रोल्स-रॉयस।
लेकिन उसके बोनट पर अब भी चमकता है सोने जैसा लोगो।
संकेत साफ है—यह कहानी लालच से जन्म लेती है।
शायद किसी खजाने की तलाश।
शायद उस थिएटर में कुछ ऐसा छुपा है, जो सिर्फ पैसे से बड़ा है।
लेकिन फिर सवाल उठता है, खजाने की कहानी में हेलमेट पर इमोजी स्टिकर संशय में डालता है। और पोस्टर में हीरो के चेहरे पर वह अजीब-सा गैस मास्क
क्या थिएटर के भीतर कोई ऐसा दरवाज़ा खुलने वाला है, जो पूरे शहर को मौत या पागलपन की ओर धकेल देगा?
सबसे दिलचस्प बात यह है कि हम जिस चीज़ को सबसे ज़्यादा मिस कर रहे हैं, वही फिल्म का सबसे बड़ा हिंट है—
टाइटल में लिखा शब्द: Illusion।
एक नकली दुनिया, जो दिमाग खुद रचता है।
जहाँ हर सच धोखा है।
30 जनवरी को रिलीज़ होकर ये फिल्म भ्रम में दर्शको को उलझाएगी या फिर खुद भ्रमित होकर भटक जाएगी ये तो वक्त बताएगा। पर. ....कौतुहल तो मच चूका है। आखिर राही अनिल बर्वे की फिल्म है।
-गिरीश भगवती।
#गिरीश

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