I am Rajpurohit and am proud to be one

I am Rajpurohit and am proud to be one Rajpurohit (राजपुरोहित) is a subgroup of Hindu Brahmins (Brāhmaṇa, ब्राह्मणः) with its roots in Rishikul (great revered Indian sages from Vedic era) in India.

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22/02/2017

कमाल का मैसेज

अर्जुन श्री कृष्णजी से बोले :-
केशव ,जब मृत्यु सभी की होनी है तो हम सत्संग भजन सेवा सिमरन क्यों करे जो इंसान मौज मस्ती करता है मृत्यु तो उसकी भी होगी ।

श्री कृष्णजी ने अर्जुन से कहा :- हे पार्थ
बिल्ली जब चूहे को पकड़ती है तो दांतो से पकड़कर उसे मार कर खा जाती है । लेकिन उन्ही दांतो से जब अपने बच्चे को पकड़ती है तो उसे मारती नहीं बहुत ही नाजुक तरीके से एक जगह से दूसरी जगह पंहुचा देती है । दांत भी वही है मुह भी वही है पर परिणाम अलग अलग । ठीक उसी प्रकार मृत्यु भी सभी की होगी पर एक प्रभु के धाम में और दूसरा 84 के चक्कर में!! 🙏👏👌👏👌👏👌 सुभ प्रभात आप का हर दिन मंगलमय रहे 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

18/05/2016

🍁🍂🌾🍁🍂🌾🍁जब शयन का समय होता है तब श्रीनाथजी का ह्रदय भर आता है, नेत्र से आँसू छलकने लगते है।
श्री गुंसाईजी जब भोग धरने पधारे है तब श्रीनाथजी की ये अवस्था देखे तब श्री गुंसाईजी को सहन नही होती ।
ये प्रीत इतनी अद्भुत है की शेषजी भी स्वयं के सहस्त्र मुखो से इसका वर्णन करने का प्रयत्न करते है लेकिन कर नही सकते ।
"गोकुल पधारने का समय हुआ है" ये भाव जब श्री गुंसाईजी के ह्रदय में आवे तब श्री गुंसाईजी के नेत्रो से अश्रुधारा बहने लगे ।
श्री गुंसाईजी जब श्रीनाथजी की टहेल करे तब श्रीनाथजी को इतना आनंद आता है इतना सुख मिलता है की कभी सेवा में किसी चीज की कमी पड़ जाय तब श्रीनाथजी को कमी महसूस नही होती । श्रीनाथजी को एक ही बात का खूब आनंद रहता है की मेरे श्री गुंसाईजी मेरे पास है ।
"सुनियत कथा जलद चातक की कुमुदिनी चंद चकोर विशेखि" ।
श्री गुंसाईजी आज्ञा माँगने के पश्चात श्रीनाथजी के श्री मुख के दर्शन करते करते मन्दिर के द्वार के बहार होते है तब श्रीनाथजी चरणचोकि से उतरकर दौड़ते दौड़ते निज मन्दिर की खिड़की पर जाकर खड़े हो जाते है ।
श्री गुंसाईजी को गोकुल पधारते हुए श्रीनाथजी निज मन्दिर की खिड़की से देखते है तब श्रीनाथजी के नेत्रों से अश्रु धारा बहती है । श्री गुंसाईजी घोड़े पर सवार होकर गोकुल पधारते है तब दोनों स्वरूप की दृष्टी एक दूसरे पर है ।
जब श्री गुंसाईजी गोकुल जाने की आज्ञा माँगते है तब श्रीनाथजी व श्री गुंसाईजी का ह्रदय भर आता है । दोनों स्वरूप एक दूसरे की तरफ दृष्टी भी नही कर सकते क्योकि श्री गुंसाईजी के कोई प्राण है तो वो है श्रीनाथजी और श्रीनाथजी के प्राण श्री गुंसाईजी है ।
जब श्री गुंसाईजी गोकुल जाने हेतु आज्ञा लेने जाते है तब श्रीनाथजी के चरण दृढ़ता से पकड़कर स्वयं का मस्तक श्रीनाथजी के चरण में रख देते है ।
श्री गुंसाईजी नेत्रों द्वारा कहे कृपानाथ "आप धैर्य धारण करो मैं कल जरूर पधारूँगा" ।
और कहते है - कृपानाथ गोकुल जाने की आज्ञा दो। तब केसी दशा होवे दोनों स्वरूप की ---
"आज्ञा माँग चले श्री गोकुल फिर फिर झाँक झरोखन पेखी" ।
श्री गुंसाईजी विचार करते है की श्रीनाथजी से आखिर कैसे आज्ञा लूँ की आपको छोड़कर गोकुल जाउ ? श्री गुंसाईजी को खबर है की श्रीनाथजी आपके बिना एक पल नही रह सकते ।
दुनिया में जब भी प्रेम की बात आवे तब प्रेमियो के दृष्टांत चन्द्रमा और चकोर, मेघ और चातक के दृष्टांत देते है । लेकिन श्री यशोदानंदन और वल्लभनन्दन जैसी प्रीत तो कहि देखी ही नही । ये दोनों स्वरूप जितना वियोग का अनुभव करते है इतना अनुभव इस जगत में कोई नही कर सकता ।
यशोमतीसुत श्री वल्लभसुत जैसी, शेष सहस्त्र जात न लेखी ।
जब श्री गुंसाईजी के गोकुल पधारने का समय होता है तब श्री गुंसाईजी श्रीनाथजी के सन्मुख होते है । दोनों स्वरूप के श्री मुख झुके हुए रहे ।
श्री गुंसाईजी की ऐसी दशा देखकर श्रीनाथजी के नेत्रो से आँसू आने लगे और विचार करे की आखिर कैसे श्री गुंसाईजी को गोकुल जाने की आज्ञा दू ? श्रीनाथजी खूब ध्यान रखते है की श्री गुंसाईजी मेरे आँसू देख ना ले । जो मेरे आँसू देख लेंगे तो श्री गुंसाईजी यहीँ मूर्छित हो जाएंगे ।
श्री गोविन्दस्वामी इन दोनों स्वरूप का विप्रयोग देख नही सकते इसलिए कहते है की-हे ! प्रभु आपसे विनती है की एक क्षण के लिए भी आप बिछड़ो नही क्यों की बिछड़ने से आप दोनों स्वरूप को खूब विप्रयोग होता है ।
प्रीत का एक मुख्य लक्षण ये है की कौन कर रहा है ये महत्व रखता है । क्या कर रहे है ये महत्व नही रखता ।। इसलिए दोनों स्वरूप के प्रेम का आगे वर्णन करते हुए कहते है की ---
श्री गुंसाईजी श्रीनाथजी को जो भी धरावे, जो श्रृंगार करे वो श्रीनाथजी अति प्रसन्न होकर धारण करते है ।
श्रीनाथजी को खबर है की श्री गुंसाईजी सब कुछ् सहन कर लेंगे लेकिन मेरे नेत्रों के आँसू वो भी स्वयं के लिये ये तो कभी श्री गुंसाईजी सहन नही कर सकते ।
श्री गुंसाईजी अश्रु छुपाने का प्रयास करते है और विचार करते है की - मेरे आँसू श्रीनाथजी देख ना ले । जो मेरे श्रीनाथजी मेरे अश्रु देख लेंगे तो सहन नही कर सकेंगे । मेरे प्रभु सबकुछ सहन कर सकते है लेकिन मेरे अश्रु नही ।
इनको कियो सबे जीय भावत, करत श्रृंगार विचित्र विशेखि, गोविन्द गोवर्धन पे माँगत बिसरो पलछिन न अर्ध निमेखि ।।
गोविंदस्वामी कहते है की - नेत्र की पलक बंध होती है इसके आधे समय के लिए भी आप दोनो स्वरूप एक दूसरे से दूर ना हो ऐसा मैं माँगता हूँ ।🍁🌾🍂🍁🌾🍂🍁
Nmaskar

18/05/2016

आप आज तक श्रीकृष्‍ण के कई मंदिरों में गए होंगे, लेकिन क्‍या आपने कभी उनकी किसी पत्‍नी के मंदिर के बारे में सुना या देखा है। यदि नहीं तो आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बता रहे तो उनकी पत्‍नी के नाम पर बना दुनिया का एकमात्र मंदिर है। यहां पर अपनी मन्‍नत मांगने काफी संख्‍या में लोग आते हैं। यह मंदिर आंध्र प्रदेश के पुट्टपर्थी में स्थित है और भगवान श्रीकृष्‍ण की आठ पटरानियों में से एक स्‍त्‍यभामा को समर्पित है।
सत्यभामा भगवान कृष्ण की आठ पटरानियों में से एक थीं। आंध्र प्रदेश में देवी सत्यभामा का एक मंदिर है। इस मंदिर की स्थापना के पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी है।
कहा जाता है कि एक बार साईं बाबा के दादाजी को सपने में देवी सत्यभामा ने दर्शन दिए थे। दर्शन देकर देवी सत्यभामा ने उन्हें अपना मंदिर बनाने का आदेश दिया। देवी सत्यभामा के कहने पर साईं बाबा के दादाजी ने उनके इस मंदिर का निर्माण करवाया।
पुराणों में देवी सत्यभामा को इच्छाशक्ति की देवी के रूप में दर्शाया गया है। हर वर्ष लोग यहां पर अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए और भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए आते हैं।

18/05/2016

🍁🌀🍁🌀🍁🌀🍁🌀🍁🌀🍁
बिन हरिनाम गुजारा नहीं,
रे बावरे मन किनारा नहीं ।।
🌀
नाव पुरानी, चंचल धारा, मौसम तूफानों का,
खेते-खेते हिम्मत हारी, डगमग डोले नौका,
प्रीतम को जो पुकारा नहीं,
रे बावरे मन गुजारा नहीं ।।
🍁
फँसता क्यों जाता माया में, ये है नागिन काली,
डस जायेगी बच कर रहना, चौतरफ़ा मुँह वाली,
फिर ये जनम दुबारा नहीं,
रे बावरे मन गुजारा नहीं ।।
🌀
अब तो तूं इस नैया को, करदे श्याम हवाले,
बस की बात नहीं बन्दे की, वो दातार सम्हाले,
अहम का भाव गवारा नहीं,
रे बावरे मन गुजारा नहीं ।।
🍁
ये भी मौका चूक गया 'शिव', तो क्या आनी-जानी,
श्यामबहादुर जाग नींद से, जीवन ओस का पानी,
फूल के होना गुब्बारा नहीं,
रे बावरे मन गुजारा नहीं ।।
🍁🌀🍁
स्व. शिवचरणजी भीमराजका 'शिव' द्वारा
'ज्योत से ज्योत जगाते चलो' गीत की तर्ज़
पर रचित अनुपम भावपूर्ण भजन ।
🍁🌀🍁🌀🍁🌀🍁🌀🍁🌀🍁

18/05/2016

. *“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”*

साहब मैं थाने नहीं आउंगा,

अपने इस घर से कहीं नहीं जाउंगा,

माना पत्नी से थोडा मन मुटाव था,

सोच में अन्तर और विचारों में खिंचाव था,

*पर यकीन मानिए साहब ,*
*“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”*

मानता हूँ कानून आज पत्नी के पास है,

महिलाओं का समाज में हो रहा विकास है।

चाहत मेरी भी बस ये थी कि माँ बाप का सम्मान हो,

उन्हें भी समझे माता पिता, न कभी उनका अपमान हो।

पर अब क्या फायदा, जब टूट ही गया हर रिश्ते का धागा,

*यकीन मानिए साहब,*
*“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”*


परिवार के साथ रहना इसे पसंन्द नहीं,

कहती यहाँ कोई रस, कोई आनन्द नही,

मुझे ले चलो इस घर से दूर, किसी किराए के आशियाने में,

कुछ नहीं रखा माँ बाप पर प्यार बरसाने में,

हाँ छोड़ दो, छोड़ दो इस माँ बाप के प्यार को,

नहीं मांने तो याद रखोगे मेरी मार को,

बस बूढ़े माता पिता का ही मोह, न छोड़ पाया मैं अभागा,

*यकींन मानिए साहब,*
*“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”*

फिर शुरू हुआ वाद विवाद माँ बाप से अलग होने का,

शायद समय आ गया था, चैन और सुकून खोने का,

एक दिन साफ़ मैंने पत्नी को मना कर दिया,

न रहुगा माँ बाप के बिना ये उसके दिमाग में भर दिया।

बस मुझसे लड़ कर मोहतरमा मायके जा पहुंची,

2 दिन बाद ही पत्नी के घर से मुझे धमकी आ पहुंची,

माँ बाप से हो जा अलग, नहीं सबक सीखा देगे,

क्या होता है दहेज़ कानून तुझे इसका असर दिखा देगें।

परिणाम जानते हुए भी हर धमकी को गले में टांगा,

*यकींन माँनिये साहब ,*
*“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”*



जो कहा था बीवी ने, आखिरकार वो कर दिखाया,

झगड़ा किसी और बात पर था, पर उसने दहेज़ का नाटक रचाया।

बस पुलिस थाने से एक दिन मुझे फ़ोन आया,

क्यों बे, पत्नी से दहेज़ मांगता है, ये कह के मुझे धमकाया।

माता पिता भाई बहिन जीजा सभी के रिपोर्ट में नाम थे,

घर में सब हैरान, सब परेशान थे,

अब अकेले बैठ कर सोचता हूँ, वो क्यों ज़िन्दगी में आई थी,

मैंने भी तो उसके प्रति हर ज़िम्मेदारी निभाई थी।

आखिरकार तमका मिला हमे दहेज़ लोभी होने का,

कोई फायदा न हुआ मीठे मीठे सपने सजोने का।

बुलाने पर थाने आया हूँ, छूप कर कहीं नहीं भागा,

*लेकिन यकींन मानिए साहब ,*
*“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”*

😪 *झूठे दहेज के मुकदमों के कारण ,*
*पुरुष के दर्द से ओतप्रोत एक मार्मिक कृति…* 🙏🏻

*दहेज की ये कविता कई घरो की हकीकत है*
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✍सर्वे भवन्तु सुखिनः✍🏻
🐅⛳जय जय सियाराम⛳🐅

01/04/2016

🙌🏻हरि इच्छा बलवान्🙌🏻

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एक बार भगवान विष्णु गरुड़जी पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर जा रहे थे। रास्ते में गरुड़जी ने देखा कि एक ही दरवाजे पर दो बाराते ठहरी थी।
मामला उनके समझ में नहीं आया। फिर क्या था, पूछ बैठे प्रभु को।👣

गरुड़जी बोले ! प्रभु ये कैसी अनोखी बात है कि विवाह के लिए कन्या एक और दो बारातें आई है। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा है।☺

प्रभु बोले- हां एक ही कन्या से विवाह के लिए दो अलग अलग जगह से बारातें आई है। एक बारात पिता द्वारा पसंद किये गये लड़के की है, और दूसरी माता द्वारा पसंद किये गये लड़के की है।👣

यह सुनकर गरुड़जी बोले- आखिर विवाह किसके साथ होगा ?
प्रभु बोले- जिसे माता ने पसंद किया और बुलाया है उसी के साथ कन्या का विवाह होगा।😊

भगवान की बाते सुनकर गरुड़जी चुप हो गए और भगवान को कैलाश पर पहुंचाकर कौतुहल वश पुनः उसी जगह आ गए जहां दोनों बारातें ठहरी थी।👣

गरुड़जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं माता के बुलाए गए वर को यहां से हटा दूं तो कैसे विवाह संभव होगा।☺

फिर क्या था; उन्होंने भगवद्विधान को देखने की जिज्ञासा के लिए तुरन्त ही उस वर को उठाया और ले जाकर समुद्र के एक टापू पर धर दिए।😊

ऐसा कर गरुड़जी थोड़ी देर के लिए ठहरे भी नहीं थे कि उनके मन में अचानक विचार दौड़ा कि मैं तो इस लड़के को यहां उठा लाया हूँ पर यहां तो खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं है,
ऐसे में इस निर्जन टापू पर तो यह भूखा ही मर जाएगा और वहां सारी बारात मजे से छप्पन भोग का आनन्द लेंगी,
यह कतई उचित नहीं है। इसका पाप अवश्य ही मुझे लगेगा। मुझे इसके लिए भी खाने का कुछ इंतजाम तो करना ही चाहिए।👣

यदि विधि का विधान देखना है तो थोड़ा परिश्रम तो मुझे करना ही पड़ेगा। और ऐसा विचार कर वे वापस उसी स्थान पर फिर से आ गए।☺

इधर कन्या के घर पर स्थिति यह थी कि वर के लापता हो जाने से कन्या की माता को बड़ी निराशा हो रही थी। परन्तु अब भी वह अपने हठ पर अडिग थी।😊

अतः कन्या को एक भारी टोकरी में बैठाकर ऊपर से फल-फूल, मेवा-मिष्ठान्न आदि सजा कर रख दिया, जिसमें कि भोजन-सामग्री ले जाने के निमित्त वर पक्ष से लोग आए थे।👣

माता द्वारा उसी टोकरी में कन्या को छिपाकर भेजने के पीछे उसकी ये मंशा थी कि वर पक्ष के लोग कन्या को अपने घर ले जाकर वर को खोजकर उन दोनों का ब्याह करा देंगे।😊

माता ने अपना यह भाव किसी तरह होने वाले समधि को सूचित भी कर दिया।☺

अब संयोग की बात देखिये, आंगन में रखी उसी टोकरी को जिसमे कन्या की माता ने विविध फल-मेवा, मिष्ठान्नादि से भर कर कन्या को छिपाया था, गरुड़जी ने उसे भरा देखकर उठाया और ले उड़े।😊

उस टोकरी को ले जाकर गरुड़जी ने उसी निर्जन टापू पर जहां पहले से ही वर को उठा ले जाकर उन्होंने रखा था, वर के सामने रख दिया।👣

इधर भूख के मारे व्याकुल हो रहे वर ने ज्यों ही अपने सामने भोज्य सामग्रियों से भरी टोकरी को देखा तो बाज की तरह उस पर झपटा।☺

उसने टोकरी से जैसे ही खाने के लिए फल आदि निकालना शुरू किया तो देखा कि उसमें सोलहों श्रृंगार किए वह युवती बैठी है जिससे कि उसका विवाह होना था।😊

गरुड़जी यह सब देख कर दंग रह गए।
उन्हें निश्चय हो गया कि :–‘हरि इच्छा बलवान।’☺

👣‘राम कीन्ह चाहैं सोई होई।
करै अन्यथा आस नहिं कोई।’👣
👇🏻
फिर तो शुभ मुहुर्त विचारकर स्वयं गरुड़जी ने ही पुरोहिताई का कर्तव्य निभाया। वेदमंत्रों से विधिपूर्वक विवाह कार्य सम्पन्न कराकर वर-वधु को आशीर्वाद दिया और उन्हें पुनः उनके घर पहुंचाया।😊

तत्पश्चात प्रभु के पास आकर सारा वृत्तांत निवादन किए और प्रभु पर अधिकार समझ झुंझलाकर बोले-
प्रभो ! आपने अच्छी लीला करी, सारा ब्याह कार्य हमीं से करवा लिया।
भगवान गरुड़जी की बातों को सुनकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।🤗🤗

जय गौमाता🙏🏻🐄🙏🏻🐄

वन्दे गौ मातरम⛳⛳🐄⛳⛳

🚩🚩🙏🏻🙏🏻जय जय श्रीराधेकृष्णजी🙏🏻🙏🏻🚩🚩

01/04/2016

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07/12/2014

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