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अप्रैल से प्रारंभ होने वाला शैक्षणिक सत्र : क्या वास्तव में व्यवहारिक है?— तुलाराम अठ्यादेश में शिक्षा सुधार के नाम पर प...
23/05/2026

अप्रैल से प्रारंभ होने वाला शैक्षणिक सत्र : क्या वास्तव में व्यवहारिक है?
— तुलाराम अठ्या

देश में शिक्षा सुधार के नाम पर पिछले कुछ वर्षों से एक नई प्रवृत्ति तेजी से लागू की गई है—1 अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ करने की व्यवस्था। कागज़ों और सरकारी घोषणाओं में यह व्यवस्था आधुनिक, समयबद्ध और “सुधारित शिक्षा प्रणाली” के रूप में प्रस्तुत की जाती है, लेकिन ज़मीनी वास्तविकता इस दावे की पोल खोल देती है। सच यह है कि भारत जैसे विशाल और विविध जलवायु वाले देश में अप्रैल से शैक्षणिक सत्र शुरू करने का निर्णय न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह विद्यार्थियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और शैक्षणिक गुणवत्ता—तीनों के साथ गंभीर खिलवाड़ भी साबित हो रहा है।

मध्यप्रदेश सहित देश के अधिकांश मैदानी राज्यों में अप्रैल की शुरुआत के साथ ही तापमान 40 डिग्री के आसपास पहुंचने लगता है। स्कूल खुलते ही सरकारों को 10–15 अप्रैल के बाद ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित करना पड़ता है। यानी जिस “नए सत्र” को बड़े उत्साह से प्रारंभ किया जाता है, वह दो सप्ताह भी व्यवस्थित रूप से नहीं चल पाता। न पाठ्यपुस्तकें समय पर पहुंचती हैं, न शिक्षकों की पूरी तैयारी होती है और न ही अध्ययन-अध्यापन की नियमित प्रक्रिया शुरू हो पाती है। परिणाम यह होता है कि अप्रैल का पूरा महीना केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।

जून में विद्यालय पुनः खुलते हैं, लेकिन तब भीषण गर्मी, उमस और कई क्षेत्रों में जल संकट जैसी परिस्थितियाँ विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति में बाधा बनती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे, विशेषकर छोटे विद्यार्थी, इस स्थिति से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। अनेक स्थानों पर स्कूल भवनों में पंखों, शीतल पेयजल और पर्याप्त कक्षाओं तक की व्यवस्था नहीं होती। ऐसे में “समय पर सत्र प्रारंभ” करने का सरकारी दावा केवल प्रशासनिक आंकड़ों तक सीमित दिखाई देता है।

इस पूरी व्यवस्था का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अप्रैल से सत्र शुरू करने के नाम पर परीक्षाओं को लगातार समय से पहले कराया जा रहा है। अब वार्षिक परीक्षाएँ जनवरी के अंतिम सप्ताह से प्रारंभ होकर फरवरी में समाप्त हो जाती हैं। कक्षा 1 से 8 तक के परिणाम मार्च अंत तक जारी कर दिए जाते हैं और बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम अप्रैल में घोषित कर दिए जाते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि विद्यार्थियों का वास्तविक अध्ययन समय दो से ढाई महीने कम कर दिया गया है।

शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, समझ और व्यक्तित्व विकास होना चाहिए, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में पूरी शिक्षा परीक्षा-केंद्रित होकर रह गई है। विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम समझने, पुनरावृत्ति करने और विषयों को गहराई से पढ़ने का पर्याप्त समय ही नहीं मिल पाता। पूरे वर्ष आंतरिक मूल्यांकन, प्रोजेक्ट, यूनिट टेस्ट और फिर समयपूर्व वार्षिक परीक्षाओं का दबाव बना रहता है। शिक्षा अब सीखने की प्रक्रिया कम और “रिजल्ट उत्पादन प्रणाली” अधिक दिखाई देने लगी है।

स्थिति और गंभीर तब हो जाती है जब नई तकनीकों को बिना तैयारी लागू किया जाता है। इस वर्ष सीबीएसई द्वारा उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन में स्कैन कॉपी प्रणाली अपनाई गई। लेकिन पर्याप्त प्रशिक्षण और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में अनेक विद्यार्थियों और अभिभावकों ने मूल्यांकन त्रुटियों, अंक असंगतियों और गलत जांच की शिकायतें दर्ज कराईं। इससे परीक्षा परिणामों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया। यह दिखाता है कि शिक्षा सुधार के नाम पर जल्दबाजी में लिए जा रहे निर्णय विद्यार्थियों के भविष्य को प्रयोगशाला बना रहे हैं।

सरकारें दावा करती हैं कि अप्रैल से सत्र प्रारंभ करने से विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और मेडिकल-इंजीनियरिंग प्रवेश प्रक्रियाओं को समय पर पूरा किया जा सकेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि विद्यालयों में पढ़ाई जुलाई से पहले व्यवस्थित रूप से शुरू ही नहीं हो पाती। यानी प्रशासनिक कैलेंडर तो बदल गया, पर शिक्षा की वास्तविक परिस्थितियाँ वही बनी हुई हैं।

भारत की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियाँ यूरोपीय देशों से पूरी तरह भिन्न हैं। यहाँ अप्रैल, मई और जून अधिकांश क्षेत्रों में अत्यधिक गर्म होते हैं। ऐसे में यही अधिक तर्कसंगत और व्यवहारिक होगा कि विद्यालयों का नया सत्र जून के अंतिम सप्ताह अथवा जुलाई से प्रारंभ किया जाए तथा वार्षिक परीक्षाएँ मार्च और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में आयोजित हों। इससे विद्यार्थियों को पूरा अध्ययन समय मिलेगा, शिक्षकों को पाठ्यक्रम पूरा कराने में सुविधा होगी और शिक्षा की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार संभव हो सकेगा।

उच्च शिक्षण संस्थानों की प्रवेश परीक्षाएँ—जैसे CUET, NEET, JEE आदि—ग्रीष्मावकाश के दौरान आयोजित की जा सकती हैं ताकि जुलाई से विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों का सत्र व्यवस्थित रूप से शुरू हो सके। यह मॉडल विद्यार्थियों के स्वास्थ्य, मौसम और भारतीय सामाजिक परिस्थितियों के अधिक अनुकूल सिद्ध होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा नीति केवल प्रशासनिक सुविधा और आंकड़ों पर आधारित न होकर विद्यार्थियों की वास्तविक आवश्यकताओं, मानसिक स्वास्थ्य, जलवायु परिस्थितियों और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन की जरूरतों को केंद्र में रखकर बनाई जाए। यदि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल “समय पर रिजल्ट” और “डेटा प्रबंधन” बनकर रह जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ डिग्री तो प्राप्त कर लेंगी, लेकिन वास्तविक ज्ञान और बौद्धिक क्षमता से वंचित रह जाएंगी।
सरकारों को चाहिए कि वे वर्तमान शैक्षणिक सत्र प्रणाली की गंभीर समीक्षा करें और शिक्षा को प्रयोगशाला बनाने के बजाय विद्यार्थियों के हित में व्यावहारिक, वैज्ञानिक और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था लागू करें।

23/05/2026

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम का एक व्यंग्यात्मक डिजिटल अभियान अचानक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया।
सरकार ने खुफिया ब्यूरो (IB) की रिपोर्ट के आधार पर X (पूर्व ट्विटर) से इस अकाउंट को ब्लॉक करने को कहा।
लेकिन सवाल यह है कि—
क्या यह वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था?
या फिर युवाओं के व्यंग्य और असहमति की आवाज़ से सरकार असहज हो गई?
इस वीडियो में जानिए:
� ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की शुरुआत कैसे हुई
� CJI की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर क्या हुआ
� IT Act की धारा 69A क्या है?
� IB रिपोर्ट में क्या कहा गया?
� अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस
� सोशल मीडिया सेंसरशिप पर उठते सवाल
वीडियो को अंत तक देखें और अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
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22/05/2026

आमची मुंबई’ को सुरक्षित और “बांग्लादेशी मुक्त” बनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार, BMC और पुलिस प्रशासन ने बड़ा अभियान शुरू किया है।
मुंबई के मलाड़, कुर्ला, घाटकोपर, बांद्रा सहित कई इलाकों में अवैध प्रवासियों और रोहिंग्याओं के खिलाफ “ऑपरेशन ऑल आउट” चलाया जा रहा है।
इस वीडियो में जानिए —
� कैसे AI तकनीक और डिजिटल डाटा से की जा रही पहचान?
� फर्जी आधार, राशन कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र पर कैसे हो रही कार्रवाई?
� अवैध अतिक्रमण और झुग्गियों पर बुलडोजर कार्रवाई क्यों?
� क्या वैध नागरिकों को परेशानी होगी?
� एकनाथ शिंदे और प्रशासन का क्या है पूरा प्लान?
� “बांग्लादेशी मुक्त मुंबई” चुनावी मुद्दा या सुरक्षा का सवाल?
मुंबई में चल रहे इस बड़े अभियान का राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक विश्लेषण इस विशेष वीडियो में।
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21/05/2026

अमेरिकी राजनीति और वैश्विक कूटनीति में बड़ा भूचाल!
अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान Operation Epic Fury को सीमित करने वाले ऐतिहासिक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
50-47 के बहुमत से पारित इस प्रस्ताव ने दुनिया भर में नई बहस छेड़ दी है —
क्या अब ईरान-अमेरिका युद्ध का खतरा टल गया है?
क्या अमेरिकी संसद ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर अंकुश लगा दिया है?
और इसका असर पश्चिम एशिया, फिलिस्तीन, भारत और वैश्विक राजनीति पर क्या पड़ेगा?
इन्हीं सवालों पर बहुजन संवाद की विशेष चर्चा —
� सहभाग:
� प्रो. ए. के. पाशा — अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
� प्रो. शिवाजी सरकार — अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
� डॉ. सतीश मिश्रा — वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली
� फिरोज मीठीबोरवाला — महामंत्री, इंडिया-फिलिस्तीन सॉलिडेरिटी फोरम
� अनीश अंकुर — राष्ट्रीय सचिव, AIPSO
� डॉ. आनन्द प्रकाश तिवारी — कार्यक्रम संपादक, बहुजन संवाद
� डॉ. सुनीलम — संस्थापक संपादक, बहुजन संवाद
� प्रसारण : 21 मई 2026
� समय : रात 8 बजे
� वीडियो को Like, Share और Subscribe जरूर करें।
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21/05/2026

देश में बेरोजगारी, पेपर लीक, न्यायिक जवाबदेही और सिस्टम से नाराज युवाओं के बीच अचानक एक नाम तेजी से वायरल हुआ — ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP)।
एक कथित टिप्पणी के बाद शुरू हुआ यह डिजिटल व्यंग्य आंदोलन अब सोशल मीडिया पर करोड़ों युवाओं की आवाज बन चुका है। क्या यह केवल मीम कल्चर है?
या फिर युवाओं के भीतर जमा गुस्से का डिजिटल विस्फोट?
इस विशेष चर्चा में जानिए —
� CJP कैसे बना Gen Z का सबसे बड़ा ट्रेंड?
� “Secular, Socialist, Democratic, Lazy” नारे का असली अर्थ
� बेरोजगारी और सिस्टम से नाराज युवाओं की मनोदशा
� क्या यह डिजिटल राजनीति का नया मॉडल है?
� कौन हैं अभिजीत दीपके, जिन्होंने इस अभियान को शुरू किया?

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20/05/2026

नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में एक प्रेस मीट के दौरान नॉर्वेजियन पत्रकार हेली लिंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा —
“आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते?”
इस एक सवाल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और भारत की वैश्विक छवि को लेकर नई बहस छेड़ दी है। क्या भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं?
क्या सत्ता आलोचनात्मक सवालों से बच रही है?
या फिर यह भारत के खिलाफ विदेशी मीडिया का नैरेटिव है?
इन्हीं सवालों पर बहुजन संवाद की विशेष चर्चा —
� प्रसारण : 20 मई 2026
� रात्रि 8 बजे
� सहभागी:
� विभूति नारायण राय — लेखक एवं पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी
� प्रो. विजेंद्र उपाध्याय — IIT दिल्ली
� युगनाथ शर्मा पोंड्याल — संपादक, आसन बाजार, काठमांडू, नेपाल
� रौशन प्रकाश — शिक्षाविद्, बिहार
� डॉ. आनन्द प्रकाश तिवारी — कार्यक्रम संपादक, बहुजन संवाद
� संचालन :
डॉ. सुनीलम — संस्थापक संपादक, बहुजन संवाद
लोकतंत्र, मीडिया और सत्ता के रिश्तों पर एक गंभीर और बेबाक चर्चा।
वीडियो को देखें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें।


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20/05/2026

सहारनपुर में समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन और पुलिस प्रशासन के बीच हुई तीखी बहस का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
मोनू कश्यप हत्या मामले में न्याय की मांग को लेकर पहुंचे प्रदर्शन के दौरान सांसद इकरा हसन ने गुस्से में कहा —
“मुझे गोली मार दो, फांसी पर चढ़ा दो…”
क्या यह लोकतांत्रिक विरोध की आवाज़ थी या प्रशासन के खिलाफ राजनीतिक आक्रोश?
क्या पुलिस ने कार्यकर्ताओं के साथ सख्ती की या कानून व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश की?
इन्हीं सवालों पर आज की विशेष चर्चा।
� प्रसारण : 20 मई 2026
� समय : शाम 6 बजे
सहभाग:
� डॉ सतीश मिश्रा — वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली
� मोहम्मद अरशद खान — पूर्व विधायक एवं राष्ट्रीय सचिव, सपा
� चौधरी मज़ाहिर राणा — प्रदेश महासचिव, सपा
� डॉ आनन्द प्रकाश तिवारी — कार्यक्रम संपादक, बहुजन संवाद
� संचालन :
डॉ सुनीलम — संस्थापक संपादक, बहुजन संवाद
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19/05/2026

वियतनाम लोकतांत्रिक गणराज्य के संस्थापक और विश्व के महान क्रांतिकारी नेताओं में शामिल हो ची मिन्ह की 136वीं जयंती पर विशेष चर्चा।
हो ची मिन्ह ने फ्रांसीसी उपनिवेशवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया और वियतनाम को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।
उनका जीवन केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं बल्कि राष्ट्रीय मुक्ति, सामाजिक न्याय और जनसंगठन की अद्भुत मिसाल है।
इस विशेष कार्यक्रम में चर्चा होगी :
� हो ची मिन्ह का क्रांतिकारी जीवन
� वियतनाम की स्वतंत्रता का संघर्ष
� अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ ऐतिहासिक लड़ाई
� “हो ची मिन्ह विचार” की प्रासंगिकता
� आज के दौर में वियतनामी क्रांति से मिलने वाले सबक
� प्रसारण : 19 मई 2026
सहभाग:
� प्रो. दीपक मालिक — पूर्व निदेशक, गांधी विद्या संस्थान
� अनीश अंकुर — राष्ट्रीय सचिव, ऐप्सो
� विद्युत पाल — संपादक, बिहार हेराल्ड
� रोशन प्रकाश — शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता
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19/05/2026

दिल्ली दंगा मामले में 2020 से जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर महत्वपूर्ण बहस सामने आई है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की बेंच ने टिप्पणी की कि UAPA जैसे कठोर कानून में भी जमानत दी जा सकती है।
क्या UAPA का इस्तेमाल असहमति की आवाज़ दबाने के लिए हो रहा है?
क्या लंबे समय तक बिना ट्रायल जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है?
क्या सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में कई मामलों को प्रभावित कर सकती है?
इस वीडियो में देखिए :
� उमर खालिद बेल केस की पूरी पृष्ठभूमि
� UAPA कानून क्या है?
� सुप्रीम कोर्ट की नई टिप्पणी का महत्व
� बेल बनाम जेल की संवैधानिक बहस
� लोकतंत्र, असहमति और नागरिक अधिकारों पर असर
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18/05/2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 2026 में पांच देशों — संयुक्त अरब अमीरात (UAE), नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली — का महत्वपूर्ण दौरा किया। इस यात्रा में ऊर्जा सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रक्षा सहयोग, स्टार्टअप्स और वैश्विक निवेश जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
� UAE में ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी
� नीदरलैंड के साथ सेमीकंडक्टर और AI सहयोग
� स्वीडन में रक्षा और हरित तकनीक पर बातचीत
� नॉर्वे में भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन
� इटली में व्यापार और निवेश बढ़ाने पर फोकस
क्या यह दौरा भारत की वैश्विक स्थिति को और मजबूत करेगा?
क्या भारत नई विश्व व्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है?
देखिए इस वीडियो में पूरा राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक विश्लेषण।
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