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जानें: क्यों मनाया जाता है छठ, क्या है इसका इतिहास? हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को पर्वों की माला माना जाता है। पां...
26/10/2017

जानें: क्यों मनाया जाता है छठ, क्या है इसका इतिहास?
हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को पर्वों की माला माना जाता है। पांच दिन तक चलने वाला ये पर्व सिर्फ भैयादूज तक ही सीमित नही है बल्कि यह पर्व छठ तक चलता है। उत्तर प्रदेश और खासकर बिहार में मनाया जाने वाला ये पर्व बेहद अहम पर्व है जो पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। छठ केवल एक पर्व ही नहीं है बल्कि महापर्व है जो कुल चार दिन तक चलता है। नहाय-खाय से लेकर उगते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देने तक चलने वाले इस पर्व का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है।पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहते हैं राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा।राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

क्यों मनाते है धनतेरस, इस दिन क्या करें और कैसे करें धनतेरस की पूजादीपावली से ठीक दो दिन पहले कार्तिक मॉस की त्रयोदशी को...
17/10/2017

क्यों मनाते है धनतेरस, इस दिन क्या करें और कैसे करें धनतेरस की पूजा
दीपावली से ठीक दो दिन पहले कार्तिक मॉस की त्रयोदशी को धनतेरस का त्यौहार आता है. इस दिन लोग अपने घर में कोई नई वस्तु लाते है. ऐसा मानना है की इस दिन घर में कुछ भी नया लाना शुभ माना जाता है. धन को सभी चीजों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है. कहते भी है ना “पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में माया”.शरीर के बाद धन को महत्व दिया गया है. इसलिए इस दिन लोग धन के देवता कुबेर की पूजा करते है और जिससे भगवान कुबेर प्रसन्न हो और घर में धन-धान्य आये और सब स्वस्थ रहे धनतेरस के दिन घर में 13 दिए जलाने चाहिए. इस दिन नए बर्तन, सोना-चांदी आदि खरीदना शुभ माना जाता है. धनतेरस के दिन भगवान कुबेर, यमराज और धनवंतरी की पूजा की जाती है. इस दिन कांच, नुकीली चीजें, तेल की वस्तुएं आदि नहीं खरीदनी चाहिए.इस दिन सबसे पहले मिट्टी का हाथी और भगवान धनवंतरी का फोटो लगायें. चांदी या तांबे के बर्तन से जल का आचमन करें. भगवान गणेश की पूजा करे, क्योंकि सभी देवताओं में भगवान गणेश को पहले पूजा जाता है. हाथ में अक्षत-फुल लेकर भगवान धनवंतरी का ध्यान करें.

जानिए क्या है अहोई अष्टमी व्रत का महत्व, क्यों किया जाता है इस दिन निर्जला व्रत ?उत्तर भारत में और विशेष रूप से राजस्थान...
12/10/2017

जानिए क्या है अहोई अष्टमी व्रत का महत्व, क्यों किया जाता है इस दिन निर्जला व्रत ?
उत्तर भारत में और विशेष रूप से राजस्थान में महिलाएं बड़ी निष्ठा के साथ इस व्रत को करती हैं।भारत एक त्योहारों का देश है और इस बार अक्टूबर माह में सभी त्योहार आ रहे हैं। करवाचौथ के बाद अब सभी को दिवाली का इंतजार रहता है। लेकिन इससे पहले कार्तिक माह की अष्टमी के दिन आता अहोई अष्टमी का व्रत। उत्तर भारत में ज्यादा इस व्रत का प्रचलन है। इस द‍िन अहोई माता की पूजा की जाती है। इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। उत्तर भारत में और विशेष रूप से राजस्थान में महिलाएं बड़ी निष्ठा के साथ इस व्रत को करती हैं। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं घर की दीवार पर अहोई का चित्र बनाती हैं। संतान की सलामती से जुड़े इस व्रत का बहुत महत्व है। इस व्रत को हर महिला अपने बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए करती हैं। कुछ महिलाएं इस व्रत को बच्चे की प्राप्ति के लिए भी करती हैं।इस दिन को विशेष पूजा होती है। इस दिन के लिए विशेष मान्यता भी है। यह व्रत बड़े व्रतों में से एक है. इसमें परिवार कल्याण की भावना छिपी होती है। इस व्रत को करने से पारिवारिक सुख प्राप्त‍ि और संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है। इसे संतान वाली स्त्री ही करती है। इस पूजा के पीछे एक प्राचीन कथा है। दरअसल, दिवाली पर घर को लीपने के लिए एक साहुकार की सात बहुएं मिट्टी लाने जंगल में गई। तो उनकी ननद भी उनके साथ चली आई। साहुकार की बेटी जिस जगह मिट्टी खोद रही थी। उसी जगह स्याहु अपने बच्चों के साथ रहती थी। मिट्टी खोदते वक्त लड़की की खुरपी से स्याहू का एक बच्चा मर गया।इसलिए जब भी साहुकार की लड़की के जब भी बच्चे होते थे। वो सात दिन के अंदर मर जाते थे। एक-एक कर सात बच्चों की मौत के बाद लड़की ने जब पंडित को बुलाया और इसका कारण पूछा। लड़की को पता चला कि अनजाने में जो उससे पाप हुआ, उसका ये नतीजा है। पंडित ने लड़की से अहोई माता की पूजा करने को कहा, इसके बाद कार्तिक कृष्ण की अष्टमी तिथि के दिन उसने माता का व्रत रखा और पूजा की। बाद में माता अहोई ने सभी मृत संतानों को जीवित कर दिया। इस तरह से संतान की लंबी आयु और प्राप्ति के लिए इस व्रत को किया जाने लगा।

Upcoming Festival's and Diwali Pujan Time
06/10/2017

Upcoming Festival's and Diwali Pujan Time

नवरात्री के अष्टम दिन माता महागौरी रूप की पूजाश्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए...
28/09/2017

नवरात्री के अष्टम दिन माता महागौरी रूप की पूजा
श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए ये महागौरी कहलाती हैं। नवरात्रि के अष्टम दिन इनका पूजन किया जाता है। इनकी उपासना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। माँ महागौरी की आराधना से किसी प्रकार के रूप और मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। उजले वस्त्र धारण किये हुए महादेव को आनंद देवे वाली शुद्धता मूर्ती देवी महागौरी मंगलदायिनी हों।देवी दुर्गा के नौ रूपों में महागौरी आठवीं शक्ति स्वरूपा हैं। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है। महागौरी आदी शक्ति हैं इनके तेज से संपूर्ण विश्व प्रकाश-मान होता है इनकी शक्ति अमोघ फलदायिनी हैम माँ महागौरी की अराधना से भक्तों को सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा देवी का भक्त जीवन में पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी बनता है

नवरात्र के सातवें दिन की जाती है मां कालरात्रि की पूजानवरात्र के सातवें दिन महाशक्ति मां दुर्गा के सातवें स्वरूप कालरात्...
27/09/2017

नवरात्र के सातवें दिन की जाती है मां कालरात्रि की पूजा
नवरात्र के सातवें दिन महाशक्ति मां दुर्गा के सातवें स्वरूप कालरात्रि की पूजा की जाती है. कहा जाता है कि मां कालरात्रि की पूजा करने से काल का नाश होता है. इसी वजह से मां के इस रूप को कालरात्रि कहा जाता है. असुरों के राजा रक्तबीज का वध करने के लिए देवी दुर्गा ने अपने तेज से इन्हें उत्पन्न किया था. इनकी पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें 'शुभंकारी' भी कहते हैं.इस दिन साधक का मन सहस्रार चक्र में स्थित रहता है. इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है. मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं

नवरात्रि के पांचवें दिन करें मां स्कंदमाता की पूजानवरात्रि में मां दुर्गा के नवस्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के ...
25/09/2017

नवरात्रि के पांचवें दिन करें मां स्कंदमाता की पूजा
नवरात्रि में मां दुर्गा के नवस्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के पांचवें दिन माता स्कंदमाता की पूजा करने का विधान है। भगवान स्कंद की माता होने के कारण देवी को स्कंदमाता कहा जाता है। सच्चे मन से मां की पूजा करने से मां अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें मोेक्ष प्रदान करती हैं। माता के पूजन से व्यक्ति को संतान प्राप्त होती है। मां स्कंदमाता भगवान स्कंद को गोद में लिए हुए हैं। मां का ये स्वरूप दर्शाता है कि वात्सल्य की प्रतिमूर्ति मां स्कंदमाता अपने भक्तों को अपने बच्चे के समान समझती है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान स्कंद की पूजा भी स्वत: हो जाती है।माता को कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। देवी स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा इनकी मनोहर छवि पूरे ब्रह्मांड में प्रकाशमान होती है। सच्चे मन से मां की पूजा करने से व्यक्ति को दुःखों से मुक्ति मिलकर मोक्ष अौर सुख-शांति की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की विधि-विधान से पूजा करने के बाद इस मंत्र का जाप करने से भक्त पर मां का कृपा सदैव बनी रहती है।
या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
जो व्यक्ति मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना करता है मां उसकी गोद हमेशा भरी रखती हैं। नवरात्र के पांचवे दिन लाल वस्त्र में सुहाग चिन्ह् सिंदूर, लाल चूड़ी, महावर, नेल पेंट, लाल बिंदी तथा सेब और लाल फूल एवं चावल बांधकर मां की गोद भरने से भक्त को संतान का प्राप्ति होती है।

तीसरे दिन होती है मां के 'चंद्रघंटा' स्वरूप की पूजानवरात्र का तीसरा दिन भय से मुक्ति और अपार साहस प्राप्त करने का होता ह...
23/09/2017

तीसरे दिन होती है मां के 'चंद्रघंटा' स्वरूप की पूजा
नवरात्र का तीसरा दिन भय से मुक्ति और अपार साहस प्राप्त करने का होता है. इस दिन मां के चंद्रघंटा स्वरुप की उपासना की जाती है. इनके सिर पर घंटे के आकार का चंद्रामा है, इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है. इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और इनकी मुद्रा युद्ध की मुद्रा है. मां चंद्रघंटा तंभ साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती है और ज्योतिष में इनका संबंध मंगल ग्रह से होता है.

नवरात्री के दूसरे दिन माता ब्रम्ह्चारिणी रूप की पूजानवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना का विधान है। दे...
22/09/2017

नवरात्री के दूसरे दिन माता ब्रम्ह्चारिणी रूप की पूजा
नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना का विधान है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

नवरात्रि के पहले दिन होती है "देवी शैलपुत्री" की पूजाआज चैत्र नवरात्र का पहला दिन है और इस दिन घटस्थापन के बाद मां दुर्ग...
21/09/2017

नवरात्रि के पहले दिन होती है "देवी शैलपुत्री" की पूजा
आज चैत्र नवरात्र का पहला दिन है और इस दिन घटस्थापन के बाद मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का पूजन, अर्चन और स्तवन किया जाता है। शैल का अर्थ है हिमालय और पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। पार्वती के रूप में इन्हें भगवान शंकर की पत्नी के रूप में भी जाना जाता है। वृषभ (बैल) इनका वाहन होने के कारण इन्हें वृषभारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। इनके दाएं हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में इन्होंने कमल धारण किया हुआ है।
वन्दे वांछितलाभाय, चंद्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढ़ां शूलधरां, शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥
अर्थात् मैं मनोवांछित लाभ के लिये अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, वृष पर सवार रहने वाली, शूलधारिणी और यशस्विनी मां शैलपुत्री की वंदना करता हूं।

महाराजा अग्रसेन जयंती जानिए क्यों मनाई जाती है?महाराजा अग्रसेन को वौश्य सामाज का जनक कहा जाता है। अग्रसेन महाराज का जन्म...
21/09/2017

महाराजा अग्रसेन जयंती जानिए क्यों मनाई जाती है?
महाराजा अग्रसेन को वौश्य सामाज का जनक कहा जाता है। अग्रसेन महाराज का जन्म मूल रुप से क्षत्रिय समाज में हुआ था। अग्रसेन समाज में उस वक्त देवता को आहुति के लिए पशु की बलि दी जाती थी। अग्रसेन महाराज इस प्रथा को पसंद नहीं करते थे। इसलिए अग्रसेन महाराज ने क्षत्रिय धर्म को छोड़कर वैश्य धर्म को अपना लिया था। महाराजा अग्रसेन ने ही व्यापारियों के राज्य की स्थापना की थी।महाराजा अग्रसेन रजा बल्लभ सेन के सबसे बड़े पुत्र थे।कहा जाता है कि महाराजा अग्रसेन का जन्म द्वापर युग के अंतिम चरण में हुआ था। महाराजा अग्रसेन की नगरी का नाम प्रतापनगर था। महाराजा अग्रसेन ने ही अग्रोहा नाम की नगरी बसाई थी। महाराजा अग्रसेन ने महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से युद्ध किया था।

कैसे करनी चाहिए सावन में शिवलिंग की पूजा?सावन के महीने में शिवलिंग की पूजा की जाती है लिंग सृष्टि का आधार है और शिव विश्...
17/07/2017

कैसे करनी चाहिए सावन में शिवलिंग की पूजा?
सावन के महीने में शिवलिंग की पूजा की जाती है लिंग सृष्टि का आधार है और शिव विश्व कल्याण के देवता है। वैसे तो शिव जी की पूजा में कोई विशेष नियम की बाध्यता नहीं है। क्योंकि शिव बहुत ही भोले है वो सिर्फ भाव के भूखे है। शास्त्रों में शिवलिंग पूजा के कुछ नियम-विधान बताये गये है। जिस जगह पर शिवलिंग स्वथापित हो, उससे पूर्व दिशा की ओर मुख करके नहीं बैठना चाहिए। शिवलिंग से उत्तर दिशा में भी न बैठें। क्योंकि इस दिशा में भगवान शंकर का बॉया अंग होता है एंव शक्तिरूपा देवी उमा का स्थान होता है। पूजा के दौरान शिवलिंग से पश्चिम दिशा में बैठना भी उचित नहीं रहता है। क्योंकि इस दिशा में भोले बाबा की पीठ होती है। जिस कारण पीछे से देवपूजा करने से शुभ फल नहीं मिलता है। शिवलिंग से दक्षिण दिशा में ही बैठकर पूजन करने से मनोकामना पूर्ण होती है। उज्जैन के दक्षिणामुखी महाकाल और अन्य दक्षिणामुखी शिलिंग पूजा का बहुत अधिक धार्मिक महत्च है। शिवलिंग पूजा में दक्षिण दिशा में बैठकर करके साथ में भक्त को भस्म का त्रिपुण्ड लगाना चाहिए, रूद्राक्ष की माला पहननी चाहिए और बिना कटे-फटे हुये बिल्वपत्र अर्पित करना चाहिए। शिवलिंग की कभी पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। आधी परिक्रमा करना ही शुभ होता है।

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