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मुक्ति और मोक्ष-मुक्ति में तो अहं भाव शेष रह जाता है यह द्वैत की स्थिति है।द्वैत का अर्थ है-अहंकार से वह स्वयं को ईश्वर ...
22/07/2014

मुक्ति और मोक्ष-
मुक्ति में तो अहं भाव शेष रह जाता है यह द्वैत की स्थिति है।द्वैत का अर्थ है-
अहंकार से वह स्वयं को ईश्वर से भिन्न समझता है। वह जीव -चेतना अपने को ईश्वर
से भिन्न समझकर केवल उसकी समीपता का अनुभव करता है। लेकिन अहं भाव के नष्ट
होने से अर्थात अद्वैत की स्थिति में वह उस परम चैतन्य ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है।
और इसी को मोक्ष कहते हैं।।

भगवान श्रीकृष्ण जी ने कहा है :-वृन्दावन मेरा निज धाम है।इस वृन्दावन में जो समस्त पशु, पक्षी, मृग,कीट, मानव एवं देवता गण ...
22/07/2014

भगवान श्रीकृष्ण जी ने कहा है :-वृन्दावन मेरा निज धाम है।

इस वृन्दावन में जो समस्त पशु, पक्षी, मृग,
कीट, मानव एवं देवता गण वास करते हैं वे मेरे ही अधिष्ठान में वास करते हैं और देहावसान के बाद सब मेरे धाम को प्राप्त होते हैं।

वृन्दावन के वृक्ष साक्षात कल्पतरु हैं यहाँ की भूमि दर्पण के समान एवं मन्दिर, गौशाला स्थानों की भूमि तो चिन्तामणि स्वरूप, सर्व अभिलाषाओं की पूर्ति करने में समर्थ है।

वृन्दावन के वृक्ष को मरहम न जाने कोय, यहाँ डाल डाल और पात पात श्री राधे राधे होय।

वृन्दावन की छवि प्रतिक्षण नवीन है। आज भी चारों ओर आराध्य की आराधना और इष्ट की उपासना के स्वर हर क्षण सुनाई देते हैं।

कोई भी अनुभव कर सकता है कि वृन्दावन की सीमा में प्रवेश करते ही एक अदृश्य भाव, एक अदृश्य शक्ति हृदय स्थल के अन्दर प्रवेश करती है और वृन्दावन की परिधि छोड़ते ही यह दूर हो जाती है।

अष्टछाप कवि सूरदास जी ने वृन्दावन रज की महिमा के वशीभूत होकर गाया है:-

हम ना भई वृन्दावन रेणु, तिन चरनन डोलत नंद नन्दन नित प्रति चरावत धेनु।

हम ते धन्य परम ये द्रुम वन बाल बच्छ अरु धेनु।
सूर सकल खेलत हँस बोलत संग मध्य पीवत धेनु॥

वृन्दावन धाम कौ वास भलौ, जहाँ पास बहै यमुना पटरानी।
जो जन न्हाय के ध्यान करै, बैकुण्ठ मिले तिनको रजधानी॥

धन वृन्दावन धाम है, धन वृन्दावन नाम।
धन वृन्दावन रसिक जो सुमिरै स्यामा स्याम। —

JAY GAU MAATA---आज के समाज के लिए हमारे बड़े उत्तरदायी हैं, जिन्होने शिक्षा तो दिलाई पर धर्म का मार्ग नहीं दिखाया.सनातन ...
22/07/2014

JAY GAU MAATA---
आज के समाज के लिए हमारे बड़े उत्तरदायी हैं, जिन्होने शिक्षा तो दिलाई पर धर्म का मार्ग नहीं दिखाया.
सनातन समाज को क्षीण-रुग्ण बनाया गया है.
षड्यंत्र के तहत सिखाया गया,
"कर्म ही पूजा है"पर संध्या पूजन भुला दिया,
"अहिंसा परमो धर्म:" पर आगे का श्लोक नहीं बताया,
राम को बनवास तो दिखा दिया पर कितने राक्षसों का वध किया वो भूल गए.
कृष्ण नीति, चाणकया नीति को भुला दिया और सिखाया की निहत्तों पर वार नहीं करना, चाहे वो तुम्हारे कुटुम्ब की हत्या करके भागे हों.
वर्षों से इस समाज को इतना हीन-भावना से ग्रस्त कर दिया है कि अब यह समाज स्वयं ही नहीं उठना चाहता.
बहुत जागृति की आवश्यकता है, अब सोई चेतना को जगाने के लिए संजीवनी चाहिए. एक सतत प्रयास चाहिए.
यदि चाहते हो की आने वाली पीढ़ी जागी हुई हो तो इस पीढ़ी को जागना होगा.

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21/07/2014

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21/07/2014

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