27/06/2025
शीर्षक: आडंबर और आस्था के बीच : सोशल मीडिया युग में एस्ट्रोलॉजी की वापसी
भारत जैसे देश में ज्योतिष यानी एस्ट्रोलॉजी केवल एक परंपरा नहीं रही, यह समाज के कई स्तरों—व्यक्तिगत जीवन, विवाह, व्यापार, शिक्षा, यहां तक कि राजनीति—तक में गहराई से जुड़ा रहा है। परंतु 21वीं सदी के इस वैज्ञानिक, तकनीकी और डिजिटल युग में, जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटर और स्पेस टेक्नोलॉजी की बातें हो रही हैं, तब सोशल मीडिया पर ज्योतिषीय विज्ञापनों की भरमार एक विडंबना भी है और चिंता का विषय भी। सवाल यह है कि क्या यह पुनरुत्थान है, या केवल बाज़ार और मानसिक असुरक्षा का खेल? और यदि सच में ग्रह-नक्षत्र हमारे जीवन के हर मोड़ को तय करते हैं, तो फिर कर्म और वैज्ञानिक सोच की प्रासंगिकता क्या रह जाती है?
आजकल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर रोज़ाना हम ऐसे विज्ञापन और रील्स देखते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि केवल जन्मतिथि, नाम या राशि बताने से आपकी समस्याओं का समाधान मिल सकता है—चाहे वह विवाह न होना हो, प्रमोशन में रुकावट हो, संतान सुख का न मिलना हो या किसी प्रकार की बीमारी का इलाज। कई बार ये विज्ञापन मनोवैज्ञानिक चालों का इस्तेमाल करते हैं—“अगर आपकी कुंडली में मंगल है, तो अगले 5 दिन आपके जीवन का बड़ा मोड़ हो सकते हैं”, या “शनि की साढ़ेसाती से पीड़ित लोग केवल यह उपाय कर लें”—जैसे वाक्य लोगों की जिज्ञासा और भय दोनों को एक साथ पकड़ लेते हैं। यही नहीं, कुछ विज्ञापनों में लोगों की भावनात्मक दुर्बलताओं को भुना कर उन्हें “कुंडली मिलान” या “कर्म दोष निवारण” जैसे महंगे ऑनलाइन सेशंस में फंसा दिया जाता है।
यह जानना ज़रूरी है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ज्योतिष की कोई ठोस पुष्टि नहीं है। यह न तो अनुभवजन्य परीक्षणों से गुज़रा है और न ही इसके सिद्धांत किसी प्राकृतिक नियम की कसौटी पर खरे उतरते हैं। ग्रहों और तारों की स्थिति का विश्लेषण करना और उसे किसी व्यक्ति के व्यवहार, भाग्य या भविष्य से जोड़ देना विज्ञान के मानकों के अनुरूप नहीं है। कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि विभिन्न ज्योतिषाचार्यों द्वारा एक ही व्यक्ति की कुंडली पर की गई भविष्यवाणियाँ आपस में मेल नहीं खातीं। इसके बावजूद यह धारणा बनी हुई है कि किसी विशेष ग्रह की दशा हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करती है।
अब सवाल यह है कि यदि हम ज्योतिष की इन धाराओं को पूरी तरह नकार दें, तो क्या हम एक मूल्यहीन, दिशा हीन समाज बन जाएंगे? और यदि इसे पूरी तरह स्वीकार कर लें, तो क्या कर्म, नैतिकता और व्यक्तिगत प्रयासों की उपयोगिता खत्म नहीं हो जाती? भारत की दार्शनिक परंपरा में ‘कर्म’ का सिद्धांत केंद्र में रहा है। गीता में कृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” यानी मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता करना व्यर्थ है। यह विचार व्यक्ति को आत्मनिर्भर और सक्रिय बनाता है। यदि हम यह मान लें कि हमारे जीवन की दशा केवल ग्रहों की दशा से तय होती है, तो यह हमारे प्रयासों को अर्थहीन बना देता है।
सोशल मीडिया पर इन ज्योतिषीय सेवाओं का विस्फोट दरअसल दो बड़े कारणों से हुआ है—पहला, मानव मन की अनिश्चितता और भय, और दूसरा, डिजिटल मार्केटिंग का आक्रामक व्यापार मॉडल। कोरोना महामारी के बाद जब लोगों ने अपनी नौकरियां खोईं, जब परिवार उजड़े, जब भविष्य अनिश्चित लगने लगा—तब लोगों ने समाधान की तलाश में ज्योतिष, तंत्र-मंत्र और धार्मिक उपायों का सहारा लेना शुरू किया। दूसरी ओर, सोशल मीडिया एल्गोरिद्म इस तरह डिजाइन किया गया है कि जो चीज़ें लोगों की भावनाओं को झकझोरती हैं, उन्हें अधिक प्रचार मिलता है। डर, उम्मीद, चमत्कार—ये सब सोशल मीडिया के सबसे बिकाऊ विषय हैं, और ज्योतिष इन तीनों का मिश्रण है।
इसके अलावा एक और पहलू है जिसे समझना जरूरी है—धर्म और आडंबर के बीच की पतली रेखा। धर्म का उद्देश्य आत्मानुशासन, नैतिकता, सहिष्णुता और मानसिक शांति को बढ़ावा देना रहा है, लेकिन आज यह अपने कई रूपों में दिखावे, भय और व्यवसाय का उपकरण बनता जा रहा है। हम देखते हैं कि कैसे लोगों को यज्ञ, पूजा, रत्न, अनुष्ठान, और विशेष तिथियों की आड़ में मानसिक और आर्थिक रूप से शोषित किया जा रहा है। यह केवल आस्था का मामला नहीं है, यह एक बड़ी सामाजिक-मानसिक संरचना की ओर इशारा करता है जिसमें ज्ञान की जगह अंधविश्वास, तर्क की जगह भय और प्रयास की जगह भाग्य ने ले ली है।
एक और चिंताजनक बात यह है कि इन डिजिटल ज्योतिषियों की पहुँच युवा पीढ़ी तक भी हो गई है। आज का युवा, जो कि स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी, और नवाचार की बात करता है, वह भी इन विज्ञापनों के प्रभाव में आकर ऑनलाइन फ्री कुंडली, जन्मपत्रिका और राशि भविष्यवाणी डाउनलोड करता है। यह हमारे समाज में वैज्ञानिक सोच और तार्किकता के विकास में बाधा है। 21वीं सदी के भारत को “विकसित भारत” बनाने के लिए जितनी आवश्यकता बुनियादी ढाँचे, शिक्षा और स्वास्थ्य की है, उतनी ही ज़रूरत वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जीवन के हर स्तर पर लागू करने की भी है। संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के अनुसार वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवतावादी सोच को बढ़ावा देना हर नागरिक का मूल कर्तव्य है।
यहाँ यह भी समझना होगा कि ज्योतिष से जुड़े सारे लोग या परंपराएँ गलत नहीं हैं। कई विद्वान इसे सांस्कृतिक ज्ञान प्रणाली के रूप में समझते हैं, जहां यह एक मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसा कार्य करती है—किसी को दिशा देने, मन को संतुलित करने और जीवन में कुछ अनुशासन लाने का। लेकिन यह कार्य तभी उचित है जब वह तर्क और स्वतंत्र सोच को बाधित किए बिना हो, न कि डर या चमत्कार के नाम पर। समस्या वहां उत्पन्न होती है जब ज्योतिष केवल एक परामर्श नहीं रह जाता, बल्कि निर्णय का स्रोत बन जाता है—विवाह, शिक्षा, करियर, इलाज जैसे महत्त्वपूर्ण निर्णय जब ग्रहों के आधार पर लिए जाने लगते हैं, तब यह खतरनाक होता है।
भारत की शिक्षा प्रणाली को भी यह जिम्मेदारी उठानी होगी कि वह केवल डिग्री और रोज़गार तक सीमित न रह जाए, बल्कि वह विद्यार्थियों को तर्कशील, वैज्ञानिक और आत्मनिर्भर बनाए। यह आवश्यक है कि स्कूल स्तर से ही विद्यार्थियों को पद्धतिगत संदेह (systematic doubt), तार्किक विश्लेषण और मिथकों की पहचान करने की शिक्षा दी जाए। जब तक हम अपने बच्चों को केवल ‘कहानी सुनाने’ की संस्कृति में रखेंगे, तब तक वे कहानी और सत्य में भेद नहीं कर पाएंगे।
अंततः यह समझना जरूरी है कि ज्योतिष कोई शत्रु नहीं है, बल्कि वह समाज की एक सांस्कृतिक परछाईं है—वह हमारे डर, हमारी उम्मीद और हमारी जिज्ञासा का प्रतिबिंब है। लेकिन जब यह परछाईं इतनी घनी हो जाए कि वह वास्तविकता को ढँकने लगे, तो हमें रुक कर आत्मविश्लेषण करना होगा। सोशल मीडिया की ताकत, अगर वैज्ञानिक सोच और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने में लगे, तो यह देश को प्रगति की ओर ले जाएगा। लेकिन यदि यह आडंबर, भय और अंधविश्वास को बढ़ावा देता रहा, तो यह भारत को पीछे की ओर खींच ले जाएगा।
हमें यह चुनना होगा कि हम भविष्य को ग्रहों से तय करना चाहते हैं या अपने कर्मों से। यही चुनाव हमारे समाज की दिशा तय करेगा।
#पीएम
Social media creator/social issue and entertainment