Rekhi Jeevan Urza

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दोस्तों यदि आप बार-बार परेशान हो रहे हैं डिप्रेशन में जा रहे हैं या किसी और मानसिक तकलीफ से गुजर रहे हैं तो एक बार औरा  ...
22/11/2019

दोस्तों यदि आप बार-बार परेशान हो रहे हैं डिप्रेशन में जा रहे हैं या किसी और मानसिक तकलीफ से गुजर रहे हैं तो एक बार औरा स्कैनिंग जरूर करवाएं और जाने आपका कौन सा चक्र अनबैलेंस है जिसकी वजह से आपको यह प्रॉब्लम हो रही है #संजीवनी_रेकी_09057727325

22/11/2018

रेकी एक साधारण विधि है, लेकिन इसे पारंपरिक तौर पर नहीं सिखाया जा सकता। विद्यार्थी इसे रेकी मास्टर से ही सीखता है। इसे आध्यात्म आधारित अभ्यास के तौर पर जाना जाता है। चिन्ता, क्रोध, लोभ, उत्तेजना और तनाव शरीर के अंगों एवं नाड़ियो में हलचल पैदा करते देते हैं, जिससे रक्त धमनियों में कई प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं। शारीरिक रोग इन्ही विकृतियों के परिणाम हैं। शारीरिक रोग मानसिक रोगों से प्रभावित होते है। रेकी बीमारी के कारण को जड़ मूल से नष्ट करती हैं, स्वास्थ्य स्तर को उठाती है, बीमारी के लक्षणों को दबाती नहीं हैं। रेकी के द्वारा मानसिक भावनाओं का संतुलन होता है और शारीरिक तनाव, बैचेनी व दर्द से छुटकारा मिलता जाता हैं। रेकी गठिया, दमा, कैंसर, रक्तचाप, पक्षाघात, अल्सर, एसिडिटी, पथरी, बवासीर, मधुमेह, अनिद्रा, मोटापा, गुर्दे के रोग, आंखों के रोग , स्त्री रोग, बाँझपन, शक्तिन्यूनता और पागलपन तक दूर करने में समर्थ है।

सभी दिव्यात्माओ को आत्मनमन, हम सभी के हाथों में दिव्य चुंबकीय गुण होते हैं, थोड़े से अभ्यास से हम इसे विकसित कर सकते हैं ...
18/11/2018

सभी दिव्यात्माओ को आत्मनमन, हम सभी के हाथों में दिव्य चुंबकीय गुण होते हैं, थोड़े से अभ्यास से हम इसे विकसित कर सकते हैं । निम्न प्रयोग करके आप खूद इसे महसूस करे ।

विवेक

हाथो में megnetic flow करे आसान से अभ्यास द्वारा"

शरीर में अगर कही सबसे ज्यादा प्राण शक्ति(आकर्षण शक्ति) का प्रवाह रहता है तो वो है.आँखे,
हाथो और पैरो की अंगुलिया
हाथो में प्राण शक्ति को महसूस कर सकते है अपने तर्जनी अंगुली को किसी दूसरे व्यक्ति के ललाट पर लेजाकर उसे छुए बगैर थोड़ी दुरी पर गोल गोल घुमाए जितनी देर में वो आपको अपने अंगुली को हटाने या अपने ललाट में हुए दर्द को बताता है उसके अनुसार अपनी आकर्षण शक्ति काम या ज्यादा होती है.
शरीर में प्रवाह करती प्राण शक्ति को हाथो की अंगुलिया के द्वारा दुसरो पर प्रभाव छोड़ा जा सकता है.

प्रयोग :-

1. शांत बैठ कर सामने एक तकिया रखे जो हम सोते वक़्त काम लेते है उस तकिये को चुम्बक मान ले और अपने हाथो को लोहे की रोड.
2. हथेली को तकिये के ऊपर ले जाकर खोल ले जैसे की हम स्कूल में प्रतिज्ञा के वक़्त करते है. याद रहे आपका हाथ पूरा सीधा हो.
3. तकिये के एक कोने से थोड़ा ऊपर हथेली को घुमाते हुए दूसरे कोने तक ले जाये ( जैसे की ऊपर के चित्र में चुम्बक के ऊपर की लाइन बनी हुई है.)
4. अपने हथेली को 15 -20 बार ऐसे दोहराये लेकिन हथेली तकिये से थोड़ा ऊपर हो और स्पर्श न कर सके.
5. कुछ दिन के अभ्यास से हमें हथेली में गर्मी या झनझनाहट सी महसूस होती है. ये प्राण शक्ति या आकर्षण शक्ति का प्रवाह ही है.
6. हमारे नित्य दिन के क्रियाकलाप में इस प्रयोग से कही पर भी प्रभाव डाल सकते है खासतौर से वह जहा हमें खुद को दिखाना होता है जैसे की मार्केटिंग के काम में ये आकर्षण शक्ति आपके हथेली के पौरो के माध्यम से सामने वाले पर प्रभाव डालती है.

सभी दिव्यात्माओ को आत्मनमन, एक संक्षिप्त पोस्ट उनके लिए जो रेकी से परिचित नहीं हैं,विवेक रेकी क्या है ? इसके फायेदे क्या...
15/11/2018

सभी दिव्यात्माओ को आत्मनमन, एक संक्षिप्त पोस्ट उनके लिए जो रेकी से परिचित नहीं हैं,
विवेक

रेकी क्या है ? इसके फायेदे क्या हैं ?

रेकी क्या है ?
रेकी क्या है ? रेकी जापानी भाषा का शब्द है जो ‘ रे ‘ और ‘ की ‘ दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘ रे ‘ का अर्थ है सर्वव्यापी अर्थात ओम्नीप्रेजेंट तथा ‘ की ‘ का अर्थ है जीवन शक्ति या प्राण अर्थात लाइफ फोर्स। इस प्रकार रेकी वह ईश्वरीय अथवा आध्यात्मिक ऊर्जा है , जो इस समस्त ब्रह्माण्ड में हमारे चारों ओर व्याप्त है। हम सब इसी जीवन शक्ति को लेकर पैदा होते हैं और इसी के द्वारा जीवन जीते हैं। समय के साथ-साथ अनेक कारणों से जब हमारे शरीर में इस ऊर्जा का प्रवाह कम हो जाता है अथवा इसका संतुलन बिगड़ जाता है , तभी हमारा शरीर रोगों की ओर आकर्षित होता है।

रेकी द्वारा उपचार या रेकी साधना में हम इसी सर्वव्यापी जीवन शक्ति का उपयोग अपने लाभ के लिए करते हैं। प्रार्थना क्या है ? हमारा प्रत्येक कर्म हमारे जीवन को निर्धारित करता है और कर्म के मूल में उपस्थित होता है ‘ विचार ‘ । अत: हमारे विचार ही हमारा जीवन निर्धारित करते हैं। हर विचार एक प्रार्थना की तरह कार्य करता है। हमारे विचार एक तरह से प्रतिज्ञापन या स्वीकारोक्ति हैं। हम जो चाहते हैं उसकी स्वीकारोक्ति। प्रार्थना भी एक स्वीकारोक्ति है। हमारे मन में अनेक इच्छाएं जाग्रत होती रहती हैं। हम ईश्वर से जो चाहते हैं , वह भाव सदैव हमारे मन में बना रहता है। अत: हमारा हर भाव , हमारा हर संकल्प प्रार्थना ही है। हमारी इच्छाएं , हमारे विचार या भाव अथवा संकल्प कैसे हों यह अत्यंत महत्वपूर्ण है न कि प्रक्रिया। प्रार्थना क्योंकि एक भाव है , अत: यह करने की वस्तु नहीं है। यह स्वत: ही घटित होती है। भाव को नियंत्रित करने की जरूरत है। भाव प्रदूषण से बचने के लिए जरूरी है कि हमारे विचार सदैव सकारात्मक रहें। सकारात्मक विचारों का पोषण ही वास्तविक प्रार्थना है।

क्या रेकी और प्रार्थना में कुछ तत्व समान हैं ? ऊपरी तौर पर देखें तो रेकी और प्रार्थना में अंतर दिखाई पड़ता है , लेकिन वास्तव में रेकी और प्रार्थना एक ही हैं। प्रार्थना द्वारा हम ईश्वर से अपनी मनचाही वस्तु या स्थिति के लिए याचना करते हैं। या तो हम धन-दौलत या समृद्धि की कामना करते हैं या फिर कष्टों से मुक्ति की। प्रार्थना हम अपने परिवार के अन्य सदस्यों , मित्रों तथा परिचितों के लिए भी करते हैं। हम बस याचक होते हैं और ईश्वर या खुदा उन याचनाओं को पूरा करने वाला। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रेकी साधना भी की जाती है। रेकी और प्रार्थना के उद्देश्य और रेकी ऊर्जा तथा ईश्वरीय कृपा या ऊर्जा में कोई तात्त्विक अंतर नहीं है। रेकी ही नहीं , किसी भी अन्य शक्ति या उपचार पद्धति का सहारा व्यक्ति तब लेता है , जब उसके विश्वास में कमी आने लगती है। प्रार्थना और विश्वास का गहन संबंध है। जिस विचार अथवा प्रार्थना में विश्वास नहीं , वह मात्र शब्दाडम्बर है। जब किसी भी कारण से व्यक्ति का विश्वास डगमगाने लगता है तो ईश्वर से की गई उसकी प्रार्थना फलित नहीं हो सकती।

सर्वव्यापी ऊर्जा के रूप में नए ईश्वर की स्थापना ही ‘ रेकी ‘ है। जैसे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं , वैसे ही रेकी ऊर्जा का आह्वान करते हैं। रेकी ऊर्जा या रेकी उपचार के प्रति आपके विश्वास का स्तर जितना अधिक होगा , उतना ही अधिक लाभ रेकी का अभ्यास आपको पहुंचाएगा। विश्वास के स्तर पर देखें तो जब तक ईश्वर में विश्वास था तो वह हमारी प्रार्थनाओं के माध्यम से हमारी इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम था और अब यदि रेकी ऊर्जा में दृढ़ विश्वास है तो रेकी ऊर्जा हमारी इच्छाओं की पूर्ति में सहायक हो रही है। ईश्वर हो अथवा रेकी ऊर्जा या अन्य कोई ऊर्जा या ईश्वर रूप- हमारे विश्वास के बिना कोई हमारी सहायता नहीं कर सकता। विश्वास का उद्गम हमारा मन है , अत: ईश्वर हो अथवा रेकी ऊर्जा , दोनों हमारे मन की स्थितियां हैं।

🌻🌻कुण्डलिनी शक्ति🌻🌻मनुष्य शरीर स्थित कुंडलिनी शक्ति में जोचक्र स्थित होते हैं उनकी संख्या सात बताई गई है।यह जानकारी शास्...
15/11/2018

🌻🌻कुण्डलिनी शक्ति🌻🌻

मनुष्य शरीर स्थित कुंडलिनी शक्ति में जो
चक्र स्थित होते हैं उनकी संख्या सात बताई गई है।
यह जानकारी शास्त्रीय, प्रामाणिक एवं
तथ्यात्मक है-

(1) 🌹मूलाधार चक्र - गुदा और लिंग के बीच चार
पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही
एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। वहाँ
वीरता और आनन्द भाव का निवास है ।

(2)🌹 सवाधिष्ठान चक्र - इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में
है । उसकी छ: पंखुरियाँ हैं । इसके जाग्रत होने पर
क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों
का नाश होता है ।

(3) 🌹मणिपूर चक्र - नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । यह
प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा,
भय, घृणा, मोह, आदि कषाय-कल्मष मन में लड़ जमाये पड़े रहते
हैं ।

(4) 🌹अनाहत चक्र - हृदय स्थानमें अनाहत चक्र है । यह
बारह पंखरियों वाला है । यह सोता रहे तो लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़,
कुतर्क, चिन्ता, मोह, दम्भ, अविवेक अहंकार से भरा रहेगा ।
जागरण होने पर यह सब दुर्गुण हट जायेंगे ।

(5) 🌹विशुद्ध चक्र - कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह
सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है।
यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है

(6) 🌹आज्ञाचक्र - भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ '?'
उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर
आदिका निवास है । इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से यह
सभी शक्तियाँ जाग पड़ती हैं।

(7) 🌹सहस्रार चक्र - सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क
के मध्यभाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर
अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग
सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का
स्वयंभू प्रवाह उभरता है । किसी भी
साधना के सफल होने का प्रतिशत साधक के शरीर के
चक्रों के संतुलित होने पर निर्भर करता है । साधक को चाहिए कि
वो मूलाधार से आरंभ कर सहस्त्रार तक के चक्रों का मूल मंत्र
के साथ बीज मंत्र की 108 माला एक
ही दिन मे करें ।
🍀🍀चक्र जागरण के मंत्र....🍀🍀
🌼*मूलाधार चक्र – “ ॐ लं परम तत्वाय गं ॐ
फट “
🌼* स्वाधिष्ठान चक्र – “ ॐ वं वं स्वाधिष्ठान जाग्रय
जाग्रय वं वं ॐ फट “
🌼* मणिपुर चक्र – “ ॐ रं जाग्रनय ह्रीम
मणिपुर रं ॐ फट “
🌼* अनाहत चक्र – “ ॐ यं अनाहत जाग्रय जाग्रय
श्रीं ॐ फट “
🌼* विशुद्ध चक्र – “ ॐ ऐं ह्रीं
श्रीं विशुद्धय फट “
🌼* आज्ञा चक्र – “ ॐ हं क्षं चक्र जगरनाए
कलिकाए फट “
🌼* सहस्त्रार चक्र – “ ॐ ह्रीं सहस्त्रार
चक्र जाग्रय जाग्रय ऐं फट “
🌻बीज मंत्र , जिनकी 108 माला
करनी है ( एक दिन मे एक चक्र पर ही
108 माला करना है ...
मूलाधा से आरंभ करना है )-

1 🔺मूलाधार – “ लं “
2 ♦सवाधिष्ठान- “ वं “
3 🔺मणिपुर – “ रं “
4 ♦अनाहत- “ यं “
5🔺 विशुद्ध – “ हं “
6 ♦आज्ञा – “ ॐ “
7🔺 सहस्त्रार – “ ॐ

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