30/12/2025
सुनो राधे…
अजीब समय है,
लोग बाहर से पूरे दिखते हैं
और भीतर से धीरे-धीरे ख़त्म हो रहे हैं।
किसी ने प्रेम लिखना छोड़ दिया,
किसी ने ख़ुद पर ध्यान देना छोड़ दिया,
किसी ने भावनाओं को
हाफ पैंट जितना छोटा कर लिया।
मैं भी देख रहा हूँ यह सब,
समझ भी रहा हूँ,
पर फिर भी…
मैं नहीं सुधर पाया।
फिर वही प्रेम,
फिर वही शब्दों की बग़ावत,
फिर वही रातें
जो तुम्हारे नाम से शुरू होकर
तुम्हीं पर ख़त्म हो जाती हैं।
लोग कहते हैं —
अब ज़माना practical हो गया है,
दिल से नहीं, दिमाग़ से चला जाता है।
मगर दिल की आदतें
किसी दौर की मोहताज नहीं होतीं।
मैं आज भी अच्छा लिखता हूँ,
क्योंकि अब भी किसी एक चेहरे में
पूरी दुनिया दिख जाती है।
मैं आज भी सँवरता हूँ,
क्योंकि कहीं न कहीं
तुम्हें अच्छा लगने की चाह बाक़ी है।
इतनी बेपरवाही के बाद भी
अगर कोई प्रेम करता है,
तो वो कमज़ोर नहीं,
बस थोड़ा ज़्यादा सच्चा होता है।
और हाँ राधे…
दुनिया चाहे जितनी बदल जाए,
मेरे हिस्से की ज़िद
आज भी तुम्हीं पर आकर रुक जाती है।
मिश्रा ✍️