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महाबंध के अभ्यास से व्यक्ति योगी बनता है। वाणी में शुद्धता आती है वाक् सिद्धि होती है। शरीर पर सूर्य जैसा तेज   आने लगती...
30/04/2026

महाबंध के अभ्यास से व्यक्ति योगी बनता है। वाणी में शुद्धता आती है वाक् सिद्धि होती है। शरीर पर सूर्य जैसा तेज आने लगती है। औरा बढ़ने लगता है। मस्तिष्क में सकारात्मक विचारों का सृजन होने लगता है।जीवन में स्थिरता(stability) आने लगती है। जीवन सुंदर लगने लगता है।
Astro Healer Spiritual Mentor Panch tatav Founder Meena Kumari 9050306339 #वायरल

29/04/2026

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28/04/2026

सत्य नाम आदेश गुरु काॐ गुरु गोरखनाथ नमःअलख निरंजन , ॐ शिव गोरख।
28/04/2026

सत्य नाम आदेश गुरु का
ॐ गुरु गोरखनाथ नमः
अलख निरंजन , ॐ शिव गोरख।

दग्धा राशि और  गण्डान्त राशियाँ सूर्य द्वारा निर्मित होती हैं, नक्षत्र चंद्रमा द्वारा निर्मित होते हैं।सूर्य अग्नि का स्...
28/04/2026

दग्धा राशि और गण्डान्त

राशियाँ सूर्य द्वारा निर्मित होती हैं, नक्षत्र चंद्रमा द्वारा निर्मित होते हैं।

सूर्य अग्नि का स्रोत है, चंद्रमा जल का स्रोत है।

अग्नि और जल के मिलन से गण्डान्त बनता है अग्नि और जल राशियों के बीच एक खतरनाक संधि।

तिथि सूर्य-अग्नि और चंद्रमा-जल के बीच का 'संबंध' है।

पूर्णिमा और अमावस्या को छोड़कर प्रत्येक तिथि में दग्धा राशि होती है। इन दोनों तिथियों में राशियाँ क्रमशः विष्णु (शुक्ल पक्ष) और रुद्र (कृष्ण पक्ष) द्वारा संरक्षित होती हैं। अन्य तिथियाँ, सूर्य-अग्नि, जो जलती हुई मंगल ऊर्जा के समान है, दो या अधिक राशियों में फैल जाती है जिससे उन्हें और उनके स्वामियों को काफी नुकसान पहुँचता है।
#नक्षत्र #वायरल

ध्यान साधना में हमे जिन समस्याओ का सामना करना पड़ता है वो है विचार, भावनायें, कल्पनाएं, स्मृतियां।अगर  ये थोड़ी देर के लि...
27/04/2026

ध्यान साधना में हमे जिन समस्याओ का सामना करना पड़ता है वो है विचार, भावनायें, कल्पनाएं, स्मृतियां।
अगर ये थोड़ी देर के लिए भी शांत हो जाए तो हम अपने अंदर गहराई में जा सकते हैं। ध्यान का मुख्य लक्ष्य ही चित्त को विचारो से मुक्त करना अथार्थ निर्विचार अवस्था। इस अवस्था को पाने के लिए सभी गुरुओ ने साक्षी भाव पर जोर दिया है।
हम अपने जीवन में हमारे साथ जो भी होता है अच्छा या बुरा। वो सब स्मृतियां खास कर बुरे अनुभव जिनको हम भूल नही पाते है या कह लो भूलना ही नही चाहते है। बार बार सरफेस पर आ जाते है। जिसके कारण हम दुखी होते है। और सब से कमाल की बात है जीवन के अच्छे सुखदाई अनुभव हमे कम ही याद रहते है।
बाहरी दुनिया की गतिविधियों के कारण चित्त पर हमेशा विचारों का जाल बना ही रहता है है। जिस के कारण हमारी चेतना कुछ समझ ही नही पाती। यह अशुद्धि ही हमारे सभी दुखों का मूल कारण है। इसलिएआंतरिक स्वच्छता साधने का एक ही मार्ग है वो है साक्षीभाव। अगर हम चीज़ों को द्रष्टा बनकर देखें तो उससे दूरी निर्मित हो जाती है। जैसे कोई आपसे अपमानजनक शब्द कहे तो आपके भीतर क्रोध की तरंगे पैदा होती है। यदि आप सजग होंगे तो आप चुपचाप इस घटना को शांतिपूर्वक देख सकते हैं कि किस प्रकार वह व्यक्ति नाराज होकर अपशब्द का प्रयोग कर रहा है। तब आपके भीतर बोध जगेगा कि वह व्यक्ति जो भी कर रहा है, वह अपनी भावदशा के कारण कर रहा है, जो उसकी समस्या है। इतने ख्याल मात्र से आपकी शांति खंडित होने से बच जाती है और आप क्रोध की लहरों से अछूते रह जाते हैं। चैतन्य की साधना का अर्थ ही है-निर्विचार जागरूकता में डूबना है। दिलचस्प बात यह है कि जो विचारों को देखना शुरू करेगा, वह विचारों से अलग हो ही जाएगा, क्योंकि यह जो साक्षी है वह हमारे मन की क्रियाओं का हिस्सा नहीं है। जिसको हम जानते हैं, उससे हम अलग हो जाते हैं।

अगर आप प्रशंसा से प्रफुल्लित होते हैं, तब भी आपके चित्त की निर्मलता तरंगित होगी। साक्षीभाव का अभ्यास हमें अपनी गहराई से हटने नहीं देता है। एक बार यह स्थिरता प्राप्त हो जाए, फिर प्रशंसा से भी आप पर कोई असर नहीं पड़ता। आपके भीतर स्थायी शांति होगी। निर्मल चित्त ही सत्य की अनुभूति कर पाता है।
जिस क्षण आपने 'साक्षी' को पुकारा, जिस क्षण आप अपने भीतर होश को लेकर आए, जिस क्षण आपने जलाई भीतर की ज्योति उसी क्षण सवेरा। रोज एक घंटा ध्यान और दिन भर की सारी क्रियाओं में अपने भीतर होश को जगाए रखना यह अनुभव में रहना कि मैं कर्ता नहीं, भोगता नहीं, सिर्फ देखने वाला हूं। 'साक्षी' मात्र हूं। यही है 'साक्षी' की साधना।
जो है, जैसा है, उसके प्रति जागें, जागरूक हों। कोई निर्णय न लें, कोई नियंत्रण न करें, किसी संघर्ष में न पड़ें। बस, मौन होकर देखें। देखना ही, यह साक्षी होना ही मुक्ति बन जाता है।
एकाग्र मन से किसी भी चीज़ को अपने मन में बिना कोई विचार लाए सिर्फ देखने को उस वस्तु के प्रति साक्षी भाव में होना कहते है। साक्षी का मतलब किसी भी चीज़, अवस्था या घटना को देखना और ख़ुद उसका प्रत्यक्ष प्रमाण बनना होता है। अब ऐसा नहीं होता कि हम किसी व्यक्ति या वस्तु को देखे और हमारे मन में कोई विचार ना आएं।
कितना आसानी से कह देते है मन मे कोई विचार न लाये। पर विचार तो आते ही रहते है। अब इसको इस बात से समझे।
आप की आंखों के पीछे से बाहर की दुनिया को को देख रहा है। वो है आप की चेतना। (consiousness)। सिर्फ देखिये उसका अपने मन और मस्तिष्क पर असर न होने दे। एक साक्षी (witness)की तरह देखे।
और साक्षितव को साधने के लिए क्रिया योग की क्रियाओं का अभ्यास निरंतर करे। तभी साक्षितत्व सधेगा।
अपनी सांसो के प्रति अवेयर रहे। अपने शरीर की हर हरकत के प्रति अवेयर हो जाये। आप कैसे चलते है कैसे बैठते है कैसे खाते है कैसे बात करते है। पूरी तरह अपने शरीर की हर गतिविधि नोटिस करे।

Astro Healer Spiritual Mentor Meenaa Kumari
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क्रिया योग
26/04/2026

क्रिया योग

महाबंध (Maha Bandha) एक उन्नत योग क्रिया है, जिससे व्यक्ति योगी बन सकता है लेकिन महाबंध करने से पहले ख़ुद को तैयार करना ...
25/04/2026

महाबंध (Maha Bandha) एक उन्नत योग क्रिया है, जिससे व्यक्ति योगी बन सकता है लेकिन महाबंध करने से पहले ख़ुद को तैयार करना पड़ता है पहले प्राणायाम करें । खासकर दो प्राणायाम कपालभाति एवं अनुलोम विलोम । कम से कम 15 15 मिनट। अगर इसके बिना आप बंध लगाते है तो शरीर को नुकसान हो सकता है।महाबंध में मूलबंध, उड्डियान बंध और जालंधर बंध का एक साथ अभ्यास किया जाता है। प्राणमय शरीर को ऊर्जा से भर देता है । नाड़ियों को शुद्ध करने, रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से ऊर्जा को ऊपर उठाने और मन को शांत कर कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में मदद करता है। इस से आप की ऊर्जा उर्ध्वगामी हो जाती है जो सभी चक्रों का भेदन करते हुए सहस्रारचक्र पर स्थापित होकर निर्वाण की प्राप्ति करवाती है।

महाबंध कैसे करते है आइए जानते है।
स्थिति: सुखासन या पद्मासन में बैठें, रीढ़ की हड्डी सीधी रखें और हथेलियों को घुटनों पर रखें। अपने हिप्स के नीचे तकिया रख सकते है।
श्वास: लंबी गहरी गहरी सांस लें (पूरक), फिर पूरी सांस बाहर छोड़ें (रेचक)। सात बार सांस नाक से ले और मुंह से छोड़े। ऐसा करने पर शरीर की नकारात्मक ऊर्जा शरीर से बाहर हो जाती है।
मूलबंध लगाए पहले अपनी गुदा यानि मलद्वार को अंदर की तरफ खींचे। रोक ले। इसके बाद
उड्डियान बंध लगाए पेट की मांसपेशियों को अंदर-ऊपर की ओर खींचें। सांस को बाहर निकाल कर रोक ले और और फिर
जालंधर बंध लगाए। ठोड़ी को छाती से लगाएं।
10 से 20 सेकंड तक। या आप की जितनी क्षमता हो सांस को रोक सकते है । शुरुआत में 10 से 20 सेकंड तक करना ही उचित होता है धीरे धीरे बढ़ाते जाए।

समापन: पहले जालंधर बंध खोले फिर
सांस ले यानि जब हम सांस लेंगे तो उड्डियान बंध खुलेगा फिर मूलबंध खोल दे। शांत होकर बैठें और गहरी सांस लें।

महाबंध के मुख्य लाभ:इस अभ्यास से व्यक्ति योगी बनता है स्वयं को जानने की क्रिया शुरू होती हैं। मन शांत होता चला जाता है । तनाव खत्म होने लगता है चीजों को अच्छे से समझने की समझ आने लगती है।हर प्रतिकूल परिस्थिति को हल करने का ज्ञान आने लगता है।आपके
हार्मोनल संतुलित हो जाते है अंतःस्रावी तंत्र स्वस्थ होने लगता है।
पाचन शक्ति (मेटाबॉलिज्म सिस्टम) में सुधार होने लगता है।
एंटी-एजिंग: शरीर की कोशिकाओं को पुनर्जीवित हो जाती है काया कल्प होने लगता है।
सावधानियां:
उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अल्सर या गर्भावस्था में इसका अभ्यास न करें। Astro,Mobile Numerologist Healer, Spiritual Mentor and Founder of Panch Tatav Meena Kumari 9050306339

मुख बन्धन मंत्र। गुरु गोरख नाथ जी द्वारा रचित।ॐ शिव गोरख।
24/04/2026

मुख बन्धन मंत्र।
गुरु गोरख नाथ जी द्वारा रचित।
ॐ शिव गोरख।

23/04/2026

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20/04/2026

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