20/01/2026
भाजपा VS वामपंथ? विचारधारा से सत्ता तक साम्यवाद, एकात्म मानववाद और आज की पहचान की राजनीति-
बीसवीं सदी के आरंभ में विश्व दो बड़े वैचारिक ध्रुवों में बँट रहा था, एक ओर पूँजीवाद, दूसरी ओर साम्यवाद। कार्ल मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत के आधार पर जिस समाज की कल्पना की, उसे लेनिन ने 1917 की रूसी क्रांति के माध्यम से सत्ता-व्यवस्था में रूपांतरित कर दिया। इसके बाद साम्यवाद केवल एक आर्थिक दर्शन नहीं रहा, बल्कि एक संगठित राजनीतिक शक्ति बन गया। उपनिवेशवाद से जूझ रहे एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में यह विचार तेजी से फैला। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।
1920 के दशक से भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन और छात्र संगठनों के माध्यम से मजबूत होने लगा। 1940–50 के दशक तक मार्क्सवादी चिंतन राष्ट्रीय बौद्धिक विमर्श का एक प्रमुख स्तंभ बन चुका था। समाज को ‘शोषक बनाम शोषित’ के द्वंद्व में देखना और क्रांति को समाधान मानना इसकी केन्द्रीय दृष्टि थी।
इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े विचारकों के सामने एक बुनियादी प्रश्न खड़ा हुआ, क्या भारतीय समाज को केवल आर्थिक वर्गों के चश्मे से समझा जा सकता है? क्या उसकी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संरचना को इस दृष्टि से समेटा जा सकता है? इसी वैचारिक चुनौती के उत्तर के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन सामने आता है।
दीनदयाल उपाध्याय ने उस मार्क्सवादी धारणा को अस्वीकार किया जिसमें मनुष्य को मात्र एक आर्थिक इकाई माना जाता है। उन्होंने भारतीय जीवन-दृष्टि के आधार पर “एकात्म मानववाद” का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसमें व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और संस्कृति को एक अविभाज्य समग्रता के रूप में देखा गया। साम्यवाद जहाँ वर्ग-संघर्ष और राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था पर टिका था, वहीं दीनदयाल उपाध्याय ने “अंत्योदय” की अवधारणा दी, समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति के उत्थान को विकास का केंद्र बिंदु बनाने की सोच।
1950–60 के दशकों में, जब वामपंथी बौद्धिक प्रभाव अपने चरम पर था, भारतीय जनसंघ (जो आगे चलकर भाजपा बना) ने एकात्म मानववाद को अपनी वैचारिक आधारशिला बनाया। 1965 के मुंबई व्याख्यानों के माध्यम से दीनदयाल उपाध्याय ने इसे एक सुव्यवस्थित दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार मार्क्स के “सर्वहारा” के समानांतर भारतीय परंपरा में “अंतिम जन” की संकल्पना उभरी, उद्देश्य दोनों का कल्याण था, किंतु मार्ग और दृष्टि भिन्न थे।
आज के परिदृश्य में यह वैचारिक द्वंद्व एक नए रूप में दिखाई देता है। वामपंथ और भाजपा दोनों ही अब केवल दार्शनिक विमर्श की दुनिया में नहीं, बल्कि सत्ता-राजनीति के कठोर यथार्थ में खड़े हैं। वर्ग-संघर्ष और सामाजिक समरसता जैसे मूल सिद्धांत व्यवहार में चुनावी गणित और जनाधार की राजनीति में ढल जाते हैं। यहाँ विचारधाराएँ अपने-अपने समर्थक समूहों को संगठित करने के लिए पहचान की राजनीति का सहारा लेती हैं।
वामपंथी दलों का सामाजिक आधार प्रायः अल्पसंख्यक, हाशिये के समुदाय और वंचित वर्ग रहे हैं, जबकि भाजपा का आधार बहुसंख्यक समाज और उसकी सांस्कृतिक अस्मिता। यहीं से हिंदू–मुस्लिम विमर्श और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति उभरती है। यह टकराव मूलतः धर्म का नहीं, बल्कि सत्ता-संरचना का है, धर्म और पहचान यहाँ साधन बन जाते हैं, लक्ष्य होता है राजनीतिक वर्चस्व।
इस दृष्टि से देखा जाए तो आज की राजनीति न तो केवल साम्यवाद बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का शुद्ध वैचारिक संघर्ष है और न ही केवल धार्मिक भावनाओं का स्वतःस्फूर्त उभार। यह उस लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम है जिसमें हर विचारधारा को सत्ता में बने रहने के लिए एक स्थायी, भावनात्मक और संगठित जनाधार चाहिए।
बीसवीं सदी में द्वंद्व था, मार्क्स बनाम दीनदयाल, वर्ग-संघर्ष बनाम समरसता।
इक्कीसवीं सदी में वही द्वंद्व रूप बदलकर सामने है, समुदाय बनाम समुदाय, पहचान बनाम पहचान।
अंततः संघर्ष विचारों का नहीं, उस सत्ता का है जो समाज की दिशा तय करने की क्षमता रखती है।
नोट - कॉंग्रेस की कोई विचारधारा नहीं है, इसलिए वो इस विषय से बाहर है।
- गिरीश भगवती।
#गिरीश