21/07/2022
नए महामहिम द्रोपदी मुर्मू का स्वागत है....
वनवासी समाज से माँ शबरी वंश परम्परा वाली प्रभु राम की अनुयायी द्रोपदी मुर्मू अब भारत की महामहिम राष्ट्रपति चुनी गई.....! अभिनन्दन महामहिम
भारत को बांटने के लिए जो विभाजन रेखा अंग्रेज ने खींची वनों में रहने वाले बंधु भागनी को मूलनिवासी, आदिवासी जो नगरों में रहते थे वे आर्य और द्रविड़ बाद में जिसे पुष्ट करने का काम नेहरू माडल के नाम पर वामपंथियों कांग्रेसियों जिहादियों और चर्च ने किया....
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने इस विमर्श को तिलांजलि दे दी।
नदियों के तटों व जंगल में रहने वाले शृंगवेरपुर के राजा निषादराज गुह, नदी तट पर रहने वाले केवट, गृद्धकूट पर्वत, अरण्य व वृक्षों पर रहने वाले आर्य जटायु, भक्ति व समर्पण की प्रतिमूर्ति एवं वन में साधनारत शबरी, पर्वतों एवं वन में रहने वाले नर अर्थात् वानर-सुग्रीव, हनुमान आदि, गुफाओं में रहने वाली तपस्विनी स्वयंप्रभा, समुद्र तट पर साधना कर रहे सम्पाती, सामुद्रिक विद्या व शिल्प कला के जानकार नल-नील, आकाश गमन में सिद्ध हनुमान एवं अंगद आदि, गुफा-कंदरा या घोर जंगलों व आश्रमों में तपस्या करने वाले विश्वामित्र, अगस्त्य, अत्रि तथा भरद्वाज मुनि, नगरों में वसने वाले अयोध्या व मिथिलावासी इत्यादि सभी मूलतः सनातनी ही हैं।
इस प्रकार किसी को पहाड़ों में, किसी को नदियों के किनारे, किसी को सघन वन में, किसी को रेगिस्तान में, बर्फ में, पठार में, समुद्र के भीतर, समुद्र के किनारे, द्वीप में, पेड़ों पर, किसी को कच्चे मकान में तो किसी को महलों में, किसी को पशुओं के बीच, किसी को खुले खेतों या खौर में, किसी को बैलगाड़ियों या रथ में ही रहने का अभ्यास था तथा वे सभी स्थानविशेष की जलवायु एवं शारीरिक व मानसिक तप के अनुरूप वस्त्र आभूषण पहनते थे। ना कोई पूर्ण था ना कोई अपूर्ण था। एक-दूसरे के पूरक तो अवश्य थे किंतु सभी स्वाभिमानी व आत्मनिर्भर भी थे।
इस विकसित सर्वोच्च सामाजिक व्यवस्था को तोड़ पाना बहुत कठिन था। धरती पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति संपूर्ण धरती की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध थे, इस बात का प्रमाण अथर्ववेद में भी निहित है । ये ग्रामा यदरण्यं या: सभा अधि भूम्याम् । ये संग्रामा: समितयस्तेषु चारु वदेम ते। अर्थात् चाहे कोई गाँव के हों या बड़ी सभाओं के सभासद, या किन्हीं समितियों के स्वामी हों, वे सभी सम्पूर्ण प्रकृति व धरती की रक्षा एवं संवर्द्धन के लिए संकल्पित हों, एकजुट हों।
यही सनातन है।
यही भारतीयता है।