30/08/2026
उत्तरौला में एक निजी अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि गंभीर रूप से बीमार बच्चे को कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रखकर इलाज किया गया और परिवार से भारी रकम भी ली गई। लेकिन बच्चे की हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ती चली गई।
जब हालत ज्यादा खराब हुई तो कथित तौर पर अस्पताल ने परिवार से कह दिया कि बच्चे को कहीं दूसरी जगह ले जाकर बेहतर इलाज कराएं। यानी जब इलाज की जरूरत सबसे ज्यादा थी, तब माता-पिता अपने गंभीर रूप से बीमार बच्चे को लेकर अस्पताल के बाहर बैठने को मजबूर हो गए।
सोचिए, जिस माँ-बाप का बच्चा जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा हो, उनके सामने पैसे और इलाज की मजबूरी खड़ी हो जाए तो उन पर क्या बीत रही होगी?
सवाल सीधा है—अगर अस्पताल में गंभीर बच्चे के इलाज की पर्याप्त सुविधा नहीं थी, तो उसे कई दिनों तक भर्ती रखकर इलाज क्यों किया गया? समय रहते बड़े अस्पताल के लिए रेफर क्यों नहीं किया गया? और अगर इलाज के नाम पर भारी रकम ली गई, तो उसका हिसाब कौन देगा?
यह सिर्फ एक परिवार का सवाल नहीं है, बल्कि हर उस गरीब और मजबूर परिवार का सवाल है जो इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर भरोसा करता है।