26/05/2026
आज एशिया की सबसे बड़ी इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद जाने और वहाँ के माहौल को करीब से देखने का अवसर मिला।
इस दौरान मौलाना अरशद मदनी साहब के दौलतखाने पर मुलाकात हुई। देश में चल रहे मौजूदा सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई। खास तौर पर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को लेकर मौलाना साहब द्वारा उठाई गई आवाज़ के लिए उनका धन्यवाद किया और इस सामाजिक सद्भाव और भाईचारे के मिशन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का भरोसा दिया।
मौलाना साहब से मुलाकात बेहद सकारात्मक, सौहार्दपूर्ण और प्रेरणादायक रही।
उन्होंने जिस तरह देश में अमन, इंसानियत, आपसी सम्मान और संविधानिक मूल्यों की बात रखी, वह वास्तव में सराहनीय है।
इसके बाद दारुल उलूम देवबंद को नज़दीक से देखने और समझने का मौका मिला। अक्सर इस संस्था को लेकर जो झूठे आरोप लगाए जाते हैं कि यहाँ कट्टरता या आतंकवाद की शिक्षा दी जाती है, वह पूरी तरह बेबुनियाद और राजनीतिक प्रोपेगेंडा है।
हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। यहाँ शिक्षा, अनुशासन, नैतिकता, इंसानियत, भाईचारा और देशप्रेम का माहौल देखने को मिला।
दारुल उलूम ने केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं दी, बल्कि भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संस्था से जुड़े अनेक उलेमाओं ने अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष किया और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानियाँ दीं।
सबसे ज्यादा खुशी उस समय हुई जब दारुल उलूम की लाइब्रेरी में हिंदू धर्मग्रंथ — मनुस्मृति, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद आदि पुस्तकों को भी सम्मान के साथ रखा देखा।
यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि दारुल उलूम देवबंद नफरत नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, धार्मिक सहिष्णुता और “सर्व धर्म समभाव” का संदेश देता है।
मैं अपने सभी हिंदू-मुस्लिम भाइयों से कहना चाहूँगा कि किसी भी संस्था के बारे में राय बनाने से पहले एक बार खुद वहाँ जाकर देखें, समझें और सच जानें।
सोशल मीडिया और राजनीति के जरिए फैलाए गए भ्रम से ऊपर उठकर सच्चाई को पहचानना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
दारुल उलूम देवबंद हमेशा से अमन, शिक्षा, इंसानियत और भाईचारे का केंद्र रहा है और आगे भी देश में एकता और सौहार्द को मजबूत करने का काम करता रहेगा।
हिंदू-मुस्लिम एकता ज़िंदाबाद 🇮🇳
आपसी भाईचारा ज़िंदाबाद 🤝
भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब अमर रहे ❤️
Harsh Chhikara ✍️✍️