01/01/2026
एक छोटा सा गांव एक गरीब परिवार और एक ऐसी जगह जहां पहुंचने से पहले लोग सौ बार सोचते थे आज़ादी के 78 साल बाद भी न सड़क थी,न पुल,न पगडंडी तक भरोसे लायक बरसात हो या बाढ़,बीमारी हो या प्रसव,स्कूल जाना हो या रोज़गार नाव ही जीवन और मौत के बीच का सहारा थी उसी गांव में जन्मा एक युवा जिसने बचपन से देखा कि कैसे लोग नदी पार करते हुए जान गंवा देते हैं, कैसे मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते,कैसे बच्चे पढ़ाई से दूर रह जाते हैं। जब उसने सवाल किया देश आज़ाद हुआ, पर हमारा गांव क्यों नहीं? हम आज भी नदी के उस पार क्यों हैं?
हम तक सड़क क्यों नहीं? हमारे हिस्से पुल क्यों नहीं? यहीं से जन्म हुआ एक ऐसे संघर्ष का,जो सिर्फ़ मांग नहीं बल्कि मिशन बन गया।
यह युवा पेशे से डॉक्टर था उसके पास आराम की ज़िंदगी का विकल्प था,लेकिन उसने अपना स्टेथोस्कोप उतार दिया और हाथ में उठा लिया माइक उसकी आवाज़ अब सिर्फ़ उसके गांव की नहीं रही, बल्कि 50 हजार लोगों की आवाज़ बन गई दिन हो या रात,
धूप हो या बारिश,वह जनप्रतिनिधियों के दरवाज़े पर खड़ा रहा, अधिकारियों के दफ़्तरों तक पहुंचा, मंच से सड़क तक एक ही बात दोहराता रहा पुल चाहिए हमारे हक़ का पुल। इस आवाज़ की कीमत भी चुकानी पड़ी जेल जाना पड़ा, मुकदमे दर्ज हुए धमकियां मिलीं, बदनाम करने की कोशिशें हुईं लेकिन जिसने नदी से हार मानना नहीं सीखा था,वह इंसान सिस्टम से कैसे डरता? उसने एक और कसम खा ली जब तक पुल पास नहीं होगा, शादी नहीं करूंगा आज के समय में, जब लोग अपने सपनों के लिए जीते हैं,उस युवा ने अपने सपनों को 50 हजार लोगों के भविष्य पर कुर्बान कर दिया पूरी दुनिया कहती रही चार किलोमीटर का पुल सरकार 50 हजार लोगों के लिए क्यों बनाएगी? लेकिन वह अकेला युवा कहता रहा पुल बनेगा अगर सरकार नहीं समझेगी तो उसे समझाना पड़ेगा।”
और आख़िरकार संघर्ष जीत गया आवाज़ दबाई नहीं जा सकी।
सरकार को झुकना पड़ा आज साल के आख़िरी महीने में,
माननीय विधायक विवेकानंद पांडे जी ने 50 हजार लोगों से किया गया वादा निभा दिया अब यह सपना सपना नहीं रहा पुल बनेगा।
वह युवा,जिसने अपनी जवानी, पेशा, सुख-सुविधा सब कुछ दांव पर लगा दिया उसका नाम है 👉 राकेश गुप्ता आर्या (भैया) जो उन्होंने किया,वह सिर्फ़ एक पुल की लड़ाई नहीं थी वह जनसंघर्ष, साहस और त्याग का इतिहास है आज सवाल सिर्फ़ पुल का नहीं है
सवाल यह है कि?
क्या ऐसे संघर्ष को दुनिया याद रखेगी? क्या ऐसे इंसान को एक पहचान नहीं मिलनी चाहिए? अगर “माउंटेन मैन” हो सकता है तो क्यों नहीं पुल मैन राकेश गुप्ता आर्या? यह कहानी हर युवा के लिए सबक है अगर नीयत साफ़ हो और हौसले बुलंद हों,तो एक आम इंसान भी पूरा सिस्टम बदल सकता है यह पुल सिर्फ़ नदी पर नहीं बनेगा यह उपेक्षा और विकास के बीच बनेगा।