08/10/2026
🙏श्री हनुमान जी के विशुद्ध प्रेम और भक्ति से जुड़ा एक सुंदर प्रसंग 👇👇👇
गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के लंकाकाण्ड की शुरुआत में जब भगवान श्री राम जी वानर सेना सहित समुद्र तट पर डेरा डाले, तब शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा को देखकर श्री राम जी और उनके सखाओं के बीच चंद्रमा के काले धब्बे (कलंक) को लेकर संवाद होता है।
प्रभु श्री राम जी ने सभी से पूछा कि चंद्रमा में यह कालापन क्या है:
कहै रामु सब सुनहु कबीसा। कहहु चंद महँ राहु कि कीसा॥
कौउ कह बिषम भूमि बहु भाई। कौउ कह परछाहिं छिति छाई॥
अर्थ: श्री राम जी ने कहा—हे वानरराज सुग्रीव! सुनो, बताओ तो चंद्रमा में यह क्या है? राहु है या कोई बंदर ? किसी ने कहा—भाई, इसमें ऊबड़-खाबड़ विषम भूमि है; किसी ने कहा—इसमें पृथ्वी की छाया दिखाई देती है।
सुग्रीव जी भी अपना मत रखते हैं:
कहा सुग्रीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कइ झाँई॥
अर्थ: सुग्रीव जी ने कहा—हे रघुनाथ जी! सुनिए, चंद्रमा में पृथ्वी की छाया साफ़ दिखाई पड़ रही है।
फिर भगवान श्री राम जी स्वयं एक रोचक कल्पना रखते हैं:
कहा राम सब सुनहु सयाने। ससि कर सहोदरा बिष जाने॥
बिष प्रिय अति तातें उर राखा। करइ प्रगट निज बिरह कराखा॥
अर्थ: श्री राम जी ने कहा—हे चतुर वीरों! सुनो, विष चंद्रमा का सगा भाई है (क्योंकि दोनों समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए थे)। चंद्रमा को विष अत्यंत प्रिय है, इसलिए उसने विष को अपने हृदय में बसा रखा है, जो अपने विरह के कालेपन के रूप में प्रकट हो रहा है।
अंत में, जब प्रभु श्री राम ने हनुमान जी से पूछा, तब हनुमान जी ने विशुद्ध प्रेम और भक्ति से भरा उत्तर दिया:
कह हनुमंत सुनहु प्रभु प्रबीन। ससि तुम्हार प्रिय दास अदीन॥
तव मूरति बिधु उर अति प्रीती। बसति सदा यह सुंदर रीती॥
सोइ मूरति प्रगटति सब काहू। कहत लोग छबि छाँह अकाहू॥
अर्थ: श्री हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा—हे चतुर प्रभु! सुनिए, चंद्रमा आपका अत्यंत विनम्र और प्रिय दास है। उसके हृदय में आपकी श्यामल (नीलवर्ण) छवि अत्यंत प्रेमपूर्वक बसी हुई है। वही आपकी सुंदर श्यामल मूरत चंद्रमा के वक्षस्थल पर बाहर झलक रही है, जिसे संसार अज्ञानवश चंद्रमा का कलंक या धब्बा कहता है।
🌹 जय सियाराम 🌹 जय हनुमान जी 🌹