02/08/2026
अंधों की दौड़ या समाज सेवा...?
पद बेचने की प्रवृत्ति पर एक सामाजिक जागरण संदेश...👏
आज समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा है...?
क्या समाज सेवक बनने का मूल्य अब मात्र ₹11,000, ₹21,000 या इँसान की वर्तमान धन खर्च करने की हैसियत तय करेगा...?
आज हमारे समाज में यह प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती नजर आ रही है, समाज की शीर्ष संस्था के फर्जी नाम का उपयोग करते हुए धन लेकर समाज के लोगों को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय सचिव, प्रदेश पदाधिकारी या अन्य आकर्षक पदों से समाज सेवकों का पद बेचा जा रहा है, कहीं सदस्यता के नाम पर मोटी राशि, तो कहीं पद देने के नाम पर मोटी रकम वसूल की जा रही है, 10000 सदस्य और 4000 पदाधिकारी, मजे की बात यह हैं कि इस अनैतिक व्यापार में समाज के वो लोग भी पूरी भागीदारी निभा रहे हैं, जो अपनेआप को बुद्धिजीवी या पढ़े लिखों की श्रेणी में उपस्थिति दर्ज करवाते हैं, दुःख इस बात का हैं कि कोई खरीददार समाज बँधु की हैसियत आँकता हैं और एक ही पद "राष्ट्रीय उपाध्यक्ष" किसी को 11000/- में तो किसी को 21000/- और किसी को लाख में भी बेच रहा हैं, यह समाज सेवा नहीं, बल्कि समाज की भावनाओं का व्यापार है, अब समाज को तय करना होगा कि खरीददार होशियार है ये अपनी सामाजिक हैसियत वाली कीमत चुका कर फर्जी पद पाने वाले...?
वास्तविक सम्मान कभी खरीदा नही जाता, वह वर्षों की निष्ठा, सेवा, त्याग, ईमानदारी और समाज के विश्वास से अर्जित होता है, जो पद धन से मिल जाए, वह सम्मान नहीं, केवल एक कागज़ या उपाधि बनकर रह जाता है, जो पदाधिकारी स्वयँ वोट खरीद कर पदासीन हुआ है, स्वाभाविक है खरीदी गई ईज्जत को वापिस बेच कर ही खरीदी की रकम उगाही जा सकती हैं, बस बिकाऊ सामान का सही समय पर सही आँकलन करने की गजब कला हैं, ऐसे समाज सेवक व्यापारी समाज को टुकड़ों-टुकड़ों में बँटा कर अपना व्यापार भली-भांति चला रहे है...!
समाज के प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए, कि क्या हम समाज की उन्नति के लिए आगे बढ़ रहे हैं या केवल नाम के आगे बड़ा पद लिखवाने की होड़ में शामिल हो गए हैं...?
यदि समाज बिना सत्य जाने, बिना पारदर्शिता देखे और बिना संस्था की वैधानिकता परखें केवल पद पाने की लालसा में धन खर्च करता रहेगा, तो ऐसे लोग समाज की इसी कमजोरी का लाभ उठाते रहेंगे, इससे योग्य और समर्पित कार्यकर्ताओं का तथा समाज की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है...!
यह लेख किसी व्यक्ति या संस्था विशेष पर आरोप नहीं है, इसका उद्देश्य केवल सिखवाल समाज को जागरूक करना है कि किसी भी संस्था से जुड़ने, सदस्यता लेने या कोई पद स्वीकार करने से पहले उसकी वैधता, कार्यप्रणाली, संविधान, पारदर्शिता और वास्तविक सामाजिक योगदान की निष्पक्ष जानकारी अवश्य प्राप्त करें, अन्यथा अपनी कड़ी मेहनत से अर्जित से धन लोगों की ऐशमौज के संसाधनों के बदले गले में फर्जी पद का पट्टा लगा कर मुर्खो की श्रेणी में नाम अंकित होंगे...!
याद रखिए:
- सेवा का मूल्य धन नहीं, समर्पण होता है...!
- पद का गौरव खरीदने से नहीं, कर्म से बढ़ता है...!
- समाज का भविष्य दिखावे से नहीं, जागरूकता और सत्यनिष्ठा से सुरक्षित होता है...!
आइए, हम सब मिलकर ऐसी प्रवृत्तियों से सावधान रहें और अपने समाज में योग्यता, ईमानदारी, पारदर्शिता और वास्तविक सेवा की संस्कृति को बढ़ावा दें...!
"पद नहीं, पात्रता कमाइए, सम्मान खरीदा नहीं जाता, उसे अपने कर्मों से अर्जित किया जाता है...!"
ठंडे दिमाग से सोचिये की 10000 सदस्यों की संस्था में 2000 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, 500 राष्ट्रीय प्रदेश अध्यक्ष, 1000 राष्ट्रीय सचिव, अन्य सैकड़ों फर्जी राष्ट्रीय नेताओं से किसी भी समाज का कितना भला हो सकता हैं...?
क्या पूरे कार्यकाल में कभी सभी पदाधिकारीयो की कोई कार्यकारिणी की सभा हो सकती हैं...?
अपनी गाढ़ी कमाई से पद खरीद कर कुछ लोगों की दाल-रोटी का जरिया ही बनना हैं तो अन्नदान करें, अपने ही शहर में किसी विद्यार्थी को छात्रवर्ती दे, किसी मरीज के इलाज में सहयोग करें, अन्यथा वो कहावत याद करे कि "मूर्खों का माल मसखरे खा गये...!"
हमारी बातों से किसी की भावनाएँ आहत होती हैं तो चिंतन मंथन करें, क्यूँकि हमारा उद्धेश्य केवल समाज को जागरूक करना हैं किसी की भावनाओं के आहत करना नही, मगर नित-प्रतिदिन फर्जी घोषणाओं से बन रहे पदाधिकारियों से यह पता चलता है कि 11000 या 21000 के बदले फर्जी पद प्राप्त हुए तो दुःख होता हैं...!
सुरेश कुमार व्यास "जानम"
सिखवाल समाचार®
सत्य का "दर्पण" - समाज को "अर्पण"