Braj Nandini Hare krishnaaaaaa

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Today's divine darshan of my Neelmadhavaaa Ji's ❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️🤍❣️be blessed forever u and your family ...
27/03/2026

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Braj Nandini Hare krishnaaaaaa Ame Odia Ama Jagannath

Kanya poojan On Ram Navami..Durga Navami Radhey radhey radhey radhey radhey Jay shree Ram Braj Nandini Hare krishnaaaaaa...
27/03/2026

Kanya poojan
On Ram Navami..Durga Navami

Radhey radhey radhey radhey radhey
Jay shree Ram
Braj Nandini Hare krishnaaaaaa fans

25/03/2026

Mahabhisheik of my Neelmadhavaaa Ji's

भूखी माता के लिए भोजन बन गए थे राजा विक्रमादित्य**************************************************माता का कोई भी रूप हो ...
23/03/2026

भूखी माता के लिए भोजन बन गए थे राजा विक्रमादित्य
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माता का कोई भी रूप हो या कोई भी स्वरूप हो, हमेशा माता के दर्शनों से भक्तों के कष्टों का हरण होता है। देवी के सभी पौराणिक मंदिरों से शास्त्रों की जनश्रुतियां जुड़ी हुई है, जिनमें देवी का महिमामंडन किया गया है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक देवी मंदिर उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे पर है, जिनको भूखी माता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
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शिप्रा के तट पर है माता का बसेरा
भूखी माता का मंदिर शास्त्रोक्त, स्वच्छ, निर्मल, सदानीरा शिप्रा नदी के किनारे पर दत्त अखाड़ा घाट के नजदीक स्थित है। माता के इस मंदिर की कहानी उज्जैन के परम प्रतापी राजा विक्रमादित्य से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि उज्जैन नगर में रोजाना एक नवयुवक को राजा घोषित किया जाता था और उसके बाद भूखी माता उस युवक का भोग लगाती थी या बलि लेती थी। एक समय महाराज विक्रमादित्य नगर में भ्रमण कर रहे थे तभी उन्होने एक वृद्धा को विलाप करते हुए देखा।

महाराज विक्रमादित्य ने वृद्धा से उसके रोने का कारण पूछा तो उसने भूखी माता की कहानी बताई और कहा कि 'आज राजा बनने की मेरे बेटे की बारी है और उसके बाद भूखी माता उसका भक्षण करेगी। 'तब महाराज विक्रमादित्य ने कहा कि 'मां आप विलाप न करें आज रात्रि को आपके बेटे की जगह पर मैं राजा बनूंगा और भूखी माता का आहार बनने के लिए मैं जाऊंगा।'

माता के लिए नगर को व्यंजनों से सजाया
विक्रमादित्य ने राजा बनते ही पूरे नगर को सुगंधित, स्वादिष्ट व्यंजनों से सजाने का आदेश दिया। राजाज्ञा का पालन करते हुए नगर को छप्पन भोग से सजाया गया और महाराज विक्रमादित्य भूखी माता की प्रतिक्षा करने लगे। भूखी माता ने जैसे ही नगर प्रवेश किया, स्वादिष्ट व्यंजनों को देखकर उन्होने जमकर भोजन किया। इस तरह जब भूखी माता महाराज विक्रमादित्य तक पहुंची तो उनकी भूख शांत हो गई उन्होने विक्रमादित्य को प्रजापालक चक्रवर्ती सम्राट होने का आशीर्वाद दिया। तब विक्रमादित्य ने उनके सम्मान में इस मंदिर का निर्माण करवाया।

माता से नदी पार स्थापना का लिया था वचन
दूसरी जनश्रुति यह भी है कि भूखी माता और उज्जैन में विराजित दूसरी माताएं नरबली का भोग लगाती थी। इस समस्या के समाधान के लिए महाराज विक्रमादित्य ने देवी को वचन में लेकर नदी के उस पार जहां इंसानी आबादी नहीं थी, वहां पर माता की स्थापना करवाई थी। इस जनश्रुति के अनुसार महाराज विक्रमादित्य ने एक बार सभी देवी शक्तियों को भोजन के लिए आमंत्रित किया। कई तरह के पकवान और मिष्ठान बनाकर विक्रमादित्य ने एक भोजशाला में सजाकर रखवा दिए और एक तखत पर मेवा-मिष्ठान्न का मानव पुतला बनाकर लेटा दिया और खुद तखत के ‍नीचे छिप गए।

रात्रि में सभी देवियां उनके उस भोजन से प्रसन्न और तृप्त हो गईं। देवियां भोजन के पश्चात आपस में बातें करने लगीं कि 'यह राजा ऐसे ही हमें आमंत्रित करता रहा तो अच्छा रहेगा।' जब सभी देवियां प्रस्थान करने लगी, तब एक देवी को जिज्ञासा हुई कि तखत पर कौन-सी चीज है जिसे छिपाकर रखा गया है?

विक्रमादित्य ने देवी को किया प्रसन्न-
अन्य देवियों ने कहा कि 'हम सभी तृप्त हो गई हैं इसलिए तखत पर क्या रखा है उससे हमको कोई मतलब नहीं है।' यह बोलकर एक देवी को छोड़कर बाकी सभी देवियां प्रस्थान कर गई, लेकिन एक देवी नहीं मानी और तखत पर रखे उस पुतले को तोड़कर खा लिया। खुश होकर देवी ने कहा कि ‘किसने रखा है इतना स्वादिष्ट भोजन?’ तब विक्रमादित्य तखत के नीचे से निकलकर सामने आ गए और उन्होंने कहा कि’ मैंने रखा है।‘

तब देवी ने कहा कि 'वत्स! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं, इसलिए तुम जो चाहे मांग सकते हो।' तब महाराज विक्रमादित्य ने कहा कि 'मां आप कृपा करके नदी के उस पार विराजमान हो और फिर कभी नगर में प्रवेश न करें।' देवी ने राजा से कहा कि 'राजन तुम्हारे वचन का पालन होगा।' चूंकी भरपेट भोजन के बाद भी देवी की भूख नहीं मिटी थी और उन्होने तखत पर रखा मेवे-मिष्ठान्न का पुतला खाया था, इसलिए सभी देवियों नें माता का नाम भूखीमाता रख दिया।

नगरपूजा में माता को लगता है मदिरा का भोग-
भूखी माता मंदिर में दो देवियां विराजमान है। माना जाता है कि दोनों बहने हैं। इनमें से एक को भूखी माता और दूसरी को धूमावती के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर को भुवनेश्वरी भूखी माता मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर में दो दीपस्तंभ हैं इन दीपस्तंभो को नवरात्रों में प्रज्वलित किया जाता है।

प्रतिवर्ष नवरात्र की अष्टमी तिथी को नगर पूजा के अवसर पर और बारह बरस में एक बार आयोजित होने वाले सिंहस्थ के अवसर पर माता को मदिरा का भोग लगाकर विशेष पूजा की जाती है। कहा यह भी जाता है कि सिंहस्थ के अवसर पर बारह सालों में एक बार भूखी माता को मात्र एक पल के लिए नदी पार कर शहर में आने की अनुमति है। सिंहस्थ के दौरान माता को बलि भी नहीं चढ़ाई जाती है इसलिए माता अपनी भूख तामसिक की जगह सात्विक आहार से शांत करती है।

 #गोवर्धन पर्वत की महिमा अपार है l१. गोवर्धन पर्वत को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप माना जाता है।२. द्वापर युग...
23/03/2026

#गोवर्धन पर्वत की महिमा अपार है l

१. गोवर्धन पर्वत को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप माना जाता है।
२. द्वापर युग में इंद्र का मान मर्दन करने के लिए कान्हा ने इसे अपनी कनिष्ठ उंगली पर उठाया था।
३. इस पर्वत की परिक्रमा करने से भक्तों के सभी पाप नष्ट होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
४. यह पावन पर्वत दिव्य लीलाओं का केंद्र है और ब्रजवासियों के लिए आस्था का सबसे बड़ा आधार है।

भगवान श्री गोवर्धन महाराज की जय!

Happy appearance day of my Neelmadhavaaa Ji's...Birthday vibesAnand a lot of Devotees happy a lot Hariiiiiiiiii bollllll...
23/03/2026

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Beautiful divine darshan of my Neelmadhavaaa Ji's Stay blessed forever u and your family jiBraj Nandini Hare krishnaaaaa...
19/03/2026

Beautiful divine darshan of my Neelmadhavaaa Ji's

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19/03/2026

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Braj Nandini Hare krishnaaaaaa
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18/03/2026

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Braj Nandini Hare krishnaaaaaa

रावण का कभी भी शव अग्नि दाह नहीं किया गया । इस बात को समझने के लिए आप को रावण के जन्म के बारे में जानना होगा ।वाल्मीकि र...
16/03/2026

रावण का कभी भी शव अग्नि दाह नहीं किया गया । इस बात को समझने के लिए आप को रावण के जन्म के बारे में जानना होगा ।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण पुलस्त्य मुनि का पोता था अर्थात् उनके पुत्र विश्वश्रवा का पुत्र था। विश्वश्रवा की वरवर्णिनी और कैकसी नामक दो पत्नियां थी। वरवर्णिनी के कुबेर को जन्म दिया था । कैकसी ने अशुभ समय में गर्भ धारण किया। क्यों कि कैकसी राक्षस नाग कुल से थी।

नाग कुल की पथा के अनुसार दाह संस्कार नहीं होता था । इस लिए श्री राम जी के द्वारा रावण के वध करने के बाद अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी विभीषण को थी लेकिन नागकुल के लोग रावण का शव अपने साथ ले गए।

उन का विश्वास था रावण अभी पूरी तरह से नहीं मरा है क्यों कि रावण अपने आप को अमर और उस के पास अमृत है । इस लिए उन को था कि किसी भी तरह रावण को जिन्दा किया जा सकता है। लेकिन उनके हर प्रयास असफल रहे और हारकर उन्होंने कई प्रकार के रसायनों का प्रयोग कर रावण के शव को ममी के रूप में रख दिया।

इस कहानी के अनुसार कुछ समय पहले ही श्रीलंका पुरातत्व विभाग ने दावा किया है उन को रेगला के घने जंगल में एक विशाल पर्वत मिला है जिसमें एक खतरनाक गुफा हैं। जिसे रावण के गुफा के नाम से जाना जाता है,क्योंकि रावण ने उसी गुफा में बर्षो तपस्या को थी।रेगला के उस गुफा में कोई नही जाता क्योंकि रावण के शव की रक्षा कई खूंखार जानवर और नागकुल के नाग करते है। रावण की ताबूत 18 फ़ीट लंबी और 5 फ़ीट चौड़ी है इतने सालों के बाद भी रावण की ताबूत आज भी रेगला के घने जंगल में सुरक्षित है। इस बात का दावा श्रीलंका की सरकार ने उसे कहानी के अनुसार किया है । अब तक ये कही भी ये नहीं साबित हुआ कि वो ममी रावण की ही है ।

ये सिर्फ दावा है अभी इस पर शोध चल रहा है इस लिए ये बोलना भी गलत होगा कि ये सत्य है या नहीं । इस घटना को हुए 9000 साल से भी अधिक हो गए है और कितने ही हमले और गुलामी में हम ने बहुत खो दिया है । इस लिए अब सिर्फ शोध पूरा होने के बाद ही हम किसी बात के निर्णय पर जाते है ।

15/03/2026

Jay jagannath jj

राजस्थान के श्री सांवलिया सेठ मंदिर  की प्रसिद्धि हम सभी जानते हैं। जो नहीं जानते वह इस बात से समझ लीजिये कि, जब वहां पर...
14/03/2026

राजस्थान के श्री सांवलिया सेठ मंदिर की प्रसिद्धि हम सभी जानते हैं। जो नहीं जानते वह इस बात से समझ लीजिये कि, जब वहां पर दानपेटी और चढ़ावे की गणना होती है तो उसे गिनने के लिए सैकड़ो लोग लगते हैं।

इस गणना को देखने लाखों श्रद्धालु आते हैं। और इस दौरान कुछ लोग स्वेच्छा से वॉलिंटियर्स भी बनते हैं।

मैंने स्वयं वहाँ पर दानपेटी और चढ़ावे को गिनते हुए देखा है। एक समय जब सिक्के बहुत आते थे तो उनके लिए प्रॉपर चालना ( छलनी ) होता था। अलग-अलग सिक्कों के लिए। नोटों को गिनने की मशीन अलग से लगती है, और सोना इकट्ठा करने का अलग से इंतजाम होता है।

मेरे दादाजी बताया करते थे कि पुराने समय मे जब डाकू भी कहीं लूट कर आते थे, तो सांवरिया सेठ को अपनी लूट में से एक हिस्सा चढ़ाते थे।

कई लोग कोर्ट में केस चलने पर साँवरिया सेठ को मन्नत कर जाते हैं, और अगर उनकी मन्नत पूरी हुई तो जमीन में से उनका हिस्सा चढ़ा कर जाते हैं।

कहा जाता है कि साँवरिया सेठ मन्दिर में साक्षात कान्हा जी विराजमान हैं।

हमारे इधर के कई व्यापारियों ने अपने व्यापार में सांवरिया सेठ को एक हिस्सेदार बनाया हुआ है! उनका बकायदा बहीखाते में नाम चढ़ता है, बैंक में अकॉउंट खुलता है...और हर साल कमाई में से एक हिस्सा सांवरिया सेठ को चढ़ाया जाता है।

मुझे जहाँ तक ज्ञात है सम्पूर्ण देश मे मात्र साँवरिया सेठ ही हैं जो व्यापार में हिस्सेदार भी हैं, और बैंक के नियमित ग्राहक भी!

इसलिए ही बाबा को सेठ कहा जाता है। सेठों के सेठ साँवरिया सेठ!

इस बार साँवरिया सेठ जी के भंडार से 36 करोड़ 57 लाख 87 हजार 642 रुपये, भेंटकक्ष और ऑनलाइन दान से 10 करोड़ 45 हजार 282 रुपये प्राप्त हुए।

इसके साथ ही भक्तों ने 2 किलो 967 ग्राम 480 मिलीग्राम सोना और 152 किलो 609 ग्राम चांदी भी भगवान के चरणों में अर्पित की।

यह मात्र करोड़ों रुपये का हिसाब नहीं है…यह लाखों श्रद्धालुओं की मेहनत, विश्वास और सनातन के प्रति आस्था का अर्पण है। कोई अपनी पहली कमाई चढ़ाता है, कोई मनौती पूरी होने पर धन्यवाद देता है! तो कोई बस श्रद्धा से कुछ न कुछ प्रभु के चरणों में रख देता है।

मन मे यह प्रश्न उठता है कि, जब यह सारा धन अंततः सरकारी खजाने में चला जाता है, तो क्या इसका उपयोग वास्तव में दूसरे मंदिरों के जीर्णोद्धार में, गौशालाओं, धर्मशालाओं, शिक्षा, सेवा कार्य और हिन्दू समाज के हित में होता है?

या फिर यह भी सरकारी तंत्र में कहीं गुम हो जाता है?

वैसे सभी धर्मों के धार्मिक संस्थानों की संपत्ति पर सरकार का हाथ नहीं होता, लेकिन विडंबना देखिए कि हिन्दू मंदिरों की आय पर ही सबसे पहले नजर जाती है।

चढ़ावे की सार्थकता तभी है, जब उस धन का उपयोग धर्म, संस्कृति और हिन्दू समाज के उत्थान में हो। क्योंकि यह सिर्फ धन नहीं…यह सनातन की आस्था का प्रसाद है।

आपको क्या लगता है, इस धन का सदुपयोग क्या होना चाहिये? और इस धन का क्या उपयोग हो यह किसे तय करना चाहिये?

जय श्री सांवलिया सेठ 🙏

चित्र: साभार
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