10/06/2024
कल अध्यात्म चर्चा ग्रुप में किसी जिज्ञासु के दो प्रश्न आए।
1. चेतना से ऊपर क्या है?
2. चेतना के भाव का विकास कैसे हो?
पहले प्रश्न का उत्तर:-
चेतना के ऊपर ईश्वर है। परंतु चेतना तो सभी जीवों के पास है, तो क्या वे सभी जीव ईश्वर के समीप हैं?
नहीं!
चेतना के शीर्ष पर पहुंचने के पश्चात हीं ये आत्मा ईश्वर से मिल पाती है।।
*मनुष्य की उत्तम चेतना का शीर्ष बिंदु हीं ईश्वर का सामिप्य है*!
आत्म यात्रा करते हुए अपनी चेतना के शीर्ष पर पहुंचने वाले हमारे सनातन धर्म के इतिहास में कई महात्मा हुए। जिन्होंने एक साधारण आत्मा से महात्मा बनने की यात्रा की, फिर महात्मा से भी कई चरण आगे की यात्रा करके परमात्मा बनें।
उदाहरणार्थ:-
सिद्धार्थ गौतम, वर्धमान महावीर, आद्यगुरु शंकराचार्य, jesus chrisht, मोहम्मद साहब, महाअवतारी बाबा इत्यादि परम आत्माएं।
दूसरे प्रश्न का उत्तर:-
सबसे पहले की चेतना कोई भाव नहीं है।
यह स्वविवेक है। जो आत्मा आपके अंदर है, जिसे आप अंतरात्मा कहते हैं, वह शिवांश है जो अति विकसित और उन्नत है।
उसे विकसित करने की आवश्यता नहीं है।
जरूरत है उस अंतरात्मा के ऊपर चढ़ते परत को विकसित होने से रोकने की या चढ़ी हुई परत को तोड़ने की ।
परंतु अब आपकी उम्र इतनी ज्यादा हो चुकी है की आपकी अंतरात्मा के ऊपर चढ़ी बहिरात्मा की परत बहुत हीं ज्यादा विकसित ( मोटी) हो चुकी है, अब उस परत को भेदना बहुत हीं मुश्किल है।
इसका सबसे सहज उपाय है जब बच्चा पैदा हो यानी की एक आत्मा जब नया शरीर धारण करे तो उसे स्वविवेक का इस्तेमाल करने दिया जाए, उसे किसी भी प्रकार की सांसारिकता न सिखाई जाए, उसे प्रकृति की गोद में छोड़ दिया जाए।
इसे उसके अंतरात्मा के ऊपर बहिरात्मा की गंदी परत नही बनेगी । प्रकृति स्वयं उसकी शुद्ध चेतना को पोषित करती रहेगी और विकसित करती रहेगी।
उम्र बढ़ने के बाद जब आपने इतना कूड़ा जमा कर लिया है तो इसका अब एक ही उपाय है।
अब तक आपने जितना सीखा है, आपके ज्ञानेंद्रियों ने जितना भी संदेश पूर्व से अब तक आपके मस्तिष्क को दिया उन सबको मिटा दीजिए, निर्विकार हो जाइए।
क्या ये संभव है?
है, परंतु बहुत कठीन है। सदगुरु, ज्ञानी जनों ( कथावाचकों / कर्मकांडियों का नहीं) , का संग करो उनसे मूल विधि विधान को सीखो और आत्म यात्रा पर निकल पड़ो।
लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं की इस यात्रा में कोई विरला ही निकलेगा।
अपने पूर्व जन्म के सद्कर्मों के बूते कहीं इस रास्ते पर निकल भी गया तो शीघ्र हीं अपने अहम पर चोट खाकर भाग जायेगा। क्योंकि जिस चीज को उसने बचपन से देखा है , सुना है, जिसे वह सत्य मानता आया है; एक सदगुरु उसकी भावनाओं को अनदेखा करते हुए उसके भ्रम को तत्क्षण तोड़ देगा।
ये सब पचेगा नहीं उसे और वह भाग जायेगा🙏🏻
ये कटु सत्य है।
इसको झेल पाओ तो निकल पड़ो अध्यात्मिक (आत्मा) यात्रा पर। नहीं तो चुपचाप गृहस्थी का मजा लो। गृहस्थी में हीं अपनी जिम्मेदारियों को समझो, ईमानदारी से कर्तव्यों का पालन करो। इतने से भी नैया देर सवेर पार लग ही जायेगी।
यही विधान है 🙏🏻☺️
हर हर महादेव 🙏🏻🚩🌷
जय शिवशक्ति 🙏🏻🚩🌷🌺