01/01/2020
☀ प्रभु प्रेमी संघ 🌏
01 जनवरी, 2020 (बुधवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य "सदगुरुदेव" जी ने कहा - सत्संग-स्वाध्याय और सद्विविचारामृत द्वारा अंतस में छिपी देव सत्ता को जागृत कीजिए। स्वयं के उत्थान से ही धर्म-संस्कृति, समाज और राष्ट्र का विकास होता है। इसलिए अज्ञान निवृत्ति, आत्मजागरण की तत्परता और स्वात्मोत्थान मनुष्य का प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए ..! श्रद्धा मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को गहराई से प्रभावित करती है। गीता में कहा गया है कि श्रद्धा अध्यात्म क्षेत्र में सात्विकी और कर्म के क्षेत्र में राजसी गुणों को उत्पन्न करती है। संत तुलसीदास जी ने भी 'मानस' में कहा है कि 'श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई ...'। भक्ति के क्षेत्र में श्रद्धा की ही प्रधानता होती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ अर्जित ऊर्जा विलक्षण प्रभाव प्रकट करती है। भौतिकता और पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के कारण हम अपने गौरवशाली अतीत को भूलते जा रहे हैं। वस्तुत: श्रद्धा व्यक्ति के जीवन का उत्कृष्ट आभूषण है। तभी कहा गया है कि श्रद्धावान व्यक्ति ही ज्ञान को प्राप्त कर पाते हैं। यहां स्मरण रखना चाहिए कि श्रद्धा का अर्थ अंधविश्वास कदापि नहीं है। जब अंधविश्वास दूर हो जाता है तब श्रद्धा का अभ्युदय होता है। अंधश्रद्धा कमजोर, हारे हुए लोगों की बैसाखी है। अंधश्रद्धा पाखण्ड है, धर्म नहीं है; अतः इससे बचें। अंधविश्वास वह बीमारी है जिससे हमनें अतीत में इतना कुछ गवांया। इसकी पूर्ति करने में पता नहीं हमें कितने वर्ष और लगेंगे। हम जब इतिहास उठाते हैं तो भारत की अनेकों हार का कारण जानना चाहते हैं तब उसमें सबसे बड़ा कारण हमेशा अंधविश्वास के रूप में सामने पाते हैं। संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, रामदास, तुकाराम, गुरुनानकदेव जी जैसे अनेक संत-सत्पुरुष भारत में हुए हैं जिनके संदेश ने न केवल जन सामान्य को शिक्षित करने का, बल्कि अंधश्रद्धा के खिलाफ लड़ने का, जागृति लाने का मंत्र दिया है। ऐसे संतों ने समय-समय पर समाज को रोका, टोका और आईना भी दिखाया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कुप्रथाएं समाज से समाप्त हों और लोगों में करुणा, समानता और शुचिता के संस्कार आयें। हमारी यह भारतभूमि बहुरत्ना वसुंधरा है, जहां समर्पित महापुरुषों ने कहा कि आज का युग समाधि का युग नहीं है, समाज से भ्रांतियों को मिटाने का और जागृति लाने का युग है ...।
🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - सामान्यत: श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था को 'श्रद्धा' कहा जाता है। आस्था जब सिद्धांत से व्यवहार में आती है तब उसे 'निष्ठा' कहा जाता है। जब निष्ठा व्यक्ति के जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है तब श्रद्धा का रूप ले लेती हैं। वस्तुत: श्रद्धा एक गुण है जो व्यक्ति के सद्गुणों, सद्विचारों और उत्कृष्ट विशिष्टताओं के आधार पर उसे श्रेष्ठता प्रदान करता है। ऐसे सद्गुणी, सदाचारी और श्रेष्ठजन ही व्यक्ति को उन्नति के शिखर पर पहुंचाने की सीढ़ी के रूप में श्रद्धा सहायक सिद्ध होते हैं और उसके जीवन-पथ को आलोकित करते हैं। कर्म, ज्ञान और उपासना या भक्ति का मूल श्रद्धा ही है। इसी प्रकार भक्ति रसामृत सिंधु नामक ग्रंथ में लिखा गया है कि श्रद्धा से सत्संग, पारस्परिक सद्भाव स्नेह-आदर और सहयोग के संवर्द्धन के साथ ही समाज में बिखराव पर नियंत्रण और एकत्व की भावना में वृद्धि होती है। समग्र सृष्टि भगवान की ही अभिव्यक्ति है। भगवान श्रीकृष्ण ने 'गीता' में स्पष्ट घोषणा करते हुए कहा है कि श्रद्धावान व्यक्ति ही मुझे प्राप्त कर सकता है। अतः संसार का कोई भी व्यक्ति भगवान को बिना श्रद्धा के प्राप्त नहीं कर सकता। यह श्रद्धा ही है जो समाज को गति, दिशा और सद्भाव उत्पन्न करने के साथ मनुष्यता को विकसित करती है। विवेक, वैराग्य, अभ्यास और श्रद्धा आध्यात्मिक साधना के आधार स्तंभ है। अटूट-श्रद्धा, पूर्ण-विश्वास जैसी दिव्यता से संपन्न अंतःकरण वाला साधक अपने शुभ-संकल्प और पुरुषार्थ से एहलोक-परलोक की समस्त अनुकूलताओं को अर्जित कर लेता है। इसलिए श्रद्धा, विश्वास और निष्कपट प्रार्थनाएँ, ऐसी अदृश्य, अमूर्त-अतुल्य शक्तियाँ हैं, जो असाध्य को साध्य और असम्भव को सम्भव कर देतीं हैं। अतः इन दैवीय सामर्थ्यवान शक्तियों को सहेज कर रखें ...।
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