15/11/2017
सामन्त
कुंवर अवधेश शेखावत (धमोरा) कि कलम से✍
पिछले कुछ दिनों से व्यस्थता के कारण कुछ लिख नहीं पाया लेकिन हम सभी को विदित है कि कुछ दिनों से देश में राजनितिक व सामाजिक हलचल चल रही है । विषय है - पद्मावती फिल्म । हर विषय की भांति इस विषय पर भी पक्ष व विपक्ष दोनों हैं । वाद विवाद, चर्चा, तथ्यात्मक विचार विमर्श, तर्क वितर्क एक अच्छे वातावरण की निशानी है लेकिन किसी के प्रति द्वेष भावना रखना आपकी गिरी हुई मानसिकता को दर्शाता है ।
कुछ लोग कह रहे हैं कि आप कानूनी तरीके से लड़ो तो भाई कानूनी तरीके से तो सलमान खान का केश भी लड़ा गया था न ? क्या हुआ नतीजा हमारे सामने है । आज भारत की कानून व्यवस्था कैसी है ये हमसे छुपी हुई नहीं है । फिर भी आप देखिए की हर बार क्षत्रिय समाज लोकतान्त्रिक तरीके से और कानूनी तरीके से ही अपनी मांग करता रहा है ।
और हां आपकी कानूनी आग्रह के लिए बता दूं कि ये मेवाड़ महाराज का कानूनी अधिकार है कि वो अपनी दादीसा व दादोसा पर फिल्म बनाने की इजाजत दें या ना दें ।
ये जनता जरा तस्सली से बैठकर सोचे की 50,000 की भीड़ जैसलमेर में चतर सिंह को न्याय दिलाने के लिए एकत्रित हुई थी । तब इस सरकार ने, इस देश की कानून व्यवस्था ने विश्वास दिलाया कि चतर सिंह के साथ न्याय होगा तो वो भीड़ शांति पूर्ण तरीके से अपने घर लौट आई । इसके बाद लगभग 3 लाख की भीड़ सांवराद में एकत्रित हुई आंनदपाल के प्रकरण में । वो भीड़ मांग कर रही थी अपने मौलिक अधिकारों की, अपने मानवाधिकारों की, अपने न्यायिक अधिकारों की लेकिन उस भीड़ को मिली गोलियां । फिर भी गोलियां खाकर 2 लोगों की शहादत देकर भी वो भीड़ शांति से घर लौट आई, रास्ते में उस भीड़ ने किसी का 1 रु का नुकसान नहीं किया । उसके बाद भी इस सरकार ने, इस देश की कानून व्यवस्था ने आश्वासन दिया की सभी मांगे मानी जाएगी आपको न्याय मिलेगा । लेकिन इस लोकतान्त्रिक देश की न्याय व्यवस्था ने क्या दिया ? आप स्वयं विचार करें ।
एक दौर था जब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कमोबेश हर फिल्म में एक ठाकुर साहब दिखाए गए जो बेहद अय्याश, लूटेरे, अस्मत से खेलने वाले, घरो में आग लगाने वाले और दुसरो के हको पर डाका डालने वाले होते थे । हुमने वो सब देखा लेकिन आपकी अभिव्यक्ति की आजादी पर अंगुली नहीं उठाई, ना ही किसी की कला में बाधा बने लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं की अब आप देश की गौरव माँ पद्मावती पर कुछ भी उल जुलूल दिखाओगे ।
जिस लोकतंत्र और कानूनों की आप बात कर रहे हो वो लोकतंत्र और एक भारत इन क्षत्रियों के सहयोग से ही बना है वरन 1947 में अंग्रेजो ने केवल भारत और पाकिस्तान को आजाद नहीं किया था उन्होंने 550 से ज्यादा देश आजाद किए थे । हर रियासत के पास ये विकल्प था कि वो भारत में जाए या पाकिस्तान में या स्वतंत्र देश बनाए । तब जूनागढ़, जम्मू, हैदराबाद व भोपाल के अलावा सभी ने बिना किसी सैन्य दवाब के अपनी रियासतें इस लोकतंत्र के लिए दे दी एक कागच पर हस्ताक्षर करके । इतना ही नहीं आजादी के बाद भी सबसे अधिक शहीद देने वाली कॉम है - क्षत्रिय । सबसे ज्यादा परमवीर चक्र इसी कॉम के नाम है । क्या देश की आर्मी में सबसे ज्यादा सैनिक देने वाली कॉम गैर लोकतान्त्रिक हो सकती है ? आप स्वयं विचार करें ।
इतना सब होने के बाद भी आप देखिए परसों 12 तारिख को रतलाम (म.प्र.) की सड़कों पर श्री राष्ट्रीय राजपूत करनी सेना के नेतृत्व में 2 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे और पद्मावती के विरोध में शांति पूर्ण विरोध किया और शांति से घर लौट आए । उसी दिन 12 तारीख को करनी सेना के संरक्षक कालवी साहब के नेतृत्व में लगभग 2 लाख की भीड़ गांधीनगर (गुजरात) में एकत्रित हुई पद्मावती के विरोध में, शांतिपूर्ण तरीके से विरोध सभा हुई और शांति पूर्ण तरीके से वापस घर लौट आए । उसी दिन 12 तारीख को ही राज शेखावत जी के नेतृत्व में लगभग 50,000 की भीड़ सूरत (गुजरात) की सड़कों पर उतरी पद्मावती के विरोध में, ज्ञापन दिया और शांति से घर लौट आई । क्यों ? क्योंकि ये न्यायपसन्द और शांति प्रिय लोगों की भीड़ थी । वरना ये लाखों की भीड़ जिन रास्तों से गुजरी उनको नेस्तानबूध कर सकती थी । लेकिन नहीं ये क्षत्रियों की भीड़ थी उन लोगों की भीड़ जिन्होंने इस देश के लिए त्याग किया है और आज भी कर रहे हैं ।
अब आप ही बता दें कि इससे ज्यादा लोकतान्त्रिक कैसे बनें ? नक्सलियों की तरह हथियार उठाकर ? या हरियाणा की तरह आंदोलन के नाम पर बहिन बेटियों की अस्मत लूट कर ? या गुर्जरों की भांति पटरियां उखाड़कर ? या कश्मीरियों की भांति बोम फोड़कर ? या माओवादियों की तरह ? जवाब जरुर देंवे लेकिन केवल सभ्य भाषा में ।
- कुंवर अवधेश शेखावत (धमोरा) ाही