19/06/2018
जेपी तुमको न भूल पाएंगे : 1975-1990
देश में संपूर्ण क्रांति की अलख जगाने वाले महान समाजवादी लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन आज था, मगर हमें याद नहीं रहा, शायद हमारी याददास्त कमजोर हो गयी है या वोलीवुड के महानायक के जन्मदिन की चकाचौंध में हमारी आंखे चुंधिया गयी,हम भूले तो भूले मगर बात बात पे जेपि का नाम लेकर अपनी समाजवादी और भ्रस्ताचार के विरुद्ध लारायी लरने वाले श्री केजरीवाल को भी उनका जन्मदिन याद नहीं रहा| जेपी के चेलो में लालू. नितीश, रविशंकर, सुशिल मोदी,बी पि सिंह ,अजित सिंह, मुलायम, जैसे बरे नाम है , जो उनका नाम आज भी लेते है, मगर नितीश के अलावा किसी को भी उनको याद करते नहीं दिखा, कांग्रेस से तो वैसे भी कोई आशा है नहीं मगर जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के लोग भी अपने हीरो को भूल गए लगता है|
उन्होंने कहा था -मेरी रुचि इस बात में नहीं की कैसे सत्ता हासिल की जाये, बल्कि इस बात में है की कैसे नियंत्रण जनता के हाथ में दे दिया जाये !
एक ऐसे नेता जिसने सत्ता के शीर्ष पे बैठे लोगो को धुल चटा दी,मगर खुद कभी भी किसी पद से चिपके रहना पसंद नही किया, जिसने हुंकार भरी – “सिंहासन खाली करो की जनता आती है” (रामधारी सिंह के कविता) और एक लाख जनता उस समय (१९७५) में रामलीला मैदान पहुची थी|
महात्मा गाधी,जवाहरलाल नेहरू और वह आचार्य विनोभा भावे से प्रभावित जेपी सबसे अलग सोच रखने वाले समाजवादी नेता थे,उनका जन्म बिहार के पावन भूमि में 11 अक्टूबर,1902 को सारण के सिताबदियारा में हुआ था। पिता श्री हसनू दयाल औए माता जी फूलो रानी बहुत ही सिम्पल धार्मिक परिवार से थे, माता जी से उनको काफी लागाव था और उनसे प्रभावित भी| उन्हें भगवद गीता से काफी प्रेरणा मिली और उन्होंने अपने जीवन में आत्मसात कर लिया, ९ साल के उम्र में वो पटना पढने के लिया गए, १९१८ में दसवी के परिछा में जिला मेरिट स्कोलोरशिप का पुरुस्कार जीता| १८ साल के उम्र में प्रभवति जी से १४ अक्टूबर १९२० को शादी हुए, ब्रज किशोर प्रभावती के पिता ने प्रभावती जी को कस्तूरबा गांधीजी के साथ गाँधी आश्रम अहमदाब भेज दिया, खिलाफत आन्दोलन में भागीदारी निभाई और अंग्रेजो के कालेज पटना को छोर के बिहार विद्यापीठ से पढाई की,पटना से पढ़ाई करने के बाद वह उच शिक्षा के लिये अमेरिका(१९२२) गए, लेकिन उनका मन में भारत के स्वाधीनता संग्राम में योगदान देना का संकल्प हमेशा हिलोरे मारता रहा,और सेपतेम्बर १९२९ को भारत के ओर निकले नोवेम्बर को भारत वापुस आये,प्रभावती देवी उस समय तक गाँधी आश्रम में थी,
प्रभावती के कहने पर गांधी से मिलने साबरमती आश्रम गए। गाँधी जी ओर नेहरूजी दोनों से साथ ही मुलाकात हुए, नेहरूजी ने सीधे तौर पे जेपी को योगदान देने को कहा, ओर जेपी नेहरूजी के साथ कूद परे,नेहरू के ही कहने पर जेपी काग्रेस के साथ जुड़े, आज़ादी की लारायी में बार बार जेल गए ओर अंगेजो की आंख की किरकिरी बन चुके जेपी नासिक जेल में राम मनोहर लोहिया ओर मिनो मसानी से १९३२ में मिले ओर उसके बाद उनकी भागीदारी आक्रामक हो गयी|
१९ अप्रैल १९५४ को आजादी के बाद वह आचार्य विनोभा भावे और उनके सर्वोदय आदोलन से जुड़े। उन्होंने लंबे वक्त के लिए ग्रामीण भारत में इस आदोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने आचार्य भावे के भूदान के आह्वान का पूरा समर्थन किया। जेपी ने ५० के दशक में ‘राज्यव्यवस्था की पुनर्रचना’ नामक किताब लिखी। इसी पुस्तक को आधार बनाकर नेहरू ने ‘मेहता आयोग’ का गठन किया था। शायद सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात शायद सबसे पहले जेपी ने उठाई थी। १९६० में प्रधानमंत्री नेहरू की कोशिश के बावजूद वह उनके मंत्रिमंडल शामिल नहीं हुए ये साबित करता है की उनको सत्ता का मोह कभी नहीं था| बाद में वो बिहार की राजनीती ओर समाजसेवा में कूद परे, कौन नहीं जनता की ७४ में विधार्थी आन्दोलन सुरु की ओर राजनीती की दिशा ही बदल दी, सन १९७४ में वी एम् तर्कुंदे के साथ मिल कर Citizens for democracy ओर १९७६ में People’s Union for Civil Liberties एन जी ओ बनाया जिसने समाजसेवा ओर नागरिक अधिकारों के लिए कार्य की, जेपी ने पांच जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में विशाल जनसमूह को संबोधित किया। यहीं उन्हें ‘लोकनायक’ की उपाधि दी गई| जयप्रकाश मैगसायसाय पुरस्कार से सम्मानित हुए और मरणोपरात उन्हें ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया
। मगर सन ७७ न होता तो हम जेपी के शक्ति को समझ नहीं पाते, सन ७५ में अलहबाद हायकोर्ट के द्वारा इंदिरा गाँधी की जित को कानून के खिलाफ कहा तो जेपी खुल कर इंदिरा के खिलाफ कूद परे, उन्होंने इस्तीफा माँगा ओर आन्दोलन सुरु कर दिया, ओर सम्पूर्ण क्रांति की रूप रेखा तैयार की, सम्पूर्ण क्रांति जिसे सरे देश ने हाथो-हाथ लिया, २५ जून ७५ को इंदिरा गाँधी ने घबरा कर इमरजेंसी लगा दी, आपातकाल- सरे नागरिक अधिकारों की निर्मम हत्या, लोकतंत्र के नाम पे कलंक , एक काला अध्याय!
रास्त्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के कविता से प्रभावित हो एक जय घोष किया जेपी ने हुंकार भरी – “सिंहासन खाली करो की जनता आती है” (रामधारी सिंह के कविता) और एक लाख जनता उस समय (१९७५) में रामलीला मैदान पहुची थी| राजनीती की दिशा बदल दी, इंदिरा की सत्ता के खिलाफ सारा देश जेपी के साथ खरा हो गया, ७७ में चुनाव हुए जेपि की जित ओर इंदिरा की हार हुई | २ साल बाद अपने ही लोगो की अति-महत्वकांछा के कारन सरकार गिर गयी, कोई न एक बदलाव तो आ ही गयी देश में|
मगर इसके बाद की घटना काफी दुखद है, भारत का इतिहास रहा है की गांधीजी के हत्या के बाद किसी भी राजनेताओ की हत्या नहीं होता (आतंकवादी घटना छोरके) दुर्घटना होती है, लो! हो गयी एक ओर दुर्घटना!
पटना बिहार ०८ ओक्टुबर ७९ अपने जन्मदिन के केवल ३ दिन पहले उनका निधन हो गया,७७ के आन्दोलन के जनक ७७ साल पूरा न कर सके, हृदय अघात ओर डायबिटीज के इलाज के लिए हस्पताल में भर्ती जेपी का निधन अचानक ही हो गया, मेरा मानना है की ये एक विवाद का विषय है, हा कोई साबुत नहीं दे सकता मैं, पूरा बिहार ओर उत्तर प्रदेश की साडी दुकाने ओर ऑफिस बंद हो गयी ओर समूचा भारत जेपी के निधन पे शोकाकुल हो गया|।
एक युग का अंत !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जेपी तुम चले गए मगर हमारे हृदय से तुम्हे कौन निकालेगा , एक युग का अंत हो गया मगर एक युग की शुरुवात कर गए
सचमुच जेपी तुमको न भूल पाएंगे :(
बिहार आंदोलन और बाद में: 1975-1990
आजादी के बाद भी, जब भारत इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान एक निरंकुश शासन में पड़ रहा था, तब चुनाव लड़ने के आंदोलन का मुख्य जोर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार से आया था। 1974 में, जेपी ने बिहार राज्य में छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया जो धीरे-धीरे लोकप्रिय लोगों के आंदोलन में विकसित हुआ जिसे बिहार आंदोलन के नाम से जाना जाता है। इस आंदोलन के दौरान नारायण ने वीएम तर्कुंडे के साथ शांतिपूर्ण कुल क्रांति के लिए एक आह्वान किया, उन्होंने 1974 में नागरिकों के लिए नागरिकों की स्थापना की और 1976 में नागरिक संघों के लिए पीपुल्स यूनियन सिविल लिबर्टीज की स्थापना की, दोनों गैर सरकारी संगठनों ने नागरिक स्वतंत्रताओं को बनाए रखने और उनकी रक्षा करने के लिए। 23 जनवरी को 1977, इंदिरा गांधी ने मार्च के लिए नए चुनाव बुलाए और सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया। आपातकाल आधिकारिक तौर पर 23 मार्च 1977 को समाप्त हुआ। कांग्रेस पार्टी को 1977 में बनाए गए कई छोटी पार्टियों के जनता पार्टी गठबंधन के हाथों हार का सामना करना पड़ा और गठबंधन सत्ता में आया, जिसके नेतृत्व में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता हुई, जो बन गए भारत के पहले गैर-कांग्रेस प्रधान मंत्री। बिहार में, जनता पार्टी ने 1977 के आम चुनावों में नारायण के मार्गदर्शन के तहत पचास लोकसभा सीटें जीतीं और बिहार विधानसभा में सत्ता में बढ़ीं। तत्कालीन जनता पार्टी के अध्यक्ष सत्येंद्र नारायण सिन्हा से चुनाव जीतने के बाद करपुरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने।
बिहार आंदोलन के अभियान ने भारतीयों को चेतावनी दी कि चुनाव "लोकतंत्र और तानाशाही" के बीच चयन करने का आखिरी मौका हो सकता है।
इसके परिणामस्वरूप दो चीजें हुईं:
एक गौरवशाली अतीत का प्रतिनिधित्व करने वाले बिहार की पहचान (विहार अर्थ मठ से) मारे गए थे। इसकी आवाज अक्सर अन्य राज्यों के क्षेत्रीय झगड़े के क्षेत्र में खोने के लिए प्रयोग की जाती है, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि जैसे भाषाई राज्यों।
बिहार ने एक विरोधी प्रतिष्ठान छवि प्राप्त की। प्रतिष्ठान उन्मुख प्रेस ने अक्सर राज्य को अनुशासन और अराजकता के रूप में पेश किया। आदर्शवाद ने समय-समय पर राजनीति में खुद को जोर दिया, जैसे 1977 में जब एक लहर ने कांग्रेस पार्टी को हरा दिया और फिर 1989 में जब जनता दल भ्रष्टाचार विरोधी लहर पर सत्ता में आया। बीच में, समाजवादी आंदोलन ने महामाया प्रसाद सिन्हा और करपुरी ठाकुर के नेतृत्व में स्थिति की गड़बड़ी को तोड़ने की कोशिश की। यह आंशिक रूप से इन नेताओं के अव्यवहारिक आदर्शवाद के कारण और आंशिक रूप से कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेताओं की मूर्तियों के कारण नहीं बढ़ सका, जिन्होंने बड़े राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य द्वारा धमकी दी थी। 1939 में बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ था। 1960 के दशक और 1980 के दशक में बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन एक भयंकर बल था और बिहार में सबसे प्रबुद्ध वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था। आंदोलन का नेतृत्व जगन्नाथ सरकार, सुनील मुखर्जी, राहुल संक्रित्ययन, पंडित करीनंद शर्मा, इंद्रदीप सिन्हा और चंद्रशेखर सिंह जैसे अनुभवी कम्युनिस्ट नेताओं ने किया था। यह सरकार के नेतृत्व में था कि कम्युनिस्ट पार्टी ने जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में "कुल क्रांति" लड़ी, क्योंकि इसके मूल में आंदोलन विरोधी लोकतांत्रिक था और भारतीय लोकतंत्र के कपड़े को चुनौती दी थी। [उद्धरण वांछित]
चूंकि क्षेत्रीय पहचान धीरे-धीरे खत्म हो रही थी, इसलिए इसकी जगह जाति आधारित राजनीति द्वारा उठाई गई थी, शुरुआत में ब्राह्मणों, भुमिहार और राजपूतों के हाथों में सत्ता थी।
Translation:
Bihar movement & Aftermath: 1975–1990
After independence also, when India was falling into an autocratic rule during the regime of Indira Gandhi, the main thrust to the movement to hold elections came from Bihar under the leadership of Jayaprakash Narayan. In 1974, JP led the student's movement in the state of Bihar which gradually developed into a popular people's movement known as the Bihar Movement. It was during this movement that Narayan gave a call for peaceful Total Revolution together with V. M. Tarkunde, he founded the Citizens for Democracy in 1974 and the People's Union for Civil Liberties in 1976, both NGOs, to uphold and defend civil liberties. On 23 January 1977, Indira Gandhi called fresh elections for March and released all political prisoners. Emergency officially ended on 23 March 1977. The Congress Party, suffered a defeat at the hands of the Janata Party coalition of several small parties created in 1977 and the alliance came to power, headed by Morarji Desai, who became the first non-Congress Prime Minister of India. In Bihar, the Janata Party won all the fifty-four Lok Sabha seats in 1977 general elections under the mentorship of Narayan and rose to power in Bihar assembly also. Karpoori Thakur became Chief Minister after winning a contest from the then Janata Party President Satyendra Narayan Sinha.
Bihar movement's campaign warned Indians that the elections might be their last chance to choose between "democracy and dictatorship."
This resulted in two things:
The identity of Bihar (from the word Vihar meaning monasteries) representing a glorious past was lost. Its voice often used to get lost in the din of the regional clamour of other states, specially the linguistic states like Uttar Pradesh, Madhya Pradesh etc.
Bihar gained an anti-establishment image. The establishment-oriented press often projected the state as indiscipline and anarchy.[citation needed]
Idealism did assert itself in the politics from time to time, viz, 1977 when a wave defeated the entrenched Congress Party and then again in 1989 when Janata Dal came to power on an anti corruption wave. In between, the socialist movement tried to break the stranglehold of the status quoits under the leadership of Mahamaya Prasad Sinha and Karpoori Thakur. This could not flourish, partly due to the impractical idealism of these leaders and partly due to the machinations of the central leaders of the Congress Party who felt threatened by a large politically aware state. Communist Party in Bihar was formed in 1939. In the 1960s, 1970s and 1980s the Communist movement in Bihar was a formidable force and represented the most enlightened section in Bihar. The movement was led by veteran communist leaders like Jagannath Sarkar, Sunil Mukherjee, Rahul Sankrityayan, Pandit Karyanand Sharma, Indradeep Sinha, and Chandrashekhar Singh. It was under the leadership of Sarkar that the Communist party fought "total revolution" led by Jayprakash Narayan, as the movement in its core was anti-democratic and challenged the very fabric of Indian democracy.[citation needed]
Since the regional identity was slowly getting sidelined, its place was taken up by caste-based politics, power initially being in the hands of the Brahmins, Bhumihars and Rajputs.