07/11/2025
एक छोटा सा गाँव था—धूलपुर। यहाँ के लोग खेती करते, मेहनत करते और शांतिपूर्वक जीते। लेकिन हर पाँच साल में वहाँ एक नया तूफ़ान आता—चुनाव।
हर बार नेता जी आते, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, पोस्टर, और वादों की बारिश के साथ।
इस बार कुछ अलग था।
टीवी पर दिन-रात एक ही बात—सीमा पर तनाव, युद्ध का खतरा, देशभक्ति का जोश।
गाँव के मास्टरजी ने कहा, "समस्या सुलझेगी नहीं, क्योंकि समस्या रहेगी तभी तो प्रचार चलेगा।"
भीड़ ने सुना, मगर समझी नहीं।
नेता जी आए, बोले, "हम देश को बचाएंगे। बस वोट हमें दो।"
गाँववालों ने पूछा, "लेकिन खेत सूख रहे हैं, स्कूल की छत गिर रही है?"
नेता मुस्कराए, "पहले दुश्मन से निपटना है, फिर देखेंगे।"
मास्टरजी ने फिर कहा, "जब तक डर बेचोगे, लोग सोचेंगे नहीं। और जब लोग सोचेंगे नहीं, तभी वोट मिलेगा।"
युद्ध नहीं हुआ। चुनाव जीत गए।
समस्याएं वहीं की वहीं।
पर अगली बार फिर वही स्क्रिप्ट तैयार थी—नया खतरा, नया डर, नया नारा।
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संक्षेप में:
“समस्या सुलझेगी नहीं, क्योंकि समस्या रहेगी तभी सत्ता मिलेगी।"
भीड़ समझेगी नहीं, क्योंकि सोचने का वक्त ही कहाँ मिलेगा जब डर हर वक्त टीवी पर नाचा करेगा।