ABHAY B. GUPTA

ABHAY B. GUPTA Digital Creater

30/01/2026

रानी मुखर्जी की ‘मर्दानी’ फ्रैंचाइज़ी हिंदी सिनेमा में उन गिनी-चुनी फिल्मों में शामिल है, जिन्होंने महिला केंद्रित होने के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी को भी अपनी पहचान बनाया है। ‘मर्दानी 3’ इसी परंपरा को और मजबूती के साथ आगे बढ़ाती है। यह फिल्म किसी चमक-दमक या बड़े-बड़े डायलॉग्स का सहारा नहीं लेती, बल्कि एक बेहद असहज और कड़वी सच्चाई को सीधे दर्शक के सामने रख देती है। बच्चियों की सुरक्षा, मानव तस्करी और संगठित अपराध जैसे विषयों को जिस संवेदनशीलता और ईमानदारी के साथ फिल्म में पिरोया गया है, वही इसकी सबसे बड़ी ताकत बनती है।
फिल्म की कहानी ACP शिवानी रॉय के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अब सिर्फ एक तेज़-तर्रार पुलिस अफसर नहीं, बल्कि अनुभव से तप चुकी एक जांबाज़ अधिकारी के रूप में सामने आती हैं। इस बार वह NIA के साथ मिलकर एक ऐसे केस की जांच कर रही हैं, जिसकी शुरुआत भले ही एक सामान्य अपहरण से होती है, लेकिन जो धीरे-धीरे पूरे देश को झकझोर देने वाले अपराध में बदल जाता है। एक हाई-प्रोफाइल अधिकारी की बेटी और उसी घर में काम करने वाली नौकरानी की बेटी का अचानक गायब हो जाना सिस्टम के कई चेहरों को बेनकाब कर देता है। शुरुआती जांच में मामला जितना सीधा लगता है, सच्चाई उससे कहीं ज्यादा भयावह निकलती है।
जांच के दौरान जब यह खुलासा होता है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से 8 से 12 साल की कुल 93 बच्चियां लापता हैं, तब कहानी सिर्फ एक पुलिस केस नहीं रहती। यह उन माता-पिताओं की पीड़ा, उन मासूम जिंदगियों की चीख और उस सिस्टम की खामियों की कहानी बन जाती है, जो अक्सर ताकतवरों के सामने खामोश हो जाता है। शिवानी रॉय को जल्द ही अहसास हो जाता है कि यह किसी अकेले अपराधी का काम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित मानव तस्करी नेटवर्क है, जिसकी जड़ें बेहद गहरी हैं।
इसी नेटवर्क की सरगना के रूप में सामने आती है ‘अम्मा’ — एक ऐसी महिला, जो दिखने में शांत है, लेकिन जिसके भीतर क्रूरता और अमानवीय सोच की सारी हदें टूट चुकी हैं। फिल्म की खास बात यह है कि वह ‘अम्मा’ को सिर्फ एक खलनायिका नहीं बनाती, बल्कि उसके ज़रिए उस सोच को दिखाती है, जहां इंसानियत पूरी तरह मर चुकी है। जैसे-जैसे शिवानी और उनकी टीम इस नेटवर्क की परतें खोलती जाती हैं, फिल्म का माहौल और भी भारी, डरावना और भावनात्मक होता चला जाता है।
रानी मुखर्जी इस फिल्म की आत्मा हैं। ACP शिवानी रॉय के किरदार में उनका अभिनय पूरी तरह परिपक्व और संतुलित है। यहां न तो जरूरत से ज्यादा गुस्सा है और न ही बेवजह का ड्रामा। उनके चेहरे पर थकान है, आंखों में गुस्सा है और भीतर एक ऐसा जज़्बा है, जो किसी भी कीमत पर बच्चियों को बचाना चाहता है। उनका अभिनय इस बात का प्रमाण है कि अनुभव जब ईमानदारी से परदे पर उतरता है, तो वह बिना शोर किए भी गहरी छाप छोड़ जाता है।
‘अम्मा’ के किरदार में मल्लिका प्रसाद फिल्म की सबसे डरावनी परत बनकर उभरती हैं। उनका शांत और ठंडा अंदाज़ दर्शक को भीतर तक सिहरने पर मजबूर करता है। वह चीखती नहीं, धमकाती नहीं, फिर भी हर सीन में डर पैदा करती हैं। जानकी बोड़ीवाला शिवानी की टीम के सदस्य के रूप में सहज लगती हैं और कहानी को मजबूती देती हैं। अन्य सहायक कलाकार भी अपने-अपने किरदारों में ईमानदार नजर आते हैं और फिल्म को यथार्थ के करीब ले जाते हैं।
निर्देशन की बात करें, तो अभिराज मीनावाला ने इस संवेदनशील विषय को पूरी जिम्मेदारी के साथ संभाला है। फिल्म कहीं भी भटकती नहीं, न ही बेवजह भावुक होने की कोशिश करती है। खास तौर पर पहला हाफ बेहद मजबूत है, जहां तनाव लगातार बना रहता है। बैकग्राउंड स्कोर कहानी के माहौल को और गहराता है, कैमरा वर्क सादा लेकिन प्रभावी है और एडिटिंग चुस्त है। एक्शन सीन सीमित हैं, लेकिन वे कहानी की जरूरत के मुताबिक हैं, जिससे फिल्म ज्यादा वास्तविक लगती है।
हां, यह जरूर महसूस होता है कि कहानी का ढांचा पहले की ‘मर्दानी’ फिल्मों से मिलता-जुलता है, जिसके कारण कुछ मोड़ पहले से अनुमान लगाए जा सकते हैं। कुछ भावनात्मक दृश्यों को अगर और वक्त दिया जाता, तो उनका असर और गहरा हो सकता था। इसके बावजूद फिल्म अपनी गंभीरता और संदेश के कारण दर्शक को अंत तक बांधे रखती है।
‘मर्दानी 3’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सवाल है — एक ऐसा सवाल, जो समाज और सिस्टम दोनों से जवाब मांगता है। यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ जिम्मेदारी भी निभाती है और शायद यही इसकी सबसे बड़ी जीत है। अगर आप दमदार अभिनय, सच्चाई के करीब क्राइम ड्रामा और समाज को आईना दिखाने वाला सिनेमा देखना चाहते हैं, तो ‘मर्दानी 3’ आपको निराश नहीं करेगी।

18/01/2026

मधुर गीतों का जादू और उनकी यादें
दिल को छू लेने वाले गीत किसी मौसम की तरह होते हैं—धीरे-धीरे उतरते हैं, भीतर जगह बनाते हैं और फिर लंबे समय तक मन के आकाश में ठहरे रहते हैं। आज जब चारों तरफ तेज़ बीट्स, ऊंची आवाज़ और तात्कालिक रोमांच से भरा संगीत सुनाई देता है, तब अनायास उन पुराने मधुर गीतों की याद आती है जो बिना शोर किए सीधे आत्मा से संवाद कर लेते थे।
वे गीत केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि एक अनुभव थे, एक निजी बातचीत की तरह। इनमें इंसान अपने सुख-दुख, प्रेम-विरह और अकेलेपन की परछाइयां देख लेता था। आज ऐसे गीत हाशिये पर क्यों चले गए, यह केवल संगीत का प्रश्न नहीं, हमारे समय और जीवनशैली का भी प्रश्न है।
किसी गीत का दिल तक पहुंचना महज धुन की मिठास से तय नहीं होता। उसमें शब्दों की सादगी, स्वर का ठहराव और भावना की सच्चाई का अदृश्य मेल काम करता है। पुराने दौर के गीतकार और संगीतकार इस रहस्य को गहराई से समझते थे। इसलिए वे सुरों को केवल कानों के लिए नहीं, मन के लिए गढ़ते थे।
गीतों का धीमा जादू और भारतीय संगीत की परंपरा
नीचे सुरों में रची धुनें मानो श्रोता का हाथ पकड़कर भीतर की गलियों में ले जाती थीं। लता मंगेशकर का गाया “लग जा गले” सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत अपना धीरे से पुकार रहा हो। किशोर कुमार का “चिंगारी कोई भड़के” दर्द को चीख में नहीं, मौन में बदल देता है। रफी और लता का “अभी न जाओ छोड़कर” प्रेम का ऐसा सभ्य आग्रह है जिसमें शोर की कोई जगह नहीं।
इन गीतों की ताकत उनकी धीमी चाल में छिपी थी। भारतीय संगीत परंपरा में मंद्र और मध्य सप्तक को गंभीरता और आत्मसंवाद का क्षेत्र माना गया है। नीचे सुरों में गाना आसान नहीं होता; उसमें सांसों का संतुलन, उच्चारण की सफाई और भाव की पकड़ चाहिए।
पुराने गायक वर्षों की रियाज़ से इस कला को साधते थे। वे किरदार की मनःस्थिति को समझकर गाते थे, इसलिए उनकी आवाज़ फिल्म या मंच पर प्राकृतिक और भावपूर्ण लगती थी। आज तकनीक ने गायकी को आसान तो बना दिया है, पर आत्मा से थोड़ा दूर भी कर दिया है। ऑटो-ट्यून और डिजिटल इफेक्ट्स से सुर चमक जाते हैं, मगर भीतर की कसक अक्सर खो जाती है।
आधुनिक समय में संगीत और सुनने की आदतें
समय के बदलने के साथ संगीत सुनने का तरीका भी बदल गया। कभी गीत रेडियो पर इत्मीनान से सुने जाते थे, कैसेट और रिकॉर्ड प्लेयर पर दोहराए जाते थे। आज संगीत मोबाइल की छोटी स्क्रीन और छोटे स्पीकरों में सिमट गया है।
रील्स के लिए बने तीस सेकंड के टुकड़ों में गहराई वाले सुरों की गुंजाइश कम रह जाती है। निर्माता भी वही बनाते हैं जो तुरंत ध्यान खींच सके। तेज़ बीट्स और ऊंचे सुर पहले ही पल में असर डाल देते हैं, जबकि मधुर गीत धीरे-धीरे खुलते हैं, जैसे कोई किताब धैर्य मांगती है। बाजार की इस हड़बड़ी ने ठहराव वाले संगीत को जोखिम भरा मान लिया है।
फिर भी यह कहना गलत होगा कि मधुर गीत पूरी तरह समाप्त हो गए हैं। वे आज भी कहीं-कहीं सांस ले रहे हैं। “अगर तुम साथ हो” सुनते हुए लगता है जैसे पुराने दौर की गंभीरता आधुनिक संवेदना से हाथ मिला रही हो। “फिर ले आया दिल” या “इकतारा” जैसे गीत बताते हैं कि आज भी ऐसी रचनात्मकता संभव है जो शोर से नहीं, अनुभूति से बात करे।
अरिजीत सिंह की आवाज़ में कई बार वह ठहराव लौट आता है जिसकी हमें तलाश रहती है। लेकिन ये गीत अपवाद की तरह सामने आते हैं, मुख्यधारा की धारा अब दूसरी दिशा में बह रही है।
श्रोता और संगीत का बदलता रिश्ता
समस्या केवल संगीतकारों की नहीं, हमारी सामूहिक सुनने की आदतों की भी है। हम जल्दी में हैं—रास्ते में, दफ्तर में, सोशल मीडिया की भीड़ में।
जहां ध्यान ही ठहरा हुआ न हो, वहां ठहरे हुए सुर कैसे टिकें। नीचे सुर का गीत एकांत चाहता है, थोड़ा समय चाहता है, जैसे कोई दोस्त दिल की बात करने से पहले माहौल बनाता है। आज का श्रोता अक्सर उतना धैर्य नहीं दे पाता। इसलिए कंपनियां भी ऐसे गीतों में कम निवेश करती हैं। निर्णय लेने वाले लोग आंकड़ों से चलते हैं और आंकड़े तेज़, चमकीले और वायरल संगीत के पक्ष में खड़े दिखते हैं।
दिल की संवेदनशीलता और सच्ची संगीत की मांग
इसके बावजूद दिल की जरूरतें बदली नहीं हैं। इंसान आज भी उदास होता है, प्रेम में डूबता है, अकेलेपन से जूझता है। इन भावों को व्यक्त करने के लिए शोर नहीं, सुकून चाहिए। यही कारण है कि जब भी कोई सच्चा मधुर गीत आता है, वह तुरंत अपनी जगह बना लेता है।
शादियों के शोर के बीच भी लोग देर रात पुराने गाने लगाकर चुपचाप सुनना चाहते हैं। टैक्सी के रेडियो पर अचानक “वो शाम कुछ अजीब थी” बज उठे तो समय जैसे धीमा पड़ जाता है। इसका मतलब है कि भीतर कहीं वह संवेदनशील श्रोता अब भी जीवित है।
फिल्म संगीत का बदलता स्वरूप
फिल्म संगीत कभी केवल पृष्ठभूमि का शोर नहीं था, वह कहानी का अदृश्य पात्र होता था। गीत नायक-नायिका की जगह बोलते थे, उनके मन की परतें खोलते थे। आज दृश्य अधिक बोलने लगे हैं, गीत की भूमिका छोटी हो गई है।
कई बार कलाकार खुद गायक बन जाते हैं, इसलिए भाव से ज्यादा छवि हावी हो जाती है। प्रशिक्षण की जगह प्रस्तुति का दबाव बढ़ गया है। नीचे सुर में गाने के लिए जिस अनुशासन की जरूरत होती है, वह तेजी से घट रहा है। पर यह स्थिति स्थायी नहीं हो सकती, क्योंकि कला अंततः इंसान की भीतरी मांग से चलती है।
भविष्य में संगीत का नया मोड़
हो सकता है आने वाले वर्षों में संगीत फिर एक मोड़ ले। जब लोग शोर से ऊबेंगे, तब वे दोबारा ठहराव खोजेंगे। जैसे फैशन में पुराने रंग लौट आते हैं, वैसे ही सुरों का स्वभाव भी लौटता है। स्वतंत्र संगीत का बढ़ता संसार इस उम्मीद को मजबूत करता है।
इंटरनेट ने भले ही तात्कालिकता बढ़ाई हो, पर उसी ने अलग-अलग तरह के संगीत को जगह भी दी है। बहुत से युवा कलाकार आज पारंपरिक रागों और मंद्र सप्तक के प्रयोग कर रहे हैं, भले ही मुख्यधारा उन्हें तुरंत स्वीकार न करे।
श्रोता की भूमिका और धैर्य की आवश्यकता
असल सवाल यह नहीं कि मधुर गीत कब लौटेंगे, बल्कि यह है कि क्या हम उन्हें सुनने के लिए तैयार हैं। गीत और श्रोता का रिश्ता दोतरफा होता है। यदि हम थोड़ा समय, थोड़ा एकांत और थोड़ा धैर्य दें, तो संगीतकार भी वही भाषा बोलेंगे।
दिल तक उतरने वाला गीत किसी आदेश से पैदा नहीं होता, वह समाज के भीतर की संवेदनशीलता से जन्म लेता है। इसलिए उम्मीद छोड़ी नहीं जा सकती।
मधुर गीतों की वापसी और हमारी खुद की संवेदनशीलता
मधुर गीतों की वापसी दरअसल हमारी अपनी वापसी होगी—उस भीतर बसे इंसान की ओर जो आज भी प्रेम करना जानता है, दुख महसूस करता है और सुकून की तलाश में रहता है। जब तक यह इंसान जिंदा है, तब तक नीचे सुर की वह कोमल दुनिया भी जिंदा रहेगी।
शायद किसी शाम फिर कोई नया गीत जन्म लेगा, जो बिना दस्तक दिए हमारे दिल के दरवाज़े खोल देगा और हम पाएंगे कि शोर चाहे जितना बढ़ जाए, सच्ची आवाज़ हमेशा रास्ता खोज ही लेती है।

मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल ने गुजरात टेक्सटाइल पॉलिसी-2024 के तहत राज्य के टेक्सटाइल उद्योग और महिला सशक्तिकरण के क्...
18/01/2026

मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल ने गुजरात टेक्सटाइल पॉलिसी-2024 के तहत राज्य के टेक्सटाइल उद्योग और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इस वर्ष टेक्सटाइल पॉलिसी में विशेष रूप से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के सशक्तिकरण और उनकी आय में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए कई प्रावधानों में सुधार किए गए हैं।
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM) में पंजीकृत या अन्य ऐसे स्वैच्छिक स्वयं सहायता समूह, जिनमें आजीविका से जुड़े महिलाओं के एक या अधिक समूह शामिल हैं, को टेक्सटाइल पॉलिसी-2024 के तहत लाभ मिलेगा। इससे महिलाओं के व्यवसायिक अवसर बढ़ेंगे और वे आर्थिक रूप से अधिक सशक्त बन सकेंगी।
साथ ही, मुख्यमंत्री ने यह भी निर्णय लिया है कि राज्य के महानगर पालिका क्षेत्रों के भीतर स्थित गैर-प्रदूषणकारी टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों वाली इकाइयां, जैसे गारमेंट, अपैरल, मेडअप्स, स्टिचिंग और एंब्रॉयडरी, टेक्सटाइल पॉलिसी का लाभ प्राप्त कर सकेंगी। इस कदम से शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय कुशल एवं अर्धकुशल कामगारों को रोजगार मिलेगा।
मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल ने टेक्सटाइल पॉलिसी-2024 के अंतर्गत राज्य की अर्थव्यवस्था और देश की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कपड़ा उद्योग की टेक्सटाइल वैल्यू चेन के हर सेगमेंट का विश्लेषण किया है। विशेष ध्यान गारमेंट, अपैरल और टेक्निकल टेक्सटाइल पर दिया गया है। अब गैर-प्रदूषणकारी और मूल्यवर्धित गतिविधियों वाली इकाइयां, जो गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPPCB) की वाइट कैटेगरी या ग्रीन कैटेगरी के तहत आती हैं और महानगर पालिका क्षेत्र में स्थित हैं, इस पॉलिसी के लाभार्थी होंगी।
इस निर्णय से राज्य में शहरी क्षेत्रों की टेक्सटाइल इकाइयों को कई लाभ होंगे। मनपा क्षेत्र में उपलब्ध इन्फ्रास्ट्रक्चर का अधिक प्रभावी उपयोग होगा, जिससे उत्पादन लागत कम होगी और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। गारमेंट, अपैरल, स्टिचिंग और एंब्रॉयडरी जैसी लेबर-इंटेंसिव गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलने से महिला कर्मचारियों को स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। यह उनके सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण और कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance) में सहायक होगा।
गैर-प्रदूषणकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने से पर्यावरण सुरक्षा, संतुलित और टिकाऊ औद्योगिक विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा। राज्य में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) का विकास प्रोत्साहित होगा, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था और रोजगार दोनों को लाभ मिलेगा।
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के इस निर्णय के परिणामस्वरूप महिला स्वयं सहायता समूहों को टेक्सटाइल पॉलिसी-2024 का लाभ मिलने के अतिरिक्त वे आर्थिक रूप से अधिक सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनेंगी। उन्हें व्यवसाय और समाज में नई भूमिका निभाने के अवसर मिलेंगे। यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत को 2047 तक विकसित और वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने के लक्ष्य में भी टेक्सटाइल सेक्टर को सहयोग प्रदान करेगा।
उप मुख्यमंत्री और उद्योग मंत्री श्री हर्ष संघवी के मार्गदर्शन में किए गए इन सुधारों से राज्य की महिलाओं, उद्योग और आर्थिक विकास तीनों क्षेत्रों में लाभ होगा। महिला सशक्तिकरण के दृष्टिकोण को अधिक व्यापक बनाने के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और टिकाऊ औद्योगिक विकास को सुनिश्चित करने में यह निर्णय ऐतिहासिक माना जा सकता है।
इस तरह गुजरात टेक्सटाइल पॉलिसी-2024 के तहत मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल ने न केवल टेक्सटाइल उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाई है, बल्कि समाज में महिला सशक्तिकरण और रोजगार सृजन को भी नई दिशा दी है। राज्य की अर्थव्यवस्था में स्थायित्व और उद्योगों की टिकाऊ प्रगति के लिए यह कदम अहम साबित होगा।

मुंबई की राजनीति इस समय अजीब मोड़ पर खड़ी है। बृहन्मुंबई नगर निगम के चुनाव परिणामों ने भले ही महायुति को स्पष्ट बहुमत दे...
17/01/2026

मुंबई की राजनीति इस समय अजीब मोड़ पर खड़ी है। बृहन्मुंबई नगर निगम के चुनाव परिणामों ने भले ही महायुति को स्पष्ट बहुमत दे दिया हो, लेकिन सत्ता के गलियारों में उत्सव से ज्यादा बेचैनी दिखाई दे रही है। भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने मिलकर 118 सीटें हासिल की हैं, जबकि बहुमत का जादुई आंकड़ा 114 है। आंकड़ों के लिहाज से तस्वीर साफ है, पर राजनीति केवल गणित से नहीं चलती। यही कारण है कि जीत के बाद भी शिंदे खेमे में असुरक्षा का माहौल बन गया है और नवनिर्वाचित पार्षदों को पांच सितारा होटल में ठहराना पड़ा है।
मुंबई महानगरपालिका का यह चुनाव कई अर्थों में ऐतिहासिक रहा। ढाई दशक से जिस बीएमसी पर उद्धव ठाकरे की शिवसेना का दबदबा था, वह पहली बार कमजोर पड़ता दिखा। भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और शिंदे गुट को 29 सीटें मिलीं। पर परिणाम आते ही यह सवाल उठने लगा कि क्या यह बहुमत सचमुच स्थायी रहेगा। विपक्ष के संभावित गठजोड़ का आंकड़ा 106 तक पहुंचता दिख रहा है और बहुमत से केवल आठ सीटों की दूरी ने पूरे खेल को रोचक बना दिया है।
इसी आठ के आंकड़े ने राजनीतिक धड़कनें तेज कर दी हैं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना, कांग्रेस, मनसे, शरद पवार गुट, समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम यदि एक मंच पर आ जाएं तो तस्वीर पलट सकती है। इस आशंका ने शिंदे खेमे को सतर्क कर दिया है। खबरें हैं कि विपक्ष की तरफ से पार्षदों को लुभाने की कोशिश हो सकती है, इसलिए सभी जीते हुए पार्षदों को एकजुट रखने की रणनीति अपनाई गई है। होटल में ठहराव केवल आराम के लिए नहीं, बल्कि विश्वास बचाए रखने की कवायद है।
बीएमसी की सत्ता केवल राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल नहीं, बल्कि हजारों करोड़ के विकास बजट की चाबी भी है। मुंबई की सड़कों, नालों, स्वास्थ्य सेवाओं और बड़े ठेकों का नियंत्रण इसी सदन से तय होता है। इसलिए मेयर पद को लेकर खींचतान अभी से तेज हो गई है। शिंदे गुट परंपरा का हवाला देकर मेयर पद पर दावा कर रहा है, जबकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते अपना अधिकार जता रही है। गठबंधन की यह अंदरूनी रस्साकशी आने वाले दिनों में नए समीकरण गढ़ सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम में एआईएमआईएम के आठ पार्षद अचानक निर्णायक भूमिका में आ गए हैं। पार्टी ने मुंबई में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन कर सबको चौंका दिया है। होटल ट्राइडेंट में बुलाई गई बैठक और असदुद्दीन ओवैसी की सीधी भागीदारी इस बात का संकेत है कि यह छोटा सा आंकड़ा बड़ी सौदेबाजी का केंद्र बनने वाला है। किसे समर्थन देना है और किन शर्तों पर देना है, इस पर गहन मंथन चल रहा है।
विपक्ष भी नई संभावनाएं तलाश रहा है। उद्धव ठाकरे गुट ने 65 सीटें जीतकर अपनी जड़ें बचाए रखी हैं। कांग्रेस और मनसे का साथ मिल जाए तो मुकाबला कांटे का हो सकता है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि असली खेल मेयर चुनाव के दिन दिखेगा। पार्षदों की नाराजगी, पदों का बंटवारा और स्थानीय समीकरण किसी भी तरफ पलड़ा झुका सकते हैं।
मुंबई की सियासत फिलहाल होटल के कमरों, बंद दरवाजों और देर रात की बैठकों में सिमट गई है। जनता ने फैसला सुना दिया है, पर सत्ता की असली पटकथा अभी लिखी जानी बाकी है। देश की सबसे अमीर महानगरपालिका की चाबी किसके हाथ पूरी तरह सुरक्षित रहेगी, यह आने वाला सप्ताह तय करेगा। इतना तय है कि इस बार मुंबई का भविष्य आठ के छोटे से अंक के इर्दगिर्द घूम रहा है और यही अंक महाराष्ट्र की राजनीति की सबसे बड़ी कहानी बन चुका है।

16/01/2026

जनवरी 2026 के पहले पखवाड़े में रिलीज हुई फिल्म ‘वन टू चा चा चा’ ने दर्शकों के लिए कॉमेडी के नए आयाम स्थापित कर दिए हैं। यह फिल्म अपनी पूरी तरह से साफ-सुथरी कॉमेडी, सिचुएशनल हास्य और बेहतरीन किरदारों के संयोजन के कारण आज के समय में किसी ताजगी भरे अनुभव से कम नहीं है। फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण है इसमें आशुतोष राणा का नया अवतार, जिन्हें अब तक गंभीर और डरावनी भूमिकाओं में देखा गया था। इस बार वे एक सनकी और कुंवारे चाचा के रूप में सामने आए हैं, जो दर्शकों को हंसाने के साथ ही भावनात्मक जुड़ाव भी महसूस कराते हैं।
कहानी बिहार के मोतिहारी शहर से शुरू होती है। जयसवाल परिवार में खुशी का माहौल है क्योंकि परिवार के बड़े बेटे संजू की सगाई की तैयारियां जोरों पर हैं। पूरे घर में उत्सव का माहौल है, लेकिन अचानक परिवार के सबसे उम्रदराज और सनकी चाचा का ऐलान सबको चौंका देता है कि वे भी शादी करेंगे। चाचा की अजीबोगरीब जिद को देखकर परिवार वाले चिंतित हो जाते हैं और डॉक्टर उन्हें बाइपोलर बताकर रांची के एक मानसिक संस्थान ले जाने की सलाह देते हैं। यही घटना फिल्म का शुरुआती टर्निंग पॉइंट बनती है।
दो भतीजे और उनका दोस्त, बेहोश चाचा को लेकर एक वैन में रांची के लिए निकलते हैं। लेकिन जिसे वे केवल एक मेडिकल ट्रिप समझ रहे थे, वह जल्द ही एक पूरी तरह से अराजक रोड-ट्रिप में बदल जाती है। रास्ते में उन्हें ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जिसमें अपराध, पुलिस, ड्रग्स और बैंक डकैती जैसी घटनाएं शामिल हैं। फिल्म में शामिल होने वाले किरदार जैसे सस्पेंड किया गया नारकोटिक्स ऑफिसर, शोमा नाम की डांसर, जेल से भागा शातिर अपराधी भूरा सिंह और एक उत्साही पुलिसवाला इस यात्रा को और भी मजेदार बनाते हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदारों और उनकी केमिस्ट्री में है। आशुतोष राणा ने ‘वेद प्रकाश जयसवाल चाचा’ के किरदार को न केवल जीवंत बनाया है, बल्कि उनके चेहरे और बॉडी लैंग्वेज में जो बारीकी है, वह दर्शकों को हर दृश्य में बांधे रखती है। उनका कॉमिक अवतार बिल्कुल स्वाभाविक है और उन्होंने कभी भी जोकर बनने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि फिल्म की कॉमेडी बनावटी नहीं, बल्कि प्रामाणिक और दर्शनीय लगती है।
सहायक कलाकारों ने भी अपने रोल में जान डाल दी है। अभिमन्यु सिंह की नेगेटिव रोल से हटकर की गई प्रस्तुति बेहद मजेदार लगी, वहीं नायरा बनर्जी ने ग्लैमर और एक्टिंग का सही संतुलन पेश किया। युवा कलाकारों जैसे अनंत विजय जोशी, हर्ष मायर और अशोक पाठक ने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया। चितरंजन गिरी और हेमल इंगले ने सहायक भूमिकाओं में कहानी की गति बनाए रखी, जिससे फिल्म में निरंतर हास्य और रोमांच का प्रवाह बना रहा।
डायरेक्टर्स अभिषेक राज खेमका और रजनीश ठाकुर ने फिल्म को पूरी तरह सिचुएशनल कॉमेडी पर टिका रखा है। फिल्म का एक बड़ा हिस्सा सड़क और वैन में बीतता है, जिससे रोड-ट्रिप का अनुभव और भी वास्तविक लगता है। हालांकि कुछ जगह फिल्म की गति थोड़ी धीमी लगती है, लेकिन संवादों की ताजगी और कलाकारों की बेहतरीन केमिस्ट्री इसे संतुलित करती है। संवाद बेहद सरल और सटीक हैं। बिहारी लहजे का पुट और स्थिति के अनुसार उनका इस्तेमाल फिल्म की कॉमेडी को और प्रभावशाली बनाता है।
तकनीकी पक्ष में फिल्म की सिनेमैटोग्राफी सड़क, ढाबों और छोटे शहरों के वातावरण को बहुत ही ओरिजिनल तरीके से दर्शाती है। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की ऊर्जा बनाए रखता है, खासकर उन दृश्यों में जहां अफरातफरी और हास्य चरम पर होता है।
कहानी में पेश किए गए घटनाक्रम कभी-कभी ‘ओवर-द-टॉप’ लग सकते हैं, लेकिन फिल्म की अपनी दुनिया में ये घटनाएं बहुत ही लॉजिकल और मजेदार प्रतीत होती हैं। गोलियों की बारिश, ड्रग्स का जखीरा और गलती से होने वाली बैंक डकैती जैसे दृश्य दर्शकों को पूरी तरह मनोरंजन की दुनिया में ले जाते हैं।
‘वन टू चा चा चा’ दर्शकों को बिना किसी मानसिक तनाव के हंसाने का वादा करती है। यह उन लोगों के लिए आदर्श फिल्म है, जो परिवार के साथ सिनेमाघरों में समय बिताना चाहते हैं और कुछ घंटों के लिए दुनिया की परेशानियों को भूलकर ठहाके लगाना चाहते हैं।
फिल्म का आकर्षण सिर्फ हास्य तक सीमित नहीं है। यह पात्रों के आपसी रिश्तों, उनके टकराव और अनजाने पलों में उत्पन्न मजाक का भी बेहतरीन मिश्रण प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि यह फिल्म न केवल कॉमेडी प्रेमियों के लिए, बल्कि फैमिली ऑडियंस के लिए भी परफेक्ट एंटरटेनर बन जाती है।
संक्षेप में, ‘वन टू चा चा चा’ एक ऐसी ताजी और सधी हुई कॉमेडी फिल्म है, जो शुद्ध हास्य और उत्कृष्ट अभिनय के साथ दर्शकों के मनोरंजन की पूरी जिम्मेदारी निभाती है। आशुतोष राणा का नया अवतार, रोड-ट्रिप की मजेदार घटनाएं और फिल्म का सहज संवाद इसे किसी भी फैमिली के लिए जरूरी मनोरंजन बनाते हैं। फिल्म ने यह साबित कर दिया है कि बिना किसी फूहड़पन और शोर-शराबे के भी दर्शकों को पूरी तरह लोटपोट किया जा सकता है।
मेरी समीक्षा के अनुसार, यह फिल्म 5 में से 3 स्टार के काबिल है। परिवार के साथ देखने के लिए एक परफेक्ट विकल्प, जो हंसी और रोमांच के बीच संतुलन बनाए रखता है और दर्शकों को हल्के मन और खुशी के साथ सिनेमाघर से बाहर भेजता है।
ABHAY B. GUPTA

13/01/2026

हिंदी सिनेमा की यात्रा: आरंभ से आज तक
हिंदी फिल्म या जिसे हम आज सामान्य रूप से हिंदी सिनेमा और लोकप्रिय शब्द में बॉलीवुड कहते हैं, उसकी यात्रा केवल मनोरंजन की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और तकनीकी इतिहास की भी एक जीवित दास्तान है। यह यात्रा उन्नीसवीं सदी के अंत में शुरू हुई, जब भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था, समाज परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व से गुजर रहा था, और नई तकनीकों के प्रति कौतूहल धीरे-धीरे जन्म ले रहा था। उस समय किसी ने शायद यह कल्पना भी नहीं की होगी कि चलती हुई तस्वीरों का यह प्रयोग आने वाले सौ वर्षों में भारत की सबसे प्रभावशाली सांस्कृतिक शक्तियों में बदल जाएगा।
भारत में सिनेमा की नींव वास्तव में उस क्षण पड़ी जब लुमिएर ब्रदर्स ने 1895 में फ्रांस में पहली बार चलचित्रों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इसके कुछ ही महीनों बाद, 1896 में बंबई के वॉटसन होटल में लुमिएर ब्रदर्स की फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। यह क्षण भारतीय दर्शकों के लिए चमत्कार से कम नहीं था। रेलगाड़ी का स्टेशन पर आना, फैक्ट्री से मजदूरों का निकलना, समुद्र की लहरें—ये सब दृश्य उस समय के लोगों के लिए जादू जैसे थे। हालांकि ये विदेशी फिल्में थीं, लेकिन उन्होंने भारतीय समाज में यह बीज बो दिया कि चलती तस्वीरों के माध्यम से कहानी कही जा सकती है।
शुरुआत में भारतीय सिनेमा के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीकी ज्ञान की कमी थी। कैमरे विदेश से आते थे, फिल्म रील महंगी थी, और उसे चलाने तथा सुरक्षित रखने का अनुभव लगभग नहीं के बराबर था। बिजली की उपलब्धता सीमित थी, स्टूडियो जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी, और फिल्मों की शूटिंग अक्सर खुले मैदानों या प्राकृतिक रोशनी में करनी पड़ती थी। इसके अलावा समाज में अभिनय को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। रंगमंच से जुड़े कलाकारों को भी सम्मानजनक दृष्टि से नहीं देखा जाता था, इसलिए फिल्म में काम करना तो और भी अधिक सामाजिक जोखिम भरा माना जाता था।
इन्हीं कठिन परिस्थितियों के बीच धुंडिराज गोविंद फाल्के, जिन्हें आज हम दादासाहेब फाल्के के नाम से जानते हैं, भारतीय सिनेमा के जनक के रूप में सामने आए। उन्होंने विदेश जाकर फिल्म निर्माण की तकनीक सीखी, कैमरा और फिल्म रील खरीदी, और भारत लौटकर अपने सपने को साकार करने में जुट गए। उनके सामने आर्थिक संकट था, परिवार की जिम्मेदारियां थीं, और समाज की शंकालु नजरें थीं, लेकिन उनके भीतर यह दृढ़ विश्वास था कि भारतीय कहानियों को भारतीय दृष्टि से परदे पर उतारा जा सकता है।
1913 में दादासाहेब फाल्के ने ‘राजा हरिश्चंद्र’ नामक पहली भारतीय फीचर फिल्म बनाई। यह एक मूक फिल्म थी, यानी इसमें संवाद नहीं थे, केवल दृश्य और बीच-बीच में लिखे हुए कार्ड के माध्यम से कहानी आगे बढ़ती थी। फिल्म पौराणिक कथा पर आधारित थी, क्योंकि उस समय माना जाता था कि धार्मिक और पौराणिक कथाएं समाज में अधिक स्वीकार्य होंगी। एक और बड़ी चुनौती यह थी कि उस दौर में कोई महिला अभिनेत्री फिल्म में काम करने को तैयार नहीं थी, इसलिए महिला पात्रों की भूमिका पुरुष कलाकारों ने निभाई।
‘राजा हरिश्चंद्र’ का प्रदर्शन जब बंबई में हुआ, तो दर्शक आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने पहली बार अपनी ही भाषा, अपनी ही संस्कृति और अपनी ही कथाओं को चलती तस्वीरों में देखा। यह फिल्म व्यावसायिक रूप से भी सफल रही और इसने यह साबित कर दिया कि भारत में सिनेमा की संभावनाएं अपार हैं। यहीं से भारतीय फिल्मों का सफर वास्तव में शुरू हुआ।
मूक फिल्मों के दौर में हिंदी क्षेत्र के साथ-साथ बंगाल, दक्षिण भारत और अन्य हिस्सों में भी फिल्म निर्माण शुरू हो गया। बंबई, कलकत्ता, मद्रास जैसे शहर धीरे-धीरे फिल्म निर्माण के केंद्र बनते चले गए। इस दौर में फिल्में मुख्य रूप से पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक कथाओं पर आधारित होती थीं, क्योंकि इनमें संवाद की कमी के बावजूद भाव-भंगिमाओं और दृश्यों के माध्यम से कहानी समझाई जा सकती थी।
लेकिन मूक फिल्मों की अपनी सीमाएं थीं। संवाद के बिना भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त करना कठिन था, और संगीत का उपयोग केवल लाइव ऑर्केस्ट्रा या संगीतकारों के माध्यम से सिनेमाघर में किया जाता था। दर्शकों के मन में यह इच्छा लगातार बढ़ रही थी कि वे परदे पर कलाकारों को बोलते और गाते हुए देखें। यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें सवाक फिल्मों का जन्म हुआ।
1931 में ‘आलम आरा’ नामक पहली हिंदी बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई। इसके निर्देशक अर्देशिर ईरानी थे। इस फिल्म के साथ ही हिंदी सिनेमा में एक नए युग की शुरुआत हुई। जब दर्शकों ने पहली बार परदे पर कलाकारों की आवाज सुनी, तो सिनेमाघरों के बाहर लंबी कतारें लग गईं। ‘आलम आरा’ के गीत बेहद लोकप्रिय हुए और यहीं से हिंदी फिल्मों में संगीत एक अनिवार्य तत्व बन गया।
हालांकि सवाक फिल्मों के आगमन के साथ नई चुनौतियां भी सामने आईं। माइक्रोफोन की गुणवत्ता खराब थी, कैमरे शोर करते थे, इसलिए उन्हें बंद डिब्बों में रखना पड़ता था, जिससे शूटिंग कठिन हो जाती थी। कलाकारों को स्पष्ट उच्चारण करना सीखना पड़ा, और थिएटर से आए कई कलाकार, जिनकी आवाज अच्छी नहीं थी, धीरे-धीरे फिल्मों से बाहर हो गए। इसके बावजूद सवाक फिल्मों ने हिंदी सिनेमा को आम जनता से और भी गहराई से जोड़ दिया।
1930 और 1940 का दशक हिंदी सिनेमा के विस्तार का समय था। इस दौर में सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्में बनने लगीं। छुआछूत, नारी शिक्षा, विधवा विवाह, गरीबी और सामाजिक अन्याय जैसे मुद्दों को फिल्मों में उठाया जाने लगा। हालांकि पौराणिक और ऐतिहासिक फिल्में भी बनती रहीं, लेकिन सिनेमा अब केवल धार्मिक मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा।
आजादी से पहले का दौर राजनीतिक रूप से भी उथल-पुथल भरा था। स्वतंत्रता आंदोलन की गूंज फिल्मों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सुनाई देने लगी। कई फिल्में राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थीं, हालांकि ब्रिटिश सेंसरशिप के कारण सीधे राजनीतिक संदेश देना कठिन था। फिर भी प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से फिल्मकारों ने जनता के मन में स्वतंत्रता की भावना को जीवित रखा।
1947 में देश की आजादी और विभाजन ने हिंदी सिनेमा को गहरे रूप से प्रभावित किया। कई कलाकार, निर्देशक और तकनीशियन पाकिस्तान चले गए, जिससे उद्योग को बड़ा झटका लगा। इसके बावजूद यह दौर हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग की नींव रखने वाला साबित हुआ। 1950 और 1960 का दशक अक्सर हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जाता है।
इस काल में राज कपूर, गुरुदत्त, बिमल रॉय, महबूब खान जैसे महान फिल्मकार सामने आए। उनकी फिल्मों में मनोरंजन के साथ-साथ गहरी सामाजिक संवेदना दिखाई देती थी। ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘प्यासा’, ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्में न केवल व्यावसायिक रूप से सफल रहीं, बल्कि उन्होंने हिंदी सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई।
इस दौर के कलाकार भी किंवदंती बन गए। दिलीप कुमार, जिन्हें ट्रेजेडी किंग कहा गया, अपने गहरे और संवेदनशील अभिनय से दर्शकों के दिलों पर छा गए। राज कपूर ने आम आदमी के सपनों और संघर्षों को परदे पर उतारा। देव आनंद की शैली और संवाद अदायगी युवाओं में बेहद लोकप्रिय हुई। वहीं नर्गिस, मधुबाला, मीना कुमारी जैसी अभिनेत्रियों ने महिला पात्रों को नई गरिमा दी।
संगीत इस दौर में हिंदी सिनेमा की आत्मा बन गया। नौशाद, एस. डी. बर्मन, शंकर-जयकिशन जैसे संगीतकारों और लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार जैसे गायकों ने ऐसे गीत दिए जो आज भी लोगों की स्मृतियों में बसे हुए हैं। गीत केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने और भावनाओं को गहराई देने का माध्यम थे।
1970 का दशक हिंदी सिनेमा में एक बड़े बदलाव का प्रतीक बना। इस दौर में सामाजिक और राजनीतिक निराशा, बेरोजगारी और व्यवस्था के प्रति गुस्सा फिल्मों में झलकने लगा। अमिताभ बच्चन के रूप में ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि सामने आई। ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’ जैसी फिल्मों ने एक नए तरह के नायक को जन्म दिया, जो व्यवस्था से लड़ता है और न्याय की मांग करता है।
इस समय समानांतर सिनेमा भी उभर कर सामने आया। श्याम बेनेगल, मृणाल सेन, गोविंद निहलानी जैसे फिल्मकारों ने यथार्थवादी और गंभीर विषयों पर फिल्में बनाईं। ये फिल्में भले ही सीमित दर्शकों तक पहुंचीं, लेकिन उन्होंने हिंदी सिनेमा को वैचारिक गहराई दी।
1980 और 1990 का दशक हिंदी सिनेमा के लिए संक्रमण का समय था। एक ओर मसाला फिल्मों का बोलबाला था, दूसरी ओर वीडियो कैसेट और टेलीविजन के आगमन ने सिनेमा हॉल की दर्शक संख्या को प्रभावित किया। इस दौर में कई फिल्में गुणवत्ता के स्तर पर कमजोर रहीं, लेकिन इसी समय कुछ नए प्रयोग भी हुए।
1990 के दशक में उदारीकरण के बाद हिंदी सिनेमा ने एक बार फिर नई दिशा पकड़ी। शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान जैसे सितारे सामने आए, जिन्होंने रोमांस, पारिवारिक मूल्यों और आधुनिकता के मिश्रण को परदे पर प्रस्तुत किया। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ जैसी फिल्मों ने विदेशों में बसे भारतीय दर्शकों को भी हिंदी सिनेमा से जोड़ा।
2000 के बाद तकनीक ने हिंदी सिनेमा की शक्ल ही बदल दी। डिजिटल कैमरे, कंप्यूटर ग्राफिक्स, बेहतर ध्वनि तकनीक और वैश्विक वितरण ने फिल्मों को नए स्तर पर पहुंचाया। विषयों में विविधता आई। छोटे शहरों की कहानियां, वास्तविक जीवन से जुड़े पात्र और नए प्रयोग मुख्यधारा में जगह बनाने लगे।
आज हिंदी सिनेमा एक विशाल उद्योग है, जो हर साल सैकड़ों फिल्में बनाता है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के आगमन ने कहानी कहने के नए रास्ते खोले हैं। अब फिल्में केवल बड़े परदे तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि मोबाइल और लैपटॉप तक पहुंच गई हैं। विषयों में साहस बढ़ा है और नए फिल्मकार अपनी अलग आवाज के साथ सामने आ रहे हैं।
यदि हम आज के हिंदी सिनेमा को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह अपनी जड़ों से जुड़ा रहते हुए भी निरंतर बदल रहा है। पौराणिक कथाओं से शुरू होकर सामाजिक यथार्थ, रोमांस, एक्शन, प्रयोगात्मक सिनेमा और डिजिटल युग तक की यह यात्रा संघर्ष, प्रयोग और सपनों से भरी हुई है। हिंदी सिनेमा आज न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, बल्कि विश्व सिनेमा के मानचित्र पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है।
ABHAY B. GUPTA

11/01/2026

अरब सागर की लहरों के साक्ष्य में खड़ा सोमनाथ मंदिर एक बार फिर भारत की आत्मा, आस्था और स्वाभिमान की अमर गाथा का केंद्र बना, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर राष्ट्र को इतिहास, चेतना और भविष्य का संदेश दिया। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गजनी और औरंगजेब जैसे आक्रांता इतिहास के पन्नों में दफन हो चुके हैं, लेकिन सोमनाथ आज भी उतना ही अडिग, उतना ही जीवंत और उतना ही प्रेरक है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ मंदिर पर हुए आक्रमण किसी आर्थिक लूट के उद्देश्य से नहीं थे, बल्कि भारत की आस्था, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना को तोड़ने की कोशिश थे, परंतु हर बार भारत की आत्मा ने उन हमलों को पराजित किया और और भी अधिक दृढ़ होकर खड़ी हुई।
प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व किसी विनाश की स्मृति का आयोजन नहीं है, बल्कि यह हजार वर्षों तक चले संघर्ष, पुनर्निर्माण और विजय की उस अविरल यात्रा का उत्सव है, जो भारत की पहचान रही है। यह पर्व उस संकल्प का प्रतीक है, जिसने बार-बार टूटने के बाद भी भारत को खड़ा किया, जिसने हर आक्रमण को आत्मबल में बदला और जिसने पराजय को कभी अपनी नियति नहीं बनने दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि सदियों तक विदेशी आक्रांताओं ने भारत और उसकी आस्था को मिटाने का प्रयास किया, लेकिन न तो सोमनाथ झुका और न ही भारत की आत्मा कमजोर हुई।
सद्भावना ग्राउंड में आयोजित विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और उसकी आस्था एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। भारत की आत्मा उसकी संस्कृति, उसकी परंपराओं, उसके मंदिरों, उसके तीर्थों और उसके मूल्यों में बसती है। सोमनाथ उसी आत्मा का प्रतीक है, जो समय, सत्ता और परिस्थितियों से परे है। उन्होंने कहा कि आज भले ही तलवारें हाथों में न हों, लेकिन साजिशों के स्वरूप बदल गए हैं। आज भी भारत की एकता, उसकी सांस्कृतिक जड़ों और उसके विश्वास को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं, इसलिए देश को पहले से अधिक सजग, संगठित और शक्तिशाली बनने की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री ने सोमनाथ के ऐतिहासिक महत्व को विस्तार से रेखांकित करते हुए कहा कि महमूद गजनी से लेकर औरंगजेब तक अनेक आक्रांताओं ने इस पवित्र स्थल को नष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन वे यह समझने में असफल रहे कि सोमनाथ केवल पत्थरों से बना एक मंदिर नहीं है। ‘सोमनाथ’ शब्द स्वयं अमरता से जुड़ा हुआ है। यह उस चेतना का नाम है, जिसे न तो तोड़ा जा सकता है और न ही मिटाया जा सकता है। हर बार विनाश के प्रयासों के बाद यह मंदिर और अधिक भव्यता, गौरव और आत्मबल के साथ पुनर्निर्मित हुआ। उन्होंने कहा कि 12वीं शताब्दी से लेकर मराठा शासिका अहिल्याबाई होलकर तक, सोमनाथ का इतिहास पराजय का नहीं, बल्कि सतत पुनर्निर्माण और आत्मसम्मान की विजय का इतिहास है।
प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता के बाद के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि दुर्भाग्यवश आज़ादी के बाद भी गुलामी की मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। कुछ लोगों ने भारत के गौरवशाली इतिहास से दूरी बनाने का प्रयास किया और उसे भुलाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि जब सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया, तब उसका भी विरोध हुआ। 1951 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के लिए पहुंचे, तब भी आपत्तियां जताई गईं। यह विरोध किसी एक कार्यक्रम या व्यक्ति का नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा और उसके इतिहास से मुंह मोड़ने की मानसिकता का प्रतीक था, जिसे देश ने कभी स्वीकार नहीं किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारत के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की घोषणा था। यह उस भारत का संदेश था, जो अपने अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य की ओर बढ़ना चाहता था। यह केवल एक मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं था, बल्कि यह उस विश्वास की पुनर्स्थापना थी, जिसने भारत को सदियों तक जीवित रखा। उन्होंने कहा कि आज जब देश आज़ादी के अमृत काल में प्रवेश कर चुका है, तब हमें अपने इतिहास को बोझ नहीं, बल्कि शक्ति के स्रोत के रूप में देखना होगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सोमनाथ मंदिर की शिखर पर लहराती धर्मध्वजा केवल एक ध्वज नहीं है, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक शक्ति, सांस्कृतिक सामर्थ्य और अडिग संकल्प का संदेश देती है। यह ध्वजा पूरे विश्व को बताती है कि भारत की आस्था को न तो तलवारों से हराया जा सकता है और न ही षड्यंत्रों से। उन्होंने कहा कि हजार वर्ष पूर्व जिन लोगों ने अपनी आस्था और विश्वास की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, उनका बलिदान आज भी भारत को मार्ग दिखा रहा है।
अपने संबोधन की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पवित्र सोमनाथ मंदिर में इस महापर्व का साक्षी बनना उनके जीवन के सबसे अविस्मरणीय क्षणों में से एक है। उन्होंने कहा कि आज मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं और यह वही पावन भूमि है, जहां से भारत के स्वाभिमान की नई यात्रा ने स्वतंत्रता के बाद गति पकड़ी थी। उन्होंने कहा कि सोमनाथ हमें यह सिखाता है कि चाहे कितनी भी बड़ी विपत्तियां क्यों न आएं, यदि आस्था अटूट हो और संकल्प दृढ़ हो, तो कोई शक्ति हमें झुका नहीं सकती।
प्रधानमंत्री ने आह्वान किया कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को केवल एक दिन या एक आयोजन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे मई 2027 तक एक निरंतर उत्सव के रूप में मनाया जाए। उन्होंने कहा कि यह कालखंड सोमनाथ की हजार वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा और 75 वर्षों के पुनर्निर्माण का प्रतीक है। इस उत्सव के माध्यम से देश की नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ना आवश्यक है, ताकि वे यह समझ सकें कि भारत की पहचान केवल वर्तमान उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके हजारों वर्षों के आत्मसंघर्ष और आत्मबल से बनी है।
इससे पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने सोमनाथ मंदिर में लगभग 40 मिनट तक विधिवत पूजा-अर्चना की। उन्होंने शिवलिंग पर जल, पुष्प और पंचामृत से अभिषेक किया और मंत्रोच्चार के बीच भगवान सोमनाथ से देश की शांति, समृद्धि और प्रगति की कामना की। उन्होंने मंदिर परिसर में उपस्थित पुजारियों, संतों और स्थानीय कलाकारों से संवाद किया और पारंपरिक चेंदा वाद्य बजाकर शोभायात्रा में भी सहभागिता निभाई। पूरा वातावरण भक्ति, गौरव और स्वाभिमान की भावना से ओतप्रोत दिखाई दिया।
उल्लेखनीय है कि 1026 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर हुए प्रथम आक्रमण की सहस्राब्दी के अवसर पर यह भव्य ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन केवल इतिहास को स्मरण करने का प्रयास नहीं है, बल्कि उस चेतना को जागृत करने का माध्यम है, जिसने भारत को सदियों तक जीवित, जाग्रत और अडिग बनाए रखा। प्रधानमंत्री के शब्दों में, सोमनाथ न कभी झुका था, न आज झुका है और न ही कभी झुकेगा, क्योंकि जब तक भारत की आस्था जीवित है, तब तक उसकी आत्मा अडिग रहेगी और उसका स्वाभिमान अमर बना रहेगा।

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