Binder Singh grewal chandpura2

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ਹੱਥ ਜੋੜ ਕੇ ਬੇਨਤੀ ਹੈ ਕਿ ਫੇਸਬੁੱਕ ਤੇ ਫੇਸਬੁੱਕ ਪੇਜ਼ ਚਲਾਉਣ ਵਾਲੇ ਸਾਰੇ ਵੀਰਾਂ ਭੈਣਾਂ ਅਤੇ ਭਰਾਵਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਛੋਟੇ ਵੀਰ ਬਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਤੋਤਾ ਰਾਮ ਚੰਦਪੁਰਾ ਦੇ ਪੇਜ ਨੂੰ ਲਾਈਕ ਅਤੇ ਸ਼ੇਅਰ ਕਰਨਾ ਨਾ ਭੁੱਲਣਾ ਤੁਹਾਡਾ ਬਹੁਤ ਬਹੁਤ ਧੰਨਵਾਦ 🙏⚘

17/09/2026
23/08/2026

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

*!! अष्टावक्र का ज्ञान !!*
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ऋषि को अपने शिष्य कहोड़ की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी पुत्री सुजाता का विवाह कहोड़ से कर दिया। सुजाता के गर्भ ठहरने के बाद ऋषि कहोड़ सुजाता को वेदपाठ सुनाते थे। तभी सुजाता के गर्भ से बालक बोला - ‘पिताजी! आप गलत पाठ कर रहे हैं। इस पर कहोड़ को क्रोध आ गया और शाप दिया तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) होकर पैदा होगा। कुछ दिन बाद कहोड़, राजा जनक के दरबार में एक महान विद्वान बंदी से शास्त्रार्थ में हार गए और नियम अनुसार, कहोड़ को जल समाधि लेनी पड़ी। कुछ दिनों बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ।

एक दिन माँ से पिता की सच्चाई पता चली, तो अष्टावक्र दुखी हुआ और बारह साल का अष्टावक्र बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिए राजा जनक के दरबार में पहुंचा। सभा में आते ही बंदी को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी, लेकिन अष्टावक्र को देखकर सभी पंडित और सभासद हंसने लगे, क्योंकि वो आठ जगह से टेढ़े थे, उनकी चाल से ही लोग हंसने लगते थे। सभी अष्टावक्र पर हंस रहे थे और अष्टावक्र सब लोगों पर। जनक ने पूछा- ‘हे बालक! सभी लोगों की हंसी समझ आती है, लेकिन तुम क्यों हंस रहे हो?

अष्टावक्र बोले - महाराज आपकी सभा चमड़ी की पहचान करने वालों की सभा है, जो मेरी चमड़ी की विकृति पर हंस रहे हैं, इनमें कोई विद्वान नहीं! ये चमड़े के पारखी हैं। मंदिर के टेढ़े होने से आकाश टेढ़ा नहीं होता है और घड़े के फूटे होने से आकाश नहीं फूटता है। इसके बाद शास्त्रार्थ में बंदी की हार हुई। अष्टावक्र ने बंदी को जल में डुबोने का आग्रह किया। बंदी बोला मैं वरुण-पुत्र हूं और सब हारे ब्राह्मणों को यहां वापिस भेज देता हूं। मैं उनको वापस बुला लेता हूं। सभी हारे हुए ब्राह्मण वापस आ गए, उनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे। इसके बाद राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु बना लिया और उनके आत्मज्ञान प्राप्त किया। राजा जनक और अष्टावक्र के इस संवाद को अष्टावक्र गीता के नाम से जाना जाता है।

*शिक्षा :-*
जैसे आभूषण के पुराने या कम सुंदर होने से सोने की कीमत कम नहीं हो जाती, वैसे शरीर की कुरूपता से आत्म तत्व कम नहीं होता। कभी किसी व्यक्ति के शरीर की सुंदरता को देखकर प्रभावित या किसी की कुरूपता को देखता घृणा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शरीर तो हाड़-मांस से बना है। देखना है तो उसका ज्ञान, प्रेम और दिव्यता देखो, क्योंकि आत्मा सबका समान है।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है, उसके पास समस्त है।।*
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20/08/2026

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