09/07/2026
धूल फांक रहे दफ्तर, मौके पर मिले ताले: सुनसान गांवो की संसद..
34 ग्राम पंचायतें 27 ग्राम सेवक: दोहरे चार्ज के जाल में फंसी जनता,
गारिंडा में दो एलडीसी तैनात तो कही व्यवस्था चार्ज के भरोसे दूरी के खेल में फंसी जनता..
फतेहपुर में पंचायती राज पर खोल पोल टीम का बड़ा खुलासा
विशेष रिपोर्ट
फतेहपुर (सीकर)। राज्य सरकार एक तरफ जहां गांवों में बेहतर इंतजाम और तरक्की का दम भरते हुए 'हर घर तक सरकारी सहूलियतें' पहुंचाने के उद्देश्य से पंचायत मुख्यालय खोलकर बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट और 'ऊंट के मुंह में जीरा' साबित हो रही है।
खोल पोल टीम की इस खास ग्राउंड रिपोर्ट में अफसरों की लापरवाही और बदइंतजामी का ऐसा नजारा सामने आया है, जो सरकारी दावों की पोल खोल रहा हैं। फतेहपुर पंचायत समिति के तहत आने वाली कई ग्राम पंचायतों में ड्यूटी के वक्त लटके ताले और सूने पड़े दफ्तर इस बात का साफ सबूत हैं कि आम जनता की दिक्कतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।
बेचारे ग्रामीणों को अपनी जायज और जरूरी कागजी कार्यवाहियों के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। स्कूली बच्चों के सर्टिफिकेट से लेकर किसानों की जमीन-जायदाद के बेहद जरूरी कागजातों पर ग्राम विकास अधिकारी (ग्राम सेवक) के दस्तखत जरूरी होने के बावजूद, इन जिम्मेदार अधिकारियों का दफ्तरों से गायब रहना जनता के लिए बड़ी मुसीबत बन चुका है। यह रवैया सरकारी सेवा कानून का खुला उल्लंघन और अपनी जिम्मेदारी से सरासर खिलवाड़ है।
दोहरे प्रभार का अजीब खेल: एक ही वक्त पर दो जगहों पर मौजूदगी का 'जादू'
इस भारी लापरवाही की गहराई में जब हमारी टीम पहुंची तो बेहद हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। फतेहपुर पंचायत समिति के दायरे में कुल 34 ग्राम पंचायतें आती हैं, लेकिन सिस्टम की लापरवाही का आलम देखिए कि यहां सिर्फ 27 ग्राम सेवक ही तैनात हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए बड़े अफसरों ने जो रास्ता निकाला, उसने जनता की मुश्किलों को और बढ़ा दिया हैं।
एक ग्रामसेवक दो जगह तैनाती
इस पूरे मामले में जनता के कामों को जुगाड़ी अंदाज में चलाया जा रहा हैं। रामाकांत महावर को बांठोद व हेतमसर, अशोक कुमार को हरसावा बड़ा व दाडून्दा, और सज्जन सिंह को खोटिया व हुढेरा जैसी दो-दो ग्राम पंचायतों का अतिरिक्त प्रभार (चार्ज) दे दिया गया है। इसी तरह इकराज अहमद को भींचरी व ठीमोली तथा चंद्र प्रकाश को तिहावली व रोसावा की दोहरी जिम्मेदारी का हुक्म थमा दिया गया है, जबकि मुकेश कुमार को नया बास और योगेश कुमार को दिनवा लाड़खानी में सिर्फ काम चलाने के लिए लगाया गया है। अब बड़ा सवाल यह है कि कोई भी अधिकारी एक ही वक्त में दो अलग-अलग गांवों के दफ्तरों में कैसे मौजूद रह सकता है? इस सीधे सवाल का जवाब देने से बड़े अफसर कतरा रहे हैं। इस नीति से न सिर्फ सरकारी काम ठप पड़ा है, बल्कि आम जनता का वक्त और पैसा भी बर्बाद हो रहा है।
कनिष्ठ सहायकों की तैनाती में मनमानी: कहीं सूखा, तो कहीं मेहरबानी.. अनोखा 'सेटिंग खेल'
सिर्फ ग्राम सेवक ही नहीं, कनिष्ठ सहायकों (एलडीसी) की तैनाती में भी अफसरों की मनमानी और भेदभाव साफ नजर आता है। कुल 31 कनिष्ठ सहायकों में से 6 को दोहरे कार्यभार के जाल में उलझा दिया गया है। लक्ष्मण प्रसाद को रोसावा व भींचरी, सुरेंद्र कुमार को गंगियासर व दीनवा लाडखानी, लालचंद को गोडियां बड़ा व खोटिया, छगन सिंह को हरसावा बड़ा व कारंगा बड़ा, महेश कुमार को देवास व दाडून्दा, और परसोतम मीणा को रोलसाबसर व ठिमोली का दोहरा प्रभार देकर पल्ला झाड़ लिया गया है।
इसके बिल्कुल उलट, गारिंडा ग्राम पंचायत में दो-दो कनिष्ठ सहायकों को एक साथ तैनात कर दिया गया है।
यहां अनिता के साथ संतोष गारिंडा को विशेष तौर पर डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) पर लगाया गया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, संतोष गारिंडा का अपना ही इलाका होने की वजह से उन्हें यह खास रियायत दी गई है।
अब सवाल यह है कि जहां कई ग्राम पंचायतें एक अदद बाबू के लिए तरस रही हैं, वहां गारिंडा पर यह खास मेहरबानी और साठगांठ का खेल किस नियम के तहत चल रहा है? बराबरी और इंसाफ के नियमों की धज्जियां उड़ाने वाली यह व्यवस्था बड़े स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
दूरी का अजीबोगरीब खेल: ग्रामसेवकों की अव्यावहारिक तैनाती
"प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण उपजा 'दूरी का यह खेल' अब ग्रामीण जनता के लिए मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना बन चुका है।"
मामला सिर्फ ग्रामसेवकों की कमी का नहीं, बल्कि उनकी दोषपूर्ण तैनाती का है। एक-एक अधिकारी को जिन दो ग्राम पंचायतों का चार्ज दिया गया है, उनके बीच की दूरी 25 से 35 किलोमीटर है। व्यावहारिक रूप से एक अधिकारी के लिए हर दिन इतनी लंबी दूरी तय कर दोनों जगह न्याय कर पाना असंभव है। नतीजा यह है कि अधिकारी का आधा समय सफर में बीत रहा है और मुख्यालयों पर ताले लटके मिलते हैं। इस भौगोलिक मिसमैनेजमेंट का सीधा खामियाजा आम जनता भुगत रही है, जिसके छोटे-छोटे सरकारी काम हफ्तों तक अटक रहे हैं।
एसी कमरों में बैठे हुक्मरानों के आदेश एक ही कुर्सी पर दो दावेदारों का अजीबोगरीब किस्सा
अफसरों के बंद कमरों में बैठकर फैसले लेने का नमूना तब देखने को मिला, जब तबादला नीति का मजाक उड़ाते हुए एक अजीब ऑर्डर जारी किया गया। पिछले साल अगस्त 2025 में जमीन के पट्टों के मामले में गड़बड़ी के चलते सस्पेंड रहे ग्राम सेवक हरिराम यादव को बहाली के बाद पाटन से कायमसर (फतेहपुर) ट्रांसफर कर दिया गया। लेकिन महकमे के अफसरों की नासमझी का आलम तो देखिए, कायमसर में पहले से ही चंदा मीणा नाम की ग्राम सेवक पूरी मुस्तैदी से काम कर रही हैं। नतीजा यह हुआ कि *फतेहपुर के विकास अधिकारी (बीडीओ) ने जगह खाली न होने की वजह से हरिराम यादव को जॉइनिंग कराने से साफ मना कर दिया और उन्हें वापस जिला परिषद भेज दिया। जब फतेहपुर इलाके में ग्राम सेवकों की इतनी सीटें खाली पड़ी हैं, तब ऐसी अंधी तबादला नीति के तहत एक ही कुर्सी पर दो लोगों को भेजने का फैसला अफसरों की घोर लापरवाही और नाकामी को साफ बयां करता है।
जानकारों की राय:
बीडीओ के पास मौजूद अधिकारों का दायरा
कानून और प्रशासनिक मामलों के जानकारों का इस पर साफ कहना है कि नियमों के मुताबिक खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के पास यह पावर होती है कि वह अपने इलाके में पहले से काम कर रहे ग्रामसेवक को अपने क्षेत्र की किसी खाली जगह पर भेजकर नए आए अफसर को जॉइन करवा सकें। या फिर वे एक ऑफिशियल चिट्ठी लिखकर बड़े अफसरों से यह मांग कर सकते थे कि उनके इलाके में जो पद खाली पड़े हैं, वहां इन कर्मचारियों को तैनात किया जाए ताकि जनता को परेशानी न हो।
जिम्मेदारों की दलील: कार्रवाई का भरोसा, विसंगतियों पर खामोशी
"सरकार के नियमों के मुताबिक किसी जगह पर दो एलडीसी को काम की जरूरत के हिसाब से लगाया जा सकता है। सरकार ने लगाया हैं। गारिंडा में भी उन्हें एक अस्थाई व्यवस्था के तहत तैनात किया गया है। जहां तक खाली पदों और डबल चार्ज की बात है, तो काम चलाने के लिए किसी न किसी को प्रभार देना ही पड़ेगा। जब नई भर्तियां या पोस्टिंग होंगी, तब यह दोहरा चार्ज खत्म हो जाएगा। जहां तक हरिराम यादव की बात हैं तो उनको मेने वापस जिला परिषद भेज दिया हैं। उच्च स्तर पर हम लगातार खाली पदों की रिपोर्ट भेजते रहते हैं। रही बात दफ्तरों में ताले लटके मिलने की, तो हम अचानक दौरा करके इसकी जांच करेंगे। जो भी कर्मचारी ड्यूटी से नदारद मिलेगा, उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।"
— नरेंद्र कुमार, विकास अधिकारी (बीडीओ), पंचायत समिति कार्यालय, फतेहपुर (सीकर)
"अगस्त 2025 में पट्टों के मामले में निलंबन की कार्रवाई हुई थी, जिसके बाद मैं पाटन में तैनात रहा। अब मुझे कायमसर का ऑफिशियल ट्रांसफर ऑर्डर मिला था, लेकिन वहां पहले से ही ग्राम सेवक तैनात होने की वजह से बीडीओ साहब ने मुझे वापस जिला परिषद भेज दिया है। अब आगे के आदेशों का इंतजार है।"
— हरीराम यादव, प्रभावित ग्राम सेवक
इस पूरे खेल में जनता को क्या मिला..?
प्रशासनिक अमले की इस भारी ढिलाई, नियमों की अनदेखी और दफ्तरों में चल रही इस 'तालाशाही' की वजह से इलाके की भोली-भाली जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। अब देखना यह है कि इस गंभीर बदइंतजामी पर आला अधिकारी और जिला कलेक्टर कब जागते हैं और कब फतेहपुर की जनता को इस मुसीबत से निजात मिलती है। और कब सरकार के दावे धरातल पर दौड़ते दिखाई देते हैं ये देखना होगा
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