Sikhwal Samachar

Sikhwal Samachar "आप सभी का सिखवाल समाचार में हार्दिक स्वागत हैं ." http://www.sikhwalsamachar.com/

"आप सभी का सिखवाल समाचार में हार्दिक स्वागत हैं ."
हे ! श्रृंगीऋषि ब्राह्मण ( सिखवाल ) श्रेष्ठ ,
" सिखवाल समाचार " में आप सभी सम्मानित सदस्यों को अभिवादन है, स्वागत है, वंदन है, अभिनन्दन है !
आप सभी से विनम्र निवेदन है की आपके सहयोग से हम श्रृंगीऋषि समाज ( सिखवाल ब्राह्मण) में नई चेतना जागृत करने का प्रयास कर रहे है , आपका अतुलनीय सहयोग हमें अपने सामूहिक लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा , ऐसा

हमें पूर्ण विश्वास है !
हमारा मुख्य लक्ष्य है - श्रृंगीऋषि समाज ( सिखवाल ब्राह्मणों ) में संस्कार का प्रचार-प्रसार करना , ज्ञान की वृद्धि करना , सामाजिक रुढियो पर विचार - विमर्श करना कुरीतियों को कम कर आज के ज़माने के साथ चलना आदि, इत्यादि !
आप सभी से आग्रह हैं की ऐसा कोई पोस्ट इस परिवार में न करे ! जिसे हटाने के लिए बाध्य होना पड़े ! पोस्ट करने से पहले अवश्य चिंतन करें !
अगर परिवार के गरिमा के अनुरूप कोई भी पोस्ट नहीं पाया जायेगा तो पोस्ट कर्ता को विना सूचित किए हुए पोस्ट हटा दिया जायेगा ! एवं बार बार ऐसा करने पर विना उसे सूचित किए हुए ही परिवार से अलग कर दिया जायेगा !
आप समस्त सदस्यों से अनुरोध है की कृपया अपने Face Book के Wall पर अपने वास्तविक चित्र लगाएं ! इससे ये होगा की हम एक दूसरे को ज्यादा अच्छी तरह से जान सकेंगे. हाँ यदि महिलाओ को विशेष कारण से चित्र लगाने में असुविधा हो तो बात अलग है..
परिवार पूंजी है, रिश्ते हमारी सम्पत्ति। जब भी कोई काम करें तो यह अनुमान पहले ही लगा लें कि इससे आपकी इस जायदाद पर तो कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा, परिवार में एकता बनी रहें एवं हम अपने लक्ष्य को पाने में हम सफल हो ..
आईये हम सभी मिलकर श्रृंगीऋषि समाज की गरिमा बनाने में सहयोग करें ! आप अपने अमूल्य विचार दे कर सहयोग कीजिये .........
अपना साथ एव प्यार यूही बनाये रखे !! ................. " जय श्रृंग " ................ !! धन्यबाद !!

!! स्वर्गवास !!श्रीमती हेमलता उपाध्याय 45 वर्षधर्मपत्नी: हंसराज उपाध्याय जैतारण वाला का आकस्मिक निधन आज मंगलवार 9 जून 20...
09/06/2026

!! स्वर्गवास !!

श्रीमती हेमलता उपाध्याय 45 वर्ष
धर्मपत्नी: हंसराज उपाध्याय जैतारण वाला का आकस्मिक निधन आज मंगलवार 9 जून 2026 को प्रातः काल में हो गया ।

अंतिम यात्रा: आज मंगलवार 9 जून 2026 दोपहर 12:00 बजे निज निवास: रंगीन तालीम के पास, बेगमबाजार हैदराबाद से स्थानीय मोक्षधाम ईमली बन शमशान वाटिका जायेगी ।

शोकाकुल: समस्त पेमावत उपाध्याय परिवार जैतारण वाला ।

पाँच सीढियाँ संबंधों की...,1. देखना2. अच्छा लगना3. चाहना4. पानाये चार बहुत सरल सीढियां हैं,सबसे कठिन पाँचवीं सीढ़ी हैं, ...
05/06/2026

पाँच सीढियाँ संबंधों की...,

1. देखना

2. अच्छा लगना

3. चाहना

4. पाना
ये चार बहुत सरल सीढियां हैं,
सबसे कठिन पाँचवीं सीढ़ी हैं, "निभाना":

संबंधों की असली परीक्षा...,

जीवन में रिश्ते बनाना आसान है, लेकिन उन्हें निभाना सबसे कठिन कार्य है, चित्र में दर्शाई गई पाँच सीढ़ियाँ वास्तव में हर संबंध की यात्रा को दर्शाती हैं, किसी को "देखना" फिर "अच्छा लगना" उसके बाद उसे "चाहना" फिर उसे "पाना" यह सब अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन इन सबके बाद जो सबसे महत्वपूर्ण और सबसे चुनौतीपूर्ण चरण आता है, वह है "निभाना"...!

आज के समय में अधिकांश लोग संबंधों की शुरुआत तो बड़े उत्साह से करते हैं, लेकिन समय के साथ जब परिस्थितियाँ बदलती हैं, मतभेद आते हैं, स्वार्थ टकराते हैं या कठिनाइयाँ सामने आती हैं, तब रिश्तों की असली परीक्षा शुरू होती है, यहीं पर पता चलता है कि संबंध केवल आकर्षण, आवश्यकता या सुविधा पर आधारित था, या उसमें सच्ची निष्ठा और समर्पण भी था...!

रिश्ते निभाने के लिए केवल प्रेम ही पर्याप्त नहीं होता, इसके लिए विश्वास, धैर्य, त्याग, सम्मान, समझदारी और क्षमा जैसे गुणों की आवश्यकता होती है, जो व्यक्ति हर परिस्थिति में अपने संबंधों को सम्मान देता है, वही वास्तव में रिश्तों का मूल्य समझता है...!

कई बार लोग किसी को पाने के लिए वर्षों तक प्रयास करते हैं, लेकिन उसे पाने के बाद उसकी कद्र करना भूल जाते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि किसी को प्राप्त कर लेना उपलब्धि हो सकती है, पर उसे जीवनभर सम्मान और विश्वास के साथ निभाना ही चरित्र की पहचान है...!

वृक्ष की जड़ें दिखाई नहीं देतीं, फिर भी वही पूरे वृक्ष को संभाले रखती हैं, उसी प्रकार रिश्तों में निभाने की भावना दिखाई नहीं देती, लेकिन वही संबंधों को लंबे समय तक जीवित रखती है, जहाँ निभाने का भाव समाप्त हो जाता है, वहाँ सबसे मजबूत रिश्ते भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाते हैं...!

इसलिए जीवन में यदि कोई संबंध बना है, तो केवल उसे पाने का नहीं, बल्कि उसे सहेजने और निभाने का प्रयास कीजिए, क्योंकि दुनियाँ में सबसे सुंदर रिश्ते वे नहीं होते जो आसानी से बन जाते हैं, बल्कि वे होते हैं जो हर परिस्थिति में मजबूती से निभाए जाते हैं...!

"रिश्तों की असली खूबसूरती मिलने में नहीं, बल्कि जीवनभर साथ निभाने में होती है...!"

✍️ सुरेश कुमार व्यास "जानम"
सिखवाल समाचार®
सत्य का "दर्पण" समाज को "अर्पण"

मेरा नाम, तेरा नाम और वास्तविकता...,समाज में कुछ ऐसे लोग भी मिल जाते हैं, जिन्हें हर समय केवल "मेरा नाम" और "तेरा नाम" क...
31/05/2026

मेरा नाम, तेरा नाम और वास्तविकता...,

समाज में कुछ ऐसे लोग भी मिल जाते हैं, जिन्हें हर समय केवल "मेरा नाम" और "तेरा नाम" की ही चिंता रहती है, किसने किसका नाम लिया, किसका नाम नहीं लिया, किसे श्रेय मिला और किसे नहीं मिला, मानो जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य यही रह गया हो...!

विडंबना यह है कि जो लोग हर समय नाम और प्रसिद्धि के पीछे भागते हैं, वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि वास्तविक जीवन केवल नाम से नहीं चलता...!

घर-परिवार, रिश्ते-नाते, मित्रता और सामाजिक सम्मान केवल नाम की पट्टिका से नहीं, बल्कि व्यवहार, संस्कार और परस्पर सहयोग से चलते हैं...!

सच्चाई यह है कि मनुष्य कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए, जीवन के किसी न किसी मोड़ पर उसे अपने परिवार, रिश्तेदारों और समाज के सहयोग की आवश्यकता पड़ती ही है, जन्म से लेकर जीवन के अंतिम पड़ाव तक कोई भी व्यक्ति पूरी तरह अकेला नहीं चल सकता, जिन रिश्तों को लोग कभी महत्व नहीं देते, वही रिश्ते कठिन समय में सबसे पहले साथ खड़े दिखाई देते हैं...!

कुछ लोग स्वयं को इतना बड़ा समझ लेते हैं कि उन्हें लगता है कि उनकी पहचान केवल उनके नाम से है, लेकिन नाम का सम्मान भी तभी तक है, जब तक उसके पीछे अच्छे कर्म और अच्छा व्यवहार जुड़ा हो, केवल नाम का ढिंढोरा पीटने से न सम्मान मिलता है, न वोट और न ही स्थायी प्रतिष्ठा...!

समाज में वास्तविक सम्मान उन लोगों को मिलता है जो बिना किसी प्रचार के अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं, परिवार का मान बढ़ाते हैं, रिश्तों को निभाते हैं और दूसरों के सुख-दु:ख में सहभागी बनते हैं, ऐसे लोग भले ही मंचों पर कम दिखाई दें, लेकिन लोगों के दिलों में उनका स्थान स्थायी होता है...!

इसलिए "मेरा नाम, तेरा नाम" की संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर यह समझना चाहिए कि व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से बनती है, केवल नाम से नहीं, नाम तो समय के साथ धुंधला पड़ सकता है, लेकिन अच्छे संस्कार, अच्छे व्यवहार और अच्छे कर्म सदैव याद रखे जाते हैं...!

याद रखिए "नाम से नहीं, काम से पहचान बनती है, और रिश्तों का सम्मान ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होती है...!"

सुरेश कुमार व्यास "जानम"
सिखवाल समाचार®
सत्य का "दर्पण" समाज को "अर्पण"

स्वर्णिम काल के नाम पर भ्रम फैलाने वाले लोग किसी भी समाज का भला नहीं कर सकते...?समाज का विकास केवल भाषणों, दावों और बड़े...
31/05/2026

स्वर्णिम काल के नाम पर भ्रम फैलाने वाले लोग किसी भी समाज का भला नहीं कर सकते...?

समाज का विकास केवल भाषणों, दावों और बड़े-बड़े नारों से नहीं होता, बल्कि ईमानदारी, पारदर्शिता और कर्मठता से होता है, आज कुछ लोग स्वयं को समाज का हितैषी बताकर समाज को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करते हैं कि उनके नेतृत्व में समाज "स्वर्णिम काल" में प्रवेश कर चुका है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल घोषणाएँ कर देने से स्वर्णिम काल आ जाता है...?

यदि कोई पदाधिकारी मंचों से लाखों रुपये की सहायता या सहयोग राशि घोषित करे और बाद में उसी राशि का भुगतान तक न करे, तो यह केवल समाज को भ्रमित करने का प्रयास है, ऐसी घोषणाएँ समाज के विकास के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत छवि चमकाने के लिए तथा समाज को भृमित कर अन्य भामाशाहों से धन निकालने के लिए की जाती हैं...!

जो व्यक्ति अपने ही शब्दों का सम्मान नहीं कर सकते, वह समाज के सम्मान और भविष्य की रक्षा कैसे करेंगे...?

समाज का स्वर्णिम काल तब माना जाता हैं, जब समाज में शिक्षा बढ़े, न कि अपने रिश्तेदारों या चहेते लोगों को छात्रवर्ती के नाम पर भामाशाहों का धन लुटाएँ, युवाओं को अवसर मिले, वास्तविक जरूरतमंदों की सहायता हो, पारदर्शिता बनी रहे और संगठन में विश्वास का वातावरण हो, लेकिन जब पदाधिकारी केवल वाहवाही लूटने के लिए झूठी घोषणाएँ करें, आंकड़ों का खेल खेलें और वास्तविकता से समाज को दूर रखें, तब यह स्वर्णिम काल नहीं बल्कि भ्रम फैलाने वाला काल कहलाता है...!

समाज को ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है, जो कार्य कम और झूठे प्रचार अधिक करते हैं, समाज को व्यक्तियों के शब्दों से नहीं, उनके कार्यों से परखना चाहिए...!

जिसने जो घोषणा की है, उसका पालन किया या नहीं, समाज को इसका लेखा-जोखा अवश्य मांगना चाहिए...!

याद रखिए समाज का उत्थान सत्य, सेवा और समर्पण से होता है, न कि झूठे दावों और खोखले वादों से, जो लोग स्वयं अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर सकते, वे समाज को स्वर्णिम भविष्य देने का दावा तो कर सकते हैं, लेकिन वास्तविकता में समाज का भला कभी नहीं कर सकते...!

सुरेश कुमार व्यास "जानम"
सिखवाल समाचार®
सत्य का "दर्पण" समाज को "अर्पण"

31/05/2026
जिस समाज में कुल के लाड़ले या आधुनिक बुद्धिजीवी जिनके खुद के माँ-बाप के कारज हो गये हो, जो बाकी सभी कार्यों में करोड़ो लुट...
31/05/2026

जिस समाज में कुल के लाड़ले या आधुनिक बुद्धिजीवी जिनके खुद के माँ-बाप के कारज हो गये हो, जो बाकी सभी कार्यों में करोड़ो लुटाने को परहेज नही करते, जुआ खेल कर लाखों हार जाने में नही हिचकिचाते, मुफ्त की वाह-वाही और फोटोबाजी के चक्कर में बड़ी-बड़ी गाडियाँ लेकर घूमते हैं, मगर माँ-बाप के कारज के समय बड़ा ज्ञान बाँटते हैं, मृत्यु-भोज बंद करो, समाज सुधारक बनने के लिए निरंतर रट लगाते रहते है, उन्हें एक बार यह अवश्य पढ़ना चाहिये, क्या होता है माँ का कर्ज और कैसे निभाया जाता है बाप का फर्ज...?

जो औलाद माँ-बाप के दूध की कीमत आँकते है, ऐसी औलाद से निःसंतान रहना ही अच्छा है...!

बच्चा पैदा करने के लिए क्या आवश्यक है...?
पुरुष का वीर्य और औरत का गर्भ...!
लेकिन रुकिए... सिर्फ गर्भ...?
नहीं... नहीं...!

एक ऐसा शरीर जो इस क्रिया के लिए तैयार हो, जबकि वीर्य के लिए 13 साल और 70 साल का वीर्य भी चलेगा, लेकिन गर्भाशय का मजबूत होना अति आवश्यक है, इसलिए सेहत भी अच्छी होनी चाहिए, एक ऐसी स्त्री का गर्भाशय जिसको बाकायदा हर महीने समयानुसार माहवारी (Period) आती हो...!

जी हाँ वही माहवारी जिसको सभी स्त्रियाँ हर महीने बर्दाश्त करती हैं, बर्दाश्त इसलिए क्योंकि महावारी (Period) उनकी Choice नहीं है, यह कुदरत के द्वारा बनाई गयी एक प्रक्रिया है, एक नियम है, वही महावारी जिसमें स्त्री का शरीर पूरा अकड़ जाता है, कमर लगता है टूट गयी हो, पैरों की पिण्डलियाँ फटने लगती हैं, लगता है पेड़ू में किसी ने पत्थर ठूँस दिये हों, दर्द की हिलोरें सिहरन पैदा करती हैं, ऊपर से लोगों की घटिया मानसिकता की वजह से इसको छुपा-छुपा कर रखना, अपने आप में किसी जँग से कम नहीं, बच्चे को जन्म देते समय असहनीय दर्द को बर्दाश्त करने के लिए मानसिक और शारीरिक दोनो रूप से तैयार हों, बीस हड्डियाँ एक साथ टूटने जैसा दर्द सहन करने की क्षमता से परिपूर्ण हों...!

गर्भधारण करने के बाद शुरू के 3 से 4 महीने शारीरिक और हार्मोनल बदलाव के चलते जबरदस्त उल्टियाँ, थकान, अवसाद के लिए मानसिक रूप से तैयार हों, 5वें से 9वें महीने तक अपने बढ़े हुए पेट और शरीर के साथ सभी काम यथावत करने की शक्ति हो, गर्भधारण के बाद कुछ विशेष परिस्थितियों में तरह-तरह के हर दूसरे-तीसरे दिन इंजेक्शन लगवानें की हिम्मत रखती हों, जो कभी एक इंजेक्शन लगने पर भी घर को अपने सिर पर उठा लेती थी, प्रसव पीड़ा को दो-चार, छः घंटे के अलावा दो-तीन दिन तक बर्दाश्त कर सकने की क्षमता हो, और अगर फिर भी बच्चे का आगमन ना हो तो गर्भ को चीर कर बच्चे को बाहर निकलवाने की हिम्मत रखती हों, अपने खूबसूरत शरीर में टाँके के निशान (Stretch Marks) और शल्यक्रिया (Operation) का निशान ताउम्र अपने साथ ढोने को तैयार हों, कभी-कभी प्रसव के बाद दूध कम उतरने या ना उतरने की दशा में तरह-तरह के काढ़े और दवाई पीने का साहस रखती हों, जो अपनी नींद को दाँव पर लगा कर दिन और रात में कोई फर्क ना करती हो, 3 साल तक सिर्फ बच्चे के लिए ही जीने की शर्त पर गर्भधारण के लिए राजी होती हैं...!

एक गर्भ में आने के बाद एक स्त्री की यही मनोदशा होती है, जिसे एक पुरुष शायद ही कभी समझ पाये, औरत तो स्वयं अपने आप में एक शक्ति है, बलिदान है, इतना कुछ सहन करतें हुए भी वह तुम्हारें अच्छे-बुरे, पसन्द-नापसन्द का ख्याल रखती है, अरे जो पूजा करनें योग्य है जो पूजनीय है, उसे हम बस अपनी उपभोग की वस्तु समझते हैं, उसके ज़िन्दगी के हर फैसले खुशियों और धारणाओं पर हम अपना अँकुश रख कर खुद को मर्द समझते हैं, इस घटिया मर्दानगी पर अगर इतना ही घमण्ड है हमें, तो बस एक दिन खुद को उनकी जगह रख कर देखें, अगर ये दो कौड़ी की मर्दानगी बिखर कर चकनाचूर न हो जाये तो कहना...!

याद रखें...,
जो औरतों की अपनी माँ कि इज्ज़त करना नहीं जानतें, वो कभी मर्द हो ही नहीं सकतें...!

सुरेश कुमार व्यास "जानम"
सिखवाल समाचार®
सत्य का "दर्पण" समाज को "अर्पण"

उपदेश देने से पहले स्वयं में झाँक कर देखना कितना आवश्यक हैं...?समाज में अक्सर ऐसे लोग भी देखने को मिल जाते हैं, जो दूसरो...
30/05/2026

उपदेश देने से पहले स्वयं में झाँक कर देखना कितना आवश्यक हैं...?

समाज में अक्सर ऐसे लोग भी देखने को मिल जाते हैं, जो दूसरों को संस्कार, सेवा और कर्तव्य का पाठ पढ़ाने में सबसे आगे रहते हैं, लेकिन जब बात अपने आचरण की आती है, तो उनकी वास्तविकता कुछ और ही होती है, जब कोई व्यक्ति स्वयं अपने माता-पिता का कभी हालचाल तक नही पूछता, कभी बीमारी में उनसे मिलने तक नहीं जाता, अपनी माँ का सम्मान करने के बजाय खुलेआम गाली-गलौज करता है, ऐसे व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति से यह पूछने का नैतिक अधिकार नहीं कि उसने अपने माता-पिता की कितनी सेवा की है...!

माता-पिता की सेवा कोई प्रदर्शन का विषय नहीं है, यह प्रेम, सम्मान, कर्तव्य और संस्कारों का विषय है, सेवा का मूल्य शब्दों से नहीं बल्कि व्यवहार से आँका जाता है, जो अपने माता-पिता के प्रति सम्मान नहीं रख सकता, ऐसे व्यक्ति को दूसरों के संस्कारों पर प्रश्न उठाने से पहले अपने भीतर झाँककर देखना चाहिए...!

भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है, उनके प्रति आदर, उनकी देखभाल और उनकी भावनाओं का सम्मान करना प्रत्येक संतान का प्रथम धर्म है, जो संतान अपने माता-पिता का दिल दु:खाती है, उनकी उपेक्षा करती है या सार्वजनिक रूप से उनका अपमान करती है, वह समाज में चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर ले, उसके शब्दों का महत्व कम हो जाता है...!

दूसरों पर उँगली उठाना आसान है, लेकिन स्वयं के कर्तव्यों का निर्वहन करना कठिन, इसलिए किसी अन्य की सेवा, संस्कार या पारिवारिक जिम्मेदारियों पर प्रश्न उठाने से पहले व्यक्ति को स्वयँ अपने आचरण का मूल्यांकन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि समाज केवल शब्द नहीं देखता, वह व्यवहार भी देखता है...!

सच्चाई यही है कि माँ-बाप की सेवा का प्रमाण भाषणों और आरोपों से नहीं, बल्कि उनके चेहरे की मुस्कान, उनके प्रति सम्मान और उनके जीवन में दिए गए सहारे से मिलता है, जो स्वयं इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, उसे दूसरों की परीक्षा लेने का अधिकार भी नहीं होता...!

सुरेश कुमार व्यास "जानम"
सिखवाल समाचार®
सत्य का "दर्पण" समाज को "अर्पण"

आज के समय में समाज सेवा का दिखावा करना बहुत आसान हो गया है, कुछ समाज सेवक केवल फोटो खिंचवाकर, मंचों पर दिखाई देकर या बड़...
30/05/2026

आज के समय में समाज सेवा का दिखावा करना बहुत आसान हो गया है, कुछ समाज सेवक केवल फोटो खिंचवाकर, मंचों पर दिखाई देकर या बड़े लोगों की जी-हुजूरी करके स्वयं को समाज सेवक कहलवाने लगते हैं, लेकिन सच्ची समाज सेवा केवल दिखावे से नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वाह से शुरू होती है...!

जिस व्यक्ति ने अपने माँ-बाप की सेवा नहीं की, उनके संघर्ष और त्याग का सम्मान नहीं किया, कभी उन्हें पानी तक नही पिलाया, न कभी उनकी कुशलक्षेम पूछी, वह समाज के प्रति भी सच्चा नहीं हो सकता, माँ-बाप वह आधार हैं जिन्होंने हमें जन्म दिया, चलना, बोलना और जीवन जीना सिखाया, उनके बुढ़ापे में उनका सहारा बनना ही सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ी समाज सेवा है...!

आज कई लोग समाज में सम्मान पाने के लिए बड़े-बड़े आयोजन में जाते हैं, अन्य समुदायों के कार्यक्रमों में फोटो खिंचवाते हैं, लेकिन अपने ही घर में माता-पिता उपेक्षा का जीवन जीते हैं, यह केवल दिखावटी सेवा है, जिसका कोई वास्तविक मूल्य नहीं, सच्चा समाज सेवक वही है जो अपने घर से संस्कारों की शुरुआत करे, माता-पिता का सम्मान करे, उनकी सेवा करे और अपने परिवार को साथ लेकर चले...!

माँ-बाप की आँखों में खुशी लाना किसी भी पुरस्कार या प्रसिद्धि से बड़ा सम्मान है, उनके मुख से निकले आशीर्वाद में वह शक्ति होती है जो जीवन को सफल और सार्थक बना देती है, उनकी आत्मा को ठेस पहुँचाने वाला सुखी नही रहता, इसलिए समाज में नाम कमाने से पहले अपने कर्तव्यों को पहचानना जरूरी है, क्योंकि जो अपने माता-पिता का नहीं हुआ, वह समाज का भी कभी सच्चा हितैषी नहीं बन सकता...!

सच्चाई यही है: “फोटो खिंचवाने से नहीं, संस्कार निभाने से इंसान बड़ा बनता है...!”

👉 सुरेश कुमार व्यास "जानम"✍️
👉 सिखवाल समाचार® 📰
👉 सत्य का "दर्पण" 🪞 समाज 🫂 को "अर्पण"🙏🏻

माँ-बेटे के रिश्ते में दरार डलवाने के झूठी बातें और स्वार्थ का सच...!माँ और बेटे का रिश्ता संसार के सबसे पवित्र रिश्तों ...
29/05/2026

माँ-बेटे के रिश्ते में दरार डलवाने के झूठी बातें और स्वार्थ का सच...!

माँ और बेटे का रिश्ता संसार के सबसे पवित्र रिश्तों में माना जाता है, माँ अपने बच्चे को जन्म देने से लेकर उसे बड़ा करने तक अपना पूरा जीवन समर्पित कर देती है, वह अपने सुख-दु:ख, इच्छाएँ और सपने तक त्याग देती है, ताकि उसके बेटे जीवन में आगे बढ़ सके, तरक्की कर सकें, अपने बच्चों के लिए कभी-कभी वो अपने पति परमेश्वर से भी लड़ती हैं, लेकिन जब वही नाकारा औलाद किसी स्वार्थ, अहंकार या बाहरी प्रभाव में आकर अपनी ही माँ का अपमान करने लगे, सरेआम गाली-गलौज करने लगे, तो यह केवल किसी एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की पीड़ा बन जाती है...!

अक्सर लोग यह प्रश्न करते हैं कि क्या कोई बाहरी व्यक्ति माँ-बेटे को अलग कर सकता है...?
सच यह है कि यदि रिश्तों में विश्वास, सम्मान और अपनापन मजबूत हो, तो कोई तीसरा व्यक्ति उन्हें कभी अलग नहीं कर सकता, लेकिन जब बेटा स्वयं अपने स्वार्थ, लालच, झूठी प्रतिष्ठा या किसी के बहकावे में आकर माँ की भावनाओं को ठेस पहुँचाने लगे, तब रिश्तों में दरार पैदा होती है...!

कुछ लोग समाज के सामने खुद को निर्दोष और “पाक-दामन” साबित करने के लिए अपनी ही माँ पर झूठे आरोप लगा देते हैं, वे अपनी गलतियों को छुपाने के लिए किसी और रिश्तेदार पर झूठे आरोप मढ़ कर उन्हें दोषी ठहराने का प्रयास करते हैं, लेकिन समाज सब देखता है, समय भले ही थोड़ी देर के लिए सच को छुपा दे, चीख कर चिल्ला कर सच को झूठ बनाने का भरसक प्रयास करें, परंतु सत्य एक दिन अवश्य सामने आता है...!

जो बेटा अपनी माँ की इज्जत नहीं कर सकता, वह किसी और रिश्ते का सम्मान भी लंबे समय तक नहीं कर सकता, कहते है माँ का दिल दु;खाकर कभी किसी को सच्ची शांति नहीं मिलती, जिस माँ ने बेटे को बोलना सिखाया, उसी माँ की बेइज्जती करना सबसे बड़ा अन्याय है...!

समाज को भी ऐसे मामलों में केवल किसी एक पक्ष को सुनकर निर्णय नहीं लेना चाहिए, हर कहानी के पीछे एक दर्द और एक सच्चाई छुपी होती है...!

रिश्तों को तोड़ने वाले लोग कुछ समय के लिए सफल दिख सकते हैं, लेकिन अंततः सम्मान उसी को मिलता है जो अपने माता-पिता का आदर करता है, माँ का स्थान इस सँसार में कोई नहीं ले सकता, इसलिए हर बेटे का कर्तव्य है कि वह अपनी माँ का सम्मान करे, उनकी भावनाओं को समझे और किसी भी परिस्थिति में उन्हें अपमानित होने से बचाए, क्योंकि जिस घर में माँ रोती है, वहाँ कभी सच्ची खुशियाँ नहीं टिकतीं...!

👉 सुरेश कुमार व्यास "जानम" ✍️
👉 सिखवाल समाचार® 📰
👉 सत्य का "दर्पण"🪞 समाज 🫂 को "अर्पण"🙏🏻

श्री आयुष शर्मा ओझा (इंजीनियर)सुपौत्र: स्व. श्रीमती श्री जावित्री देवी शंकरलाल जी ओझासुपुत्र: श्रीमती श्री सरोज देवी राम...
28/05/2026

श्री आयुष शर्मा ओझा (इंजीनियर)
सुपौत्र: स्व. श्रीमती श्री जावित्री देवी शंकरलाल जी ओझा
सुपुत्र: श्रीमती श्री सरोज देवी रामानंद शर्मा (ओझा)
मरुधर में राजोला हाल मुकाम: कोलकोता निवासी ने भारतीय तटरक्षक सेना में सहायक कमांडेंट पद के प्रशिक्षण में सफलता हासिल कर पासिंग आउट परेड़ को पूर्ण कर ओझा परिवार एवँ सिखवाल समाज का नाम रोशन किया...!

सिखवाल समाचार® परिवार एवँ सम्पूर्ण सिखवाल समाज की और से आयुषजी शर्मा तथा ओझा परिवार को ढ़ेर सारी बधाईयाँ...!
ऋष्य श्रृंग एवँ माता शाँता से आयुषजी के उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करते हुए प्रार्थना करते हैं कि आप सफलताओं की बुलंदियों को चूमे, अपना परिवार तथा समाज का नाम रोशन करें...!

सिखवाल समाचार®
सुरेश कुमार व्यास "जानम"

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