27/03/2026
माँ की फटी कमीज, बिना घी का चूरमा और मेरा स्वाभिमान... 💔🔥
आज जब रसोई घी की खुशबू से महकती है, तो मुझे वो 1963 की दीपावली याद आती है। घर में घी की एक बूंद नहीं थी, पर माँ ने सूखी रोटियों का चूरमा बनाकर हमें खिलाया। मेरे बड़े भाई ने चेहरे पर 'बालों वाला तेल' लगा लिया ताकि दुनिया को लगे कि हम खूब घी वाला चूरमा खाकर आए हैं। वह तेल नहीं, हमारे परिवार की मर्यादा की चमक थी।
बचपन अभावों में बीता, जवानी संघर्ष में। एक दौर वो भी था जब अपनी नन्हीं बेटी के लिए लाई गई 'फ्रॉक' मुझे तानों की वजह से वापस करनी पड़ी। उस दिन कलेजा फट गया था, पर मैंने हार नहीं मानी।
अपनी पत्नी और बच्चों के साथ कुएं पर 'कच्ची झोपड़ी' बनाई, ऊंट-गाड़ी चलाई और खून-पसीना एक कर दिया। आज गर्व से कहता हूँ कि उसी झोपड़ी से निकलकर मेरा एक बेटा इंजीनियर बना और दूसरा मेडिकल लाइन में गया।
65 साल की उम्र में आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उस माँ के सूखे चूरमे और अपने स्वाभिमान में थी।
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