11/11/2025
उसका नाम अशोक कुमार था। दिल्ली के जगतपुरा में वह अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ रहता था। उसकी मां अमरोहा के एक गाँव में अपने बड़े पुत्र सुभाष के पास रह रही थीं, जो बीमारी के कारण काम करने में असमर्थ थे। ऐसे में पूरे आठ लोगों की देखभाल एक ही कंधे पर थी — दिन भर डीटीसी बस में कंडक्टर का काम और रात में सुरक्षा गार्ड की ड्यूटी। दिन-रात मेहनत, एक शब्द का शिकायत तक नहीं, क्योंकि जिम्मेदारी की असली तस्वीर अक्सर चुप्पी में ही दिखती है — silently लड़ना, परिवार को संभाले रखना।
कल रात रेड फ़ोर्ट पर हुए आतंकी हमले में अशोक की जान चली गई। कागज़ों पर शायद वह बस एक और “शिकार” लिखा जाएगा, पर हकीकत यह है कि एक पूरा परिवार अँधेरे में धँस गया है। पत्नी का बिखरा हुआ दुख, बच्चों की भूखी निगाहें, मां का टूटा हुआ दिल — सब कुछ उजड़ गया। यह क्रूरता और अन्याय क्या हासिल करने के लिए है? ऐसे निर्दोष लोगों को मार कर कौन सा मकसद पूरा होता है? ये वही लोग हैं जो अपनी रोज़मर्रा की जद्दोजहद में लगे रहते हैं, अपने परिवार के सपनों को पूरा करने की कोशिश करते हैं — नफ़रत नहीं, केवल प्यार बांटते रहे हैं।
सोचकर गुस्सा उठता है उन ड़ाकुओं पर जो छिपकर वार करते हैं। और सबसे कड़वा तथ्य यह है कि इन हमलों के पीछे वही लोग थे जिन्हें जान बचाने की शिक्षा दी जाती है — डॉक्टर। यह सुनकर दिल पिघल जाता है कि जिन्होंने इंसानियत सिखाई, वे किस कदर भटक गए। ऐसी क्रूरता का कोई औचित्य नहीं।
इन पथभ्रष्टों से क्या मिलेगा — कुछ क्षणिक तुष्टि या इतिहास में एक काला दाग? अशोक जैसे मेहनतकशों की चीखें और उनके परिजनों के आंसू हमें शर्मसार करते हैं। यह सिर्फ आतंकवाद नहीं, यह इंसानियत की हत्या है। हमें अभी जागना होगा — कड़ाई से जांच कराना होगी और कानूनी रूप से कड़ी सज़ा सुनिश्चित करनी होगी ताकि ऐसे अपराधों की जड़ें सूखें।
अशोक को मेरा सलाम। उसके परिवार के साथ न्याय और समर्थन दिलवाना हम सबकी जिम्मेदारी है। # #,