19/05/2026
20 मई को मेडिकल स्टोर रहेंगे बंद ,इसके साथ कुछ सवाल भी है जिसे आप सभी को पढ़ना चाहिए और जवाब तलाशने का प्रयास करना चाहिए
जब देश का हर क्षेत्र डिजिटल बदलाव को स्वीकार कर चुका है, तो दवाइयों की ऑनलाइन बिक्री पर इतना भय और विरोध क्यों?
आज कपड़े से लेकर किराना, मोबाइल, टिकट, बैंकिंग, होटल और यहां तक कि खाने-पीने का सामान भी लोग ऑनलाइन मंगा रहे हैं।
इन बदलावों से लाखों ऑफलाइन व्यापार प्रभावित हुए, लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद को बदला और प्रतिस्पर्धा में टिके रहने की कोशिश की।
फिर मेडिकल व्यवसाय ही ऐसा क्यों मानता है कि बदलाव सिर्फ दूसरों के लिए होना चाहिए?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि मेडिकल व्यवसाय से जुड़े लोग खुद अपने घर के कितने सामान ऑनलाइन खरीदते हैं — मोबाइल, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनें, यहां तक कि रोजमर्रा की चीजें भी।
तो क्या उस समय दूसरे व्यापारियों को नुकसान नहीं होता?
अगर हर व्यापारी सिर्फ अपने नुकसान के नाम पर ऑनलाइन व्यवस्था बंद कराने लगे, तो फिर डिजिटल इंडिया और आधुनिक बाजार व्यवस्था का कोई मतलब ही नहीं बचेगा।
नकली दवाओं का डर दिखाया जा रहा है, लेकिन क्या नकली दवाएं सिर्फ ऑनलाइन मिलती हैं?
देश में कई बार ऑफलाइन मेडिकल दुकानों और सप्लाई चैन से भी नकली दवाएं पकड़ी गई हैं।
गलती व्यवस्था की निगरानी में हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरे ऑनलाइन सिस्टम को ही बंद करने की मांग शुरू कर दी जाए।
और “बिना डॉक्टर सलाह दवा लेना खतरनाक है” — यह बात बिल्कुल सही है।
लेकिन यह नियम सिर्फ ऑनलाइन पर लागू नहीं होता, ऑफलाइन दुकानों पर भी बिना पर्ची दवाएं बेचे जाने की शिकायतें आम रही हैं।
इसलिए समस्या नियमों के पालन की है, माध्यम की नहीं।
असल सच्चाई यह है कि ऑनलाइन दवा बिक्री आने के बाद मेडिकल दुकानों की वर्षों पुरानी मनमानी और मोनोपॉली कमजोर हुई है।
जहां पहले ग्राहक को एक रुपये का डिस्काउंट तक नहीं मिलता था, वहीं आज वही दवाइयां ऑनलाइन कम कीमत, ऑफर और पारदर्शी रेट पर उपलब्ध हैं।
इससे सबसे ज्यादा राहत गरीब और मध्यम वर्ग के उन परिवारों को मिली है, जिन्हें हर महीने हजारों रुपये दवाइयों पर खर्च करने पड़ते हैं।
प्रतिस्पर्धा बाजार का नियम है।
जो बेहतर सेवा देगा, सही दाम देगा और लोगों की सुविधा समझेगा, जनता उसी को चुनेगी।
हड़ताल करके जनता को दवा से परेशान करना समाधान नहीं है।
समाधान है — बेहतर सेवा, उचित व्यवहार और उचित कीमत।
निष्कर्ष यही है कि ऑनलाइन शॉपिंग ने सिर्फ मेडिकल नहीं, बल्कि हजारों छोटे और मध्यम वर्गीय व्यापारियों की कमर तोड़ी है।
अगर सच में ऑनलाइन व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़नी है, तो फिर यह लड़ाई सिर्फ मेडिकल सेक्टर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
कपड़ा व्यापारी, मोबाइल दुकानदार, किराना व्यवसायी, इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापारी — सभी को साथ आना पड़ेगा।
सिर्फ अपने व्यापार पर असर पड़ने पर विरोध करना और बाकी समय ऑनलाइन खरीदारी करना, यह दोहरी सोच दिखाता है।
अगर लड़ाई सच में “ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन” की है, तो फिर यह लड़ाई सभी व्यापारियों की होनी चाहिए, सिर्फ मेडिकल दुकानों की नहीं।