17/11/2025
कुछ देर साथ चलने के बाद उसने कहा कि मैं एक डॉक्टर हूँ। इसी शहर के अस्पताल में इंटर्न। मेरे अस्पताल की इमरजेंसी में मामूली दवाएँ नहीं हैं। बिटाडिन तक नहीं है।हम जो लिक्विड चढ़ाते हैं वह भी है। लिख कर देना होता है कि बाहर से ले आइये। हार्ट अटैक के मरीज़ की एक दवा होती होती प्रोप-टी( अगर सही सुना है तो) वह भी नहीं है। हमें लिख कर देना पड़ता है कि दवा ले आइये। जबकि यह दवा हर इमरजेंसी में होनी चाहिए। रिश्तेदार जब तक बाहर जाता है और दवा लेकर आता है, मरीज़ इस दुनिया से जा चुका है। कोई दवा ही नहीं है मेरी इमरजेंसी में जबकि शहर का बड़ा सरकारी अस्पताल है। एक दिन किसी बड़े नेता का दौरा हुआ तो अचानक से चारों तरफ दवाएँ रख दी गईं। मुझे बहुत हैरानी हुई सर। कि जो दवा कभी होती नहीं है, अचानक से कहां से आ गईं। करप्शन है। मेरी इमरजेंसी में मृत्यु दर काफी बढ़ गई है। ग़रीब आम लोग होते हैं तो किसी को फर्क नहीं पड़ता। वह चलता रहा थोड़ी दूर तक साथ-साथ फिर लौट गया।
मैंने केवल सुना। ख़ुद से कहा कि ऐसी रिपोर्ट से क्या वाकई लोगों को फर्क पड़ता है? जहां लोगों के बीच चल रहा था वहाँ किसी को मास्क में नहीं देखा जबकि उस शहर की हवा ज़हर हो चुकी है। अगर वहां खड़े होकर वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों पर भाषण शुरू कर देता तो शायद भीड़ हमला कर देती या उदासीन होकर चली जाती। एक दो घंटे तक यही सोचता रहा कि खांसने की आवाज़ आ रही है, खुले में लोग बैठे हैं। चल रहे हैं। प्रेम के स्पर्शों का आनंद ले रहे हैं। लेकिन हवा में ज़हर है, इससे तो सतर्क हैं न चिंतित हैं। मगर उसी भीड़ में एक इंटर्न डॉक्टर आता है तो एक इमरजेंसी की हालत बता कर निकल जाता है। शहर और अस्पताल लिखने से कोई फायदा नहीं है। इमरजेंसी में दवा होनी चाहिए यह बेसिक दायित्व है किसी अस्पताल का। मैं सिर्फ उस अस्पताल के निदेशक के विचार जानना चाहता हूँ । धर्म और राष्ट्रवाद के बारे में क्या सोचता है। अस्पताल के बारे में क्या सोचता है यह जानने की ज़रूरत नहीं है। जो लोग बेसिक दवा के कारण मर जाते हैं, उनके परिवारों के बारे में भी यही जानना चाहता हूँ।