18/03/2026
भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाले चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान की युद्ध से धम्मघोष तक की अद्भुत यात्रा
भारतीय इतिहास में यदि किसी शासक ने शक्ति, शासन, करुणा और मानवता का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है तो वह चक्रवर्ती सम्राट असोक महान हैं वे महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और महाराज बिंदुसार के पुत्र थे। लगभग 268 ईसा पूर्व में उन्होंने मगध साम्राज्य की गद्दी संभाली और अपने पराक्रम, प्रशासन और नीतियों से भारत को एक विशाल और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित किये।
सम्राट असोक का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक, और पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक फैला हुआ था। वे एक शक्तिशाली और पराक्रमी राजा थे, जिन्होंने अपने साम्राज्य को मजबूत बनाने के लिए कई युद्ध लड़े और एक भी युद्ध नहीं हारे।
सम्राट असोक के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना कलिंग युद्ध थी, जो लगभग 261 ईसा पूर्व में हुआ। यह युद्ध आज के ओडिशा क्षेत्र में लड़ा गया था। कलिंग युद्ध से उनका हृदय परिवर्तन हुआ। इसी घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने साम्राज्य विस्तार का मार्ग त्याग कर घम्मघोष का रास्ता चुने। और अपने शासन की नीति को “धम्म” अर्थात नैतिक जीवन पर आधारित लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना किये। उनका धम्म किसी एक धर्म/सम्प्रदाय तक सीमित नहीं था, बल्कि वह मानवता, करुणा, अहिंसा, सहिष्णुता और सभी धर्मों के सम्मान पर आधारित था।
सम्राट असोक ने अपने शासनकाल में जनता के कल्याण के लिए अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने सड़कों का निर्माण कराया, यात्रियों के लिए सराय बनवाई, जगह-जगह कुएँ और तालाब खुदवाए तथा मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सालय बनवाए। उन्होंने सड़कों के किनारे पेड़ लगवाए ताकि यात्रियों को छाया मिल सके। असोक ने प्रशासन को न्यायपूर्ण और जनकल्याणकारी बनाया।
सम्राट असोक महान ने बुद्ध धम्म के प्रचार -प्रसार के लिए अपने पुत्र महाथेर महिन्द (महेंद्र) और पुत्री महाथेरी संघमित्ता (संघमित्रा) को श्रीलंका भेजे। उनके प्रयासों से तथागत बुद्ध का धम्म भारत के साथ-साथ एशिया के कई देशों श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार थाईलैंड से होते हुए लगभग पूरी दुनिया तक पहुँच गया।
आधुनिक भारत में भी सम्राट असोक की गौरवशाली विरासत स्पष्ट रूप से आज भी दिखाई देती है भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ के असोक स्तंभ से लिया गया है, जिसमें चार सिंह चारों दिशाओं में खड़े दिखाई देते हैं। यह शक्ति, साहस, गर्व और आत्मविश्वास का प्रतीक है। इसके नीचे लिखा "सत्यमेव जयते” सत्य की विजय का संदेश देता है।
भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के मध्य में बना 24 तीलियों वाला नीला असोक चक्र धर्म, न्याय, गति और प्रगति का प्रतीक है। भारतीय संविधान में भी समानता, धार्मिक सहिष्णुता, न्याय और कल्याणकारी राज्य की भावना देखने को मिलती है, जो काफी हद तक सम्राट असोक की शासन नीतियों से प्रेरित मानी जाती है हम यह कह सकते हैं वर्तमान भारतीय संविधान सम्राट असोक महान के शिलालेखों का दस्तावेज है।
सम्राट असोक को महान इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने केवल साम्राज्य का विस्तार ही नहीं किया, बल्कि मानवता, करुणा और नैतिकता को शासन का आधार बनाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची विजय तलवार से नहीं बल्कि दया, सत्य और धम्म से प्राप्त होती है। इस प्रकार चक्रवर्ती सम्राट असोक महान केवल भारत के ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास के महानतम शासकों में प्रथम स्थान रखते हैं। उनका जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि शक्ति का सर्वोत्तम उपयोग मानवता और शांति की स्थापना के लिए होना चाहिए।
आओ 26 मार्च 2026 को सम्राट असोक महान जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाएं, घर घर खीर बनाएं ।
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