06/04/2017
भाग ---५
दोस्तों नमस्कार,
मल्टीप्लायर के विषय में उलूल-जुलूल बातें फैलानेवाले सुपारी बहाद्दर कहते हैं, खेती में बाहर से कुछ भी खरीदकर नहीं डालना है, और विरोध करते हैं सिर्फ मल्टीप्लायर का, कैसा विरोधाभास है, बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ दिन रात किसान भाई को लाखों करोड़ रुपये कीमत का उत्पादन बेचकर मालामाल हो रही हैं, उनके किसी भी उत्पादन का विरोध नहीं, हमारे पूर्वज जिस प्राकृतिक मिटटी पर खेती करते थे क्या वैसी मिटटी हमारे खेतों में आज है, अगर नहीं है तब क्या पूर्वजों की खेती प्रणाली हमारे लिए फायदे की सिद्ध होगी, जानने के लिए पढ़ें.
जबसे रासायनिक खादों के इस्तेमाल से मिटटी ख़राब होनेवाली बात का पता चला है, तब से खेती करने की अलग-अलग प्रणालियां सामने आ रही है, बहोत बड़ी संख्या में किसान भाई आर्गनिक की तरफ आकर्षित हुए, आर्गनिक खेती की, परन्तु, ना तो उत्पादन को साइज मिला, ना टनेज मिला, साल भर घर चलाना मुश्किल हो गया, कुछ लोगों ने इतनी ज्यादा प्रोसेस बताई की उसे करने में मानवीय श्रम का खर्च ज्यादा हो गया, खेती का सारा बजेट बिघड गया, जितने सलाहकार उतने मत सामने आने से किसान भाई दुविधा में फंस गया क्या करें क्या नहीं |
कुछ लोगों का कहना है की, खेती में बाहर से कुछ भी नहीं डालना है, क्योंकि हमारे पूर्वज कुछ भी नहीं डालते थे, ये भी बात सही दिखती है, जब हमारे पूर्वज बाहर से कुछ नहीं डालते थे तो हम भी नहीं डालेंगे, यहाँ एक फरक आपको समझना पड़ेगा की, आपके पूर्वजों की मिटटी पूरी तरह से प्राकृतिक थी, फसलों को भोजन प्रदान करनेवाली प्रणाली वहां कार्यरत थी, एक ग्राम मिटटी में कम से कम १० करोड़ सूक्ष्म जीवाणु कार्यरत थे, एक एकर क्षेत्र में कम से कम ४०,००० केंचुए ( गांडूल,अड़सिया ) कार्यरत थे, ४०० किलो केंचुए का खाद एक एकर खेत में रोज तैयार होता था |
आज हमारी एक ग्राम मिटटी में जीवाणु संख्या १ करोड़ से कम रह गयी है, एक भी केंचुआ देखने को नहीं मिलता, केंचुए मिटटी में २ से ३ मीटर नीचे जाकर समाधी ले चुके है, हमारी मिटटी हार्ड हो गयी है, मिटटी में आक्सीजन का प्रमाण बहोत कम हो गया है, जीवाणुओं की संख्या में भयानक कमी आ जाने के कारण मिटटी में उपलब्ध, अल्प प्रमाण में लगनेवाले घटक उपलब्ध फाम में बदलनेवाले जीवाणुओं की कमतरता के कारण मिटटी से घटक नहीं मिल पा रहे है, ऐसी विषम परिस्तिथि में भी क्या आप पूर्वजों का ही अनुकरण करेंगे |
जिनका कहना है की, हाँ हम पूर्वजों का ही अनुकरण करेंगे, में उनसे पूछना चाहता हूँ की आपके पूर्वज बैलगाड़ी में सफर करते थे ५०० किलो मीटर दूर जाने के लिए उनको १० दिन लगते थे, तो क्या आप भी बैलगाड़ी में ही सफर करेंगे, विज्ञान ने प्रगति की कार, बस, रेलगाड़ी और हवाई जहाज बनाये क्या आप उस सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते ? करते हो, आप में से जैन मुनि छोड़कर सभी लोग अत्याधुनिक विज्ञान की सुविधाओं का इस्तेमाल कर रहे है, खुद के लिए आधुनिक विज्ञान के फायदे इस्तेमाल करने में रस्सी खेंच चला रखी है, और खेती की बात आएगी तो कहते है की, हमारे पूर्वज कुछ नहीं डालते थे इसलिए में भी कुछ नहीं डालूँगा |
आपके पूर्वज एक दूसरे का समाचार जानने के लिए पत्र भेजते थे, आठ से दस दिन में पत्र इच्छित व्यक्ति को मिलता था, फिर वो जब उत्तर भेजता था तब आठ से दस दिन बाद आपको मिलता था, मतलब किसी परिचित के विषय में वो कैसे है, ये जानने के लिए हमें १५ से २० दिन लगते थे, अगर आपको पूर्वजों की कार्यशैली से इतना प्रेम है, तो जेब में मोबाईल लेकर क्यों घूम रहे हो, नहीं आप मोबाईल का इस्तेमाल बंद नहीं कर सकते यहाँ आपको आधुनिक विज्ञानं का सहारा चाहिए, परन्तु बात खेती की आएगी तो कहेंगे की, हम बाहर से कुछ नहीं डालते, क्योंकि हमारे पूर्वज बाहर से कुछ नहीं डालते थे, क्या पूर्वज कह कर गए थे की, आधुनिक विज्ञानं के सब फायदे लेना पर खेती में कुछ नहीं डालना |
हमारे पूर्वज जब खेती करते थे तब जनसँख्या बहोत कम थी, इसलिए खेती का क्षेत्र भी कम था, हर गाव में शेकडो एकर जमीन जंगल थी, प्रत्येक किसान भाई के पास कम से कम २०० तक गाय बैल होते थे, घर के छोटे बच्चे चराकर लाते थे, २०० जानवर का गोबर खाद खेतों में हमारे पूर्वज डाला करते थे, क्या आपके पास गोबर का खाद है, क्या आप २०० जानवर रख सकते है, उनको चराने के लिए जंगल आपके पास है, अब सोचो क्या आपके पूर्वज जैसी खेती करते थे वैसी आप कर रहे हो, पूर्वजों का अनुकरण करना है तो पूरा करों, आधा अधूरा सब कुछ नुकसान दायक होता है |
हमारा भी यही कहना है की, खेती के लिए किसी खाद या जहरीली दवा की जरुरत नहीं है, परन्तु प्राकृतिक मिटटी में ये संभव है, मिटटी को प्राकृतिक बनाने के लिए अगर हम आधुनिक विज्ञानं का सहारा लें तो इसमें बुराई क्या है, आधुनिक विज्ञानं की मदत से हमारी मिटटी ५ से ७ साल में पूरी तरह प्राकृतिक बन जाती है, हमारी १ ग्राम मिटटी में कम से कम १० लाख सूक्ष्म जीवाणु कार्यरत हो जाते है, एक एकर क्षेत्र में कम से कम ४०,००० हजार केंचुए कार्यरत हो जाते है, हर दिन ४०० किलो केंचुआ खाद मिलने लगता है, तब हमें बाहर से कुछ भी डालने की आवश्यकता नहीं रहती |
रासायनिक खादों से ख़राब हुई मिटटी को फिर से कार्यरत करनेवाला आधुनिक अनुसन्धान है "मल्टीप्लायर" इस मल्टीप्लायर की मदत से पहले दिन से रासायनिक खाद डालना बंद करने के बावजूद आपका उत्पादन ५० प्रतिसत तक या उससे ज्यादा बढ़कर आता है, ५ से ७ साल में आपकी १ ग्राम मिटटी में १० करोड़ से ज्यादा जीवाणु कार्यरत हो जाते है, १ एकर खेत में कम से कम ४०,००० केंचुए काम करने लगते है, हर दिन ४०० किलो से ज्यादा केंचुए का खाद मिलने लगता है, तब आपकी मिटटी पूरी तरह से प्राकृतिक बन जाती है, हमारे पूर्वज जिस मिटटी पर खेती करते थे वैसी बन जाती है, आपका उत्पादन किटक रोग मुक्त तथा बढ़कर मिलता है | मिटटी प्राकृतिक होने के बाद आपको मल्टीप्लायर भी डालने की कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए में इतना ही कहूँगा की आपको जो भी सिखाया जा रहा है क्या वह बरोबर है, इसका निर्णय आपको ही लेना है |