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05/03/2022

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क्या परमेश्वर वास्तव में है? मैं निश्चित रूप से कैसे जान सकता हूँ कि परमेश्वर वास्तविक है?हम जानते हैं कि परमेश्वर वास्त...
05/03/2022

क्या परमेश्वर वास्तव में है? मैं निश्चित रूप से कैसे जान सकता हूँ कि परमेश्वर वास्तविक है?
हम जानते हैं कि परमेश्वर वास्तविक है क्योंकि उसने अपने आपको हम पर तीन तरीकों से प्रकट किया है: सृष्टि में, अपने वचन में, और अपने पुत्र यीशु मसीह में।

परमेश्वर के अस्तित्व का सर्वाधिक मौलिक प्रमाण साधारण रूप से वह है जो उसने बनाया है। "क्योंकि उसके अनदेखे गुण - अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य, और परमेश्वरत्व - जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं, यहाँ तक कि वे निरूत्तर हैं" (रोमियों 1:20)। "आकाश ईश्वर की महिमा का वर्णन कर रहा है; और आकाशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट कर रहा है" (भजन संहिता 19:1)।

यदि आपको मैदान के बीच में पड़ी हुई एक कलाई घड़ी मिल जाये, तो आप यह नहीं मान लेंगे कि वह सहसा ही "प्रकट" हो गई, या वह हमेशा से वहीं अस्तित्व में थी। घड़ी के ढाँचे पर आधारित होकर, आप मान लेंगे कि इसका एक डिजाइनर या खाकाकार था। परन्तु इससे कहीं अधिक सर्वोत्तम खाका और कार्यशुद्धता हमारे आसपास के संसार में पाई जाती है। हमारे समय का माप कलाई पर बंधी घड़ी पर आधारित नहीं है, बल्कि ईश्वर के हाथों में है - पृथ्वी का निरन्तर गति करना (और सीज़ियम के 133 अणु पर - रेडियोधर्मी गुणों का होना)। ब्रह्माण्ड महान् ढाँचे को प्रदर्शित करता, और यह बात इसके महान् खाकाकार के होने को सिद्ध करती है।

यदि आपको कूट भाषा का कोई संदेश मिलता है, तो आप इसके संकेतों को तोड़कर पढ़ने का प्रयास करेंगे। आपका अनुमान यही होगा कि सन्देश को भेजने वाला कोई बुद्धिमान व्यक्ति है; ऐसा जन जिसने इस कूट संकेत की रचना की है। डी एन ए अर्थात् अनुवंशीयकीय 'कूट संकेत' कितने जटिल होते हैं जिन्हें हम अपने शरीर की प्रत्येक कोशिका में धारण किए रहते हैं? क्या डी एन ए की जटिलता और उद्देश्य कूट संकेत के बुद्धिमान लेखक होने की दलील नहीं देते?

परमेश्वर ने न केवल एक जटिल और अन्त में आपस में तालमेल आधारित भौतिक संसार बनाया, उसने प्रत्येक मनुष्य के हृदय में अनादि-अनन्त काल के ज्ञान को भी उत्पन्न किया है (सभोपदेशक 3:1)। मानव-जाति में एक जन्मजात बोध है कि जीवन में आँख द्वारा देखे जाने से भी कहीं अधिक कुछ है, यह कि इन सांसारिक नित्यकर्मों से भी ऊँचा कोई अस्तित्व है। अनादि- अनन्त काल का हमारा ज्ञान स्वयं को कम से कम दो तरह से प्रकट करता है : व्यवस्था को-बनाना तथा आराधना।

प्रत्येक सभ्यता ने अब तक के इतिहास के दौरान कुछ नैतिक व्यवस्थाओं को मूल्य दिया है, जो कि आश्चर्यजनक रूप से एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में एक जैसे ही रहे हैं। उदाहरण के लिए, प्रेम के आदर्श को विश्वव्यापी रूप से सम्मान दिया जाता है, जबकि झूठ बोलने के कार्य की विश्वव्यापी रूप से निन्दा की जाती है। यह सामान्य नैतिकता – सही और गलत की यह सार्वभौमिक समझ - एक सर्वोच्च नैतिक प्राणी के अस्तित्व की ओर संकेत करती है जिसने हमें इस तरह की समझ दी है।

इसी तरह से, पूरे संसार के लोगों ने, वे चाहे किसी भी संस्कृति के क्यों न हों, आराधना की एक पद्धति को विकसित किया है। आराधना का उद्देश्य भिन्न हो सकता है, परन्तु मानव होने के कारण एक "ऊच्च सामर्थ्य" का अनुभव अस्वीकार नहीं किए जाने का एक हिस्सा है। आराधना का हमारा यह स्वभाव इस तथ्य के साथ मेल खाता है कि परमेश्वर ने हमें "अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया" (उत्पत्ति 1:27)।

परमेश्वर ने हम पर अपने आप को अपने वचन के द्वारा भी प्रकट किया है। धर्मशास्त्र में आरम्भ से अन्त तक, परमेश्वर के अस्तित्व को एक स्वयं-प्रमाणित तथ्य के रूप में निपटारा किया गया है (उत्पत्ति 1:1; निर्गमन 3:14)। जब एक व्यक्ति अपनी आत्मकथा लिखता है, तो वह अपनी पुस्तक में अपने स्वयं के अस्तित्व को प्रमाणित करने की कोशिश में समय व्यर्थ नहीं करता है। इसी तरह, बाइबल के जीवन-परिवर्तन करने के स्वभाव, इसकी निष्ठा और इसके आश्चर्यकर्म जो इसके लेखों के साथ ही आते हैं, एक नज़दीकी दृष्टि को पाने के अधिकार के लिए पर्यात होनी चाहिए।

तीसरा तरीका जिसमें परमेश्वर ने स्वयं को प्रकट किया है वह अपने पुत्र, यीशु मसीह के द्वारा है (यूहन्ना 14:6-11)। "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था और वचन परमेश्वर था। वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच में डेरा किया। हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा, जो पिता की ओर से अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर आया" (यूहन्ना 1:1; 14; कुलुस्सियों 2:9 को भी देखें)।

यीशु के अद्भुत जीवन में, उसने सम्पूर्ण पुराने नियम की व्यवस्था को पूर्णता से माना और मसीह के सम्बन्ध में की गई भविष्यवाणियों को पूरा किया (मत्ती 5:17)। अपने संदेश की प्रामाणिकता सिद्ध करने और अपने प्रभु होने की गवाही के लिए उसने दया के अनगिनित कार्य और सार्वजनिक रूप से आश्चर्यकर्मों को किया (यूहन्ना 21:24-25)। फिर, अपने क्रूस पर चढ़ाये जाने के तीन दिन बाद, वह मुर्दों में से जी उठा, एक ऐसी सच्चाई जिसकी पुष्टि सैकड़ों चश्मदीद गवाहों ने की (1कुरिन्थियों 15:6)। ऐतिहासिक अभिलेख इस "प्रमाण" से भरा पड़ा है कि यीशु कौन है। जैसा कि प्रेरित पौलुस ने कहा था, "यह घटना तो कोने में नहीं हुई" (प्रेरितों के काम 26:26)।

हम यह जानते है कि सन्देही हमेशा ही रहेंगे जिनके पास परमेश्वर के विषय में अपने स्वयं के अनेकों विचार होंगे और वे प्रमाण को उसी के अनुसार पढ़ेंगे। और कुछ ऐसे भी होंगे जिनको किसी भी तरह के प्रमाण संतुष्ट नहीं कर सकते (भजन संहिता 14:1)। यह सब कुछ केवल विश्वास के द्वारा ही आता है (इब्रानियों 11:6)।

परमेश्वर के गुण कौन से हैं? परमेश्वर कैसा है?बाइबल, जो परमेश्वर का वचन है, हमें बताती है कि परमेश्वर कैसा है और वह कैसा ...
05/03/2022

परमेश्वर के गुण कौन से हैं? परमेश्वर कैसा है?
बाइबल, जो परमेश्वर का वचन है, हमें बताती है कि परमेश्वर कैसा है और वह कैसा नहीं है। बाइबल के अधिकार के बिना, परमेश्वर के गुणों के विषय में किसी भी तरह की व्याख्या, विशेषकर परमेश्वर को समझने में मात्र एक विचार से ज्यादा उत्तम नहीं होगी, जो कि स्वयं में त्रुटिपूर्ण होती है (अय्यूब 42:7)। परमेश्वर कैसा है को समझने के लिए प्रयास के लिए यह कहना महत्वपूर्ण है कि यह एक बहुत ही निम्न स्तर का वाक्य है! इस बात की असफलता हमें दूसरे झूठे देवताओं की गढ़ने, उनका अनुसरण करने और उनकी उपासना करने का कारण बनेगी जो कि परमेश्वर की इच्छा के विपरीत है (निर्गमन 20:3-5)।

परमेश्वर ने अपने बारे में प्रकट करने के लिए जो कुछ चुना है केवल उसे ही जाना जा सकता है। परमेश्वर की विशेषताओं या गुणों में से एक "ज्योति" है जिसका अर्थ यह है कि वह अपने बारे में जानकारी को स्वयं प्रकट करता है (यशायाह 60:19; याकूब 1:17)। सच्चाई तो यह है कि परमेश्वर ने स्वयं ही अपने बारे में जानकारी दी है जिसे अन्देखा नहीं करना चाहिए (इब्रानियों 4:1)। सृष्टि, बाइबल, और शब्द (यीशु मसीह) जो देहधारी हुआ इसे जानने में हमारी सहायता करेंगे कि परमेश्वर कैसा है।

परमेश्वर हमारा सृजनहार है और हम उसकी सृष्टि का एक हिस्सा हैं (उत्पत्ति 1:1; भजन संहिता 24:1) और हम उसके स्वरूप में रचे गए हैं, को समझने से हम आरम्भ करते हैं। मनुष्य को सृष्टि में सबके ऊपर रखा गया और उसे उनके ऊपर अधिकार दिया गया है (उत्पत्ति 1:26-28) । सृष्टि पतन के कारण शापित है परन्तु यह फिर भी उसके कार्यों की झलक को प्रस्तुत करती है (उत्पत्ति 3:17-18; रोमियों 1:19-20)। सृष्टि की विशालता, जटिलता, सुन्दरता तथा व्यवस्था पर विचार करते हुए हमें उसकी विस्मयकारिता का बोध होता है।

परमेश्वर के कुछ नामों को पढ़ना हमारी इस खोज में सहायक हो सकता है कि परमेश्वर कैसा है। यह निम्नलिखित हैं:

एलोहीम - एकमात्र शक्तिशाली, ईश्वरीय (उत्पत्ति 1:1)
अदोनाई - प्रभु, मालिक-से-सेवक के सम्बन्धों की ओर संकेत करते हुए (निर्गमन 4:10; 13)
एल एल्योन - परम प्रधान, सबसे शक्तिशाली (उत्पत्ति 14:20)
एल रोई - सर्वदर्शी ईश्वर (उत्पत्ति 16:13)
एल शद्दाई - सर्वशक्तिमान ईश्वर (उत्पत्ति 17:1)
एल ओलाम – सनातनकाल का परमेश्वर (यशायाह 40:28)
यहोवा - प्रभु "मैं हूँ," जिसका अर्थ है अनन्तकालीन स्वयं-अस्तित्व में बने रहने वाला (निर्गमन 3:13,14)।

परमेश्वर सनातनकाल से है, जिसका अर्थ है कि उसका कोई आरम्भ नहीं था और उसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होगा। वह अमर है, वह असीम है (व्यवस्थाविवरण 33:27; भजन संहिता 90:2; 1तीमुथियुस 1:17)। परमेश्वर अपरिवर्तनीय है, अर्थात वह कभी बदलता नहीं; इसका मतलब है कि परमेश्वर पूर्ण रूप से विश्वसनीय और भरोसेमंद है (मलाकी 3:6; गिनती 23:19; भजन संहिता 102:26-27)। परमेश्वर तुलना रहित है; अर्थात् कार्यों तथा अस्तित्व में उसके जैसा और कोई भी नहीं है; वह अतुल्य तथा सिद्ध है (2शमूएल 7:22; भजन संहिता 86:8; यशायाह 40:25; मत्ती 5:48)। परमेश्वर अबोधगम्य है, अगम, अथाह, और उसे पूरी तरह समझना अत्यन्त कठिन है (यशायाह 40:28; भजन संहिता 145:3; रोमियों 11:33, 34)।

परमेश्वर न्यायी है; वह मनुष्य के विषय में किसी तरह का कोई पक्षपात नहीं करता (व्यवस्थाविवरण 32:4; भजन संहिता 18:30)। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है; उसके पास सारी-सामर्थ्य है और वह ऐसा कुछ भी कर सकता है जिससे उसे प्रसन्नता होती है, परन्तु उसके कार्य सदैव उसके चरित्र के अनुरूप होते हैं (प्रकाशित वाक्य 19:6; यिर्मयाह 32:17, 27)। परमेश्वर सर्वव्यापी है, अर्थात् वह हर समय, हर जगह उपस्थित रहता है; परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर सब कुछ है (भजन संहिता 139:7-13; यिर्मयाह 23:23)। परमेश्वर सर्वज्ञानी है, अर्थात् उसे भूतकाल, वर्तमान तथा भविष्य का ज्ञान है, जिसमें किसी भी दिए हुए समय में हम क्या सोच रहे हैं, भी सम्मिलित है। क्योंकि वह सब कुछ जानता है, उसका न्याय सदैव निष्पक्ष ही रहेगा (भजन संहिता 139:1-5; नीतिवचन 5:21)।

परमेश्वर एक है; इसका केवल यह ही मतलब नहीं है कि कोई दूसरा नहीं है, परन्तु यह भी है कि वही एक है जो हमारे हृदयों की गहरी इच्छाओं तथा लालसाओं को पूरा करने के योग्य है। वही है जो हमारी आराधना और भक्ति को प्राप्त करने के योग्य है (व्यवस्थाविवरण 6:4)। परमेश्वर धर्मी है, अर्थात् परमेश्वर कभी भी गलत कार्यों को अन्देखा नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर की धार्मिकता और न्याय के कारण ही हमारे पापों की क्षमा के लिए, यीशु को परमेश्वर के न्याय का अनुभव करना पड़ा जब हमारे पाप उसके ऊपर रख दिए गए थे (निर्गमन 9:27; मत्ती 27:45-46; रोमियो 3:21-26).

परमेश्वर सम्प्रभु है, अर्थात् वह सर्वोच्च है। उसकी सारी सृष्टि मिलकर भी उसके उद्देश्यों को विफल नहीं कर सकती (भजन संहिता 93:1; 95:3; यिर्मयाह 23:20)। परमेश्वर आत्मा है, अर्थात् वह अदृश्य है (यूहन्ना 1:18; 4:24)। परमेश्वर त्रिएक है। वह एक में तीन, साररूप में समान, सामर्थ्य और महिमा में बराबर है। परमेश्वर सत्य है, अर्थात् वह सच्चरित्र बना ही रहेगा और झूठ नहीं बोल सकता (भजन संहिता 117:2; 1शमूएल 15:29)।

परमेश्वर पवित्र है, वह सभी तरह की नैतिक अपवित्रता से अलग और उनका विरोधी है। परमेश्वर सारी बुराईयों को देखता है और वह उसे क्रोधित करती है। परमेश्वर को भस्म करने वाली आग के रूप में उल्लेख किया गया है (यशायाह 6:3; हबक्कूक 1:13; निर्गमन 3:2; 4:5; इब्रानियों 12:29)। परमेश्वर अनुग्रहकारी है, और उसके अनुग्रह में उसकी अच्छाई, भलाई, दयालुता और प्रेम सम्मिलित हैं। यदि यह परमेश्वर का अनुग्रह न होता तो ऐसा प्रतीत होता कि उसकी पवित्रता हमें उसकी उपस्थिति से अलग कर देगी। धन्यवाद सहित, ऐसा नहीं है, क्योंकि वह हममें से हर एक को व्यक्तिगत रूप से जानने की इच्छा रखता है (निर्गमन 34:6; भजन संहिता 31:19; 1पतरस 1:3; यूहन्ना 3:16; यूहन्ना 17:3)।

क्योंकि परमेश्वर अनन्त प्राणी है, कोई भी मनुष्य परमेश्वर-की इस व्याख्या के प्रश्न का पूरी तरह से उत्तर नहीं दे सकता है, परन्तु परमेश्वर के वचन के द्वारा, हम परमेश्वर कौन है और कैसा है के बारे में बहुत कुछ समझ सकते हैं। मेरी प्रार्थना यह है कि हम सभी उसकी खोज अपने पूरे हृदय से करते रहें (यिर्मयाह 29:13)।

क्या परमेश्वर का अस्तित्व है? क्या परमेश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण है?परमेश्वर का अस्तित्व प्रमाणित या अस्वीकृत नहीं ...
05/03/2022

क्या परमेश्वर का अस्तित्व है? क्या परमेश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण है?
परमेश्वर का अस्तित्व प्रमाणित या अस्वीकृत नहीं किया जा सकता है। बाइबल भी यह कहती है कि हमें विश्वास के द्वारा इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिये कि परमेश्वर का अस्तित्व है, "और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आने वाले को विश्वास करना चाहिये, कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है" (इब्रानियों 11:6)। यदि परमेश्वर की ऐसी इच्छा थी, तो वह बस यूँही प्रकट हो जाता और सारे संसार को प्रमाणित कर देता कि उसका अस्तित्व है। परन्तु यदि वह ऐसा करता, तो फिर विश्वास की कोई आवश्यकता न रहती। "यीशु ने उस से कहा, 'तू ने मुझे देखा है, इसलिए विश्वास किया है; धन्य हैं वे जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया'" (यूहन्ना 20:29)।

इसका यह अर्थ नहीं है कि, परमेश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण ही नहीं है । बाइबल घोषणा करती है कि, "आकाश ईश्वर की महिमा का वर्णन कर रहा है; और आकाशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट कर रहा है। दिन से दिन बातें करता है, और रात को रात ज्ञान सिखाती है। न तो कोई बोली है और न कोई भाषा जहाँ उसका शब्द सुनाई नहीं देता है। उसका स्वर सारी पृथ्वी पर गूँज गया है, और उसके वचन जगत की छोर तक पहुँच गए हैं" (भजन संहिता 19:1-4)। तारों की ओर देखकर, इस ब्रह्माण्ड की विशालता को समझते हुए, प्रकृति के आश्चर्यों पर ध्यान देते हुए, सूर्यास्त की सुन्दरता को देखते हुए - यह सारी वस्तुएँ एक सृष्टिकर्ता परमेश्वर की ओर संकेत करती हैं। यदि यह काफी नहीं है, तो हमारे स्वयं के हृदयों में भी परमेश्वर के लिए एक प्रमाण है। सभोपदेशक 3:11 हमें कहता है कि, "… उसने मनुष्यों के मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है।" हमारे अपने अन्दर की गहराई में ऐसी कोई पहचान है कि इस जीवन से परे भी कुछ है और इस संसार से परे भी कोई है। हम इस ज्ञान को बौद्धिक रूप से झुठला सकते हैं, परन्तु हम में और हमारे चारों ओर परमेश्वर की उपस्थिति फिर भी स्पष्ट रूप से बनी हुई है। इन सबके बाद भी, बाइबल हमें चेतावनी देती है कि कुछ लोग फिर भी परमेश्वर के अस्तित्व के होने को अस्वीकार करेंगे, "मूर्ख ने अपने मन में कहा है, 'कि कोई परमेश्वर है ही नहीं'" (भजन संहिता 14:1)। क्योंकि अब तक के इतिहास में, सभी संस्कृतियों में, सभी सभ्यताओं में, सभी महाद्वीपों में अधिकांश लोगों का बहुमत किसी प्रकार से परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, तो इस विश्वास का कारण कुछ (या कोई) तो होगा।

परमेश्वर के अस्तित्व के लिए बाइबल आधारित दलीलों के अतिरिक्त, यहाँ पर तार्किक दलील भी है। पहली, दलील तत्वमीमांसात्मक है। तत्वविज्ञानी दलील का सर्वाधिक चर्चित रूप आधारभूत रूप से इस विचारधारा का उपयोग करती है कि परमेश्वर को ही परमेश्वर के अस्तित्व का प्रमाण देना चाहिए। वह परमेश्वर की इस परिभाषा से आरम्भ होता है कि वह, "इतना बड़ा है कि उससे बड़े की कल्पना ही नहीं की जा सकती है।"

फिर यह बहस उठ खड़ी होती है कि अस्तित्व में होना ही अस्तित्व में न होने से अधिक बड़ा है, और इसलिए सबसे बड़े कल्पनीय प्राणी को अस्तित्व में होना चाहिए। यदि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है, तो परमेश्वर सबसे बड़ा कल्पनीय प्राणी नहीं हो सकता है और यह बात परमेश्वर की परिभाषा का ही खण्डन कर देगी।

दूसरी दलील सोद्देश्यवादी है। सोद्देश्यवादी दलील यह घोषणा करती है कि क्योंकि ब्रह्माण्ड एक ऐसा आश्चर्यजनक खाके को प्रदर्शित करता है, इस लिए वहाँ पर कोई ईश्वरीय खाकाकार होना ही चाहिए। उदाहरण के रूप में, यदि धरती विशेषकर सूर्य से कुछ सौ मील पास या दूर होती, तो वह जीवन की उस प्रकार से सहायता करने योग्य नहीं होती जितनी वह आज के समय में करता है। यदि हमारे वातावरण में विद्यमान तत्व यहाँ तक कि मात्र कुछ ही प्रतिशत भिन्न होते, तो पृथ्वी पर लगभग सारे जीवित प्राणी ही मर जाएंगे। एक एकल प्रोटीन के अणु के संयोग से बनने की संभावनाएं 10243 में से 1 ही होती है (इसका अर्थ है कि 10 के बाद 243 शून्यों का आना)। एक एकल कोशिका लाखों अणुओं से मिल कर बनी होती है।

परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में जो तीसरी तार्किक दलील है वह ब्रह्माण्ड सम्बन्धित दलील है। हर परिणाम के पीछे कोई एक कारण होना चाहिए। यह ब्रह्माण्ड और इसमें की हर वस्तु एक परिणाम है। कोई न कोई ऐसी वस्तु होनी ही चाहिए जिसके कारण हर वस्तु अस्तित्व में आई। आखिरकार, कोई वस्तु "कारण-रहित" भी होनी चाहिए ताकि अन्य सब वस्तुओं के अस्तित्व में आने का कारण बने। वह "कारण-रहित" वस्तु ही परमेश्वर है ।

चौथी दलील नैतिक दलील के रूप से जानी जाती है। इतिहास में अब तक प्रत्येक संस्कृति के पास किसी न किसी प्रकार की व्यवस्था होती आई है। प्रत्येक के पास सही और गलत का बोध है। हत्या, झूठ, चोरी और अनैतिकता को लगभग विश्वव्यापी रूप में अस्वीकार किया जाता है। सही और गलत का बोध यदि पवित्र परमेश्वर के पास से नहीं तो फिर कहाँ से आया?

इन सबके बाद भी, बाइबल हमें बतलाती है कि लोग परमेश्वर के स्पष्ट तथा अस्वीकार न किए जाने वाले ज्ञान को अस्वीकार कर देंगे और इसके बावजूद एक झूठ पर विश्वास करेंगे। रोमियों 1:25 घोषणा करती है कि, "उन्होंने परमेश्वर की सच्चाई को बदलकर झूठ बना डाला, और सृष्टि की उपासना और सेवा की, न कि उस सृजनहार की - जो सदा धन्य है। आमीन।" बाइबल यह भी घोषणा करती है कि परमेश्वर पर विश्वास न करने के लिए लोगों के पास किसी तरह का कोई बहाना नहीं है: "क्योंकि उसके अनदेखे गुण - अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य, और परमेश्वरत्व - जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं, यहाँ तक कि वे निरूत्तर हैं" (रोमियों 1:20)।

लोग परमेश्वर के अस्तित्व के दावे को इसलिए अस्वीकार कर देते हैं क्योंकि उसमें "वैज्ञानिकता नहीं" है या "क्योंकि इसका कोई प्रमाण नहीं है।" सच्चा कारण यह है कि एक बार लोग स्वीकार कर लेते हैं कि परमेश्वर है, तो उन्हें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि वह परमेश्वर के प्रति ज़िम्मेदार हैं और उन्हें परमेश्वर से क्षमा की आवश्यकता है (रोमियों 3:13; 6:23)। यदि परमेश्वर का अस्तित्व है, तो फिर हम उसके प्रति अपने कार्यों के प्रति जवाबदेह हैं। अगर परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है, तो फिर हम जो चाहे वह इस बात की परवाह न करते हुए कर सकते हैं कि परमेश्वर हमारा न्याय करेगा। इस लिए ही उन लोगों में से बहुत से जो परमेश्वर के अस्तित्व का इन्कार कर देते हैं प्राकृतिक विकासवाद के सिद्धान्त में शक्ति के साथ विश्वास करते हुए चिपके रहते हैं – यह उन्हें एक सृष्टिकर्ता परमेश्वर में विश्वास करने के बदले में एक विकल्प देता है। परमेश्वर है और आखिरकार सब जानते हैं कि परमेश्वर है। पूर्ण तथ्य यह है कि कुछ लोग उसके अस्तित्व को असिद्ध करने का इतनी उदण्डतापूर्वक प्रयास करते हैं कि यह स्वयं में उसके अस्तित्व के होने के प्रति एक दलील बन जाता है।

हम कैसे जानते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है? मसीही विश्वासी होने के नाते, हम जानते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है क्योंकि हम प्रतिदिन उससे बातें करते हैं। हम उसे ऊँची आवाज में हमसे बोलते हुए नहीं सुनते हैं, परन्तु हमें उसकी उपस्थिति का बोध होता है, हम उसकी अगुवाई महसूस करते हैं, हम उसके प्रेम को जानते हैं, हम उसके अनुग्रह के अभिलाषी होते हैं। हमारे जीवनों में ऐसी घटनायें घटित हो चुकी हैं जिनकी व्याख्या परमेश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं दे सकता है। परमेश्वर ने हमें बहुत ही अधिक आश्चर्यजनक रूप से बचाया है और हमारे जीवन को ऐसे परिवर्तित किया है कि हम उसके अस्तित्व को पहचानने और उसकी स्तुति करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते हैं। इनमें से कोई भी दलील अपने आप में किसी को भी प्रेरित नहीं कर सकती जो इस बात को पहचानने से इन्कार करते हैं जो कि पहली से इतनी स्पष्ट हैं। अन्त में, परमेश्वर का अस्तित्व विश्वास के द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिये (इब्रानियों 11:6)। परमेश्वर पर विश्वास अंधेरे में अंधी उड़ान नहीं है; यह एक अच्छी-तरह से रोशन कमरे में सुरक्षित कदम है जहाँ पहले से ही अधिकांश लोगों का बहुमत खड़ा हुआ है।

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