27/09/2026
🇮🇳 मैं भगत सिंह हूँ…
मेरा जन्म आज ही के दिन, 27 सितंबर 1907 को हुआ था। मेरा रास्ता हिंसा का नहीं, बल्कि विचारों और क्रांति का रास्ता था। मैंने कहा था—
“क्रांति की तलवार विचारों की शान पर तेज होती है।”
मैं और मेरे साथियों ने आज़ादी की लड़ाई में जेल के भीतर लंबा अनशन किया। लाहौर की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने का उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि बहरे शासकों तक अपनी आवाज़ पहुँचाना था।
मैंने नास्तिकता को भी अपने विचारों के स्तर पर स्वीकार किया, क्योंकि मेरे सामने समाज में व्याप्त अन्याय, शोषण और धार्मिक विभाजन की कठोर वास्तविकताएँ थीं। मेरा विश्वास था कि इंसान को इंसान समझना और उसके अधिकारों का सम्मान करना सबसे आवश्यक है।
मेरे लिए भारत की आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति नहीं था। मेरा सपना ऐसा भारत था जहाँ अंतिम व्यक्ति तक आज़ादी, सम्मान, न्याय, समानता और आर्थिक अवसर पहुँचें।
आज मैं इस दुनिया में नहीं हूँ, लेकिन मेरे विचार आज भी जीवित हैं।
जब भी कोई युवा इस देश को एकजुट करने, न्याय, समानता, बंधुत्व, रोजगार और सम्मान के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने को तैयार होगा; जब कोई युवा भारत को दुनिया का अग्रणी देश बनाने के लिए अपना जीवन लगाने का संकल्प लेगा—
तब समझना, भगत सिंह के विचार फिर से जीवित हो उठे हैं।
🇮🇳 इंकलाब ज़िंदाबाद!
🇮🇳 जय हिन्द, जय भारत!
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