30/05/2026
सबसे बड़ा मुकाबला किसी और से नहीं, खुद से होता है।
बचपन में लगता था कि ज़िंदगी में बस एक अच्छी नौकरी मिल जाए, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा।
फिर समझ आया कि नौकरी के बाद भी नए लक्ष्य होते हैं।
लक्ष्यों के बाद ज़िम्मेदारियाँ आती हैं।
ज़िम्मेदारियों के बाद नए सपने जन्म लेते हैं।
और फिर एक दिन एहसास होता है कि इंसान वास्तव में किसी मंज़िल तक पहुँचने की दौड़ में नहीं है। वह तो बस खुद को हर दिन थोड़ा और बेहतर बनाने की यात्रा पर है।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि कोई प्रमाणपत्र, वेतन या प्रोजेक्ट नहीं था।
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि हर बार गिरने के बाद भी मैंने रुकना नहीं सीखा।
कुछ लोग मुझसे आगे हैं।
कुछ लोग मुझसे पीछे हैं।
लेकिन सच कहूँ तो अब मुझे किसी से अपनी तुलना करने में कोई रुचि नहीं है।
मैं सिर्फ इतना देखना चाहता हूँ कि क्या मैं कल वाले अपने आप से बेहतर हूँ।
अगर जवाब "हाँ" है, तो समझिए कि यात्रा सही दिशा में आगे बढ़ रही है।
ज़िंदगी का असली रिपोर्ट कार्ड दुनिया नहीं, आपका अपना अंतर्मन बनाता है।
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