14/03/2026
राजस्थान के श्री सांवलिया सेठ मंदिर की प्रसिद्धि हम सभी जानते हैं। जो नहीं जानते वह इस बात से समझ लीजिये कि, जब वहां पर दानपेटी और चढ़ावे की गणना होती है तो उसे गिनने के लिए सैकड़ो लोग लगते हैं।
इस गणना को देखने लाखों श्रद्धालु आते हैं। और इस दौरान कुछ लोग स्वेच्छा से वॉलिंटियर्स भी बनते हैं।
मैंने स्वयं वहाँ पर दानपेटी और चढ़ावे को गिनते हुए देखा है। एक समय जब सिक्के बहुत आते थे तो उनके लिए प्रॉपर चालना ( छलनी ) होता था। अलग-अलग सिक्कों के लिए। नोटों को गिनने की मशीन अलग से लगती है, और सोना इकट्ठा करने का अलग से इंतजाम होता है।
मेरे दादाजी बताया करते थे कि पुराने समय मे जब डाकू भी कहीं लूट कर आते थे, तो सांवरिया सेठ को अपनी लूट में से एक हिस्सा चढ़ाते थे।
कई लोग कोर्ट में केस चलने पर साँवरिया सेठ को मन्नत कर जाते हैं, और अगर उनकी मन्नत पूरी हुई तो जमीन में से उनका हिस्सा चढ़ा कर जाते हैं।
कहा जाता है कि साँवरिया सेठ मन्दिर में साक्षात कान्हा जी विराजमान हैं।
हमारे इधर के कई व्यापारियों ने अपने व्यापार में सांवरिया सेठ को एक हिस्सेदार बनाया हुआ है! उनका बकायदा बहीखाते में नाम चढ़ता है, बैंक में अकॉउंट खुलता है...और हर साल कमाई में से एक हिस्सा सांवरिया सेठ को चढ़ाया जाता है।
मुझे जहाँ तक ज्ञात है सम्पूर्ण देश मे मात्र साँवरिया सेठ ही हैं जो व्यापार में हिस्सेदार भी हैं, और बैंक के नियमित ग्राहक भी!
इसलिए ही बाबा को सेठ कहा जाता है। सेठों के सेठ साँवरिया सेठ!
इस बार साँवरिया सेठ जी के भंडार से 36 करोड़ 57 लाख 87 हजार 642 रुपये, भेंटकक्ष और ऑनलाइन दान से 10 करोड़ 45 हजार 282 रुपये प्राप्त हुए।
इसके साथ ही भक्तों ने 2 किलो 967 ग्राम 480 मिलीग्राम सोना और 152 किलो 609 ग्राम चांदी भी भगवान के चरणों में अर्पित की।
यह मात्र करोड़ों रुपये का हिसाब नहीं है…यह लाखों श्रद्धालुओं की मेहनत, विश्वास और सनातन के प्रति आस्था का अर्पण है। कोई अपनी पहली कमाई चढ़ाता है, कोई मनौती पूरी होने पर धन्यवाद देता है! तो कोई बस श्रद्धा से कुछ न कुछ प्रभु के चरणों में रख देता है।
मन मे यह प्रश्न उठता है कि, जब यह सारा धन अंततः सरकारी खजाने में चला जाता है, तो क्या इसका उपयोग वास्तव में दूसरे मंदिरों के जीर्णोद्धार में, गौशालाओं, धर्मशालाओं, शिक्षा, सेवा कार्य और हिन्दू समाज के हित में होता है?
या फिर यह भी सरकारी तंत्र में कहीं गुम हो जाता है?
वैसे सभी धर्मों के धार्मिक संस्थानों की संपत्ति पर सरकार का हाथ नहीं होता, लेकिन विडंबना देखिए कि हिन्दू मंदिरों की आय पर ही सबसे पहले नजर जाती है।
चढ़ावे की सार्थकता तभी है, जब उस धन का उपयोग धर्म, संस्कृति और हिन्दू समाज के उत्थान में हो। क्योंकि यह सिर्फ धन नहीं…यह सनातन की आस्था का प्रसाद है।
आपको क्या लगता है, इस धन का सदुपयोग क्या होना चाहिये? और इस धन का क्या उपयोग हो यह किसे तय करना चाहिये?
जय श्री सांवलिया सेठ 🙏
चित्र: साभार
Braj Nandini Hare krishnaaaaaa