09/01/2026
📌 *माधव गाडगिल: पर्यावरण संरक्षण के प्रणेता और पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ*
माधव गाडगिल का नाम भारतीय पर्यावरणीय अध्ययन और संरक्षण में एक मील का पत्थर है। उनका 83 वर्ष की आयु में पुणे में निधन हो गया , लेकिन उनकी वैज्ञानिक दृष्टि, विचारधारा और कार्यभार की छाप भारतीय पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सदैव बनी रहेगी। विशेष रूप से पश्चिमी घाट और पारिस्थितिकी पर उनके योगदान के कारण उनका नाम हमेशा याद रखा जाएगा। पश्चिमी घाट संरक्षण और गाडगिल रिपोर्ट के लिए प्रसिद्ध गाडगिल को 2024 में UN का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान मिला था.
*प्रारंभिक जीवन और शिक्षा:*
माधव गाडगिल का जन्म 1939 में हुआ था और उन्होंने अपनी शिक्षा पुणे विश्वविद्यालय से प्राप्त की। वे एक कुशल पारिस्थितिकीविद् थे और भारतीय पारिस्थितिकी प्रणालियों के गहरे अध्ययन में उनकी विशेष रुचि थी। उनका पर्यावरण से जुड़ा दृष्टिकोण वैज्ञानिक था, लेकिन उन्होंने इसमें मानवीय दृष्टिकोण को भी हमेशा शामिल किया।
*विचारधारा और दृष्टिकोण:*
गाडगिल की विचारधारा में प्रमुख परिवर्तन उनके संरक्षण दृष्टिकोण में आया। शुरुआत में वे एक शहरी संरक्षणवादी थे, लेकिन बाद में उन्होंने यह महसूस किया कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का दुरुपयोग किया जा रहा था। यह अधिनियम विशेष रूप से किसानों और आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा था। उन्होंने यह माना कि जंगल सिर्फ वन्यजीवों के लिए नहीं, बल्कि उन समुदायों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, जिनका जीवन इन जंगलों पर आधारित है।
उनकी विचारधारा में महत्वपूर्ण बदलाव यह था कि वे हमेशा मानते थे कि संरक्षण सिर्फ वन्यजीवों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे आदिवासी और अन्य हाशिए पर पड़े समुदायों के अधिकारों को भी संरक्षित करना चाहिए। उनका कहना था कि जंगल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि इन समुदायों के लिए जीवनयापन का स्रोत भी है।
*पश्चिमी घाट और गाडगिल समिति:*
माधव गाडगिल ने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) की अध्यक्षता की थी। 2011 में प्रस्तुत उनकी रिपोर्ट में पश्चिमी घाट के बड़े हिस्से को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की गई थी। उन्होंने यह सुझाव दिया था कि इन क्षेत्रों में कोई प्रदूषणकारी उद्योग स्थापित न किया जाए, क्योंकि पश्चिमी घाट जैव विविधता के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस रिपोर्ट ने भारतीय पर्यावरणीय विमर्श में एक नया मोड़ लाया। हालांकि, उनकी सिफारिशों का विरोध निहित स्वार्थों और राजनीतिक दबावों के कारण हुआ। इसके बाद कस्तूरीरंगन पैनल ने पश्चिमी घाट के केवल 37% हिस्से को संरक्षित करने की सिफारिश की। इस विवाद ने पश्चिमी घाट के संरक्षण और विकास के बीच एक बड़ी बहस को जन्म दिया, जो आज भी जारी है।
*'सेव द साइलेंट वैली' आंदोलन और बस्तर के जंगलों की रक्षा:*
गाडगिल ने पर्यावरण संरक्षण के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। 1970 के दशक में, उन्होंने केरल में *'सेव द साइलेंट वैली'* आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आंदोलन ने राज्य के साइलेंट वैली जंगलों को बचाने के लिए एक बड़ा मोर्चा खोला था। इसके अलावा, उन्होंने बस्तर के जंगलों को बचाने के लिए भी कई अभियानों का संचालन किया।
*लेखन:*
गाडगिल के लेखन ने उनकी यात्रा और विचारों को दुनिया के सामने रखा। उनकी आत्मकथा *'A Walk Up the Hill: Living with People and Nature'* (2023) में उन्होंने अपने जीवन और कार्यों का विस्तार से वर्णन किया है। यह किताब उनके विचारों और उनके द्वारा किए गए कार्यों की गहरी समझ देती है।
*विरासत:*
माधव गाडगिल का जीवन और कार्य भारतीय पर्यावरणीय राजनीति में एक अभूतपूर्व योगदान के रूप में देखा जाएगा। उनका यह सिद्धांत कि पारिस्थितिकी और मानवाधिकारों का संबंध गहरा है, आज भी हमारे पर्यावरणीय कानूनों और नीतियों को प्रभावित करता है। उनके कार्यों से हमें यह सिखने को मिलता है कि पारिस्थितिकी का संरक्षण और सामाजिक न्याय दोनों को एक साथ जोड़ा जा सकता है।
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