27/04/2026
ध्यान साधना में हमे जिन समस्याओ का सामना करना पड़ता है वो है विचार, भावनायें, कल्पनाएं, स्मृतियां।
अगर ये थोड़ी देर के लिए भी शांत हो जाए तो हम अपने अंदर गहराई में जा सकते हैं। ध्यान का मुख्य लक्ष्य ही चित्त को विचारो से मुक्त करना अथार्थ निर्विचार अवस्था। इस अवस्था को पाने के लिए सभी गुरुओ ने साक्षी भाव पर जोर दिया है।
हम अपने जीवन में हमारे साथ जो भी होता है अच्छा या बुरा। वो सब स्मृतियां खास कर बुरे अनुभव जिनको हम भूल नही पाते है या कह लो भूलना ही नही चाहते है। बार बार सरफेस पर आ जाते है। जिसके कारण हम दुखी होते है। और सब से कमाल की बात है जीवन के अच्छे सुखदाई अनुभव हमे कम ही याद रहते है।
बाहरी दुनिया की गतिविधियों के कारण चित्त पर हमेशा विचारों का जाल बना ही रहता है है। जिस के कारण हमारी चेतना कुछ समझ ही नही पाती। यह अशुद्धि ही हमारे सभी दुखों का मूल कारण है। इसलिएआंतरिक स्वच्छता साधने का एक ही मार्ग है वो है साक्षीभाव। अगर हम चीज़ों को द्रष्टा बनकर देखें तो उससे दूरी निर्मित हो जाती है। जैसे कोई आपसे अपमानजनक शब्द कहे तो आपके भीतर क्रोध की तरंगे पैदा होती है। यदि आप सजग होंगे तो आप चुपचाप इस घटना को शांतिपूर्वक देख सकते हैं कि किस प्रकार वह व्यक्ति नाराज होकर अपशब्द का प्रयोग कर रहा है। तब आपके भीतर बोध जगेगा कि वह व्यक्ति जो भी कर रहा है, वह अपनी भावदशा के कारण कर रहा है, जो उसकी समस्या है। इतने ख्याल मात्र से आपकी शांति खंडित होने से बच जाती है और आप क्रोध की लहरों से अछूते रह जाते हैं। चैतन्य की साधना का अर्थ ही है-निर्विचार जागरूकता में डूबना है। दिलचस्प बात यह है कि जो विचारों को देखना शुरू करेगा, वह विचारों से अलग हो ही जाएगा, क्योंकि यह जो साक्षी है वह हमारे मन की क्रियाओं का हिस्सा नहीं है। जिसको हम जानते हैं, उससे हम अलग हो जाते हैं।
अगर आप प्रशंसा से प्रफुल्लित होते हैं, तब भी आपके चित्त की निर्मलता तरंगित होगी। साक्षीभाव का अभ्यास हमें अपनी गहराई से हटने नहीं देता है। एक बार यह स्थिरता प्राप्त हो जाए, फिर प्रशंसा से भी आप पर कोई असर नहीं पड़ता। आपके भीतर स्थायी शांति होगी। निर्मल चित्त ही सत्य की अनुभूति कर पाता है।
जिस क्षण आपने 'साक्षी' को पुकारा, जिस क्षण आप अपने भीतर होश को लेकर आए, जिस क्षण आपने जलाई भीतर की ज्योति उसी क्षण सवेरा। रोज एक घंटा ध्यान और दिन भर की सारी क्रियाओं में अपने भीतर होश को जगाए रखना यह अनुभव में रहना कि मैं कर्ता नहीं, भोगता नहीं, सिर्फ देखने वाला हूं। 'साक्षी' मात्र हूं। यही है 'साक्षी' की साधना।
जो है, जैसा है, उसके प्रति जागें, जागरूक हों। कोई निर्णय न लें, कोई नियंत्रण न करें, किसी संघर्ष में न पड़ें। बस, मौन होकर देखें। देखना ही, यह साक्षी होना ही मुक्ति बन जाता है।
एकाग्र मन से किसी भी चीज़ को अपने मन में बिना कोई विचार लाए सिर्फ देखने को उस वस्तु के प्रति साक्षी भाव में होना कहते है। साक्षी का मतलब किसी भी चीज़, अवस्था या घटना को देखना और ख़ुद उसका प्रत्यक्ष प्रमाण बनना होता है। अब ऐसा नहीं होता कि हम किसी व्यक्ति या वस्तु को देखे और हमारे मन में कोई विचार ना आएं।
कितना आसानी से कह देते है मन मे कोई विचार न लाये। पर विचार तो आते ही रहते है। अब इसको इस बात से समझे।
आप की आंखों के पीछे से बाहर की दुनिया को को देख रहा है। वो है आप की चेतना। (consiousness)। सिर्फ देखिये उसका अपने मन और मस्तिष्क पर असर न होने दे। एक साक्षी (witness)की तरह देखे।
और साक्षितव को साधने के लिए क्रिया योग की क्रियाओं का अभ्यास निरंतर करे। तभी साक्षितत्व सधेगा।
अपनी सांसो के प्रति अवेयर रहे। अपने शरीर की हर हरकत के प्रति अवेयर हो जाये। आप कैसे चलते है कैसे बैठते है कैसे खाते है कैसे बात करते है। पूरी तरह अपने शरीर की हर गतिविधि नोटिस करे।
Astro Healer Spiritual Mentor Meenaa Kumari
9050306339