06/10/2026
अपनी मिट्टी का अन्न, अपनी संस्कृति का सम्मान—यही आत्मनिर्भर भारत की पहचान है।
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गढ़ भोज केवल पहाड़ का पारंपरिक भोजन नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की सभ्यता, कृषि-परंपरा, जैव विविधता और आत्मनिर्भर जीवन-पद्धति का जीवंत प्रतीक है।
मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, चौलाई और राजमा जैसे स्थानीय अनाज हमारी विरासत हैं। इन्हें खेत से बाजार, बाजार से विद्यालय और विद्यालय से नई पीढ़ी की थाली तक पहुंचाना केवल पोषण का विषय नहीं—यह अपनी जड़ों और स्वदेशी सामर्थ्य के प्रति सम्मान है।
गढ़ भोज दिवस पर पारंपरिक फसलों को बाजार से जोड़ने तथा गढ़ भोज को मिड-डे मील से जोड़ने की दिशा में किए जा रहे प्रयास निश्चित रूप से स्वागतयोग्य हैं।
जिस राष्ट्र को अपनी मिट्टी के अन्न पर गर्व होता है, वही अपनी संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित रख सकता है।
स्थानीय अन्न अपनाएं।पर्वतीय किसान को मजबूत बनाएं।
अपनी संस्कृति बचाएं,आत्मनिर्भर भारत को सशक्त बनाएं।
गढ़ भोज—पहाड़ की थाली से राष्ट्र की आत्मनिर्भरता तक।
✍️ राष्ट्र बोध यात्रा
“विचारों से बदलाव तक”
DrYograj Singh Rana Randev Rana Durgeshwar Lal Ramesh Chauhan Dr Dhan Singh Rawat Pushkar Singh Dhami PMO India
BJP Uttarkashi BJP Uttarakhand Bharatiya Janata Party (BJP)
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