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साहस, गौरव और शौर्य के प्रतीक, राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।अपना सर्वस्व न्यौछावर कर द...
15/08/2018

साहस, गौरव और शौर्य के प्रतीक, राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देश को आजादी दिलाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को नमन।

30/01/2018

बार बार हम इतिहास को कुरदते रहते है। इसने ये ठीक नहीं किया, उसने वो ठीक नहीं किया। अगर वैसा होता तो आज ऐसा न होता, अगर वैसा न होता तो आज ये होता। अरे कब तक इतिहास पर गिरायते रहोगे यार! इतिहास तो खैर है ही दर्दनाक लेकिन आज भी कौन सा सुखदायी है? कोई गाँधीजी को हीरो बताता है तो कोई गाँधीजी पे ही आजकी बेबशी का बोझ डाल देता है। किसीके लिये गोडसे क़ातिल है तो किसीका हीरो है। अरे गाँधी गोडसे की बात छोड़ो वो जो थे वो थे लेकिन अपनी आत्मा भी कौन सी पावन शुद्ध है? चंद मिनटों में अलग अलग लोगों के विचारों को पढ़कर हम भी यहाँ से वहाँ झझुमते रहते है। हम भी कौन सी किसी नीति पर अटल है? चंद मिनटों में पद्मावत को पैरों तले कुचल दिया तो चंद ही सेंकड में फिर से दिल में बिठा दिया! मोदीजी को कभी मशीहा बना दिया तो कभी व्यापारी बना दिया। हम तो दोस्तों, परिवार और रिश्तेदारों को भी अब उनके रवैये से आँकने लगे है! हमारी आत्मा कौन सी गंगाजल सी पवित्र है? मेरी तो नहीं है इतना मुझे पता है। हमकों बस रोज़ कुछ चाहिये अपना फ्रुस्ट्रेशन निकालने के लिये। साला फिर कोई भी पीस जाये अपने हाथों और शायद दूसरों के हाथों हम भी पीस जाते है।

सही मायनों में आत्मा शुद्धिकरण की जरूरत है, न सिर्फ मुझे, न सिर्फ तुमको बल्कि पूरे हिंदुस्तान को। जब मेरी आत्मा मुझे नहीं कहती कि तू चंदन की तरह पवित्र है मैं किस हक़ दूसरें पर उँगली उठाऊ!
Sandy

विशेष : भारतीय इतिहास का पहला गणतंत्र दिवस ।हिंदुस्तान अपना गणतंत्र दिवस मना रहा है, ऐसे में आज से 68 साल पहले देश की रा...
26/01/2018

विशेष : भारतीय इतिहास का पहला गणतंत्र दिवस ।

हिंदुस्तान अपना गणतंत्र दिवस मना रहा है, ऐसे में आज से 68 साल पहले देश की राजधानी दिल्ली में किस तरह भारत का पहला गणतंत्र दिवस मनाया गया, इसे याद करना अपने आप में बेहद दिलचस्प है.

उस दिन गणतंत्र दिवस की परेड पुराना क़िला के सामने ब्रिटिश स्टेडियम में हुई थी. इस जगह आज दिल्ली का चिड़ियाघर हैं और स्टेडियम की जगह पर नेशनल स्टेडियम मौजूद है.

देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जैसे ही गणतंत्र भारत में पहली बार तिरंगा झण्डा लहराया, इसी के साथ परेड की शुरुआत हो गई. सबसे पहले तोपों की सलामी दी गई जिससे पुराना क़िला गूंज उठा.

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी वहां मौजूद थे, उनके साथ सी राजगोपालाचारी भी थे, वे अंतिम ब्रिटिश वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन की जगह गवर्नर-जनरल का पद संभाल रहे थे.

गणतंत्र दिवस का अर्थ था कि भारत अपनी ज़मीन से विदेशी राज के अंतिम निशान मिटाकर गणतंत्र राष्ट्रों की मंडली में शामिल होने जा रहा था.

किंग जॉर्ज VI ने भारत को अपनी ओर से शुभकामनाएं भेजी थीं और इसका आभार भी जताया कि नए स्वतंत्र हो रहे देश राष्ट्रमंडल देशों में शामिल होंगे.

हालांकि कुछ समय बाद ही किंग का निधन हो गया, भारत में इस शोक समाचार पर श्रद्धांजलि स्वरूप सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा की गई थी.

पहले गणतंत्र दिवस के समय ये अफ़वाहें भी उड़ी थीं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने 'दिल्ली चलो' आह्वान पर एक बार फ़िर सभी के सामने प्रकट हो सकते हैं.

राजपथ पर नहीं निकली थी परेड।

1950 में हुई गणतंत्र दिवस परेड आज की तुलना में उतनी भव्य नहीं थी लेकिन फ़िर भी वह अपने आप में छाप छोड़ने लायक और भारतवासियों के दिलों में यादगार बनने योग्य तो थी ही.

थल, वायु और जल सेनाओं की कुछ टुकड़ियों ने इस परेड में हिस्सा लिया था, हालांकि उस समय किसी तरह की झाकियां नहीं निकाली गई थीं.

जिस तरह मौजूदा वक्त में गणतंत्र दिवस की परेड राजपथ से होते हुए लाल क़िले तक जाती है, वैसा उस समय नहीं हुआ था. उस वक्त परेड स्टेडियम में ही हुई थी.
हवाई करतब दिखाने वाले जहाज़ों में जेट या थंडरबोल्ट शामिल नहीं थे, इनकी जगह डकोटा और स्पिटफ़ायर जैसे छोटे विमानों ने ये किया था.

जनरल फ़ील्ड मार्शल करिअप्पा भारतीय सेनाओं के पहले प्रमुख थे, जिन्हें ब्रिटिश-भारतीय सेना में कई पदक प्रदान किए गए थे.

जवानों की अपनी एक टुकड़ी को उन्होंने फ़ौजी हिंदी में कहा था, ''आज हम भी आज़ाद, तुम भी आज़ाद और हमारा कुत्ता भी आज़ाद''. उनकी आवाज़ ने वहां जोश का एक अलग ही माहौल पैदा कर दिया था.

चांदनी चौक की चमक

हाजी ज़हूरुद्दीन जो कि साल 1901 में रानी विक्टोरिया के निधन के वक्त एक स्कूली छात्र थे. पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर उनका जामा मस्जिद इलाके में एक होटल था, वे उस दिन हाजी कलां की सबसे मशहूर दुकान से मिठाइयां खरीद कर लाए थे और उन्होंने पूरे इलाक़े में बंटवाईं थीं.

चांदनी चौक में घंटेवाला हलवाई की तरफ़ से पूरे इलाके में मिठाइयां बांटी गई थीं, उन्होंने अपनी दुकान 18वीं सदी के अंत में शाह आलम के शासनकाल के दौरान शुरू की थी.
पहले गणतंत्र दिवस के दिन चांदनी चौक कई रंगों में सजा था. लाल मंदिर से लेकर फ़तेहपुरी मस्जिद तक लोगों की भीड़ हाथों में फूल मालाएं और तिरंगे लेकर मौजूद थी.

फूलमंडी के दुकानदारों ने गुलाब के पंखुड़ियों की बारिश कर दी थीं. लोग एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे, उन्हें इस बात का एहसास था कि वे अब पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर चुके हैं.
गुरुद्वारा शीश गंज में बहुत बड़े लंगर का आयोजन किया गया था. इसी तरह गुरुद्वारा बंगला साहिब और रकाबगंज में भी सैकड़ों की तादाद में लोग पूरी-सब्जी और हलवा खाने के लिए लंबी क़तारों में खड़े देखे जा सकते थे

सबसे फ़ैशनवाला बाज़ार कनॉट प्लेस

कनॉट प्लेस की ख़ूबसूरती तो उस दिन देखते ही बन रही थी, ऐसा हो भी क्यों ना आखिर यह राजधानी का सबसे फ़ैशनवाला बाज़ार जो था.

कनॉट प्लेस के गलियारों में नाचते झूमते राम लाल को देखा जा सकता था. राम लाल ब्रिटिश सैनिकों के पैरों की मसाज किया करते थे. लाल क़िले के आस पास तैनात अंग्रेज जवान अक्सर शनिवार और रविवार को उनके पास अपने पैरों की मसाज करवाने आते थे.

बूढ़े हो चुके राम लाल उस वक्त को याद करते हुए बताते हैं कि एक जवान ने उन्हें 100 रुपये का नोट पकड़ा दिया था, जब वे बाकी बचे पैसे देने उसके पीछे भागे तो जवान को लगा कि वे उनसे और पैसे मांगने के लिए आ रहे हैं और इसी वजह से उस जवान ने रामलाल पर बंदूक तान दी. उस समय 100 रुपये का एक नोट आज के 1000 रुपये के बराबर था.

फ़तेहपुरी में रहने वाले मुस्लिम परिवारों ने अपने-अपने घरों में स्वादिष्ट पकवान बनाए थे. मटिया महल के कई होटल जैसे करीम और जवाहर ने भिखारियों के लिए मुफ़्त खाने की व्यवस्था की थी. कबाब और दूध विक्रेताओं ने अपने ग्राहकों के लिए भारी छूट दी थी.

युवा लड़कियों का नृत्य

रात के वक्त सभी निजी और सार्वजनिक भवनों को खूबसूरत रौशनियों से सजाया गया था. वायसरॉय भवन जो अब राष्ट्रपति भवन बन चुका है, उसे किसी दुल्हन की तरह सजाया गया था.

इसके अलावा संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, केंद्रीय सचिवालय, इंडिया गेट और ऑल इंडिया रेडियो की इमारतें सभी एक से बढ़कर रौशनियों से नहा रही थीं.
नई दिल्ली के बड़े-बड़े होटलों और रेस्टोरेंट में नाच गाने के कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, इनमें प्रमुख थे डेविकोस और गेलोर्ड होटल. एंग्लो-इंडियन क्लब की तरफ़ से की गई डांस प्रस्तुति की सभी जगह चर्चा थी.

इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिए सेंट जॉर्ज इंग्लिश मीडियम स्कूल के प्रिंसिपल की बेटियां आगरा से दिल्ली आई थीं. तीनों लड़कियों की खूबसूरती की चारों ओर चर्चा थी.
वहां मौजूद कई युवा पुरुष जवान लड़कियों पर अपना दिल हार रहे थे. लड़िकयां ऊंची हील और स्कर्ट पहने मौजूद थीं. उसी दौरान हुई एक घटना में जिम्मी परेरा नामक युवक को अपना दांत तक खोना पड़ गया था, दरअसल उनकी गर्लफ्रेंड पर किसी दूसरे लड़के ने कुछ फब्तियां कस दी थीं. और इस वजह से दोनों युवकों के बीच लड़ाई हो गई थी.

एंग्लो-इंडियन संगठन के अध्यक्ष सर हेनरी गिड्ने और उपाध्यक्ष फ्रैंक एंथनी ने भाषण दिए थे, उन्होंने लोगों को नए गणतंत्र राष्ट्र की शुभकामनाएं दीं और देश के प्रति निष्ठा की शपथ दिलवाई.

राष्ट्रपति भवन का रात्रिभोज।

इस बीच सबसे ज़्यादा चर्चा जिस बात की थी वह था राष्ट्रपति भवन में होने वाला रात्रिभोज. पंडित नेहरू अपनी बेटी इंदिरा गांधी के साथ वहां मौजूद थे, उनके साथ कई अन्य नेता जैसे राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, सरदार बलदेव सिंह और कपूरथला की राजकुमारी अमृत कौर भी मौजूद थे.

कश्मीरी गेट इलाके में रहने वाले पंडित रामचंदर उस समय 90 साल के थे, उन्होंने याद करते हुए बताया था कि उन्होंने कभी भी दिल्ली को इतने भव्य रूप में नहीं देखा था, यहां तक कि रानी विक्टोरिया की गोल्डन जुबली के वक्त भी नहीं.

सर हेनरी गिड्नी ने उस वक्त एक बात कही थी, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. उन्होंने कहा था कि भारत वह धरती है जहां सभ्यता अपने चरम तक पहुंच चुकी थी, वह अब दोबारा उसी सभ्यता को प्राप्त करने की तरफ कदम बढ़ाएगा. हेनरी का जन्म 1873 में हुआ था और उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में अंग्रेजों के अभियान में हिस्सा लिया था.
अपने इस कथन के साथ वे एक तरह से महान जर्मन भाषाविद मैक्स म्युलर की बात दोहरा रहे थे.

मैक्स म्युलर ने कहा था, गणतंत्र दिवस की इस धूमधाम के बीच, रौशनी की चमक बिखेरते अंतिम दिए के बुझने से पहले, तमाम मुशायरों और कवि सम्मेलनों के ज़रिए इस यादगार मौके पर वह स्वप्न जीवित रहना चाहिए, अल्लामा इक़बाल के ये अमर शब्द हमेशा फ़िजाओं में गूंजते रहने चाहिए-
''हिंदी हैं हम, वतन हैं, हिन्दुस्तान हमारा!''

20/01/2018
12/01/2018

स्वामी विवेकानंद जी के ये विचार पढिये ऐसा महसूस होगा जैसे आपका पुनर्जन्म हो रहा हो।

उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये।

ब्रह्माण्ड कि सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हमीं हैं जो अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है!

किसी की निंदा ना करें. अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो ज़रुर बढाएं.अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िये, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये, और उन्हें उनके मार्ग पे जाने दीजिये।

कभी मत सोचिये कि आत्मा के लिए कुछ असंभव है. ऐसा सोचना सबसे बड़ा विधर्म है.अगर कोई पाप है, तो वो यही है; ये कहना कि तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं।

जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिये, नहीं तो लोगो का विश्वास उठ जाता है।

उस व्यक्ति ने अमरत्त्व प्राप्त कर लिया है, जो किसी सांसारिक वस्तु से व्याकुल नहीं होता।

जब तक आप खुद पे विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पे विश्वास नहीं कर सकते।

जिस दिन आपके सामने कोई समस्या न आये – आप यकीन कर सकते है की आप गलत रस्ते पर सफर कर रहे है।

यह जीवन अल्पकालीन है, संसार की विलासिता क्षणिक है, लेकिन जो दुसरो के लिए जीते है, वे वास्तव में जीते है।

हम जितना ज्यादा बाहर जायें और दूसरों का भला करें, हमारा ह्रदय उतना ही शुद्ध होगा , और परमात्मा उसमे बसेंगे।

बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रूप है।

जिस क्षण मैंने यह जान लिया कि भगवान हर एक मानव शरीर रुपी मंदिर में विराजमान हैं , जिस क्षण मैं हर व्यक्ति के सामने श्रद्धा से खड़ा हो गया और उसके भीतर भगवान को देखने लगा – उसी क्षण मैं बन्धनों से मुक्त हूँ , हर वो चीज जो बांधती है नष्ट हो गयी , और मैं स्वतंत्र हूँ।

भला हम भगवान को खोजने कहाँ जा सकते हैं अगर उसे अपने ह्रदय और हर एक जीवित प्राणी में नहीं देख सकते।

पहले हर अच्छी बात का मज़ाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है, और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है।

किसी चीज से डरो मत। तुम अद्भुत काम करोगे। यह निर्भयता ही है जो क्षण भर में परम आनंद लाती है।

प्रेम विस्तार है , स्वार्थ संकुचन है। इसलिए प्रेम जीवन का सिद्धांत है। वह जो प्रेम करता है जीता है , वह जो स्वार्थी है मर रहा है। इसलिए प्रेम के लिए प्रेम करो , क्योंकि जीने का यही एक मात्र सिद्धांत है , वैसे ही जैसे कि तुम जीने के लिए सांस लेते हो।

सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चे होना। स्वयं पर विश्वास करो।

शक्ति जीवन है , निर्बलता मृत्यु है . विस्तार जीवन है , संकुचन मृत्यु है . प्रेम जीवन है , द्वेष मृत्यु है।

बस वही जीते हैं ,जो दूसरों के लिए जीते हैं।

शारीरिक , बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से जो कुछ भी आपको कमजोर बनाता है – , उसे ज़हर की तरह त्याग दो।

एक समय में एक काम करो , और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।

जो तुम सोचते हो वो हो जाओगे। यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो , तुम कमजोर हो जाओगे ; अगर खुद को ताकतवर सोचते हो , तुम ताकतवर हो जाओगे।

धन्य हैं वो लोग जिनके शरीर दूसरों की सेवा करने में नष्ट हो जाते हैं।

जीवन का रहस्य केवल आनंद नहीं है बल्कि अनुभव के माध्यम से सीखना है।

स्त्रियो की स्थिति में सुधार न होने तक विश्व के कल्याण का कोई भी मार्ग नहीं है।

आज्ञा देने की क्षमता प्राप्त करने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को आज्ञा का पालन करना सीखना चाहिए।

प्रसन्नता अनमोल खजाना है छोटी -छोटी बातों पर उसे लूटने न दे।

जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी।

अगर आप ईश्वर को अपने भीतर और दूसरे वन्य जीवो में नहीं देख पाते, तो आप ईश्वर को कही नहीं पा सकते।

आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, ईमानदारी और उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता।

पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान।ध्यान से ही हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है।

संभव की सीमा जानने केवल एक ही तरीका है असम्भव से आगे निकल जाना।

विश्व में अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते है, क्योंकि उनमे समय पर साहस का संचार नही हो पाता। वे भयभीत हो उठते है।

किसी मकसद के लिए खड़े हो तो एक पेड़ की तरह, गिरो तो बीज की तरह। ताकि दुबारा उगकर उसी मकसद के लिए जंग कर सको।

जब तक लाखो लोग भूखे और अज्ञानी है तब तक मै उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हुँ जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उसकी और ध्यान नही देता।

मन की एकाग्रता ही समग्र ज्ञान है।

यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यो ही तुम उस कार्य को बंद कर दो, वे तुरंत तुम्हे बदमाश साबित करने में नहीं हिचकिचाएंगे।

दुनिया मज़ाक करे या तिरस्कार, उसकी परवाह किये बिना मनुष्य को अपना कर्त्तव्य करते रहना चाहिये।

जिंदगी का रास्ता बना बनाया नहीं मिलता है, स्वयं को बनाना पड़ता है, जिसने जैसा मार्ग बनाया उसे वैसी ही मंज़िल मिलती है।

कर्म का सिद्धांत कहता है – ‘जैसा कर्म वैसा फल’. आज का प्रारब्ध पुरुषार्थ पर अवलम्बित है। ‘आप ही अपने भाग्यविधाता है’. यह बात ध्यान में रखकर कठोर परिश्रम पुरुषार्थ में लग जाना चाहिये।

इंसान को कठिनाइयों की आवश्यकता होती है क्योंकि सफलता का आनंद उठाने के लिए ये जरूरी है।

खड़े हो जाओ, हिम्मतवान बनो, ताकतवर बन जाओ, सब जवाबदारिया अपने सिर पर ओढ़ लो, और समझो की अपने नसीब के रचियता आप खुद हो।

एक नायक बनो, और सदैव कहो – “मुझे कोई डर नहीं है”।

एक विचार लो . उस विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो , उस विचार को जियो . अपने मस्तिष्क , मांसपेशियों , नसों , शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो , और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो . यही सफल होने का तरीका है।

सभी साथियों को युवा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 💐

01/01/2018

प्रभु आपको सुबह की पहली किरण से शुरु होने वाले नये साल में
सुख ,शांति,शक्ति,सम्पति, स्वरुप, संयम, सादगी, सफलता, समृध्दि, साधना, संस्कार, और स्वास्थ्य दे।
नये साल की ढेरों शुभ कामनाओं के साथ
आप ओर आपके परिवार को मेरी तरफ से नऐ साल कि हार्दिक शुभ कामनाऐं। "

नूतन वर्षाभिनंदन 🙏🙏
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29/12/2017

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