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तथ्यों और (RTI) से प्राप्त सूचनाओं से
सच को बेनक़ाब करने वाले सजग नागरिक. वीडियो में व्यक्त किए गए सभी विचार
वक्ता के निजी हैं
इनका हमारे पेज की राय या रुख़ से
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जीतने वाले नेता जी कह रहे  हैं – कोई सुनाई नही कर रहा हैं।, और हारने वाले नेता जी के पास समय ही नही..? ऐसे में जनता आखिर...
09/07/2026

जीतने वाले नेता जी कह रहे हैं – कोई सुनाई नही कर रहा हैं।, और हारने वाले नेता जी के पास समय ही नही..? ऐसे में जनता आखिर जाए तो जाए कहाँ जाए?
गाँवों की ग्राम पंचायतों की बदहाल और बुरी स्थिति देखकर हर जागरूक नागरिक को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर पाँच साल तक विकास की जिम्मेदारी किसकी हैं?
अगली बार जब कोई नेता वोट माँगने आपके दरवाजे आए, तो सिर्फ एक सवाल जरूर पूछिए—
पूरे पाँच साल हमारे गाँव के लिए एक नियमित ग्राम सेवक और एक एलडीसी बाबू तक उपलब्ध नहीं करा सके, तो अब किस मुँह से वोट माँगने आए हैं?
भरोसा करने से पहले सोचिए और सवाल कीजिए जातिवाद से ऊपर उठकर अपने मत का सही इस्तेमाल कीजिए ताकि आपके बच्चो का भविष्य सुरक्षित हो सके
मीडिया सिर्फ सच का आईना दिखा सकता है, लेकिन बदलाव तभी आएगा जब जनता सवाल पूछेगी।

लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज़ है।

जागरूक बनिए… सवाल पूछिए… क्योंकि जवाबदेही ही लोकतंत्र की असली पहचान और मजबूती है।
Bhajanlal Sharma Hakam Ali Khan CMO Rajasthan Amit Tiwari Reporter Dinesh Kumawat

क्या से क्या हो रहा हैं..?
09/07/2026

क्या से क्या हो रहा हैं..?

धूल फांक रहे दफ्तर, मौके पर मिले ताले: सुनसान गांवो की संसद..34 ग्राम पंचायतें 27 ग्राम सेवक: दोहरे चार्ज के जाल में फंस...
09/07/2026

धूल फांक रहे दफ्तर, मौके पर मिले ताले: सुनसान गांवो की संसद..
34 ग्राम पंचायतें 27 ग्राम सेवक: दोहरे चार्ज के जाल में फंसी जनता,

गारिंडा में दो एलडीसी तैनात तो कही व्यवस्था चार्ज के भरोसे दूरी के खेल में फंसी जनता..

फतेहपुर में पंचायती राज पर खोल पोल टीम का बड़ा खुलासा

विशेष रिपोर्ट
​फतेहपुर (सीकर)। राज्य सरकार एक तरफ जहां गांवों में बेहतर इंतजाम और तरक्की का दम भरते हुए 'हर घर तक सरकारी सहूलियतें' पहुंचाने के उद्देश्य से पंचायत मुख्यालय खोलकर बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट और 'ऊंट के मुंह में जीरा' साबित हो रही है।

खोल पोल टीम की इस खास ग्राउंड रिपोर्ट में अफसरों की लापरवाही और बदइंतजामी का ऐसा नजारा सामने आया है, जो सरकारी दावों की पोल खोल रहा हैं। फतेहपुर पंचायत समिति के तहत आने वाली कई ग्राम पंचायतों में ड्यूटी के वक्त लटके ताले और सूने पड़े दफ्तर इस बात का साफ सबूत हैं कि आम जनता की दिक्कतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।
​बेचारे ग्रामीणों को अपनी जायज और जरूरी कागजी कार्यवाहियों के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। स्कूली बच्चों के सर्टिफिकेट से लेकर किसानों की जमीन-जायदाद के बेहद जरूरी कागजातों पर ग्राम विकास अधिकारी (ग्राम सेवक) के दस्तखत जरूरी होने के बावजूद, इन जिम्मेदार अधिकारियों का दफ्तरों से गायब रहना जनता के लिए बड़ी मुसीबत बन चुका है। यह रवैया सरकारी सेवा कानून का खुला उल्लंघन और अपनी जिम्मेदारी से सरासर खिलवाड़ है।

दोहरे प्रभार का अजीब खेल: एक ही वक्त पर दो जगहों पर मौजूदगी का 'जादू'

​इस भारी लापरवाही की गहराई में जब हमारी टीम पहुंची तो बेहद हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। फतेहपुर पंचायत समिति के दायरे में कुल 34 ग्राम पंचायतें आती हैं, लेकिन सिस्टम की लापरवाही का आलम देखिए कि यहां सिर्फ 27 ग्राम सेवक ही तैनात हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए बड़े अफसरों ने जो रास्ता निकाला, उसने जनता की मुश्किलों को और बढ़ा दिया हैं।

एक ग्रामसेवक दो जगह तैनाती

इस पूरे मामले में जनता के कामों को जुगाड़ी अंदाज में चलाया जा रहा हैं। रामाकांत महावर को बांठोद व हेतमसर, अशोक कुमार को हरसावा बड़ा व दाडून्दा, और सज्जन सिंह को खोटिया व हुढेरा जैसी दो-दो ग्राम पंचायतों का अतिरिक्त प्रभार (चार्ज) दे दिया गया है। इसी तरह इकराज अहमद को भींचरी व ठीमोली तथा चंद्र प्रकाश को तिहावली व रोसावा की दोहरी जिम्मेदारी का हुक्म थमा दिया गया है, जबकि मुकेश कुमार को नया बास और योगेश कुमार को दिनवा लाड़खानी में सिर्फ काम चलाने के लिए लगाया गया है। अब बड़ा सवाल यह है कि कोई भी अधिकारी एक ही वक्त में दो अलग-अलग गांवों के दफ्तरों में कैसे मौजूद रह सकता है? इस सीधे सवाल का जवाब देने से बड़े अफसर कतरा रहे हैं। इस नीति से न सिर्फ सरकारी काम ठप पड़ा है, बल्कि आम जनता का वक्त और पैसा भी बर्बाद हो रहा है।

कनिष्ठ सहायकों की तैनाती में मनमानी: कहीं सूखा, तो कहीं मेहरबानी.. अनोखा 'सेटिंग खेल'

​सिर्फ ग्राम सेवक ही नहीं, कनिष्ठ सहायकों (एलडीसी) की तैनाती में भी अफसरों की मनमानी और भेदभाव साफ नजर आता है। कुल 31 कनिष्ठ सहायकों में से 6 को दोहरे कार्यभार के जाल में उलझा दिया गया है। लक्ष्मण प्रसाद को रोसावा व भींचरी, सुरेंद्र कुमार को गंगियासर व दीनवा लाडखानी, लालचंद को गोडियां बड़ा व खोटिया, छगन सिंह को हरसावा बड़ा व कारंगा बड़ा, महेश कुमार को देवास व दाडून्दा, और परसोतम मीणा को रोलसाबसर व ठिमोली का दोहरा प्रभार देकर पल्ला झाड़ लिया गया है।

इसके बिल्कुल उलट, गारिंडा ग्राम पंचायत में दो-दो कनिष्ठ सहायकों को एक साथ तैनात कर दिया गया है।
यहां अनिता के साथ संतोष गारिंडा को विशेष तौर पर डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) पर लगाया गया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, संतोष गारिंडा का अपना ही इलाका होने की वजह से उन्हें यह खास रियायत दी गई है।
अब सवाल यह है कि जहां कई ग्राम पंचायतें एक अदद बाबू के लिए तरस रही हैं, वहां गारिंडा पर यह खास मेहरबानी और साठगांठ का खेल किस नियम के तहत चल रहा है? बराबरी और इंसाफ के नियमों की धज्जियां उड़ाने वाली यह व्यवस्था बड़े स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

दूरी का अजीबोगरीब खेल: ग्रामसेवकों की अव्यावहारिक तैनाती

​"प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण उपजा 'दूरी का यह खेल' अब ग्रामीण जनता के लिए मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना बन चुका है।"
​मामला सिर्फ ग्रामसेवकों की कमी का नहीं, बल्कि उनकी दोषपूर्ण तैनाती का है। एक-एक अधिकारी को जिन दो ग्राम पंचायतों का चार्ज दिया गया है, उनके बीच की दूरी 25 से 35 किलोमीटर है। व्यावहारिक रूप से एक अधिकारी के लिए हर दिन इतनी लंबी दूरी तय कर दोनों जगह न्याय कर पाना असंभव है। नतीजा यह है कि अधिकारी का आधा समय सफर में बीत रहा है और मुख्यालयों पर ताले लटके मिलते हैं। इस भौगोलिक मिसमैनेजमेंट का सीधा खामियाजा आम जनता भुगत रही है, जिसके छोटे-छोटे सरकारी काम हफ्तों तक अटक रहे हैं।

एसी कमरों में बैठे हुक्मरानों के आदेश एक ही कुर्सी पर दो दावेदारों का अजीबोगरीब किस्सा

​अफसरों के बंद कमरों में बैठकर फैसले लेने का नमूना तब देखने को मिला, जब तबादला नीति का मजाक उड़ाते हुए एक अजीब ऑर्डर जारी किया गया। पिछले साल अगस्त 2025 में जमीन के पट्टों के मामले में गड़बड़ी के चलते सस्पेंड रहे ग्राम सेवक हरिराम यादव को बहाली के बाद पाटन से कायमसर (फतेहपुर) ट्रांसफर कर दिया गया। लेकिन महकमे के अफसरों की नासमझी का आलम तो देखिए, कायमसर में पहले से ही चंदा मीणा नाम की ग्राम सेवक पूरी मुस्तैदी से काम कर रही हैं। नतीजा यह हुआ कि *फतेहपुर के विकास अधिकारी (बीडीओ) ने जगह खाली न होने की वजह से हरिराम यादव को जॉइनिंग कराने से साफ मना कर दिया और उन्हें वापस जिला परिषद भेज दिया। जब फतेहपुर इलाके में ग्राम सेवकों की इतनी सीटें खाली पड़ी हैं, तब ऐसी अंधी तबादला नीति के तहत एक ही कुर्सी पर दो लोगों को भेजने का फैसला अफसरों की घोर लापरवाही और नाकामी को साफ बयां करता है।

जानकारों की राय:
बीडीओ के पास मौजूद अधिकारों का दायरा
​कानून और प्रशासनिक मामलों के जानकारों का इस पर साफ कहना है कि नियमों के मुताबिक खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के पास यह पावर होती है कि वह अपने इलाके में पहले से काम कर रहे ग्रामसेवक को अपने क्षेत्र की किसी खाली जगह पर भेजकर नए आए अफसर को जॉइन करवा सकें। या फिर वे एक ऑफिशियल चिट्ठी लिखकर बड़े अफसरों से यह मांग कर सकते थे कि उनके इलाके में जो पद खाली पड़े हैं, वहां इन कर्मचारियों को तैनात किया जाए ताकि जनता को परेशानी न हो।

जिम्मेदारों की दलील: कार्रवाई का भरोसा, विसंगतियों पर खामोशी

​"सरकार के नियमों के मुताबिक किसी जगह पर दो एलडीसी को काम की जरूरत के हिसाब से लगाया जा सकता है। सरकार ने लगाया हैं। गारिंडा में भी उन्हें एक अस्थाई व्यवस्था के तहत तैनात किया गया है। जहां तक खाली पदों और डबल चार्ज की बात है, तो काम चलाने के लिए किसी न किसी को प्रभार देना ही पड़ेगा। जब नई भर्तियां या पोस्टिंग होंगी, तब यह दोहरा चार्ज खत्म हो जाएगा। जहां तक हरिराम यादव की बात हैं तो उनको मेने वापस जिला परिषद भेज दिया हैं। उच्च स्तर पर हम लगातार खाली पदों की रिपोर्ट भेजते रहते हैं। रही बात दफ्तरों में ताले लटके मिलने की, तो हम अचानक दौरा करके इसकी जांच करेंगे। जो भी कर्मचारी ड्यूटी से नदारद मिलेगा, उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।"
— नरेंद्र कुमार, विकास अधिकारी (बीडीओ), पंचायत समिति कार्यालय, फतेहपुर (सीकर)

​"अगस्त 2025 में पट्टों के मामले में निलंबन की कार्रवाई हुई थी, जिसके बाद मैं पाटन में तैनात रहा। अब मुझे कायमसर का ऑफिशियल ट्रांसफर ऑर्डर मिला था, लेकिन वहां पहले से ही ग्राम सेवक तैनात होने की वजह से बीडीओ साहब ने मुझे वापस जिला परिषद भेज दिया है। अब आगे के आदेशों का इंतजार है।"
— हरीराम यादव, प्रभावित ग्राम सेवक

इस पूरे खेल में जनता को क्या मिला..?

प्रशासनिक अमले की इस भारी ढिलाई, नियमों की अनदेखी और दफ्तरों में चल रही इस 'तालाशाही' की वजह से इलाके की भोली-भाली जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। अब देखना यह है कि इस गंभीर बदइंतजामी पर आला अधिकारी और जिला कलेक्टर कब जागते हैं और कब फतेहपुर की जनता को इस मुसीबत से निजात मिलती है। और कब सरकार के दावे धरातल पर दौड़ते दिखाई देते हैं ये देखना होगा
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दस साल और बीस साल या उस से ऊपर की गारंटी पर जिनकी छत की वाटर प्रूफिंग की गई थी चाहे वो किसी भी कंपनी से या किसी भी व्यक्...
08/07/2026

दस साल और बीस साल या उस से ऊपर की गारंटी पर जिनकी छत की वाटर प्रूफिंग की गई थी चाहे वो किसी भी कंपनी से या किसी भी व्यक्ति विशेष से बनाई गई हो और गारंटी समय में अगर छत टपक रही हो। वो पीड़ित लोग अपनी वीडियो बाइट और छत का टपकते हुए का वीडियो फोटो मेल करे
[email protected]

राम भरोसे फतेहपुर.. कुर्सी खाली, जनता बेहाल: फतेहपुर में 'राम भरोसे' चल रहा सिस्टम, कागजी दावों की खुली पोल!एसडीएम तहसील...
08/07/2026

राम भरोसे फतेहपुर.. कुर्सी खाली, जनता बेहाल: फतेहपुर में 'राम भरोसे' चल रहा सिस्टम, कागजी दावों की खुली पोल!
एसडीएम तहसीलदार और शहर पटवारी का पद खाली कागजों में दफन जनता की फाइले..?

अफसर गायब, वादे हजार: फतेहपुर को जनप्रतिनिधियों ने दिया 'प्रभार का अचार', जनता काट रही दफ्तरों के चक्कर बार बार!*

नेताओं के दावे बनाम जमीनी हकीकत

खोल पोल ग्राउंड जीरो रिपोर्ट
फतेहपुर (शेखावाटी) सीकर
​सुशासन और त्वरित जनसेवाओं के ऊंचे-ऊंचे नेताओ के दावों के बीच फतेहपुर उपखंड इस समय प्रशासनिक शून्यता और घोर उपेक्षा का जीवंत शिकार बनता नजर आ रहा है। सरकारें बदलती हैं, जनप्रतिनिधि मंचों से विकास की लंबी-चौड़ी गड़गड़ाहट करते हैं, लेकिन कड़वा सच यह है कि फतेहपुर के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक महकमे इस समय पूरी तरह 'अनाथ' और 'लावारिस' स्थिति में नजर आ रहे हैं। जहां फतेहपुर में उपखंड अधिकारी (एसडीएम), तहसीलदार और शहर के पटवारी जैसे सबसे जिम्मेदार और जनता से सीधे जुड़े प्रमुख पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं।

वादों की खुली पोल
!
नेताओं की बात करे तो हाल ये है कि चुनाव के समय तो पैर छूने घर-घर आ जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही फतेहपुर को ऐसा 'प्रभार का अचार' थमा दिया है कि जनता दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर अपनी चप्पलें घिस रही है। ऐसा लगता है जैसे फतेहपुर की जनता को बिना इंजन की रेलगाड़ी में बिठा दिया गया है और पटरी पर सिर्फ आश्वासन के सिग्नल दिखाए जा रहे हैं!

​जानकारी के अनुसार, उपखंड अधिकारी (एसडीएम) का पद रिक्त होने से क्षेत्र के तमाम प्रशासनिक निर्णयों, कानून व्यवस्था की समीक्षा और विभिन्न सरकारी विभागों के बीच का तालमेल पूरी तरह वेंटिलेटर पर दिख रहा है। वहीं, दूसरी ओर तहसीलदार की नियमित सीट खाली होने से नामांतरण, सीमाज्ञान और राजस्व अभिलेखों से जुड़े सैकड़ों मामले धूल फांक रहे हैं। किसान और आम नागरिक अपनी ही जमीनों के हक के लिए बाबुओं के आगे हाथ जोड़ने को मजबूर हैं।

अंधेर नगरी चौपट राजा

​अंधेरगर्दी का आलम यहीं खत्म नहीं होता। शहर में एक नियमित पटवारी तक उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण जाति, मूल निवास, आय प्रमाण पत्र और विभिन्न प्रकार के राजस्व सत्यापन के कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं। इसका सबसे तगड़ा और सीधा प्रहार उन गरीब विद्यार्थियों पर हो रहा है जो कॉलेज प्रवेश, छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी भर्तियों के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। आवेदन की तारीखें नजदीक आ रही हैं, लेकिन दफ्तरों में साहब की कुर्सी पर सिर्फ सन्नाटा पसरा हुआ है।

अतिरिक्त कार्य भार का झुनझुना..?

जिम्मेदारी की माने तो उनका हैं कि अतिरिक्त कार्यभार दे रखा हैं। जबकि धरातल की सच्चाई ये हैं कि अतिरिक्त कार्यभार देने से एक लोकसेवक एक ही समय में दो जगह समय पर नहीं पहुंच रहा हैं। और ना ही ढंग से कार्य कर पा रहा हैं। जिसके कारण आमजन के कार्य प्रभावित होते हैं। हाल ही में ग्रामीण सेवा शिविर का भी यही हाल हैं जहां एसडीएम शिविरो में नही पहुंच पा रही हैं।

खोखले साबित हुए नेताओं के भाषण?

​नेताओं के भाषणों में तो डिजिटल इंडिया और युवाओं का भविष्य चमक रहा है, लेकिन धरातल पर एक सर्टिफिकेट के लिए युवाओं का वर्तमान दफ्तरों की चौखट पर दम तोड़ रहा है। हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों के पास बड़ी-बड़ी बैठकों और फीते काटने का समय तो भरपूर है, लेकिन क्या कभी उन्हें यह खाली कुर्सियां और जनता की लाचारी दिखाई नहीं देती? या फिर प्रशासन को भी 'वर्क फ्रॉम होम' के भरोसे छोड़ दिया गया है?
​स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वर्तमान में अतिरिक्त प्रभार (एडिशनल चार्ज) के जरिए जैसे-तैसे काम खींचने का नाटक किया जा रहा है। लेकिन जो अधिकारी पहले से ही अपने मूल कार्यक्षेत्र के बोझ तले दबे हैं, वे फतेहपुर को कितना और कैसा समय दे पा रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।
​इस घोर लापरवाही और प्रशासनिक ढीलेपन से आक्रोशित होकर जनता का साफ कहना है कि यदि इन रिक्त प्रशासनिक पदों पर तुरंत नियमित और स्थाई नियुक्तियां नहीं की गईं, तो जनता अब मूकदर्शक नहीं बनी रहेगी और जल्द ही एक उग्र व लोकतांत्रिक आंदोलन का बिगुल फूंका जाएगा। अब देखना यह है कि कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन और चुनावो में बड़े बड़े वादे करने वाले एसी कमरों में बैठे जनप्रतिनिधि इस चीख को सुनते हैं या फिर फतेहपुर की जनता को ऐसे ही 'राम भरोसे' भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है।
Hakam Ali Khan Bhajanlal Sharma @

08/07/2026

पकड़ी गई कलाकार..
अरर.. बारे.. मेरा कपड़ा फाड़ दिया...?

फतेहपुर विधानसभा के खोटिया और ठेडी में 'सेवा शिविर 2026' बना खानापूर्ति; एक ही समय पर दो जगह कैंप, अधिकारी 'मानव या शक्त...
07/07/2026

फतेहपुर विधानसभा के खोटिया और ठेडी में 'सेवा शिविर 2026' बना खानापूर्ति;

एक ही समय पर दो जगह कैंप, अधिकारी 'मानव या शक्तिमान'?

बिना अधिकारियों के ही सेवा शिविरों' की इति श्री! कैसे दूर होगी आमजन की समस्याएं..?
ग्रामीण सेवा शिविर में अधिकारी नदारद
कागजी शिविर, गायब साहब: जब जनता ढूंढती रही अफसर, और अफसर बन गए मिस्टर इंडिया!
Hakam Ali Khan Bhajanlal Sharma CMO Rajasthan Amit Tiwari Kapil Sfi PMO India Kailash Sfi

07/07/2026
फतेहपुर विधानसभा के खोटिया और ठेडी में 'सेवा शिविर 2026' बना खानापूर्ति; एक ही समय पर दो जगह कैंप, अधिकारी 'मानव या शक्त...
07/07/2026

फतेहपुर विधानसभा के खोटिया और ठेडी में 'सेवा शिविर 2026' बना खानापूर्ति;

एक ही समय पर दो जगह कैंप, अधिकारी 'मानव या शक्तिमान'?

​बिना अधिकारियों के ही सेवा शिविरों' की इति श्री! कैसे दूर होगी आमजन की समस्याएं..?

​ग्रामीण सेवा शिविर में अधिकारी नदारद
​कागजी शिविर, गायब साहब: जब जनता ढूंढती रही अफसर, और अफसर बन गए मिस्टर इंडिया!

​विशेष रिपोर्ट: खोल पोल
फतेहपुर (सीकर)।
​आमजन को उनके द्वार पर ही सभी प्रशासनिक समस्याओं से मुक्ति दिलाने के बड़े-बड़े दावों के साथ राजस्थान सरकार द्वारा संचालित 'ग्रामीण व शहरी सेवा शिविर 2026' धरातल पर प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। सरकार ने इस अभियान के प्रचार-प्रसार के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लाखों रुपये के होर्डिंग्स और बैनर तो लगवा दिए, ताकि जनता जागरूक होकर इसका लाभ उठा सके। लेकिन फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र में अधिकारियों की सुस्ती और गैर-जिम्मेदाराना रवैये के कारण ये शिविर महज 'कागजी खानापूर्ति' बनकर रह गए हैं।

​वाह रे प्रशासनिक माया! विज्ञापन ऐसे चमचमा रहे हैं जैसे कोई इंटरनेशनल फेस्टिवल हो, लेकिन कैंप में कुर्सियां ऐसी सूनी पड़ी हैं जैसे किसी फ्लॉप फिल्म का थिएटर! सरकार सोच रही है जनता के काम हो रहे हैं, और अफसर सोच रहे हैं कि बैनर पर फोटो आ ही गई तो खुद जाने की क्या जरूरत?

​ऐसा ही एक चौंकाने वाला नजारा आज फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र की खोटिया ग्राम पंचायत और ठेडी में देखने को मिला, जहां आयोजित शिविर से उपखंड अधिकारी (एसडीएम) और ब्लॉक विकास अधिकारी (बीडीओ) जैसे मुख्य जिम्मेदार अधिकारी पूरी तरह नदारद रहे। हालांकि, मौके पर अतिरिक्त बीडीओ की मौजूदगी की बात सामने आई है, लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि जहां मुख्य और सीनियर अधिकारी ही गायब हों, वहां सरकार की मंशा के अनुरूप आमजन को मौके पर त्वरित राहत कैसे मिलेगी?

​एक ही दिन में दो-दो कैंप: अजीबोगरीब समय सारिणी अधिकारी 'मानव' या 'शक्तिमान'?
​प्रशासनिक अदूरदर्शिता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि एक ही दिन और एक ही समय पर खोटिया और ठेडी जैसी दो अलग-अलग ग्राम पंचायतों में शिविरों का आयोजन रख दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि यह किस 'महान' प्रशासनिक दिमाग की उपज है? क्या कोई भी अधिकारी एक ही समय में दो अलग-अलग स्थानों पर भौतिक रूप से उपस्थित रह सकता है? क्या प्रशासन अधिकारियों को इंसान नहीं, बल्कि कोई 'शक्तिमान' समझता है जो पलक झपकते ही एक जगह से दूसरी जगह प्रकट हो जाए?

​शायद साहब के पास कोई जादुई छड़ी है! इधर खोटिया में फाइल छुई और उधर पलक झपकते ही ठेडी में प्रकट हो गए। इस अद्भुत टाइम-टेबल को बनाने वाले को तो प्रशासनिक ऑस्कर मिलना चाहिए, जिसने एक ही समय पर दो जगह कैंप लगाकर विज्ञान के नियमों को ही फेल कर दिया!

​जब सवाल पर बिफरीं प्रशासनिक अधिकारी

​शिविर में अनुपस्थिति को लेकर जब 'जयपुर गुलाबी टाइम्स' के पत्रकार ने उपखंड अधिकारी से संपर्क साधा, तो उनका रुख सहयोगात्मक होने के बजाय आक्रामक नजर आया।

​एसडीएम (रामगढ़) भारती फूल फकर का पक्ष:
"मैं खोटिया और ठेडी, दोनों ही जगह (शिविर में) मौजूद थी। आप अपनी नॉलेज को अपडेट कीजिए और सही जानकारी जुटाइए।

​रिपोर्टर : "मैडम, हमने पूरी तरह सही और पुख्ता जानकारी जुटाई है। हम वही मोजूद थे हमारे पास इस बात के ठोस प्रमाण (एविडेंस) मौजूद हैं कि आप शिविर के दौरान वहां उपस्थित नहीं थीं।"

​एसडीएम की प्रतिक्रिया
"ठीक है, फिर देख लीजिए अपने हिसाब से।"

​एक जिम्मेदार प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी का ऐसा गैर-जिम्मेदाराना और चुनौतीपूर्ण जवाब यह साफ बयां करता है कि धरातल पर जनता के प्रति जवाबदेही को लेकर अधिकारी कितने गंभीर हैं।

​"कमियां दुरुस्त होंगी, पत्रकार साथी हमें अवगत कराते रहें" आपकी जागरूकता अच्छी हैं।— श्रवण चौधरी
​इस पूरे घटनाक्रम और जनता की परेशानियों पर जब फतेहपुर से भाजपा प्रत्याशी श्रवण चौधरी से बात की गई, तो उन्होंने सरकार का बचाव करते हुए सकारात्मक आश्वासन दिया।

​श्रवण चौधरी (भाजपा प्रत्याशी, फतेहपुर) का पक्ष:
"हमारे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जी एक बेहद साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार से उठकर इस मुकाम तक आए हैं। उन्हें एक आम आदमी की पीड़ा और समस्याओं का बखूबी अहसास है। आज दो जगहों पर कैंप का आयोजन कर आमजन की समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया गया है। रही बात कमियों की, तो अगर कहीं कोई कमी रही है, तो उसे बिल्कुल दुरुस्त किया जाएगा। आप जैसे जिम्मेदार पत्रकार साथी जब सजग रहेंगे और हमें ऐसी कमियों से अवगत कराते रहेंगे, तो समस्याओं का समाधान निश्चित तौर पर होगा।"
​यक्ष प्रश्न: विज्ञापन चमके, पर जनता कब तक भटकेगी?
​सरकार की नीतियां और मुख्यमंत्री की मंशा निसंदेह जनहित में है, लेकिन जब तक field में बैठे अधिकारी एयर-कंडीशनर कमरों से बाहर निकलकर धरातल पर मुस्तैदी नहीं दिखाएंगे, तब तक ऐसे 'सेवा शिविर' केवल बजट ठिकाने लगाने का जरिया ही बने रहेंगे। देखना यह है कि इस गंभीर लापरवाही के बाद क्या उच्च प्रशासन फतेहपुर के इन शिविरों की सुध लेता है या फिर जनता ऐसे ही 'राम भरोसे' भटकती रहेगी।
Bhajanlal Sharma Tayab Mahrab Khan Hakam Ali Khan Amit Tiwari Reporter Dinesh Kumawat CMO Rajasthan Kapil Sfi Kailash Sfi

07/07/2026

लाचार 'माननीय' का आलीशान सिस्टम?: जब जनसुनवाई के सुल्तान खुद ही बन गए थे पीड़ित

​सोशल मीडिया पर घूम रहा विधायक साहब की जनसुनवाई का यह वीडियो वाकई किसी आलीशान कॉर्पोरेट दफ्तर जैसा सुंदर, चकाचक और वेल-मेंटेंड नजर आता है। देखने वाले की आंखें चौंधिया जाएं कि वाह! जनता के दुख-दर्द दूर करने के लिए कैसा हाई-टेक दरबार सजाया गया है।

मगर इस चमचमाती सुंदरता के पीछे से एक ऐसा कड़वा और तीखा सच झांक रहा है, जो इस पूरे सिस्टम की बखिया उधेड़ रहा है।
विधायक साहब अक्सर कैमरे के सामने आते हैं और बड़े ही मासूम भाव से दुखड़ा रोने लगते हैं कि कभी जनरेटर खराब है, तो कभी पूरे क्षेत्र में तीन दिन से बिजली गायब है और सरकार में कोई सुनने वाला ही नहीं है।
माननीय का यह दर्द देखकर एक पल के लिए तो पूरी जनता की आंखों में आंसू आ जाएं कि हाय! हमारे जनसेवक कितने मजबूर हैं। मगर इसी मजबूरी के बीच सबसे बड़ा और लाख टके का सवाल यह खड़ा होता है कि विधायक साहब पहले यह तो तय कर लीजिए कि आप खुद को इस व्यवस्था के 'नेता' मानते हैं या फिर हमारी तरह ही एक पीड़ित 'जनता'?

​अगर आप वाकई इस क्षेत्र के चुने हुए जनप्रतिनिधि यानी नेता हैं, तो फिर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में आपकी सुनवाई क्यों नहीं हो रही? क्या अब जनता अपने विधायक की पैरवी करने के लिए ऊपर तक गुहार लगाएगी? और अगर मान लिया जाए कि आपकी वास्तव में कोई सुनवाई नहीं हो रही है, आप भी हमारी तरह ही लाचार हैं, तो फिर यह करोड़ों के बजट और तामझाम वाला 'जनसुनवाई केंद्र' किसके लिए सजा कर रखा गया है?
जब माननीय खुद बिजली और जनरेटर ठीक करवाने की ताकत इस आलीशान दफ्तर में दरबार सजा लेने के बाद भी नही कर पा रहे हैं, तो फिर यहाँ किस बात की जनसुनवाई का नाटक हो रहा है? जो खुद व्यवस्था के आगे हाथ फैलाए खड़ा हो, वह दूसरों के दुखों का निवारण कैसे करेगा?

यह तो वही बात हो गई कि 'हकीम साहब खुद बीमार हैं, पर शहर भर की दवा बांट रहे हैं।' जनता अब इस हाई-टेक लाचारी को देखकर असमंजस में है कि वह बिजली कटौती का रोना रोए या फिर विधायक जी के धानुका अस्पताल वाले जनरेटर के लिए चंदा इकट्ठा करना शुरू करे।

​कानूनी और प्रशासनिक तौर पर देखा जाए तो एक जनप्रतिनिधि के पास वो सारे अधिकार और संवैधानिक शक्तियां होती हैं, जिनके जरिए वह भ्रष्ट प्रशासन को उंगलियों पर नचा सकता है। लेकिन जब अपनी ही राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता को छुपाने के लिए कैमरे के सामने 'विक्टिम कार्ड' खेला जाने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

यह वीडियो चीख-चीख कर कह रहा है कि यह आलीशान दफ्तर जनता की समस्याओं को हल करने का केंद्र नहीं, बल्कि केवल फोटो खिंचवाने और राजनीतिक विलाप करने का एक सुसज्जित स्टूडियो बन कर रह गया है। जनता अब इतनी भी नासमझ नहीं है कि वह इस चकाचक दफ्तर की आड़ में छिपी नाकामी को न पहचान सके। माननीय जी, जनता ने आपको अपनी आवाज उठाने के लिए चुना था, खुद जनता की तरह कैमरे पर आकर दुख सुनाने के लिए नहीं।
इस सजावटी जनसुनवाई के ढोंग से जनता का पेट नहीं भरने वाला, अब कैमरे के सामने पीड़ा सुनाना बंद कीजिए और जमीन पर उतरकर काम करना शुरू कीजिए, वरना आज की जागरूक जनता जाति से ऊपर उठकर अगली बार इस आलीशान दफ्तर का ताला और चाबी दोनो बदलना जानती हैं।
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