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27/08/2026

मनुस्मृति का कथित अनुवाद करने वाले विलियम जोन्स की सच्चाई कम लोगों को पता होगी। उसने क्यों कहा था कि के रहते हिंदुओं को ईसाई बनाना असंभव है।

27/08/2026

सपा सरकार आई तो ये यूपी का गृहमंत्री बनेगा...फिर तो यूपी का अल्लाह की मालिक होगा.. हर गली मे शोहदे ही शोहदे घूमेंगे..

27/08/2026

जितनी गाली यह महिला दे रही है लगता है शाम तक इसके बचाव मे राहुल गाँधी का वीडियो आ जायेगा...

अछूतों के गले में हांडी और कमर पर झाड़ू के डॉ अम्बेडकर के दावे को पत्रकार एन सी केलकर ने 5 जून 1936 को केसरी अखबार मे प्र...
27/08/2026

अछूतों के गले में हांडी और कमर पर झाड़ू के डॉ अम्बेडकर के दावे को पत्रकार एन सी केलकर ने 5 जून 1936 को केसरी अखबार मे प्रश्न लिखकर साबित करने को कहा...

यह दावा मुख्यतः डॉ. अंबेडकर की Annihilation of Caste नामक पुस्तक से है।

जिसमें अंबेडकर ने पेशवा काल में पुणे में अछूतों के गले में मिट्टी का बर्तन (थूकने के लिए) और कमर में झाड़ू बांधने का जिक्र किया।

पेशवा अभिलेखों (दफ्तर व डायरियों) में इसका कोई प्राथमिक लिखित प्रमाण नहीं मिला।

पांच जून सन 1936 को प्रख्यात पत्रकार एनसी केलकर ने अंबेडकर को जब अपने लिखे को साबित करने की चुनौती दी तो अंबेडकर ने स्वीकारा किया, "..मेरे पास दस्तावेजी सबूत नहीं, मेरा दावा मौखिक परंपरा पर टिका हुआ है।"

एक सुने सुनाये...मौखिक दावे का उपयोग कैसे राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करने के लिए किया जाता है उसका यह दावा खुद में एक मिसाल है।

कथित बौद्धिकों को जब ललकारना चाहिए था तब आपराधिक खामोशी अख्तियार किए हुए बैठा रहा। हमारी हार! हमारी गुलामी की कोई एक वजह तो है नहीं। हजार वजहें हैं।

सबसे बड़ी वजह है, हिंदुओं के अतीत को गन्दला कर हिन्दू चेतना और आत्मसम्मान को असहाय बना दिया। हमने कब हिन्दू होने के आत्मसम्मान का संघर्ष किया?

27/08/2026

टीपू यादौ के चेलों का ऐलान

मुसलमान चाहे इंडिया का हो, सीरिया का हो या अमेरिका का... उसे पता है की काफिर का विरोध ही उसका मुस्तकबिल है, मुस्लिम चाहे...
27/08/2026

मुसलमान चाहे इंडिया का हो, सीरिया का हो या अमेरिका का... उसे पता है की काफिर का विरोध ही उसका मुस्तकबिल है, मुस्लिम चाहे पढ़ा लिखा हो या मदरसा छाप अपने मूल धार्मिक सिद्धांतों और विचार को लेकर स्पष्ट है

कन्फ्यूज केवल हिन्दू है मैकाले की पश्चिमी शिक्षा ग्रहण करने वाला और मिशनरीज की कोन्वेंट पद्धति का पढ़ा लिखा हिन्दू तो कहीं ज्यादा कन्फ्यूज है

27/08/2026

1937 मे कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण के चक़्कर मे वन्देमातरम काट दिया, उसके मात्र 10 वर्ष बाद 1947 मे देश काटना पड़ गया था..

आज के समय में यदि गांव देहात में किसी पशुपालक की गाय या भैंस बछड़ा/पाड़ा को जन्म दे, तो वह दुखी हो जाता है। कोई पड़ोसी पू...
27/08/2026

आज के समय में यदि गांव देहात में किसी पशुपालक की गाय या भैंस बछड़ा/पाड़ा को जन्म दे, तो वह दुखी हो जाता है। कोई पड़ोसी पूछे तो उदास भाव से सर झुका कर धीरे से कहते हैं, बछड़ा हुआ है... जबतक दूध निकालने के लिए उनकी जरूरत होती है, तबतक उन्हें चारा पानी दे कर रखते हैं, दूध छूटते ही अधिकांश लोग बेच देते हैं। उसके बाद? मान लीजिए कि अधिकांश बछड़े कसाईखानों तक पहुंच जाते हैं। शहरों के बड़े पशु कृषक तो बछड़ों को जन्म के समय ही मारने लगे हैं क्योंकि उन्हें दूध निकालने के लिए बछड़ों की जरूरत ही नहीं होती...
मात्र दो तीन दशक पहले तक ऐसा नहीं था। जबतक किसान खेतों में बिछड़े से हल चलवाता था, उनसे बैलगाड़ी खिंचवाता था, तबतक बछड़ों की पूछ थी। उन्हें ऊंचे दामों पर खरीदा बेचा जाता था। उनके चारा, दाना आदि की विशेष व्यवस्था होती, उन्हें सजा धजा कर रखा जाता, वे दरवाजे की प्रतिष्ठा कहे जाते थे।
हमारी ओर एक परंपरा है कि परिवार के मालिक की सप्ताह के जिस दिन मृत्यु होती है, वह दिन उसके बच्चों के लिए "मान" हो जाता है। उस दिन परिवार में कोई शुभ कार्य, कोई शुभ यात्रा नहीं होती। हां भविष्य में उसी दिन घर में बालक का जन्म हो जाय, या गाय बछड़े को जन्म दे दे तो मान का भेद समाप्त हो जाता है। अर्थात बछड़े का जन्म उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता रहा है, जितना एक बालक का।
तो अब बछड़ों के तिरस्कार का कारण क्या है? कारण है उनकी उपयोगिता का खत्म हो जाना। अब किसान किस लिए उन्हें रखे, उनकी सेवा करे? सेवाभाव वाला युग रहा नहीं, और देने को वे सिवाय गोबर के और कुछ नहीं दे सकते... इसलिए धर्मभीरू लोग यूं ही हांक देते हैं, और कुछ लोग सीधे कसाई के हाथों बेंच देते हैं।
लगभग ऐसी ही स्थिति होती थी तवायफों के यहां जन्म लेने वालों बालकों की। वे जन्म से ही तिरस्कार पाते थे। कुछ बेंच दिए जाते, कुछ भगा दिए जाते, कुछ थोड़े बड़े होते ही तिरस्कार के कारण स्वयं भाग जाते, और कुछ तो मार दिए जाते थे। तवायफों की स्थिति भी वही थी, कोठों पर लड़कों की उपयोगिता ही नहीं थी।
वहां लड़कियां जन्म लेतीं तो खुशियां मनाई जाती थीं। मिठाई बंटती, हफ्तों जश्न होता, धूम रहती... वह लड़की बाद में मां की उत्तराधिकारी होती, उसी के सहारे मां का बुढ़ापा भी शान से कटता... तो लड़कियों का सत्कार और लड़कों का तिरस्कार स्वाभाविक ही था।
तवायफ लड़कियों के लिए भाई एक अनावश्यक वस्तु होता था। उनके जीवन में उसकी क्या ही जरूरत होनी थी? उनके लिए भाई से अधिक पाले गए कुत्ते महत्वपूर्ण होते थे। उनके जीवन में कुत्ते की जरूरत थी, भाई की जरूरत नहीं थी। इसमें उनका दोष नहीं था, उनका जीवन ही ऐसा था कि उसमें भाई के लिए कोई जगह नहीं थी।
कुल मिला कर बात यह कि जब जहां जिस वस्तु की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, वहां उस वस्तु की प्रतिष्ठा भी खत्म हो जाती है। फिर क्या भाई और क्या कुत्ता...
उस राखी वाले विज्ञापन में कीर्ति सेनन द्वारा कुत्ते को राखी बांधते देख कर याद आया... वहां भी कुत्ता अधिक महत्वपूर्ण है, भाई कम...

-सर्वेश तिवारी

Mu££a आखिर Mu££a का ही होता है...अफ़गानिस्तान बनाम इंडिया सीरीज़ 13, 15 और 17 सितंबर को नई दिल्ली में होगी। अफ़गानिस्तान...
26/08/2026

Mu££a आखिर Mu££a का ही होता है...

अफ़गानिस्तान बनाम इंडिया सीरीज़ 13, 15 और 17 सितंबर को नई दिल्ली में होगी। अफ़गानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने कमर्शियल और टीवी प्रोडक्शन राइट्स पाकिस्तान के ट्रांस ग्रुप को दिए हैं, जिसके पास PSL और PCB के राइट्स भी हैं। मीडिया का ध्यान खींचने से बचने के लिए, ट्रांस ग्रुप ने यह प्रोजेक्ट ITW के ज़रिए दिया है।

इस सीरीज़ से पाकिस्तान को कम से कम $10 मिलियन मिलेंगे। यह एक गंभीर चिंता की बात है क्योंकि पाकिस्तान ने बार-बार भारत विरोधी प्रोपेगैंडा के लिए रिसोर्स का इस्तेमाल किया है। अफगानिस्तान को भारत भले ही कितनी भी मदद करे... वो हमारा कभी नहीं होगा

26/08/2026

मेरे लिए हमारे युवा कोई Gen Z या Gen Alpha नहीं, बल्कि हमारे अपने बेटे-बेटियां हैं। हम अपनी संतानों को किसी Category में नहीं बांटेंगे।

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