MAHA MURMU

MAHA MURMU Lifestyle of common people

14/02/2024

संताल समाज के अधिकांश लोग अपने धर्म और अपनी संस्कृति की जानकारी से बेहद अनजान हैं। वे खुद को नहीं जानते हैं कि वे कौन से धर्म के व्यक्ति हैं? क्या वे हिंदू हैं या नहीं ? वे कुछ नहीं जानते। यहां तक कि 99% मांझी बाबा लोग भी जो संताल गांव के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति और समाज के संचालक माने जाते हैं,वे भी इस बात से अनजान हैं कि वे कौन से धर्म के व्यक्ति हैं? वे सिर्फ धर्म जानते हैं।

पूर्वजों द्वारा बनाए हुए परंपराओं को रुटिन कार्य की तरह आगे ले जाना मांझी बाबा का कार्य है। लेकिन वे यह बिल्कुल नहीं जानते हैं कि उनका धर्म क्या हैं। जब समाज के अधिकांश लोगों को यह भी पता ही नहीं कि वे किस धर्म के व्यक्ति हैं ,तो यह समझना बहुत आसान हो जाता है कि संताल समाज की दुर्दशा किस हद तक होने वाला है।

कहने को तो आदिवासियों का गांव समाज स्वशासन व्यवस्था से बांधा हुआ है लेकिन स्वशासन से बांधे लोग मंदिर जाते हैं, सरस्वती पूजा करते हैं, दुर्गा पूजा करते हैं। हिंदू धर्म के सारे कर्मकांड करते हैं।कोई रोक-टोक नहीं है। क्या ऐसे लोग और ऐसे मांझी बाबा अपनी संस्कृति और परंपरा को बचा पाएंगे? बिल्कुल भी नहीं।

न सिर्फ मांझी बाबा लोग बल्कि समाज के तमाम धार्मिक और सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन के लोग भी धर्म के ज्ञान से कोसों दूर हैं। वे भी सिर्फ धर्म को जानते हैं किन्तु वे कौन से धर्म से हैं बिल्कुल नहीं जानते हैं। संतालों के बहुत से धर्म गढ़ हैं। जैसे____

लुगु बुरु घंटाबाड़ी धोरोम गढ़, ललपनिया।

जाहेर आयो धोरोम गढ़, रजरप्पा।

मारंग बुरु धोरोम गढ़, गिरिडीह।

कुडी बुरु धोरोम गढ़, बोकारो।

बागा बाबा परगाना धर्म गढ़, बोकारो।

अयोध्या बुरु धोरोम गढ़, पुरुलिया।

उपरोक्त सारे के सारे धर्म गढ़ हैं लेकिन क्या धर्म गढ़ है, कौन सा धर्म का गढ़ है,नापता है।

जब समाज के कर्ता धर्ता,समाज के अगुआ, मांझी बाबा, पढ़े लिखे आदिवासी लोग, बुद्धिजीवी, माता-पिता आदि को ही धर्म के बारे में कुछ नहीं पता तो आने वाले छोटे बच्चे क्या करेंगे? क्या हम बच्चों को दोष देंगे? आज के दौर में भी कोई अपने बच्चों को सरना धर्म के परिचय तक नहीं दे पाए हैं तो इससे ज्यादा और हास्यास्पद बात क्या हो सकती है?

आज अगर हमारे संताल समाज के छोटे-बड़े बच्चे, युवक, युवतियां आदि सरस्वती पूजा के आयोजन में दमखम से भाग लेते हैं तो इसका श्रेय किसी RSS संगठन या हिंदू लोगों को नहीं देना चाहिए। चूंकि,कोई भी किसी को भी किसी धर्म मनवाने के लिए जोर-जबरदस्ती नहीं करता है, बल्कि संताल लोग स्वयं जाते हैं। स्वयं सरस्वती पूजा का आयोजन भी करते हैं। किन्तु उनको समझाने वाला कोई नहीं है। ऐसी परिस्थिति में समाज के लोग किसी भी धर्म की ओर जाने के लिए स्वतंत्र हैं।ये भी धर्म है,वह भी धर्म है।सब धर्म है। वे कहीं भी जाएं।

जब आदिवासियों के धर्म का कोई परिचय ही नहीं है तो संताल लोग अपने धर्म के साथ हिंदू धर्म का ठप्पा क्यों नहीं लगायेंगे? ईसाई धर्म का ठप्पा क्यों नहीं लगायेंगे? चूंकि संतालों के पास तो बिना नाम का धर्म जो है। बिना नाम वाला धर्म का कोई महत्त्व नहीं होता। बिना नाम का कोई चीज समाज के अस्तित्व में कैसे बना रह सकता है!

जब आदिवासियों को पता हो जाएगा कि हम जिस धार्मिक पद्धति का पालन करते हैं वह सरना धर्म है तो वे निश्चित रुप से अपने मूल धर्म के पूजा पद्धति को ही प्राथमिकता देंगे। उसी पर टिके रहेंगे। हिंदू, मुस्लिम आदि धर्म की तरफ बिल्कुल भी नहीं जाएंगे।

वीरेंद्र कुमार बास्के।

10/02/2024
09/02/2024

*झारखंड में संताली भाषा प्रेमी नहीं हैं____*

✍️ वीरेंद्र कुमार बास्के

संताली भाषा संतालों के लिए उज्जवल भविष्य निर्माण का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता था। किन्तु अनपढ़ और मूर्खता के कारण संतालों ने इतने बड़े अवसर को गवां दिया। चूंकि, झारखंड में संताली भाषा प्रेमी नहीं हैं।

पूर्व सांसद श्री सालखन मुर्मू के आंदोलन के परिणाम स्वरुप संताली भाषा भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में साल 2003 में शामिल हुआ। किन्तु अभी तक झारखंड राज्य में संताली भाषा को राजभाषा के रुप में शामिल नहीं कराया जा सका। आखिर गलती किसकी? सत्ता में बैठे चाटुकारों की या हांड़िया दारु के नशा में डूबे संताल समाज के लोगों की?

सोचने वाली बात यह है कि भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में से 21 भाषाओं को किसी न किसी राज्य में प्रथम राजभाषा के रुप में अपनाया जा चुका है। उन सारे भाषाओं को पठन-पाठन में, प्रतियोगी परीक्षाओं में,नयोदय विद्यालयों के पठन-पाठन में, राज-काज की भाषा में शामिल कर लिए गये हैं किन्तु संताली ही एक ऐसी भाषा है जो संवैधानिक मान्यता के बावजूद आज भी एक घरेलू बोल-चाल की भाषा तक सीमित कर दी गई है। गलती किसकी? समाज की या सरकार की?

झारखंड अलग राज्य निर्माण के बाद से झारखंड में सबसे अधिक शासन संतालों ने ही किया। झारखंड में सबसे अधिक विधायक और मंत्री संताल ही हैं। झारखंड राज्य में सबसे अधिक जनसंख्या संतालों की है। एक समय मुख्यमंत्री, विरोधी दल नेता, राज्यपाल आदि सभी संताल ही रहे हैं।आज भी संताल मुख्यमंत्री ही राज्य के सत्ता में काबिज है। लेकिन संताली भाषा को राजभाषा बनाने की मुद्दे कहां है? एक अकेला सालखन मुर्मू संताली भाषा को राजभाषा बनाने के लिए संघर्षरत हैं। लेकिन इस संघर्ष में संताल समाज कहां हैं? बाकी संताल नेता कहां हैं?

*कुड़मी मारेंगे गे बाजी!*

झारखंड के जितने भी राजनीतिक पार्टियां हैं, लगभग सभी पार्टियों में कुड़मी लोगों का दबदबा है।कुड़मी समाज के लोग राजनीतिक रुप से बहुत जागरूक हैं। यूं कहें कि आदिवासी से क‌ई गुणा बेहतर समझ रखते हैं। आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी बहुत बेहतर हैं। वे कोई भी पार्टी में रहें किन्तु अपने सामाजिक मुद्दों के प्रति सभी एकजुट हैं। अतः वर्तमान और आने वाला समय कुड़मियों का है।

वे आदिवाससियों के राजनीतिक समझदारी को भांप चुके हैं।वे जान चुके हैं कि आदिवासी नेताओं के जिंदाबाद और मुर्दाबाद तक ही सीमित हैं। अतः आदिवासी समाज आबुआग् दिसोम रे आबुआग् राज की परिभाषा से बहुत अनभिज्ञ हैं। आदिवासी मुख्यमंत्री और मंत्री बनना और बनाना ही आदिवासियों का मुख्य उद्देश्य है। आदिवासी भाषा को झारखंड राज्य में स्थापित करना आदिवासियों का उद्देश्य नगण्य है।

इधर कुड़माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की आंदोलन कुड़मियों ने शुरुआत कर दी हैं। दिल्ली जीत जाते हैं तो राज्य भी जीतेंगे।

जयराम महतो एक युवा कुड़मी नेता के रुप में उभर चुके हैं। *झारखंडी भाषा खातियान संघर्ष समिति* एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के रुप में स्थापित हो चुकी है। झारखंडी भाषा अर्थात *कुड़माली* भाषा को संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के कोशिश शुरू हो चुकी है। अतः आनेवाले लोकसभा चुनाव 2024 में जयराम महतो लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार के रुप में खड़े होने का मन बना चुके हैं। समाज का भी भरपूर साथ मिल रहा है। यदि कुड़माली भाषा को संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल कराने में सफल होते हैं तो संताली भाषा का अस्तित्व झारखंड से खत्म हो सकते हैं। चूंकि,यदि कुड़माली भाषा को राष्ट्रीय मान्यता मिल जाता है तो कुड़माली भाषा को राजभाषा बनाया जाने का आवाज भी प्रबल तरीके से उठाया जाएगा। हालांकि यह अभी शुरुआती दौर है लेकिन भविष्य में ऐसा ही होने वाला है।

याद रहे _____

*भारत देश में पांच भाषा परिवार हैं:-*

*(1) हिंद-आर्य भाषा परिवार:-*
हिंदी, संस्कृत, उर्दू, मराठी, नेपाली, बंगला, गुजराती, कश्मीरी आदि।

*(2) द्रविड़ भाषा परिवार:-*
तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम आदि।

*(3)आस्ट्रो एशियाटिक भाषा परिवार:-*
संताली, मुंडारी,हो,खड़िया आदि।

*(4) चीनी -तिब्बती भाषा परिवार:-*
नगा,मिजो,बोडो मणिपुरी,तमांग,दफला इत्यादि।

*(5)अंडमानी भाषा परिवार:-*
ग्रेट अंडमानी,ओंग,जारवा आदि।

संताली जिस आस्ट्रो एशियाटिक भाषा परिवार से ताल्लुक रखता है उस भाषा परिवार में संताली ही एकमात्र भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध है।यदि संताली भाषा को झारखंड राज्य में राजभाषा के रुप में शामिल नहीं किया जाता है तो आस्ट्रो एशियाटिक भाषा परिवार समूह के सभी भारतीय भाषा लुप्त हो जाएगा। और इसके दोषीदार सिर्फ और सिर्फ संताल होंगे।

संतालों का गौरव संताली भाषा आदिवासी राज्य में राजभाषा के मान्यता से वंचित है। गलती किसकी ? सरकार का या समाज?

भांडान,छाटियार, दोरबार,बाहा, सोहराय,बापला आदि परंपराओं को पालन करना ही समाज समझने वाले संताल आदिवासी क्या कभी मातृभाषा संताली को समाज का अंग मानेंगे या ऐसे ही चलता रहेगा?

सेंगेल जोहार 🙏🙏

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वीरेंद्र कुमार बास्के
सेंगेल ओनोलिया
बोकारो, झारखंड
8.2.2024
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