Sanchar Advertising

Sanchar Advertising An advertising agency providing complete publicity solution throughout all the print,electronic,digital and outdoor media.

12/03/2021

Job Title -Marketing Executive

Qualification -Any gruduate

Job Profile -
A marketing person who can work with a software company (to promote & sell softwares in schools, colleges & other educational institutions)

Working Area-Aligarh & Bulandshahar Distts

20/01/2020

☀ प्रभु प्रेमी संघ 🌏
20 जनवरी, 2020 (सोमवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य "सदगुरुदेव" जी ने कहा - वीतराग महापुरुषों का पुण्य स्मरण सिद्धि-समाधान प्रदाता है। समन्वय के पुरोधा-राष्ट्र आराधक निवर्तमान शंकराचार्य पद्मभूषण परम गुरुदेव पूज्यपाद अनन्तश्रीविभूषित ब्रह्मलीन श्री स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज की दिव्य स्मृतियों को समर्पित "भारत का राष्ट्र दर्शन एवं अध्यात्म" विषयक व्याख्यानमाला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह आदरणीय डॉ. कृष्ण गोपाल जी, केंद्रीय कृषि मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर जी, समेत बड़ी संख्या में उपस्थित गणमान्य जन के साथ सहकार कर आह्लादित हूँ ..! महापुरुषों का जीवन चरित्र हमारे जीवन निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। महापुरुषों के स्मरण से मानवता के महान पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उनके स्मरण से जीवन में गुण सम्पदा का विस्तार होता है। महापुरुषों के स्मरण से दीन-दुखियों की सेवा समानता, न्यायप्रियता, भाईचारे का भाव, आनंद की अनुभूति और अनुसरण का उत्साह मिलता है। पूज्य "आचार्यश्री" जी कहा कि पूज्य गुरुदेव ने सारी दुनिया को सुखी और आनंदमय जीवन जीने का समन्वय का मार्ग दिखाया है तथा मानवता का पथ-प्रदर्शन किया है। उन्होंने सेवा, सहयोग और शांति का संदेश दिया है। उनके स्मरण से राष्ट्रचेतना का जागरण होता है। महापुरूष किसी विशेष जाति के लिए नहीं होते, अपितु संपूर्ण समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित होते हैं। महापुरुषों ने देश को विश्व का सिरमौर बनाने हेतु विभिन्न प्रकार के तप किए हैं। उनका प्रयास रहा है कि संपूर्ण समाज एक साथ खड़ा रहे। उन्होंने शिक्षा, संस्कार और एकता का संदेश दिया है। विद्यार्थी देश का भविष्य होता है। उन्हें अच्छी शिक्षा और संस्कार मिलना चाहिए। विद्यार्थी ही देश का निर्माता और कर्णधार बनेगा। शिक्षा के साथ ही उनका नैतिक – चारित्रिक उत्थान हो, जिससे देश में परिवर्तन आ सके। अतः विद्यार्थीगण महापुरूषों के जीवन का अनुसरण करें और उनसे प्रेरणा ग्रहण करें ...।

🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - महापुरुषों के चरित्र पढ़ना, उनका मनन करना और जहाँ तक सम्भव हो सके उनसे शिक्षा ग्रहण करके उन पर अमल करना, साधारण लोगों के लिये उन्नति तथा कल्याण का एक सहज साधन है। जिस देश में ऐसे महापुरुषों का मान नहीं किया जाता उसे मृत प्रायः ही समझना चाहिये। महापुरुषों के चरित्र और कार्य ही हमारे सच्चे पथ प्रदर्शक हैं। अपने अनुभव से पथ ढूंढोगे तो एक जीवन कम पढ़ जाएगा। अर्थात्, जिस पथ पर हमारे आचार्य संत या महत् जन गए हैं। हमारे लिए भी वही पथ उचित है। महर्षि वेदव्यास जी ने पुराण में लिखा है - "धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्। महाजनो येन गतः स पन्थाः ..."। यानी, धर्म का रहस्य अथवा स्वरूप इतना गहन है, मानो वह गुफाओं में छिपा है। अतः सभी उसका गहन अध्ययन नहीं कर सकते। सुगम मार्ग यही है कि जिन्होंने घोर तपस्या कर उस परम तत्व को जान लिया, तथा जिस रास्ते वे चले, उसी मार्ग पर चलना चाहिए। ब्रह्मनिष्ठ संत-महात्माओं, ज्ञानियों और निर्मल हृदय वाले महापुरुषों के सत्संग के महत्व को प्रदर्शित करते हुए धर्मग्रंथों में कहा गया है कि सत्संग ही एकमात्र ऐसा सरल साधन है, जो अज्ञान और कल्पित भ्रामक धारणाओं से मुक्ति दिलाकर मानव जीवन के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करने की क्षमता रखता है। सत्संग के लिए सुयोग्य पात्र कौन हैं? इस पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि मन, वाणी और कर्म की एकरूपता रखने वाला, जिसका आचरण पवित्र है, जो किसी भी प्रकार के लोभ-लालच-मोह आदि से मुक्त परम जितेंद्रिय है, उसी महापुरुष का सत्संग करने से ज्ञान व भक्ति की प्राप्ति संभव है। महाभारत में कहा गया है - "यद्यदाचरित श्रेष्ठः तत्तदेबेतरो जनः स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ..."। उपरोक्त सद्गुणों से संपन्न श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, उसी का अनुगमन करने से कल्याण होता है। अर्थात्, जिस पथ पर हमारे आचार्य, संत-सत्पुरुष या महान जन गए हैं, हमारे लिए भी वही पथ उचित है ...।
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हरि 🚩ॐ
🍁 जय गुरुदेव 🍁

13/01/2020

☀ प्रभु प्रेमी संघ 🌏
13 जनवरी, 2020 (सोमवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य "सदगुरुदेव" जी ने कहा - माली का सघन-संरक्षण, ऋतु-अनुकूलता एवं स्वयं को धरा-गर्भ से बाहर ऊपर उठने की उद्दाम-उदात्त भावना बीज को वृक्ष में परिवर्तित कर देती है ! तथापि प्रत्येक मनुष्य में अनंत-अतुल्य संभावनाएं विद्यमान हैं, जिन्हें सत्संग-स्वाध्याय-सन्त सन्निधि से उद्घाटित-उजागर किया जा सकता है ! ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल माध्यम है - सत्संग। सत्य ईश्वर का ही स्वरुप है। पूज्य "आचार्यश्री जी" ने सत्संग को ईश्वर का निज अंग कहा है। जिस घर में सत्संग हो, वह मंदिर है। उन्होंने कहा कि सुतीक्ष्ण मुनि श्रीराम का आना सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। आनंदित होकर उनका ध्यान करने लगे। ध्यान में इतना मग्न हुए कि श्रीराम उनके आगे में खड़े हैं, किंतु उन्हें मालूम नहीं। वे अपने अंदर के ठाकुरबाड़ी में ही ठाकुर जी के दर्शन कर रहे थे। तो आपको यह ठाकुरबाड़ी प्राप्त है, उसमें ऐसा यत्न कीजिए कि ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन हो। इसलिए ईश्वर का ध्यान कीजिए। सदाचार से रहिए। सदाचार-पालन के बिना ध्यान ठीक से नहीं हो सकेगा। ध्यान होने से सदाचार में दृढ़ता आ जाएगी। यदि सबके सब सदाचारी बन जाएँ, तो सारे देश में कल्याण हो जाये। संतो के वचन सुनना, सुनकर हृदय में स्थान देना और फिर कर्म में ढालना ही जीवन में सुगंधी भरना है। शुभ कर्मो की सुगंधि दूर-दूर तक फ़ैल जाती है और यही कर्म जीवन की शोभा बढ़ाते हैं। सत्संगति आत्म संस्कार का महत्वपूर्ण साधन है। सत्संगति बुद्धि की जड़ता को दूर करके वाणी में सत्यता लाती है, सम्मान तथा उन्नति का विस्तार करती है तथा कीर्ति का दिशाओं में विस्तार करती है। कांच भी सोने के आभूषण में जोड़कर मणि की शोभा प्राप्त कर लेता है।
अतः महान पुरुषों का साथ सदैव लाभकारी होता है। कमल के पत्ते पर पड़ी पानी की बूंदें भी मोती जैसी दिखाई देती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा है - “ बिनु सत्संग विवेक ना होई”... सत्संगति व्यक्ति को अज्ञान से ज्ञान की ओर, असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतन ने की ओर, घृणा से प्रेम की ओर, ईर्ष्या से सौहार्द की ओर तथा अविद्या से विद्या की ओर ले जाती है। अतः जो विद्यार्थी अच्छे संस्कार वाले छात्रों की संगति में रहते हैं, उनका चरित्र श्रेष्ठ होता है एवं उनके सभी कार्य उत्तम होते हैं। उनसे समाज एवं राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ती है ..।

🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - उत्तम प्रकृति के मनुष्य के साथ उठना बैठना ही सत्संगति है। मानव को समाज में जीवित रहने तथा महान बनने के लिए सत्संगति परमावश्यक है। इसलिए हमें सदैव समाज के उन्नत, बुद्धिमान एवं सज्जन व्यक्तियों की संगति में समय बिताना चाहिये। इससे हमारे व्यक्त्वि का विकास होता है और विचारों को सही दिशा मिलती है, क्योंकि आत्मा का भोजन सत्संगति है। सत्संगति के प्रभाव से ही हम सुखद, संतुष्ट और शान्त जीवन बिताने के समर्थ होंगे। सत्संगति वह पतवार है जो हमारे जीवन की नाव को भंवर और तूफान में फंसने नहीं देती। हमें किनारे तक पहुँचाने में सहायक होती है। मनुष्य पर जितना प्रभाव उसकी संगती का पड़ता है उतना किसी और बात का नहीं पड़ता। इसलिए भारतीय परंपरा में बचपन से सत्संगति पर बहुत जोर दिया गया है। सही मायनों में देखा जाए तो सत्संगति से संस्कार प्रबल होते हैं और बुरी संगती से चरित्र में दोष उत्पन्न होते हैं। सत्संग से सदाचार, धर्मभावना, कर्त्तव्यनिष्ठा और सदभावना आदि गुणों का उदय होता है। सत्संग से आत्मा पुष्ट और पवित्र होती है। सत्संग करने वाला व्यक्ति मन, वचन और कर्म से एक जैसा व्यवहार करता है। उसकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होता। सत्संग की महिमा सभी संतों ने गायी है। पाप और पुण्य का उदगम स्थान हमारा मन ही है। मन की स्वच्छता बिना सत्संग के नहीं आ सकते। इसलिए प्रतिदिन सत्संग, स्वाध्याय एवं साधना की आवश्यकता होती है। निरंतर सत्संग-स्वाध्याय से मन पवित्र रहता है। यदि मन को परमात्मा में रमाए रखने का अभ्यास हो जाए, तो वह हर पल, हर क्षण निश्छल बना रहता है। इसलिए परमात्मा को एक क्षण के लिए भी विस्मृत नहीं करना चाहिए। संत रविदास जी जूते बनाते समय भी अपने मन को भगवान की ओर लगाए रखते थे। भक्तों को उपदेश देते हुए और हाथों से कार्य करते हुए भी मन को पवित्र बनाए रखने के लिए भगवान का नाम जपने की प्रेरणा दिया करते थे। इसलिए उन्होंने चमड़ा भिगोने वाली कठौती में गंगा के दर्शन कराकर सभी को चमत्कृत कर दिया था - "मन चंगा, तो कठौती में गंगा ..."। अतः जीवन को समुन्नत बनाने और सुधारने के लिए सत्संग मूलाधार है। जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति में सत्संग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है ...।
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हरि 🚩ॐ
🍁 जय गुरुदेव 🍁

❤️🙏
09/01/2020

❤️🙏

☀ प्रभु प्रेमी संघ 🌏
09 जनवरी, 2020 (गुरुवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य "सदगुरुदेव" जी ने कहा - काल का प्रत्येक क्षण महनीय, दिव्य और अतुल्य-ऊर्जा से परिपूर्ण है। यदि साधक एकाग्रचित्त, समर्पित होकर ईश प्रदत्त अवसरों का सही और सकारात्मक विनिवेश करे तो वह जीवन की अजेयता-अनन्तता को सहज ही उपलब्ध हो सकता है ..! जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना लेकर आता है। हर घड़ी एक महान मोड़ का समय हो सकती है। मनुष्य यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि जिस वक्त, जिस क्षण और जिस पल को यों ही व्यर्थ में खो रहा है वह ही क्षण, वह ही पल क्या उसके भाग्योदय का क्षण नहीं है? क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर नष्ट कर रहे हैं वह ही हमारे लिये अपनी झोली में सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया हो। हर मनुष्य को वक्त का, छोटे से छोटे क्षण का मूल्य एवं महत्व समझना चाहिये। जीवन का वक्त सीमित है और कार्य बहुत है। प्रकृति का प्रत्येक कार्य एक निश्चित समय पर होता है। समय पर ग्रीष्म तपता है, समय पर पानी बरसता है, समय पर ही शीत आता है। वक्त पर ही शिशिर होता और वक्त पर ही बसन्त आकर वनस्पतियों को फूलों से सजा देता है। प्रकृति के इस ऋतु क्रम में जरा सा भी व्यवधान पड़ जाने से न जाने कितने प्रकार के रोगों एवं इति-भीति का प्रकोप हो जाता है। चांद-सूरज, ग्रह-नक्षत्र सब समय पर ही उदय-अस्त होते हैं, समय के अनुसार ही अपनी परिधि एवं कक्ष में परिभ्रमण किया करते हैं। इनकी सामयिकता में जरा-सा व्यवधान पड़ने से सृष्टि में अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं और प्रलय के दृश्य दिखने लगते हैं। इसलिए समय पालन ईश्वरीय नियमों में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रमुख नियम है ...।

🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - स्मरण रखिये ! समय बहुत मूल्यवान है। इससे आप जितना लाभ उठा सकते हैं, उठायें। समय का पालन मानव-जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण संयम है। समय पर कार्य करने वालों के शरीर चुस्त, मन निरोग तथा इन्द्रियां तेजस्वी बनी रहती हैं। निर्धारण के विपरीत काम करने से मन, बुद्धि तथा शरीर काम तो करते हैं, किन्तु अनुत्साहपूर्वक। इससे कार्य में दक्षता तो आती ही नहीं, साथ ही शक्तियों का भी क्षय होता है। किसी काम को करने के ठीक समय पर शरीर उसी काम के योग्य यन्त्र जैसा बन जाता है। ऐसे समय में यदि उससे दूसरा काम लिया जाता है, तो वह काम लकड़ी काटने वाली मशीन से कपड़े काटने जैसा ही होगा। क्रम एवं समय से न काम करने वालों का शरीर अस्त-व्यस्त प्रयोग के कारण शीघ्र ही निर्बल हो जाता है और कुछ ही समय में वह किसी कार्य के योग्य नहीं रहता। समय-संयम सफलता की निश्चित कुन्जी है। इसे प्राप्त करना प्रत्येक बुद्धिमान का मानवीय कर्त्तव्य है। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर समय के बड़े पाबन्द थे। जब वे कॉलेज जाते तो रास्ते के दुकानदार अपनी घड़ियां उन्हें देखकर ठीक करते थे। वे जानते थे कि विद्यासागर कभी एक मिनट भी आगे पीछे नहीं चलते। एक विद्वान ने अपने दरवाजे पर लिख रखा था। ‘‘कृपया बेकार मत बैठिये। यहां पधारने की कृपा की है तो मेरे काम में कुछ मदद भी कीजिये।’’ साधारण मनुष्य जिस समय को बेकार की बातों में खर्च करते रहते हैं, उसे विवेकशील लोग किसी उपयोगी कार्य में लगाते हैं। यही आदत हैं जो सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों को भी सफलता के उच्च शिखर पर पहुंचा देती हैं। माजार्ट ने हर पल को उपयोगी कार्य में लगे रहना अपने जीवन का आदर्श बना लिया था। वह मृत्यु शैय्या पर पड़े-पड़े भी कुछ न कुछ करते रहे। 'रेक्यूम' नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ उन्होंने मौत से लड़ते-लड़ते पूरा किया। पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - संसार का काल-चक्र भी कभी अनियमित नहीं होता। लोक और दिक्पाल, पृथ्वी और सूर्य, चन्द्र और अन्य ग्रह काल की गति से गतिमान हैं। समय की अनियमितता होने से सृष्टि का कोई काम चलता नहीं। धरती में भी यही नियम लागू है। लोग समय का अनुशासन न रखें तो रेल, डाक, कल-कारखाने, कृषि, रोजगार-धंधे आदि सभी ठप्प पड़ जायेंगे और उत्पादन व्यवस्था में गतिरोध के साथ सामान्य जीवन पर भी उसका कुप्रभाव पड़ेगा। इस तरह से सारी सामाजिक व्यवस्था उथल-पुथल हो जायेगी और मनुष्य को एक मिनट भी सुविधापूर्वक जीना कठिन हो जायेगा। जिस तरह अभी लोग भली प्रकार सारे क्रियाकलाप कर रहे हैं, वैसे कदापि नहीं हो सकते। अतः हमको भी अपनी दिनचर्या को अपने जीवन कार्यों की आवश्यकतानुसार विभक्त करके उसी के अनुरूप कार्य करना चाहिए ...।
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हरि 🚩ॐ
🍁 जय गुरुदेव 🍁

06/01/2020

☀ प्रभु प्रेमी संघ 🌏
06 जनवरी, 2020 (सोमवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य सदगुरुदेव जी ने कहा - साधन-चतुष्टय, सत्संग, सन्त सन्निधि और अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ जीवन सिद्धि के सहज आध्यात्मिक साधन हैं ! अतः आध्यात्मिक जीवन अभ्यासी बनें ..! विश्व में यदि आज भी भारत की कोई मौलिक पहचान है तो वह इसकी आध्यात्मिक समृद्धि से ही है। भारतीय संस्कृति को यदि कोई सुरक्षित रखे हुए है तो वह इसके मूल में विद्यमान सुदृढ़ आध्यात्मिकता ही है। यह आस्थावान लागों का देश है। इस विशाल देश में बहुरंगी संस्कृति, जीवनशैली, बोली, भाषा आदि का अपूर्व संगम है, किन्तु ऋषियों-मुनियों साधु−सन्तों एवं विद्वानों द्वारा अर्जित ज्ञान की सुदृढ़ रज्जु एक बहुरंगी माला की तरह सभी को एक सूत्र में पिरोये हुए है। भारतीय संस्कृति की गंगा का अवतरण जिस हिमालय से हुआ है वह है - अध्यात्म। विश्व में यदि आज भी भारत की कोई मौलिक पहचान है तो वह इसकी आध्यात्मिक समृद्धि से ही है। यहां के निवासियों का अहिंसा एवं शांतिवादी तथा संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना से ओतप्रोत समग्रता पूर्ण चिन्तन भारतीय संस्कृति का मूल लक्षण है। यही कारण है कि कुम्भ आदि पर्वों पर तीर्थों में एकत्र होने वाला विशाल जनमानस किसी भी भारतीय को आश्चर्य चकित नहीं करता, यद्यपि महाकुम्भ विश्व का सबसे बड़ा मानव मेला है। तीर्थराज प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन तथा नासिक में पड़ने वाले ये कुम्भ पर्व, निःसंदेह संपूर्ण भारतवासियों को आपस में जोड़ते हैं तथा "सर्वे भवन्तु सुखिनः" एवं "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना को साक्षात् मूर्तिमान करते हैं ...।

🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - हमारी भारतीय संस्कृति की विरासत को बचाने में सत्संग की अहम् भूमिका है, क्योंकि परिवार से ही बच्चों को संस्कार मिलते हैं। यदि हम आज उन्हें संस्कार नहीं देंगे, तो फिर वह संस्कृति के बारे में कैसे जानेंगे? पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा कि रामायण व भागवत के बिना मनुष्य की जीवन यात्रा अधूरी है। सत्संग के बिना जीवन नीरस है। जीवन में आनंद व उत्साह ना हो तो जीवन का कोइ अर्थ नहीं है, जीवन व्यर्थ है। जिस प्रकार अंधकार में व्यक्ति को भय लगता है, कुछ भी समझ में नहीं आता, उसी प्रकार अज्ञान भी अंधकार है। इस अज्ञान के कारण व्यक्ति को अपना हित-अहित क्या है, यह समझ में नही आता। अंधकार प्रकाश के अभाव का नाम है। इसी प्रकार अज्ञान, ज्ञान के अभाव का नाम है। जो व्यक्ति अज्ञान को अच्छी तरह समझ सकते हैं, उन्हें ज्ञान का उजाला होने में अघिक समय नहीं लगता है। अतः भारतीय आध्यात्मिक विद्या हमें सजग रहना सिखाती है। प्राचीन समय से संतों ने साक्षी भाव में रहना सिखाया और अपने आत्म-स्वरूप की समझ जागृत करने की प्रेरणा दी। भारत अध्यात्म विद्या से ओतप्रोत देश है। हमारे देश की मिट्टी के कण-कण में इसका प्रभाव परिलक्षित होता है। अज्ञान को दूर करने के लिये यही अध्यात्म विद्या एक मात्र उपाय है। भारत मे अनेक संत-सत्पुरुष, युगपुरुष हुए हैं जिन्होंने जाति-पाति के बंधनों से परे होकर मानव मात्र को आत्म स्वरूप की पहचान करने की प्रेरणा दी। उनका संदेश था कि आप अपने जीवन में सत्कर्म करो। इसलिए दया, दान की प्रवृत्ति मानवता की पहचान है और इस पुण्य की भूमिका में रहते हुए ही आत्मा की पहचान हो सकती है ...।
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हरि 🚩ॐ
🍁 जय गुरुदेव 🍁

03/01/2020

☀ प्रभु प्रेमी संघ 🌏
03 जनवरी, 2020 (शुक्रवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य "सदगुरुदेव" जी ने कहा - नवांकुरण-नवसृजन की और अग्रसर प्रकृति में चैत्र शुक्ल पक्ष की अभीप्सा और ऋतु परिवर्तन की आकाँक्षा जब प्रतीत होने लगे और उत्तरायण के अभिनंदन के स्वर मुखरित हों ऐसे समय आंग्ल कालगणना के अनुसार नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ! अन्य पर्व-परम्पराओं का आदर भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य है ..! भारतीय संस्कृति की उदार प्रवृत्ति ने ही हमारी संस्कृति के भविष्य को समुज्ज्वल बनाया है। भारतीय संस्कृति आभ्यंतर है, इसमें परंपरागत चिंतन, कलात्मक अनुभूति, विस्तृत ज्ञान एवं धार्मिक आस्था का समावेश समाहित है। हमारी भारतीय संस्कृति सार्वभौमिक सत्यों पर खड़ी है। भारतीय संस्कृति का विकास धर्म का आधार लेकर हुआ है इसीलिए उसमें दृढ़ता है। भारतीय संस्कृति व्यक्ति को व्यक्तित्व देती है और उसे महान कार्यों के लिए प्रोत्साहित करती है। भारतीय संस्कृति व्यक्ति-समाज-राष्ट्र के जीवन का सिंचन कर उसे पल्लवित-पुष्पित फलयुक्त बनाने वाली अमृत स्रोतस्विनी चिरप्रवाहिता सरिता है। भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं - आध्यात्मिकता एवं भौतिकता का समन्वय, अनेकता में एकता, ग्रहणशीलता, प्राचीनता, निरंतरता, लचीलापन एवं सहिष्णुता, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना, लोकहित और विश्व-कल्याण एवं पर्यावरण संरक्षण आदि ...।

🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - भारतीय संस्कृति "वसुधैव कुटुम्बकम् ..." के उच्च आदर्शों पर आधारित है। हमारे देश की संस्कृति एवं सभ्यता ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की रही है, जिसमें हम सम्पूर्ण पृथ्वी को अपना घर और इसके समस्त प्राणी को अपने परिवार का सदस्य मानते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे में हमारा यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि हम विश्व-कल्याण एवं मानव जाति की भलाई के लिए काम करें। भारत विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता का देश है। भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्व शिष्टाचार, सभ्य संवाद, धार्मिक संस्कार, मान्यताएँ और मूल्य आदि हैं। अब जबकि हर एक की जीवनशैली आधुनिक हो रही है, हम भारतीय आज भी अपनी परंपरा और मूल्यों को बनाए हुए हैं। विभिन्न संस्कृति और परंपरा के लोगों के बीच की घनिष्ठता ने एक अनोखा देश ‘भारत’ बनाया है। इसलिए हर भारतीय का यह कर्तव्य है कि वो अपनी भारतीय संस्कृति-सभ्यता और उसके वैदिक ज्ञान का अंतरात्मा से अनुकरण करें जिससे कि इस संस्कृति का और प्रसार हो, ये बढ़ती रहे तथा तेजस्वी रूप धारण करे। यह संस्कृति ज्ञानमय है और युतियुक्त कर्म करने की प्रेरणा देने वाली संस्कृति है। ये वो संस्कृति है जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की अनुकरणीय और लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की अनुसरणीय शिक्षाओं की साक्षी है। भारतीय संस्कृति का अर्थ है - सर्वांगीण विकास। भारतीय संस्कृति की आत्मा छुआछूत को नही मानती और ना ही जातिभेद को जानती है। अतः यह प्रेमपूर्वक और विश्वास पूर्वक सबका आलिंगन करके, ज्ञानमय और भक्तिमय कर्म का अखण्ड आधार लेकर माँगल्य-सागर की ओर तथा सच्चे मोक्ष—सिन्धु की ओर ले जाने वाली संस्कृति है ...।

🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - ये वो संस्कृति है जो अधिकार से ज्यादा कर्तव्य पालन पर बल देती है। भारत देश और यहाँ की संस्कृति अनेक धर्मों को और उनकी शिक्षाओं को न केवल अपने में संजोय हुए है, अपितु इस देश की संस्कृति ने किसी भी धर्म को श्रेष्ठ या निम्न नही आंका। भारतीय संस्कृति यथार्थ के बहुआयामी पक्ष को स्वीकार करती है तथा दृष्टिकोणों, व्यवहारों, प्रथाओं एवं संस्थाओं की विविधता का स्वागत करती है। यह एकरूपता के विस्तार के लिए विविधता के दमन की कोशिश नहीं करती। भारतीय संस्कृति का आदर्श-वाक्य 'अनेकता में एकता' एवं 'एकता में अनेकता' दोनों है। भारत एवं भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव रखने वाली संस्कृति है। भारतीय संस्कृति ने न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण धरा को सदैव एक कुटुंब (परिवार) माना है, जबकि अन्य देशों ने भारत को केवल बाज़ार मान है। लेकिन ये संस्कृति और इस संस्कृति में रचे-बसे लोग इतने उदार हैं कि सदैव अन्य देशों की संस्कृतियों का दोनों बाहें फैलाकर स्वागत किया है। भारतीय संस्कृति के उपासकों की महान यात्रा अनादि काल से आरम्भ हुई है। इस संस्कृति में व्यास-वाल्मीकि, बुद्ध-महावीर, शंकराचार्य-रामानुज, ज्ञानेश्वर-तुकाराम, नानक-कबीर एवं महर्षि अरविन्द जैसी महान विभूतियां हुई जिन्होंने इस संस्कृति को आगे बढ़ाया और समृद्ध बनाया। तो आइए ! हम सब अपने आपसी मतभेदों को दरकिनार कर इस पावन यात्रा में सम्मिलित हों। आज भारतीय संस्कृति के ये सारे सत्पुत्र हम सबको पुकार रहे हैं। अतः यह पुकार जिसके हृदय तक पहुँचेगी और जो अपने राष्ट्र और उसकी संस्कृति की सेवा के लिए सजग हो जायेगा उसी का जीवन धन्य होगा ...।
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हरि 🚩ॐ
🍁 जय गुरुदेव 🍁

01/01/2020

☀ प्रभु प्रेमी संघ 🌏
01 जनवरी, 2020 (बुधवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य "सदगुरुदेव" जी ने कहा - सत्संग-स्वाध्याय और सद्विविचारामृत द्वारा अंतस में छिपी देव सत्ता को जागृत कीजिए। स्वयं के उत्थान से ही धर्म-संस्कृति, समाज और राष्ट्र का विकास होता है। इसलिए अज्ञान निवृत्ति, आत्मजागरण की तत्परता और स्वात्मोत्थान मनुष्य का प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए ..! श्रद्धा मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को गहराई से प्रभावित करती है। गीता में कहा गया है कि श्रद्धा अध्यात्म क्षेत्र में सात्विकी और कर्म के क्षेत्र में राजसी गुणों को उत्पन्न करती है। संत तुलसीदास जी ने भी 'मानस' में कहा है कि 'श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई ...'। भक्ति के क्षेत्र में श्रद्धा की ही प्रधानता होती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ अर्जित ऊर्जा विलक्षण प्रभाव प्रकट करती है। भौतिकता और पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के कारण हम अपने गौरवशाली अतीत को भूलते जा रहे हैं। वस्तुत: श्रद्धा व्यक्ति के जीवन का उत्कृष्ट आभूषण है। तभी कहा गया है कि श्रद्धावान व्यक्ति ही ज्ञान को प्राप्त कर पाते हैं। यहां स्मरण रखना चाहिए कि श्रद्धा का अर्थ अंधविश्वास कदापि नहीं है। जब अंधविश्वास दूर हो जाता है तब श्रद्धा का अभ्युदय होता है। अंधश्रद्धा कमजोर, हारे हुए लोगों की बैसाखी है। अंधश्रद्धा पाखण्ड है, धर्म नहीं है; अतः इससे बचें। अंधविश्वास वह बीमारी है जिससे हमनें अतीत में इतना कुछ गवांया। इसकी पूर्ति करने में पता नहीं हमें कितने वर्ष और लगेंगे। हम जब इतिहास उठाते हैं तो भारत की अनेकों हार का कारण जानना चाहते हैं तब उसमें सबसे बड़ा कारण हमेशा अंधविश्वास के रूप में सामने पाते हैं। संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, रामदास, तुकाराम, गुरुनानकदेव जी जैसे अनेक संत-सत्पुरुष भारत में हुए हैं जिनके संदेश ने न केवल जन सामान्य को शिक्षित करने का, बल्कि अंधश्रद्धा के खिलाफ लड़ने का, जागृति लाने का मंत्र दिया है। ऐसे संतों ने समय-समय पर समाज को रोका, टोका और आईना भी दिखाया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कुप्रथाएं समाज से समाप्त हों और लोगों में करुणा, समानता और शुचिता के संस्कार आयें। हमारी यह भारतभूमि बहुरत्ना वसुंधरा है, जहां समर्पित महापुरुषों ने कहा कि आज का युग समाधि का युग नहीं है, समाज से भ्रांतियों को मिटाने का और जागृति लाने का युग है ...।

🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - सामान्यत: श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था को 'श्रद्धा' कहा जाता है। आस्था जब सिद्धांत से व्यवहार में आती है तब उसे 'निष्ठा' कहा जाता है। जब निष्ठा व्यक्ति के जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है तब श्रद्धा का रूप ले लेती हैं। वस्तुत: श्रद्धा एक गुण है जो व्यक्ति के सद्गुणों, सद्विचारों और उत्कृष्ट विशिष्टताओं के आधार पर उसे श्रेष्ठता प्रदान करता है। ऐसे सद्गुणी, सदाचारी और श्रेष्ठजन ही व्यक्ति को उन्नति के शिखर पर पहुंचाने की सीढ़ी के रूप में श्रद्धा सहायक सिद्ध होते हैं और उसके जीवन-पथ को आलोकित करते हैं। कर्म, ज्ञान और उपासना या भक्ति का मूल श्रद्धा ही है। इसी प्रकार भक्ति रसामृत सिंधु नामक ग्रंथ में लिखा गया है कि श्रद्धा से सत्संग, पारस्परिक सद्भाव स्नेह-आदर और सहयोग के संव‌र्द्धन के साथ ही समाज में बिखराव पर नियंत्रण और एकत्व की भावना में वृद्धि होती है। समग्र सृष्टि भगवान की ही अभिव्यक्ति है। भगवान श्रीकृष्ण ने 'गीता' में स्पष्ट घोषणा करते हुए कहा है कि श्रद्धावान व्यक्ति ही मुझे प्राप्त कर सकता है। अतः संसार का कोई भी व्यक्ति भगवान को बिना श्रद्धा के प्राप्त नहीं कर सकता। यह श्रद्धा ही है जो समाज को गति, दिशा और सद्भाव उत्पन्न करने के साथ मनुष्यता को विकसित करती है। विवेक, वैराग्य, अभ्यास और श्रद्धा आध्यात्मिक साधना के आधार स्तंभ है। अटूट-श्रद्धा, पूर्ण-विश्वास जैसी दिव्यता से संपन्न अंतःकरण वाला साधक अपने शुभ-संकल्प और पुरुषार्थ से एहलोक-परलोक की समस्त अनुकूलताओं को अर्जित कर लेता है। इसलिए श्रद्धा, विश्वास और निष्कपट प्रार्थनाएँ, ऐसी अदृश्य, अमूर्त-अतुल्य शक्तियाँ हैं, जो असाध्य को साध्य और असम्भव को सम्भव कर देतीं हैं। अतः इन दैवीय सामर्थ्यवान शक्तियों को सहेज कर रखें ...।
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हरि 🚩ॐ
🍁 जय गुरुदेव 🍁

07/11/2019
साहित्य के शीर्षक से आयोजित किसी कार्यक्रम में लाखों लोगों का आना बस कुछ वर्ष पहले तक असंभव सुनाई देता था। लेकिन अब जो द...
01/11/2019

साहित्य के शीर्षक से आयोजित किसी कार्यक्रम में लाखों लोगों का आना बस कुछ वर्ष पहले तक असंभव सुनाई देता था। लेकिन अब जो दिखाई दे रहा है, उससे तय है कि आप भाषा-प्रेमियों ने भाषा को वहाँ पहुँचाने की ज़िम्मेदारी बख़ूबी उठा ली है, जहाँ उसे प्राण-प्रतिष्ठित होना चाहिए। 'साहित्य आज तक' में आज की अद्भुत शाम

With Dr. Kumar Vishwas
❤️🙏🎤

Should read ..👌
01/11/2019

Should read ..👌

आशीष दलाल एक सशक्त साहित्यकार है । कम लिखते है, पर अच्छा लिखते हैं । इस पुस्तक की विशेषता है कि किसी भूमिका के बिना लेखक सीधे पाठक के साथ प्रस्तुत है । कई बार भूमिका किसी वरिष्ठ साहित्यकार की सिफारिश रूप में प्रकाशित पत्र मात्र बनकर रह जाती है एवं जब पाठक स्वयं पुस्तक को पढ़ता है, तो वह कुछ अलग ही पाता है । बिना किसी औपचारिक भूमिका के वेदान्त, नीरा और गौतम की यह कहानी मार्मिक भी है, संवेदनशील भी है, सक्षम भी है ।कई स्थलों पर पाठक अपनी पलकें भीगी पाता है । नीरा के निर्णयों पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है पर नीरा भी हमारी, आपकी तरह अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र है ।
“उन्होंने कहा और मैंने लिखा” में लेखक ने उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखा है की प्रेमविवाह के प्रति धारणा नकारात्मक नहीं होनी चाहिए पर उपन्यास के पात्र जिस तरह कठिन एवं संघर्षमय समय को हौंसले से जीते है वह स्वयं ही एक सकारात्मक संदेश देने में सक्षम समर्थ है । सकारात्मक परिवर्तन बहुत समय लेते है । माता पिता, परिवार द्वारा निर्धारित सम्बन्ध भी टूटते देखे गए हैं एवं प्रेमविवाह भी सफल हो रहे हैं । विवाह गणित का प्रश्न नहीं है एवं तय किए गए विवाह हो या फिर प्रेमविवाह, हर ने सम्बन्ध की अपनी सीमाएं होती ही है ।
वाट्सएप, फेसबुक, इन्टरनेट, फोटो सेल्फी भूलकर मैं आधी रात तक इस उपन्यास में डूबा रहा । काश, मुझे नीरा का सम्पर्क सूत्र मिल पाता तो मैं उससे अवश्य बात करता ।
नीरा बेटी के अन्तिम पृष्ठ वाले निर्णय को सलाम । आप भी इस उपन्यास को पढ़िये । नीरा की बेटी परी को एक सार्थक जीवन के लिए नए दिलीप अंकल की दिल से शुभकामनाएं ।
लेखक को शुभकामनाएं ।
दिलीप भाटिया, रावतभाटा ३२३३०७

30/08/2018

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