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16/08/2026

राहुल गांधी का इंटरव्यू ध्यान से सुने:
जब महात्मा गांधी को इंग्लैंड में ट्रेन से धक्के मार कर निकाल दिया तो मेरे परनाना नेहरू को बहुत गुस्सा आया और वो अपने कजिंस के साथ इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गए और कुछ अंग्रेजों को फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बाहर निकाल दिया
1️⃣ महात्मा गांधी को इंग्लैंड नहीं बल्कि अफ्रीका में फर्स्ट क्लास के डब्बे से बाहर निकाला गया था
2️⃣ जिस समय ये घटना हुई नेहरू की उम्र 3 साल थी
देश का दुर्भाग्य है कि ये विपक्ष का नेता है, क्या स्तर होगा उनका जो इसको अपना नेता मानते हैं
इस वीडियो को देखने के बाद अभी भी कुछ लोग इस प्राणी को प्रधानमंत्री देखना चाहते है।
पर हमारे कई राज्य के विपक्ष के नेता उसको घास भी नहीं डालते।
सिर्फ महामुर्ख और चरण चाटक को ही पप्पू में भविष्य दिखता है

सब तो ममता बनर्जी को छोड़कर जा ही रहे थे लेकिन ये सब मैं क्या सुन रहा हूं?सयानी घोष भी बागी हो गई हैं क्या?हाय रे राजनीत...
10/06/2026

सब तो ममता बनर्जी को छोड़कर जा ही रहे थे लेकिन ये सब मैं क्या सुन रहा हूं?

सयानी घोष भी बागी हो गई हैं क्या?

हाय रे राजनीति, अभी कुछ दिन पहले ही एक इंटरव्यू में सयानी घोष ने बड़े कॉन्फिडेंस और एटीट्यूड में बोला था कि

मैं चड्ढा नहीं हूं जो चड्डी बन जाऊंगी, घोष हमेशा घोष ही रहेगा।

आज खबर आ रही है कि ये भी उन 20 बागी सांसदों में शामिल हैं जो कुछ दिन पहले NDA की तरफ झुक गए थे।

05/05/2026

1998 से 2004 तक देशी-विदेशी मीडिया का एक बड़ा वर्ग लगातार यही नैरेटिव गढ़ता रहा कि “हिंदुत्ववादी” सत्ता में आए हैं तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा… सत्ता हस्तांतरण मुश्किल हो जाएगा… संस्थाएं दबाव में आ जाएंगी… और भारत किसी कथित “फासीवादी” दौर में प्रवेश कर जाएगा।

पन्नों पर पन्ने रंगे गए, टीवी डिबेट्स में भय बेचा गया, और दुनिया को बताया गया कि भाजपा अगर हार गई तो शायद सत्ता इतनी सहजता से छोड़ेगी नहीं।

लेकिन 2004 आया… अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हारे… और बिना किसी नाटक, बिना किसी विक्टिम कार्ड, बिना संस्थाओं पर ठीकरा फोड़े… उन्होंने गरिमा के साथ सत्ता छोड़ी। यही लोकतंत्र की असली मर्यादा थी। हार को स्वीकार करना, जनादेश का सम्मान करना और शालीनता से विपक्ष की भूमिका निभाना।

अब ज़रा आज का दृश्य देखिए।

जो लोग खुद को लोकतंत्र और संविधान का सबसे बड़ा प्रहरी बताते नहीं थकते वही हार सामने आते ही ईवीएम, एजेंसियां, सिस्टम, साजिश…. हर बहाना ढूंढने लगे।

और अब जब ममता बनर्जी जैसी तथाकथित “लिबरल आइकन” हार स्वीकारने के बजाय कुर्सी नहीं छोड़ने की धमकी दे रहीं हैं।

तो सवाल सीधा है: फासीवाद का डर वास्तव में किससे था?

उनसे जिन्होंने हारकर भी लोकतंत्र की लाज रखी?
या उनसे जो लोकतंत्र की बातें तो करते हैं पर जनादेश प्रतिकूल आते ही उसे मानने से कतराते हैं?

सच यह है कि भारत की जनता अब इस दोहरे मापदंड को समझ चुकी है।
एक दौर था जब “हिंदुत्व” को लोकतंत्र के लिए खतरा बताकर डर फैलाया गया… और एक आज का दौर है, जब तथाकथित सेक्युलर लिबरल चेहरों की सत्तालालसा खुद लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा ले रही है और जनता सब देख रही है की कौन वास्तव में लोकतंत्रवादी है और कौन सिर्फ सत्ता तक सीमित।

04/05/2026

डीडी बता रही हैं कि उन्हें पहले धक्का मारा और फिर लातों से पीटा गया है!

हे भगवान काश कि इस बार ये बिल्कुल सच हों..!!

मोटाभाई ने तो पहले ही कह दिया था : हिसाब लेने में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी ...बंगाल के सचिवालय से लेकर सरकारी दफ्तरों ...
04/05/2026

मोटाभाई ने तो पहले ही कह दिया था : हिसाब लेने में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी ...

बंगाल के सचिवालय से लेकर सरकारी दफ्तरों पर केंद्रीय सुरक्षा बल ने अपना कब्जा जमा लिया है और बंगाल के मुख्य सचिव ने एक आदेश आज पारित किया है ...

किसी भी सरकारी फाइल को ऑफिस से बाहर ले जाने पर, उसको नुकसान पहुंचाने पर, उसे इधर या उधर करने पर, उनकी फोटो कॉपी या स्कैन करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
जो ये कृत्य हुआ तो उस विभाग के सीनियर अधिकारी की जवाब दही तय की गई है ...

ममता बनर्जी के भतीजे ने सबसे ज्यादा करप्शन किया है और चुनाव के दौरान बहुत फुदक भी रहा था, अब उसका हिसाब होना तय है !!

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