04/01/2026
(हास्य–व्यंग्य)
"आई लव ❤️ गंदापुर"
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गंदापुर दरअसल किसी नक़्शे पर बसा हुआ शहर नहीं है, बल्कि गंदापुर तो एक मानसिक स्थिति है- जो हर उस नागरिक के भीतर पाई जाती है, जो बेहूदी किन्तु रसीली और माबहनिया वाली घरेलू गालियाँ सिस्टम को देता है और फिर पालन उसी का करता है। यह वही हरामी मानसिकता है, जो सुबह अख़बार में घोटाले पढ़कर थूक निगल लेती है, दोपहर में दफ्तर में उसी सिस्टम की दलाली करती है और शाम को टीवी पर चिल्लाकर खुद को क्रांतिकारी समझ लेती है। गंदापुर इसलिए फलता-फूलता है क्योंकि यहाँ हर कोई किसी न किसी रूप में लाभार्थी है- कोई सीधे, कोई टेढ़े, कोई चुप्पी के ज़रिये। यह शहर नहीं बिगड़ा, यह डिज़ाइन किया गया है- हमारे डर, हमारे लालच और हमारी सुविधा के हिसाब से।
जब दुनिया के शहर अपने-अपने नाम के आगे Smart, Metro, Green और World Class जोड़कर हम लोग आत्ममुग्ध हो रहे हैं, तब हमारा प्यारा शहर "गंदापुर", खतरनाक विनम्रता, भयंकर सादगी और बेशुमार गंदगी—तीनों में पूर्णतः आत्मनिर्भर है। यहाँ प्रेम जताने के लिए दिल की ज़रूरत नहीं पड़ती, सिर्फ़ एक चबूतरा काफ़ी होता है, जिस पर लिखा हो-
"I ❤️ GANDAPUR"
-हाँ ये अलग बात है कि, ये चबूतरा आज है, कल नहीं है, परंतु प्रेम तो स्थायी ही है ना। क्यूंकि साहब, गंदापुर में प्रेम कोई भावना नहीं, एक अस्थायी ढांचा है—जो उखड़ता है, बिकता है, पिघलता है और अंततः किसी न किसी ज़रूरतमंद की शाम रौशन कर देता है। यही तो असली समावेशी विकास है, और बिलकुल ऐसे ही तो किसी भी अविकसित, धर्मभीरू और मानसिक रूप से पंगु राष्ट्र का भी तो विकास होता है।
गंदापुर में “आई लव❤️ गंदापुर” लिखा देखना ऐसा ही है- जैसे किसी नशेड़ी की जेब से स्वास्थ्य बीमा कार्ड निकल आए, हैरानी भी होती है और हँसी भी। इस शहर में प्रेम कोई भावना नहीं, एक काले पत्थर का बोर्ड है, जिसे लगवाने का टेंडर निकलता है, फोटो खिंचती है, उद्घाटन होता है और फिर वही बोर्ड रात के अंधेरे में गायब हो जाता है। गंदापुर का प्रेम इतना सच्चा है कि उसे ज़्यादा देर खुले में छोड़ा ही नहीं जा सकता, कहीं किसी ज़रूरतमंद की नज़र न लग जाए। यहाँ दिल काग़ज़ का नहीं, लोहे और पत्थर का बनता है, ताकि उखाड़ा जा सके, तौला जा सके और बेचकर किसी की रात रोशन की जा सके। गंदापुर में प्रेम टिकता नहीं, प्रसारित होता है- कभी कबाड़ी की दुकान में, कभी थाने के बाहर, कभी किसी फाइल के नीचे दबा हुआ।
गंदापुर कोई शहर नहीं, यह एक जीवित बहाना है- ऐसा बहाना जिसे हर विभाग, हर नेता, हर अफसर और हर आम नागरिक रोज़ सुबह उठकर ओढ़ लेता है और रात को उतारकर खूंटी पर टाँग देता है। यहाँ “आई लव❤️ गंदापुर” लिखना उतना ही खोखला काम है जितना किसी सड़े हुए कुएँ पर “स्वच्छ जल स्रोत” की पट्टी लगा देना। यह शहर प्यार नहीं करता, यह प्यार का इस्तेमाल करता है- जैसे वोट का, जैसे बजट का, जैसे योजना का। गंदापुर में प्रेम एक सरकारी सामग्री है, जो उद्घाटन के दिन चमकती है और अगले दिन गायब हो जाती है, और जब कोई पूछे कि गया कहाँ, तो जवाब मिलता है- “जाँच बिठा दी है।” जाँच यहाँ निष्कर्ष के लिए नहीं, भूल पैदा करने के लिए होती है।
राजनीति गंदापुर की सबसे सड़ी हुई नस है, जिसमें बहता हुआ खून नहीं, बड़े बड़े झूठे और खोखले, फ़िल्मी वादों की गंदगी है। यहाँ नेता विचार नहीं बेचते, वे डर, पहचान और नफ़रत के पैकेट बेचते हैं- वोट के हिसाब से साइज बदल जाता है। चुनाव से पहले ये नेता जनता के पैर छूते हैं और चुनाव के बाद जनता की गर्दन। इन्हें शहर की समस्याओं से कोई मतलब नहीं, इन्हें सिर्फ़ यह देखना है कि समस्या किस जाति, किस धर्म, किस मोहल्ले में है- ताकि मुद्दे को समाधान नहीं, नारे में बदला जा सके। गंदापुर में कोई नेता असफल नहीं होता, वो तो बस अगली बार और ज़ोर से चिल्लाता है।
अफसरशाही इस पूरे तमाशे की सबसे सुरक्षित प्रजाति है- न चुनाव का डर, न जनता की गालियाँ, न परिणाम की ज़िम्मेदारी। यहाँ फाइलें इसलिए नहीं रुकतीं कि नियम सख़्त हैं, बल्कि इसलिए कि- नियमों के बीच मोलभाव की पूरी गुंजाइश छोड़ी गई है। अफसर जनता को ऐसे देखते हैं जैसे किसी रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़े भिखारी को- ज़रूरत भी है, पर दूरी बनाए रखना ज़रूरी है। गंदापुर में अफसर भ्रष्ट नहीं होते, वे तो बल्कि बहुत ज्यादा “प्रैक्टिकल” होते हैं। ईमानदारी यहाँ मूर्खता की सबसे उच्चतम श्रेणी है।
गंदापुर के नेता इस शहर के सबसे बड़े सुपर कलाकार हैं। ये विकास की ऐसी पेंटिंग बनाते हैं, जिसमें रंग सिर्फ़ पोस्टरों में होते हैं और कैनवास जनता की पीठ होती है। चुनाव से पहले शहर को गोद में उठाकर फोटो खिंचवाते हैं, चुनाव के बाद उसे सड़क पर छोड़ देते हैं। इनके भाषणों में शहर स्मार्ट होता है, डिजिटल होता है, उड़ान भरता है- लेकिन ज़मीन पर वही टूटी सड़क, वही बहता सीवर और वही भूखा नागरिक। नेता गंदापुर को नहीं चलाते, वे गंदापुर के नाम पर चलते हैं- गाड़ी, बंगला, सुरक्षा, बेशुमार जमींनें और विदेशी दौरे। और जब कोई पूछे कि इतने साल में किया क्या, तो उँगली पीछे घुमा देते हैं, क्योंकि गंदापुर में आगे देखने से पहले पीछे को कोसना राष्ट्रीय नीति है।
अफसरशाही गंदापुर की रीढ़ नहीं, उसकी गेंडाछाप मोटी, किन्तु चिकनी चमड़ी है- जिस पर शिकायतें फिसल जाती हैं और शर्म कभी चिपकती नहीं। यहाँ जनता की फाइलें काम के लिए नहीं, आराम करने के लिए घूमती हैं। एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक जाते-जाते समस्या बूढ़ी हो जाती है, लेकिन समाधान कभी जवान ही नहीं होता। अफसर जनता से ऐसे बात करते हैं जैसे एहसान कर रहे हों- क्योंकि गंदापुर में जनसेवा अधिकार नहीं, बल्कि ठाकुरजी की कृपा है। हर विभाग जानता है कि सिस्टम सड़ा हुआ है, लेकिन हर विभाग यह भी जानता है कि सड़ांध में ही सबसे ज़्यादा मलाई जमती है।
मीडिया गंदापुर की सबसे रंगीन नाली है, जिसमें खबरें नहीं, मसाला बहता है। यहाँ सवाल इसलिए नहीं पूछे जाते कि जवाब मिल जाए, बल्कि इसलिए पूछे जाते हैं कि शोर और TRP का जोर बना रहे। बेरोज़गारी, महँगाई, अशिक्षा, गड्ढे, गंदगी, स्मैक का खुला व्यापार, चोरी, गुंडागर्दी स्वास्थ्य- ये सब बोरिंग कंटेंट हैं। असली खबर वही है- जिसमें चीख हो, दुश्मन हो, और स्टूडियो में खड़े होकर किसी को शहरद्रोही घोषित किया जा सके। गंदापुर का मीडिया जनता को सूचना नहीं देता, वह उसे सोशल स्मैक का नशा और वर्चुअल ख़ौफ़ देता है- ताकि असली दर्द महसूस ही न हो।
धर्म और नैतिकता गंदापुर में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की जाने वाली और सबसे ज़्यादा अपमानित चीज़ें हैं। यहाँ के आस्थाकेंद्र- आस्था के लिए नहीं, राजनीतिक पार्किंग के लिए हैं। भगवान यहाँ पूजे नहीं जाते, बल्कि राजनैतिक रूप से भरपूर इस्तेमाल किए जाते हैं- कभी वोट के लिए, कभी दंगे के लिए, कभी चुप्पी बनाए रखने के लिए। यहाँ पर नैतिकता भाषणों में रहती है और व्यवहार में मर चुकी होती है। गंदापुर में कोई भी पाप करने से ज़्यादा ख़तरनाक है- उस पाप पर कोई भी सवाल करना या ऊँची आवाज़ उठाना, क्यूंकि प्रशासन का कहना है कि- पुराने सडे हुए कानून के अनुसार, ऊँची आवाज़ उठाना "न्यूसेंस" यानि कि "ध्वनि प्रदूषण" होता है, जो कि कानूनन अपराध है।
गंदापुर की महानता इसी में है कि, यहाँ की सार्वजनिक संपत्ति इस देश की सबसे लोकतांत्रिक व्यवस्था है, क्योंकि यहाँ हर चीज़ सबके लिए खुली है- खासतौर पर उठाने के लिए। पार्क में लगे झूले, जिम के डम्बल, नालियों के ढक्कन, सड़क किनारे लगी रेलिंग, यहाँ तक कि “आई लव❤️ गंदापुर” के अक्षर- सब कुछ जनता का है। और जनता का मतलब- वही, जो पहले पहुँचे। यहाँ चोरी शब्द का प्रयोग असभ्य माना जाता है; इसे "लोक-उपयोग" कहा जाता है। अगर कोई पूछ बैठे कि- यह सब गायब कैसे हो गया.? तो प्रशासन छाती पीटकर कहता है- “हमने जनता के लिए ही तो लगवाया था।” जनता भी उतने ही आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से जवाब देती है- “हमने इस्तेमाल कर लिया।” इस तालमेल को ही "गंदापुर मॉडल ऑफ डेवलपमेंट" कहा जाता है, जिसमें जिम्मेदारी की कोई जगह नहीं, लेकिन एडजस्टमेंट की पूरी आज़ादी है। कोई पूछे कि- फलानी सार्वजनिक सम्पत्ति को कौन ले गया.? तो प्रशासन अपना चौड़ा सीना तानकर कहता है- “हम जनता के लिए ही तो लगवाते हैं।” और जनता गर्व से जवाब देती है-“हमने ले लिया।” इस तालमेल को ही "पारस्परिक सामंजस्य" कहते हैं, जिसे समझने के लिए किसी स्पेशल ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं- बस आँखें बंद रखने का अभ्यास चाहिए।
गंदापुर नगर परिषद की आत्मा तो है, किन्तु यह आत्मा कहीं भी दिखाई नहीं देती, पर हर जगह महसूस होती है- खासतौर पर आलिया भट्ट के गालों जैसी सड़कों पर। यहाँ सड़कें चलने के लिए नहीं, झेलने के लिए होती हैं। गड्ढे दुर्घटना नहीं, अनुभव हैं। यहाँ का हर चिरंजीवी गड्ढा नागरिक को याद दिलाता है कि वह अभी तक भी ज़िंदा है। बारिश आए तो सड़क गायब, धूप निकले तो सड़क आधी- लेकिन उसका पूरा आनंद साल भर मिलता है। गंदापुर नगर परिषद इसे Natural Drainage System कहती है और नागरिक इसे अपना भाग्य। दोनों सहमत हैं, इसलिए कोई अनावश्यक विवाद नहीं। वास्तव में यहाँ की नगर परिषद गंदापुर की वह मशीन है, जो गंदगी को सिर्फ़ इधर-उधर शिफ्ट करती है। यहाँ सफ़ाई अभियान तो बस फोटो खिंचवाने के लिए होते हैं, झाड़ू हाथ में और कचरा आँख से दूर। दरअसल गंदापुर नगर परिषद तो यहाँ का सबसे मेहनती विभाग है, क्योंकि यह तो कई सालों से, अपने बेरोजगार और बेशर्म दामाद ठेकेदारों से एक ही सड़क को बार-बार बनाकर रोज़गार पैदा कर रहा है। यहाँ सड़कें चलने के लिए नहीं, सहन करने के लिए होती हैं। सड़कें बार-बार इसलिए खोदी जाती हैं ताकि जनता को याद रहे कि विकास स्थायी नहीं, चक्रीय प्रक्रिया है- खुदाई, पैचवर्क, उद्घाटन, फिर खुदाई। नालियाँ इसलिए नहीं भरी जातीं कि बह सकें, बल्कि इसलिए कि नागरिक समझ सकें कि उनका जीवन भी कभी-कभी जाम हो सकता है। यह विभाग गड्ढे नहीं बनाता, यह नागरिकों की उम्मीदें तोड़ता है। गड्ढे कोई कमी नहीं, बल्कि नागरिकों के धैर्य की परीक्षा हैं। बारिश में सड़क गायब हो जाए तो कहा जाता है- “प्राकृतिक आपदा”; धूप में उखड़ जाए तो- “मेंटेनेंस बाकी है।” नगर परिषद का असली काम सड़क बनाना नहीं, बल्कि स्पष्टीकरण देना है। हर गड्ढे के पीछे एक प्रेस नोट, हर नाली के पीछे एक बहाना और हर शिकायत के पीछे एक लंबी चुप्पी। यह विभाग शहर नहीं संभालता, यह जनता को मानसिक रूप से प्रशिक्षित करता है, कि इनसे कोई भी उम्मीद रखना तुम्हारी बेवकूफी है।
पुलिस गंदापुर की वह संस्था है जो हर अपराध के बाद सबसे पहले पहुँचती है- बयान देने के लिए। यहाँ अपराध रोकना पुलिस का काम नहीं, अपराध के बाद स्थिति संभालना काम है। नगर कोतवाली समेत यहाँ के समस्त थाने न्याय के केंद्र नहीं, समझौते के अड्डे हैं। गरीब के लिए कानून मोटा डंडा है, अमीर के लिए मुलायम रबर और डलसलों के लिए मलाई-रबड़ी। पुलिस जानती है कि- किसे पकड़ना है और किसे पहचानने से इंकार करना है। गंदापुर शहर में जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे इसलिए लगे हैं, ताकि जनता को लगे कि कुछ देखा जा रहा है। जबकि असल में सब कुछ अनदेखा किया जा रहा होता है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाये, तो पुलिस विभाग गंदापुर का सबसे रोमांटिक विभाग है। यह हमेशा पैट्रोलिंग पर रहता है- खासतौर पर उन इलाकों में जहाँ पर कुछ भी हो ही नहीं रहा। और जहां पर सबकुछ हो रहा होता है, वहाँ पुलिस पहले से जानती है कि- “अब क्या किया जा सकता है?” सीसीटीवी कैमरे पूरे गंदापुर शहर में इसीलिए तो लगाये गए हैं, ताकि अपराध न दिखे- बल्कि सिर्फ यह दिखेँ कि कैमरे लगे हैं। और उन सीसीटीवी कैमरों का एंगल स्पेशली ऐसा चुना गया है- कि हर गतिविधि तो दिखे, लेकिन हर अपराध नहीं। अगर कभी कोई फुटेज गलती से मिल भी जाए, तो वह इतनी धुंधला होती है- कि अपराधी नहीं, बस लोकतंत्र की हालत साफ़ दिखाई देती है। इसे कहते हैं स्मार्ट सर्विलांस, देखना भी और न देखना भी।
पुलिस गंदापुर की आत्मा है- क्योंकि यह सब कुछ देखती है, सब कुछ जानती है और फिर भी कुछ नहीं करती। यहाँ अपराध अचानक नहीं होते, वे समय लेकर, पूरे आत्मविश्वास से होते हैं, क्योंकि अपराधी जानता है कि पुलिस या तो “राउंड पर” होगी या “मीटिंग में”। हमारे गंदापुर में पुलिस व्यवस्था कानून से नहीं चलती, समझदारी से चलती है और समझदार वही है जो ज़्यादा सवाल न पूछे, बस लेनदेन में साफसुथरा बना रहे।
स्वास्थ्य विभाग गंदापुर का सबसे आशावादी विभाग ही नहीं अपितु गंदापुर की सबसे निर्मम विडंबना है। यहाँ हर मरीज के साथ एक उम्मीद मुफ्त में दी जाती है- इलाज बाद में। अस्पतालों में डॉक्टर कम, पोस्टर ज़्यादा हैं। “यहाँ सभी सुविधाएँ उपलब्ध हैं” जैसे वाक्य दीवारों पर ऐसे टँगे हैं जैसे वे खुद मरीजों का इलाज कर देंगे। गंदापुर में स्वास्थ्य सेवा नहीं चलती, दुर्भाग्य सेवा चलती है। यहाँ अस्पताल कम, प्रतीक्षालय ज़्यादा हैं- जहाँ लोग इलाज के लिए नहीं, किस्मत के फैसले के लिए बैठते हैं। डॉक्टरों की कमी नहीं, डॉक्टरों की उपलब्धता की कमी है। मरीज लाइन में खड़े हैं, डॉक्टर मीटिंग में हैं, दवाइयाँ रास्ते में हैं। यहाँ के हस्पताल में- दवा बाहर से लानी है, जाँच बाहर से करानी है। दवाइयाँ आती हैं, जाती हैं, और काग़ज़ों में हमेशा मौजूद रहती हैं। यहाँ बीमारी से भी बहुत ज़्यादा खतरनाक है- अस्पताल पहुँचना। यहाँ का सरकारी झिला चिकित्सालय, जो कि हस्पताल कम, नाउम्मीदेँ ज़्यादा है। जहाँ बोर्ड पर लिखा होता है- “यहाँ सब सुविधाएँ उपलब्ध हैं।” चूंकि बोर्ड कभी बीमार नहीं पड़ता, इसलिए हमेशा टंगा रहता है। मरीज अगर ठीक हो गया तो कुदरत का करिश्मा, और अगर नहीं हुआ तो- “आप देर से लाए थे।” अगर मरीज बच गया तो डॉक्टर का अनुभव, और मर गया तो भगवान की मर्ज़ी। हस्पताल तो हर हाल में पाक-साफ़, क्योंकि काग़ज़ों में सब ठीक है।
शिक्षा विभाग गंदापुर का वह बोडम कारखाना है, जहाँ सवाल पूछने की आदत को बचपन में ही कुचल दिया जाता है। स्कूलों में शिक्षा कम, आदेश ज़्यादा मिलते हैं। शिक्षक बच्चों को नहीं, सिलेबस को पढ़ाते हैं; और सिलेबस बच्चों को नहीं, परीक्षा को तैयार करता है। यह विभाग ऐसे इंटरनेशनल नागरिक पैदा करता है जो नौकरी न मिलने पर सिस्टम को नहीं, खुद को दोष देँ, क्योंकि गंदापुर को सवाल करने वाले नहीं, इंटरनेशनल भिखमंगे नागरिक चाहिए। बड़े-बड़े निजी शिक्षालय गंदापुर का भविष्य यानि शिक्षार्थी गढ़ रहे हैँ, जो कि भविष्य में शिक्षा की अर्थी उठाएंगे और मातापिता को वृद्धाश्रमों में एडमिट करवाएंगे। ऐसा शिक्षार्थी अभी भी रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहा है।
शिक्षा विभाग गंदापुर की वह सबसे खतरनाक बम फैक्ट्री है, जहाँ भविष्य को कच्चे माल की तरह संभाला जाता है। स्कूलों में बच्चे पढ़ने कम, सहने ज़्यादा आते हैं। छत टपकती है, शिक्षक अनुपस्थित हैं, लेकिन बोर्ड पर स्लोगन चमकता है- “शिक्षा ही विकास है।” यहाँ शिक्षा ज्ञान नहीं देती, एडजस्टमेंट सिखाती है। जो बच्चा बिना शिक्षक, बिना किताब और बिना सवाल किए पास हो जाए, वही गंदापुर का आदर्श नागरिक है। यह विभाग डिग्रियाँ बाँटता है, ताकि बेरोज़गारी पढ़ी-लिखी दिखे। स्कूलों में बच्चे कम, योजनाएँ ज़्यादा हैं। भवन जर्जर हैं, लेकिन पोस्टर नए हैं। शिक्षक कभी प्रशिक्षण में, कभी चुनाव में, कभी जनगणना में तो कभी कोरोना ड्यूटी में। पढ़ाने का काम तो बच्चा खुद करता है। जो बच्चा बिना किताब, बिना शिक्षक, बिना छत पढ़ ले, वही देश का भविष्य है।
जलदाय विभाग यानि कि वाटर वर्क्स- गंदापुर का सबसे दार्शनिक और शीतल विभाग है। यहाँ से शहर बह्र में पानी या तो बहुत आता है या बिल्कुल नहीं आता। दोनों स्थितियों में नागरिक को ही एडजस्ट करना पड़ता है। विभाग की टंकी में पानी नहीं है, मगर उपभोक्ता को बिल पूरा भेजा जाता है, क्योंकि भरोसा अभी जिंदा है। नल से हवा आती है, पर उम्मीद बहती रहती है। जलदाय विभाग मानता है कि पानी जीवन है, और जीवन में तो सदैव उतार-चढ़ाव ही आते रहते हैं।
बिजली विभाग गंदापुर का सबसे रचनात्मक विभाग है। यहाँ लाइट जाती नहीं, नाटकीय प्रवेश करती है। अंधेरा आते ही लोग सितारों को देखने लगते हैं, बच्चे मोबाइल की टॉर्च से होमवर्क करते हैं और विभाग कहता है- “मेंटेनेंस चल रहा है।” यह मेंटेनेंस इतना चलता है कि हम लोग दीपावली के दिन भी अंधेरे में ही जीवन के उजाले ढूँढ लेते हैं।
और फिर अब आते हैं हमारे आम नागरिक यानि कि "हम जैसे लोग", जो हैं इस प्यारे शहर गंदापुर की असली रीढ़। हम वही लोग हैं जो सुबह गड्ढे में गिरकर उठते हैं, शाम को उसी गड्ढे को कोसते हैं और रात को उसी सिस्टम को वोट देते हैं। हम शिकायत भी करते हैं और स्वीकार भी। हमको सब पता है, पर हमें सब चलता है। क्योंकि विरोध करना थकाने वाला काम है और चुप रहना हमारी स्थायी आदत बन चुकी है।
गंदापुर की महान, सहनशील, मौनप्रिय कर्मठोक जनता, यानि "हम जैसे लोग"। यही वह वर्ग है जो सबसे ज़्यादा लुटता है और सबसे कम बोलता है। यही वह जनता है जो हर चुनाव में कहती है- “ये भैं.. का ..ड़ा बहुत बेकार हैं,” और फिर उसी बेकार जीजा को, स्वयंवर की तरह बहुत प्यार से चुन लेती है। यही वह जनता है जो सोशल मीडिया पर तो शेर है और सड़क पर भेड़। गंदापुर की असली ताकत उसकी यही चुप्पी है- जो उन चंगेजी नेताओं को निडर और मोगेम्बो अफसरों को बेपरवाह बनाए रखती है। जनता यहाँ पीड़ित नहीं, बल्कि सहभागी है- क्योंकि वह हर अन्याय को “भैं..चो.. सब चलता है” कहकर पास कर देती है।
गंदापुर की जनता यानि "हम जैसे लोग" वह भीड़ हैं, जो रिश्वत देते भी हैँ, लेते भी हैँ और फिर सिस्टम को गाली भी देते हैँ। हम लोग चाहते हैँ कि- नेता ईमानदार हों, अफसर देवता हों, पुलिस फरिश्ता हो, लेकिन खुद से बस इतना ही कहते हैँ- “आख़िर हम जैसे लोग अकेले क्या कर सकते हैं?” यही वाक्य गंदापुर की असली संविधान-प्रस्तावना है।
गंदापुर को अगर सच में किसी ने बर्बाद किया है, तो न वह नेता हैं, न अफसर, न पुलिस, न मीडिया- बल्कि "हम जैसे लोग"। वही हम, जो हर गंदगी को पहचानते हैं, लेकिन उठाते नहीं; हर अन्याय को समझते हैं लेकिन रोकते नहीं; हर झूठ को जानते हैं लेकिन दोहराते ज़रूर हैं। "हम जैसे लोग" क्रांति के नाम पर फेसबुक और व्हाट्सप्प पर स्टेटस डालते हैं और व्यवस्था के नाम पर रिश्वत देते हैं। हमें सब पता है- कौन चोर है, कौन निकम्मा है, कौन झूठा है..!! लेकिन हमें उससे भी ज़्यादा पता है कि चुप रहने में ही सबसे ज्यादा आराम है क्यूंकि हम सबसे बड़े हरामी से भी ज्यादा, बड़े वाले आरामी हैं। गंदापुर का सबसे स्थायी ढाँचा सड़क नहीं, पुल नहीं, भवन नहीं- बल्कि हमारी हरामी आरामी सहूलियत है।
"हम जैसे लोग" सिस्टम को कोसते हैं, लेकिन सिस्टम के सबसे वफ़ादार कर्मचारी होते हैं। दफ्तर में घुसते ही नैतिकता को जूते के साथ बाहर उतार देते हैं और कहते हैं- “यहाँ ऐसे ही चलता है।” यही वाक्य गंदापुर की असली शहरगान-पंक्ति है। हम फाइल आगे बढ़ाने के लिए पांच सौ का नोट रखते हुए खुद को भ्रष्ट नहीं मानते, बल्कि हम तो खुद को "मॉडर्न & प्रेक्टिकल" कहते हैं। हम ट्रैफिक नियम तोड़ते हुए पुलिस को गाली देते हैं, और पुलिस को सौंपे गए नोट को “चाय-पानी” का नाम देकर अपनी सोइ हुई आत्मा साफ़ कर लेते हैं। गंदापुर में सबसे बड़ा झूठ यही है कि- "मैं तो ऐसा नहीं हूँ"।
"हम जैसे लोग" बच्चों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं और उसी बच्चे के एडमिशन के लिए सिफ़ारिश खोजते हैं या डोनेशन के नाम पर रिश्वत देते हैं। हम चाहते हैं कि देश बदल जाए, लेकिन मोहल्ले की सफ़ाई “नगर परिषद की ज़िम्मेदारी” मानते हैं। हम टैक्स चोरी को होशियारी कहते हैं और घोटालों पर नैतिक भाषण देते हैं। हम चाहते हैं कि नेता ईमानदार हों, लेकिन वोट देते समय यह नहीं देखते कि उम्मीदवार कौन है- बस यह देखते हैं कि हमारा काम निकलेगा या नहीं।
हम जैसे लोग सबसे पहले कहते हैं- “यार, भें..चो.. अब तो बहुत हो गया।” और फिर सबकुछ पहले भूल जाते हैं। हमारा गुस्सा न्यूज़ बुलेटिन तक चलता है, हमारी चेतना सिर्फ व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड तक ही ज़िंदा है। उसके बाद तो हमें- अगला मैच, अगला विवाद, अगला तमाशा चाहिए। गंदापुर इसलिए नहीं सुधरता क्योंकि यहाँ जनता नहीं, गूंगे-बहरे दर्शक रहते हैं। और दर्शक कभी मंच पर चढ़कर सवाल नहीं पूछते, वे तो बस खोखली ताली बजाते हैं- सही पर भी, ग़लत पर भी।
हम जैसे लोग बहादुरी को रोमांटिक कहानी समझते हैं- जो दूसरों के क़िस्से में आए तो अच्छी लगती है, अपने हिस्से में आए तो बेवकूफी। कोई अगर सवाल उठाए, तो हम कहते हैं- “इससे क्या घंटा मिलेगा भैं..चो..?” यही वाक्य गंदापुर की सबसे रसीली जहरीली गैस है। इससे सपने मरते हैं, आवाज़ें दबती हैं और सिस्टम चैन की नींद सोता है। हम चाहते हैं कि- कोई और जोखिम ले, कोई और जेल जाए, कोई और नौकरी खोए और हम सुरक्षित दूरी से उसे “सलाम” ठोक दें।
"हम जैसे लोग" खुद को पीड़ित मानते हैं, जबकि सच यह है कि हम सहयोगी अपराधी हैं। हम हर उस सिस्टम को चलाते हैं जिसे हम गाली देते हैं। अगर हम रिश्वत न दें, तो रिश्वत लेने वाला भूखा मर जाए-यह तर्क देकर हम अपने पाप को सामाजिक सेवा बना लेते हैं। अगर हम नियम तोड़ें, तो कहते हैं- “ये साला माडर..चो.. सिस्टम ही ऐसा है।” आखिर ये सिस्टम क्या है? सिस्टम = हम + हमारी सहूलियत + हमारी कायरता और फिर हम गर्व से कहते हैं—“यार, भैं..चो.., ये साला देश कभी नहीं सुधरेगा।” सही बात है साहब, बिलकुल भी नहीं सुधरेगा। क्योंकि देश कोई मशीन नहीं जिसे नेता बदल दे। देश हम जैसे लोगों का ही तो सामूहिक व्यवहार है और हम अपना व्यवहार बदलने से पहले सौ कारण गिना सकते हैं, पर एक क़दम उठा नहीं सकते।
इस गंदापुर का सबसे सच्चा प्रतीक कोई टूटी सड़क नहीं, कोई बहता सीवर नहीं, कोई उखड़ा हुआ बोर्ड नहीं, अपितु गंदापुर का सबसे सच्चा प्रतीक है- हमारा सडा-गला चेहरा, हमारी गंदी आदतें, और हमारा दोगला चरित्र, जो हर घोटाले पर शर्मिंदा भी दिखता है और अगले ही पल सब भूलकर अपने मोबाइल में स्क्रॉलिंग में लग जाता है।
गंदापुर में एक खास जगह पर लिखा है- - - - ->
“आई लव❤️ गंदापुर।”
-और यह प्रेम इतना सच्चा है कि दीवारें गिर जाती हैं, पर नारा नहीं मिटता। क्यूंकि प्रेम यहाँ सेल्फ़ी में सुरक्षित है। भले ही असली शहर उखड़ता रहता है, लेकिन डिजिटल शहर चमकता रहता है। विकास की यही परिभाषा है- जो दिखे वही सच, और जो टूटे- वह समायोजन।
तो साहब, आख़िर में अगर आप पूछते हैं- कि फिर भी गंदापुर इतना महान क्यों है..? तो जवाब साफ़ है- यह शहर शिकायत नहीं करता, सवाल नहीं करता, बस अंधों की तरह चलता रहता है, और जो शहर अंधों की तरह से चलता है, वह चाहे- गड्ढों में चले, भरोसे पर चले, या मज़ाक़ पर, उसे कोई रोक नहीं सकता और वह तो मरता भी नहीं है, बस अंधों की तरह से लगातार चलता ही रहेगा। गंदापुर इसलिए नहीं मरता, क्योंकि यहाँ पर तो जन्म से ही, हर कोई थोड़ा-थोड़ा मरा हुआ है। ज़िम्मेदारी में, साहस में, और आत्मसम्मान में। यहाँ पर क्रांति भी नहीं आती, क्योंकि क्रांति में तकलीफ़ होती है और गंदापुर बेहद आरामपसंद निठल्लों, बकचोदों, स्मैकचियों का शहर है, चाहे वह आराम गड्ढों में हो या अपमान में और इन सबके बीच, गंदापुर की एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय जगह पर लाल रंग का एक नकली दिल खड़ा है। जिसके साथ में बैसाखी की तरह खड़ा हुआ हुआ दिखाई देता है-
👉 “I ❤️ GANDAPUR"
-एक खोखला दिल, एक नकली मुस्कान, और एक असली धोखा। यह नकली और खोखला दिल ❤️ इसलिए लगाया जाता है, ताकि शहर की सड़ांध ढकी रहे, ताकि नागरिक को लगे कि वह किसी से प्यार कर रहा है- जबकि असल में उसके साथ रोज़ बलात्कार हो रहा है: समय का, सम्मान का, भविष्य का। और हमारे प्यारे गंदापुर शहर में भी यह नकली और खोखला दिल ❤️ इसलिए लगाया गया है, ताकि हम भूलते रहें कि- यह दिल हमारा नहीं, यह शहर हमारा नहीं, और यह सड़ांध किसी और की नहीं- हमारी अपनी है।
👉 "आई लव❤️ गंदापुर"
-क्योंकि यहाँ नेता झूठ बोलते हैं, अफसर सोते हैं, विभाग सड़ते हैं, क्योंकि यहाँ प्यार भी बिगड़ता है, पब्लिक भी और शासन-प्रशासन की व्यवस्था भी। और जनता सहती है- और इस साझी बदहाली को ही तो "आई लव❤️ गंदापुर" कहते हैं, क्यूंकि हम जैसे लोग इससे इतना ज्यादा प्यार करते हैं, फिर हम इससे नफ़रत कैसे कर सकते हैं। अगर हम इससे प्यार नहीं करेंगे, तो हमें मानना पड़ेगा कि हम ही इसे ऐसा बनाए बैठे हैं। क्यूंकि यह शहर हमारी आदतों से बना है, हमारी चुप्पी से पला है और हमारी ही सहूलियतों से जिंदा है। इसीलिए तो हम लोग इसको "झिला गंदापुर छिछी" कहते हैं।
(इति हास्य-व्यंग्यते शुभमस्ति)
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-डॉ. प्रमोद सागर
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