15/12/2025
हालांकि मैं पहले से कबूतरों की तुलना रोहिंग्याओं से करता आ रहा हूं। क्योंकि ये एक बार आपके घर/बालकनी मेंं जगह बना लें, वहां से हटने का नाम नहीं लेते। लेकिन हमारी जान के लिए ये इतने खतरनाक हो सकते हैं, यह कभी नहीं सोचा था, जो इस पोस्ट को पढ़कर पता चला...
(योगेश पराडकर की एक मराठी पोस्ट का हिंदी अनुवाद)
किसी ने ग्रुप पर कबूतर की बीट और उसके परिणामों के बारे में एक लेख डाला था। यह बात इतनी गंभीर होगी, ऐसा मैंने उस समय सोचा भी नहीं था, लेकिन... नीचे उल्लेखित / घटी हुई एक सच्ची घटना के बाद पता चला कि घर में कबूतर होना कितने खतरनाक हो सकता है ...
कबूतर एक साधारण सा पक्षी दिखता है, लेकिन यह सिर्फ 6 माह में हमें मौत के दरवाजे पर खड़ा कर सकता है।
इस पर विश्वास नहीं हो रहा ना...?
लेकिन यह सच है। दो हफ्ते पहले कबूतर की बीट के कारण ठाणे में रहने वाले एक करीबी मित्र को मैंने खो दिया।
जिस फ्लैट में वह मित्र रहता था, उसकी खिड़की के नीचे ग्रिल में ए.सी. की डक्ट यूनिट के आसपास कबूतरों का बसेरा था और उनकी बीट लगभग तीन महीने से पड़ी थी। कबूतरों के अंडे, चूज़े, टहनियां और बीट सब वहीं थे, लेकिन इसे नजरअंदाज कर दिया गया। ए.सी. के माध्यम से जो हवा घर में आती थी, उसमें सूखी बीट की सूक्ष्म जीवाणुयुक्त धूल घर के अंदर चली आ रही थी, इस बात की जरा सी भी कल्पना उस परिवार को नहीं थी।
कबूतर जब उड़ते हैं तो यह बीट की धूल एसी के बाहरी आउटलेट के पीछे की तरफ से जाली के रास्ते अंदर जाती है और वहां से आने वाली पाइप के माध्यम से यह जीवाणु ए.सी. के जरिए अंदर प्रवेश करते हैं। खिड़कियां पूरी तरह बंद हों तब भी संक्रमण हो ही जाता है। ये जीवाणु पानी, फिनाइल, एसिड, डेटॉल में भी जिंदा रहते हैं, यही बात आश्चर्यजनक है... रिपोर्ट में यही लिखा हुआ था।
रिपोर्ट में लिखे लक्षण:
कमजोरी
सूखी खांसी
बुखार
पेट दर्द
आसानी से पसीना आना
शरीर में सूजन आना-जाना
ऑक्सीजन स्तर कम होना
चिड़चिड़ापन
एक विशेष लक्षण: अचानक सांस फूलना और हाइपर होना।
रिपोर्ट पढ़कर मैं तो सन्न रह गया।
45 साल का वह मित्र दो महीने से बीमारी से परेशान होकर एक्स-रे और अन्य जांच कराने गया। संयोग से, जिन डॉक्टर कपूर के पास इलाज के लिए गया था, हाल ही में वे खुद वृद्धावस्था में गुजर चुके थे।
रोग का निदान:
"एक्यूट हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस" (यह रोग कबूतर की बीट से होता है)।
डॉक्टर कपूर के जाने के बाद उपचार पद्धति और अस्पताल दोनों बदलने पड़े। फेफड़े और श्वसन नलिका पूरी तरह संक्रमित हो चुके थे... रिपोर्ट में पाया गया कि 60% फेफड़े काम नहीं कर रहे थे।
जांच करने पर इस विषय में और अधिक जानकारी मिली, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। जब डॉक्टर ने कहा कि "इस पर कोई इलाज नहीं है, मरीज जितना जी सके, जीने दो" ... तो वह मित्र सदमे में आ गया।
एक्यूट हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस में होता क्या है...?
फेफड़ों का अंदरूनी हिस्सा सिकुड़ता जाता है और कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। मरीज को ऑक्सीजन देनी पड़ती है। इस बीमारी का जल्दी पता नहीं चलता। प्रतिरोधक क्षमता कितनी भी अच्छी हो, असर हो ही जाता है।
फेफड़ों का प्रत्यारोपण भी आसान नहीं था। क्योंकि उपलब्धता नहीं थी और खर्चीला भी था। आखिरकार पिछले हफ्ते उस मित्र की मृत्यु हो गई। हम सभी मित्र मास्क पहनकर उसकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
कबूतर शांति का दूत नहीं, बल्कि यमदूत है, यह उस मित्र की मौत ने साबित कर दिया। उस घर के सभी सदस्यों को ऊपर बताए गए अनुसार फेफड़ों की बीमारी कम-ज्यादा मात्रा में हो चुकी है। उपचार चल रहे हैं, लेकिन आगे का पूरा जीवन श्वसन रोग से त्रस्त रहकर बिताना पड़ेगा, यह देखकर बहुत दुख हुआ।
छोटा सा कबूतर कितना बड़ा अनर्थ कर सकता है, इस पर विश्वास ही नहीं हुआ...
बहुत दुखद... लेकिन सच्चाई।
इस विषय पर जानकार लोगों से जानकारी लेकर यह लिखने की कोशिश की है।
संभव हो तो कबूतरों को आसपास बसने न दें, यही इसका सबसे कारगर उपाय है। कबूतरों को घर में बिल्कुल जगह न दें...
क्योंकि अन्य पक्षी और जानवर पानी और मिट्टी (मड बाथ) से स्नान करते हैं, इसलिए वे स्वच्छ रहते हैं। लेकिन कबूतर बहुत गंदा होता है। इसलिए यह रोगाणुओं से भरा रहता है। काले रंग की जूं कबूतर की बीट से उत्पन्न होती हैं, जो सुई की नोंक से भी सूक्ष्म होती हैं।
मुंबई के (चिड़ियाघर) प्राणी संग्रहालय और पुणे सर्प उद्यान के मेरे दोस्त डॉक्टर और डॉक्टर मित्रों ने कबूतरों के बारे में अधिक जानकारी दी। अन्य पशु-पक्षी दाने और प्राकृतिक खाद्य खाते हैं, इसलिए उनकी बीट से संक्रमण नहीं होता और वह खाद के रूप में पौधों के लिए लाभकारी होती है। कबूतर, चमगादड़, गिद्ध, तेंदुआ और कोमोडो ड्रैगन की लार और बीट अम्लीय और घातक होती है।
अपने गुलाब चाचा की प्यारी सी देन, शांति का दूत न होकर मौत को बुलावा देती है... यह अपनी आंखों से देखा है...
मामूली कबूतर से जुड़ी एक आंखों देखी...सत्य घटना...