Internet MArketing Consultant - Digital Marketing Expert

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Internet MArketing Consultant - Digital Marketing Expert I contribute to the Web Marketing, Internet Marketing, Search Engine Optimization (SEO) and Search Engine Marketing with an online marketing strategy.

I am expert of Web Marketing, Internet Marketing, Search Engine Optimization (SEO) and Search Engine Marketing. I contribute to the online and offline marketing strategy of small as well medium size business enterprises for deliverable performance. My work primarily involves Company Management, Internet Marketing, Coordinating traditional marketing techniques with an online marketing strategy.

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Benefits to use Social Media for Business --What are the benefits of using social media for business? Consider that ther...
09/08/2018

Benefits to use Social Media for Business --

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03/05/2018

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19/04/2018

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13/01/2018

Marketing is like a second brain for your business. Call me at +91-9999 800 586 for Internet Marketing & Digital Marketing Consultation.

11/01/2018

★भाषा रचती है भविष्य★
#विश्व_हिंदी_दिवस पर विशेष
हमारा मस्तिष्क अपनी मातृभाषा में ही सोचता है, विचार करता है। किसी अन्य भाषा में उसकी वैचारिक क्षमता प्रभावित होती है और उसपर होने वाली प्रक्रिया भी। जैसे अगर आपको नींद आ रही है और आप अपनी मातृभाषा में किसी से कहेंगे कि ‘‘मैं सोने जा रहा हँू’’ तो आपका मस्तिष्क ज़्यादा क्रियाशील नहीं होगा, उसमें विद्युतीय तरंगों का उफान नहीं आएगा, लेकिन यदि आप किसी दूसरी भाषा या कम सीखी हुई भाषा में कहेंगे कि ‘‘मुझे सोना है’’ तो हो सकता है कुछ देर के लिये आपकी नींद उड़ जाए।
याद करिये राग-दरबारी का प्रिंसिपल साहब वाला कैरेक्टर जो कि गुस्से में या उत्तेजित अवस्था में अपनी मातृभाषा अवधि में अनायास ही बोलने लगता था।
हमारी भाषाएं, स्थान और वहाँ की जलवायु से प्रभावित होती हैं। बहती नदियों के पास रहने वाले रहवासियों की भाषा अलग होगी, पहाड़ों के पास रहने वालें की अलग, समुद्रतट के नज़दीक रहने वाले अलग और रेगिस्तानियों की भाषा बोलने का अंदाज अलग होता है। जैसे यदि आप रेगिस्तानियों की भाषा पर गौर करेंगे तो उनमें ऐसे शब्द उच्चारण है जो कि मुंह को सुखने से बचाते हैं। क्योंकि वहा पानी की कमी होती है जैसे अरबी भाषा। बहती नदियों के पास रहने वाले लोग तेज़ बोलते हैं, पहाड़ों पर रहने वाले लोग नाक से ज्यादा शब्द निकालते हैं और मिमियाते से लगते हैं जैसे कभी किसी कश्मीरी व्यक्ति से बात कीजिये .......। लेकिन जब इन पर विदेशी भाषा थोपी जाती है तो सब गुड़-गोबर हो जाता है। याद रखिये हर उस व्यक्ति के लिये वह भाषा विदेशी है जो कि उसकी मातृभाषा नहीं है, जैसे तमिलों के लिये हिन्दी विदेशी कहलाएंगी, तो हिन्दी भाषियों के लिये तमिल, तैलगु और बंगाली विदेश कहलाएंगी।
हमारे देश में अंग्रेजी का बोलबाला है। अंग्रेजी न्यूज़ पेपर हो या अंग्रेजी जानकारों का ग्रुप उसे एलिट या विशेष माना जाता है। हमारे स्कूलों में विशेषतौर से प्रायवेट स्कूलों एवं केन्द्रिय स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई होती है। हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाओं को हीनदृष्टि से देखा जाता है। जबकि भारत में मुश्किल से केवल 4 प्रतिशत लोग ही धारा प्रवाह अंग्रेजी बोल पाते हैं। उच्च शिक्षा के लगभग सभी संस्थान अंग्रेजी के पैरोकार बने हुए हैं इसीलिये शायद नए आइडिया या खोज होना हमारे यहाँ विरली है।
आइये एक बार विश्व की महाशक्तियों पर गौर करते हैं-अमेरिका की मातृभाषा यू.एस.इंग्लिश है, ब्रिटेन की इंग्लिश, फ्रांस की फ्रेंच, रूस की रशियन, जर्मनी की जर्मन, चीन की चाइनिज़ जापान की जापानिज़। क्या आपने कुछ समानता देखी महाशक्तियों में? हाँ, यह कि उनकी प्रमुख भाषा इनकी मातृभाषा है। इन देशों में अपनी मातृभाषा में ही पढ़ाई होती है चाहे वह विज्ञान और तकनीकि हो, चिकित्सकीय हो या फिर साहित्यक। लेकिन महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहा हमारा देश अपनी मुख्य भाषा अंग्रेजी को बनाना चाहता है ....! क्या इसकी ऐसे में महाशक्ति बनना संभव है ?
लोगों का तर्क होता है कि अंग्रेजी विज्ञान एवं तकनीकी की भाषा है, इसलिए यह वहाँ अनिवार्य है। तो आपको बता दूँ कि विज्ञान और तकनीकि में सबसे ज्यादा नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाला देश इज़राइल है और उसकी भाषा अंग्रेजी नहीं है, उसकी प्रथम भाषा हिब्रू है और दूसरी भाषा अरबी। लेकिन तकनीकी के मामले में इज़राइल विश्व में सिरमौर है। हमारे आई.आई.टी. और एम्स जैसे संस्थान उसके संस्थानों के आगे पानी भरते हैं। उन लोगों के लिये इज़राइल एक उदाहरण है, जो कहते हैं कि देशी भाषाएं केवल गीत, फिल्म एवं साहित्य के लिये ठीक है लेकिन विज्ञान, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा के लिये अंग्रेजी अनिवार्य है।
विश्व के शीर्ष सबसे धनी राष्ट्रों की सरकारी कामकाज की भाषा स्थानीय भाषा है, लेकिन हमारे देश की सरकारी कामकाज की भाषा भी अंग्रेजी होती जा रही है। शीर्ष कोर्ट सुप्रीम कोर्ट में तो आप अपनी मातृभाषा में केस ही दायर नहीं कर सकते, वहाँ तो अंग्रेजी ही अनिवार्य भाषा है।
सबसे गरीब 20 राष्ट्रो की सूचि में छः राष्ट्र ऐसे है जहाँ की सरकारी कार्य की और उच्च शिक्षा की भाषा अंग्रेजी है।
अंग्रेजी भाषा हमारे देश का स्वाभिमान गिराती है। स्थानीय भाषी व्यक्ति जब भी अंग्रेजी धाराप्रवाह बोलने वाले से भिड़ता है तो वह उसकी अंग्रेजी भाषा सुनते ही आत्मसमर्पण कर देता है। कई भारतीय तो अंग्रेजी में कहीं हर बात को सच मानते हैं। याद कीजिए हरिशंकर परसाई का संस्मरण कि जब उन्हें टी.सी. बिना टिकट पकड़ लेता था तो वे अंग्रेजी बोलकर छूट जाते थे। और याद कीजिये कृश्न चंदर का अमर उपन्यास "एक गधे की आत्मकथा" का वह सीन जब गधा परेशान होकर एक आफिस में जाता है और रिसेप्शन पर अपना परिचय देता है 'आई एम डंकी फ्रॉम बाराबंकी', इसके बाद आफिस वाले जो उसे सम्मान देते हैं वह हमारी व्यवस्था पर वह करारा तमाचा है जिसे वह हर बार खाकर भूल जाती है।
हमारे बच्चों के फेल होने और बीच में पढ़ाई छोड़ने की सबसे बड़ी वजह अंग्रेजी ही है। जापान, चीन, इज़राइल और रूस का कोई भी बच्चा जो कि गांव या कस्बे में रहता है वह डॉक्टर, इंजीनियर या किसी अन्य व्यावसायिक कोर्स में दाखिल होकर अपनी पढ़ाई पूरी कर लेता है, लेकिन भारत के गांवों के बच्चों के लिये यह बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि यहाँ उच्च शिक्षा उसकी मातृभाषा में नहीं वरन अंग्रेजी भाषा में है। अर्थात् गणित, विज्ञान एवं भाषाओं की अद्भुत प्रतिभाएं हम खोते जा रहे हैं।
ब्रिटिश शासकों ने अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के अतिरिक्त अन्य स्कूलों में अंग्रेजी को भाषा के रूप में पढ़ाने पर रोक लगा दी थी। 1835 में अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम के समय स्थानीय भाषा विद्यालयों से अंग्रेजी हटा दी थी। इसके पीछे यह सेाच थी कि शिक्षा के माध्यम के रूप में स्थानीय भाषा को रखने से अंग्रेजी को केवल एक भाषा के स्तर से पढ़ाया जाएगा और इस स्थिति में स्थानीय लोग अपनी भाषा के माध्यम से विकसित होंगे।
मैकाले ने घ्रणित तथा षड़यंत्रकारी तौर पर भारतीय भाषाओं को विज्ञान एवं तकनीकी के लिये अनुपयुक्त करार देते हुए कहा था कि ‘यह ज्यादा से ज्यादा केवल साहित्य की भाषाएँ बन सकती है।’
मैकाले के उत्तराधिकारी चार्ल्स कैमेरान ने सेंट्रल युनिवर्सिटी व्यवस्था हेतु सशक्त अभियान के तहत भारत की उस वक्त की शास्त्रीय भाषाओं- संस्कृत, अरबी और फारसी के सम्पूर्ण निष्कासन का आह्यान यह कहते हुए किया कि ये गैर-ईसाई धार्मिक विचारधार के साथ घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं।
यह मनुष्य का निराला मनोविज्ञान ही है कि वह हर वस्तु या कार्य को उच्चश्रेणी का मानता है जिसे वह व्यक्ति या समुह उपयोग करता है जिसने उसे गुलाम बनाया था। यही हमारी कुलषित मानसिकता है जो हमें अंग्रेजी का मुर्खतापूर्ण दिवाना बनाती है। कोट-पेंट, जींस-स्कर्ट के इसीलिये हम दिवाने हैं, क्योंकि ये अंग्रेजों के पहनावे हैं।
ब्रिटेन, अमेरिका, अरब देश, चीन, फ्रांस और स्पेन अपनी भाषाओं के विकास पर भारी निवेश करते हैं लेकिन हमारा देश इसका महत्व ही नहीं समझता। कुछ प्रयास होते भी हैं तो वे भी स्थानीय भाषाओं के लिये नहीं किये जाते इसलिये पूरा देश उसका समर्थन नहीं करता। हमारा ध्येय, स्थानीय भाषाओं के विकास पर हो दक्षिण एवं पूर्व में यदि हिन्दी जबरन थोपी जाएंगी तो निश्चित ही वे उसका विरोध करेंगे।
2001 की जनगणना के अनुसार हिन्दी बोलने वालों की संख्या 42 करोड़ से अधिक थी। निश्चित ही यह अब 50 करोड़ के पार हो चुकी होगी। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहाँ चिकित्सा, तकनीकी एवं व्यापार के अध्ययन के लिये अंग्रेजी में ही पढ़ाई होती है। एमबीबीएस, बी.ई., एम.बी.ए. के लिये अंग्रेजी अनिवार्य है।
हमारे कुंभकर्णिय निद्रा में सोए तंत्र को कोरिया से सीखना चाहिए कि 8 करोड आबादी वाले इस देश में सारी उच्च शिक्षा उनकी स्थानिय भाषाओं में उपलब्ध है। इज़राइल जो कि मात्र 80 लाख की आबादी वाला देश है में सभी उच्च शिक्षा संस्थान हिब्रु भाषा में संचालित हो रहे हैं और उनका स्तर विश्व में सबसे अच्छा है।
दुनियाभर की रिसर्च बताती हैं कि जो छात्र गणित एवं विज्ञान अपनी मातृभाषा में पढ़ते हैं, वे अस्थानिय या विदेशी भाषाओं में पढ़ने वालों की तुलना में अधिक मेधावी बनते हैं। बच्चें मातृभाषा में वैज्ञानिक अवधारणा को अधिक प्रभावी ढंग से ग्रहण करते हैं और इस प्रकार प्राप्त किये ज्ञान को व्यावहारिक जगत् के साथ आसानी से जोड़ पाने में अधिक सक्षम होते हैं।
हमारे यहाँ अधिकारिक रूप से 22 भाषाएँ हैं और इन 22 भाषाओं में हमें विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिये प्रयास करना चाहिए। कतालन स्पने के एक क्षेत्र में लगभग सवा सो करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है, उस भाषा में स्पने ने वहाँ के रहवासियों के लिये शिक्षा की व्यवस्था की है लेकिन हमारे यहाँ 50 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा में पढ़ने के लिये कुछ नहीं है तमिल, तेलगु, बंगाली और मराठी का तो फिर कहना ही क्या।
दुनिया देख रही है कि आखिर भारत कैसे महाशक्ति बनेगा? क्या अंग्रेजी के सहारे ? यदि ऐसा है तो शायद यह यह दिवास्वप्न कभी सच न हो पाएं। क्या अपनी खुद की मूल भाषाओं के साथ? तो शायद वह भी महाशक्ति बन जाएं .......।

24/06/2017
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19/12/2016

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05/12/2016

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