04/09/2026
ठेले वालों पर अतिक्रमण की कार्रवाई, निगम की संपत्ति खाली कराने में क्यों सुस्ती?
नवजीवन बिहार के वार्ड-32 का सामुदायिक भवन बना सवाल, 2024 के बाद 2026 में भी 24 घंटे का अल्टीमेटम बेअसर
सिंगरौली। नगर निगम सिंगरौली की अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। एक ओर शहर में छोटे-मोटे ठेले और दुकानदारों पर अतिक्रमण के नाम पर कार्रवाई की जा रही है, वहीं दूसरी ओर नगर निगम के स्वामित्व वाले नवजीवन बिहार वार्ड क्रमांक 32 के सामुदायिक भवन को खाली कराने के लिए जारी आदेश और अल्टीमेटम भी बेअसर नजर आ रहा है।
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि नगर निगम ने इस भवन को वापस लेने के लिए पहले वर्ष 2024 में तीन दिन का समय दिया था। इसके बावजूद भवन निगम के अधिपत्य में नहीं आया। इसके बाद 4 अगस्त 2026 को नगर निगम आयुक्त ने फिर आदेश जारी कर 24 घंटे के भीतर सामुदायिक भवन का अधिपत्य निगम को सौंपने का निर्देश दिया। आदेश में यह भी कहा गया कि अधिपत्य वापस प्राप्त कर पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाए।
लेकिन 24 घंटे की समय-सीमा बीत जाने के बाद भी यदि भवन खाली नहीं कराया गया है, तो नगर निगम की कार्रवाई और उसके आदेशों के पालन को लेकर सवाल उठना लाजिमी है।
छोटे दुकानदारों पर सख्ती, यहां आदेश क्यों बेअसर?
शहर में सड़क किनारे ठेले लगाने वाले, छोटे दुकानदार और फुटपाथ पर कारोबार करने वालों के खिलाफ नगर निगम की अतिक्रमण विरोधी मुहिम अक्सर दिखाई देती है। कार्रवाई के दौरान ठेले हटाए जाते हैं और सामान जब्त किए जाने की कार्रवाई भी होती है।
ऐसे में सवाल यह है कि जब नगर निगम छोटे-मोटे अतिक्रमण हटाने के लिए तत्काल कार्रवाई कर सकता है, तो अपनी ही संपत्ति को खाली कराने के लिए जारी आदेश पर अमल कराने में इतनी देरी क्यों?
स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्रवाई में समानता होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति या संस्था नगर निगम की संपत्ति पर निर्धारित अनुमति अथवा अवधि समाप्त होने के बाद भी काबिज है, तो उसके खिलाफ भी उसी तरह प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए, जैसी कार्रवाई आम छोटे दुकानदारों के खिलाफ की जाती है।
2024 से चल रही है कवायद
नगर निगम के उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि 30 अगस्त 2024 को तत्कालीन आदेश में समिति को तीन दिवस के भीतर सामुदायिक भवन का अधिपत्य निगम को सौंपने के निर्देश दिए गए थे। उस आदेश के अनुसार समिति को भवन का संचालन 10 फरवरी 2022 से 10 जनवरी 2023 तक दिया गया था।
इसके बावजूद 2026 में नगर निगम को दोबारा नोटिस जारी कर 24 घंटे का अल्टीमेटम देना पड़ा। अब यदि उस अल्टीमेटम के बाद भी भवन खाली नहीं हुआ है तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर निगम के आदेशों का पालन कौन कराएगा?
क्या अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग नियम?
मामले ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई छोटे और कमजोर लोगों तक ही सीमित है?
एक तरफ रोजी-रोटी के लिए ठेला लगाने वाले छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई की जाती है, वहीं दूसरी तरफ नगर निगम की अपनी संपत्ति को खाली कराने के लिए जारी लिखित आदेश के बावजूद कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में आम जनता के बीच यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि नियमों का इस्तेमाल सबके लिए समान रूप से नहीं हो रहा।
अब देखना होगा कि नगर निगम प्रशासन 4 अगस्त 2026 के 24 घंटे वाले आदेश को वास्तव में लागू कर सामुदायिक भवन को अपने अधिपत्य में लेता है या यह आदेश भी वर्ष 2024 के आदेश की तरह केवल कागजों तक सीमित रह जाता है।