06/04/2021
एक अंधेरी रात में, एक निर्जन रेगिस्तान में, एक काफिला एक सराय में आकर ठहरा।
रात थी, अंधेरा था और काफिला रास्ता भटक गया था। आधी रात गए खोजते-खोजते वे उस सराय के पास पहुंचे। यात्री थके थे, उनके ऊंट भी थके थे। उन्होंने जल्दी से खूंटियां गाड़ीं, रस्सियां निकालीं और ऊंटों को बांधा। सौ ऊंट थे उस काफिले के पास। लेकिन शायद जल्दी में रात के अंधेरे में एक ऊंट की खूंटी और रस्सी खो गई। एक ऊंट अनबंधा रह गया।
अंधेरी रात थी और ऊंट को अनबंधा छोड़ना ठीक न था, उसके भटक जाने की संभावना थी। उस काफिले के मालिकों ने सराय के बूढ़े मालिक को जाकर कहा कि अगर एक खूंटी मिल जाए और एक रस्सी, तो बड़ी कृपा होगी। एक ऊंट हमारा खुला रह गया, रस्सी-खूंटी कहीं खो गई है।
उस बूढ़े ने कहा, रस्सी और खूंटी की कोई भी जरूरत नहीं है। तुम तो जाओ, खूंटी गाड़ दो और रस्सी बांध दो। यह बात इतनी नासमझी की थी, इतनी व्यर्थ थी। खूंटी और रस्सी होती तो–उन मालिकों ने कहा–हम खुद ही बांध देते। खूंटी और रस्सी नहीं है, यही तो हम पूछने आए हैं। पर उस बूढ़े ने कहा, तुम झूठी खूंटी ही गाड़ दो। अंधेरे में ऊंट को क्या पता चलेगा कि सच्ची खूंटी गाड़ी गई है या झूठी। तुम झूठी रस्सी ही बांध दो।
उन्हें बात समझ में नहीं पड़ी, लेकिन और कोई रास्ता भी न था। सोचा एक प्रयोग करके देख लेना उचित है। वे गए और उन्होंने अंधेरे में खूंटी ठोंकी, जो खूंटी थी ही नहीं। सिर्फ ठोंकने की आवाज, ऊंट खड़ा था, वह बैठ गया, उसने सोचा कि शायद खूंटी बांध दी गई। और फिर उन्होंने रस्सी बांधने का उपक्रम किया। रस्सी तो थी नहीं, लेकिन जैसे रस्सी होती तो बांधते, उसी तरह का उपक्रम किया। और फिर जाकर सो गए।
सुबह उन्होंने देखा–ऊंट अपनी जगह बैठा है; बंधे हुए ऊंट भी बैठे हैं, अनबंधा ऊंट भी बैठा है। उन्होंने बंधे हुए ऊंटों को खोल दिया, उन्हें नई यात्रा पर निकलना था। अनबंधे ऊंट को तो खोलने का कोई सवाल न था, वे उसे बिना खोले ही उठाने की कोशिश करने लगे। लेकिन उस ऊंट ने उठने से इनकार कर दिया। वह बंधा था। वे उस सराय के मालिक के पास गए और कहा, कैसा आश्चर्य! वह ऊंट उठता नहीं है। क्या जादू किया आपने?
शक तो हमें रात भी हुआ था कि न मालूम क्या जादू किया जा रहा है। झूठी खूंटी से कहीं ऊंट बंधे हैं! असत्य रस्सी से कभी कोई बांधा गया है! और अब तो और मुश्किल हो गई कि उस ऊंट ने उठने से इनकार कर दिया। उस बूढ़े ने कहा, पहले खूंटी उखाड़ो और रस्सी खोलो। पर वे कहने लगे, खूंटी हो तब हम उखाड़ें! उस बूढ़े ने कहा, जब बांधते समय खूंटी थी, तो खूंटी अब भी है।
मजबूरी थी। बिल्कुल पागलपन का काम था। लेकिन जाकर उन्होंने खूंटी उखाड़ी, रस्सी खोली, और ऊंट उठ कर खड़ा हो गया। उन्होंने उस बूढ़े को धन्यवाद दिया और कहा, बहुत-बहुत धन्यवाद। मालूम होता है, आप ऊंटों के संबंध में बहुत बड़े जानकार हैं। उस बूढ़े ने कहा, क्षमा करना! ऊंटों से मेरी कोई पहचान नहीं है। आदमियों के संबंध में जरूर मैं बहुत कुछ जानता हूं। फिर मैंने सोचा कि जब आदमी तक झूठी खूंटियों और रस्सियों से बंध जाता है, तो बेचारा ऊंट, वह तो बंध ही सकता है।
आदमी का सारा जीवन, झूठी रस्सियों और झूठी खूंटियों से बंधा हुआ जीवन है। आदमी का सारा दुख, असत्य और कल्पना से बंधा हुआ दुख है। आदमी की सारी चिंता आदमी की अपनी ही कल्पना से निर्मित है। और आदमी ने इतनी झूठी खूंटियां और इतनी रस्सियां बांध रखी हैं कि आज वह झूठी रस्सियों और खूंटियों के अतिरिक्त उसका जीवन कुछ भी नहीं रह गया।
ओशो, समुद्र समाना बूंद में-५